श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३१ ☆

?  आलेख – #लंदन_डायरी जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन के Natural History Museum में आज एक ऐसी आकृति के सामने खड़ा था, जिसे देखकर विज्ञान कुछ और कहता है और मन कुछ और।

काँच के भीतर रखी सफेद, लहरदार संरचना को पहली नजर में देखा तो लगा, यह तो मेरे गणेश जी हैं! गोल-सा उदर, उभरती हुई मुखाकृति, सूँड़ जैसा आकार और दोनों ओर कानों का-सा विस्तार। किसी कुशल शिल्पकार ने मानो श्वेत पत्थर में गजानन को उतार दिया हो।

लेकिन यह किसी मूर्तिकार की बनाई प्रतिमा नहीं है। संग्रहालय इसे Gogotte कहता है, प्राकृतिक रूप से बनी एक विचित्र बलुआ-पत्थर संरचना। यह Lasting Impressions Gallery में प्रदर्शित है, जहाँ संग्रहालय पृथ्वी के अतीत की ऐसी प्राकृतिक वस्तुओं को प्रस्तुत करता है।

संग्रहालय स्वयं Gogotte को लगभग एक “solidified sandstone sculpture” जैसा बताता है। यह नमूना 2017 में संग्रहालय को सर डेविड एटनबरो के 90वें जन्मदिन के सम्मान में दिया गया था।

विज्ञान उसकी रचना की प्रक्रिया समझाता है। मेरी आँखें उसमें गणेश खोज लेती हैं।

यही भारतीय दृष्टि का सौंदर्य है। “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” गणेश को देखने के लिए हमेशा किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा की आवश्यकता नहीं। भारत में किसी वृक्ष के तने की आकृति में वे दिखाई दे जाते हैं, किसी अनगढ़ पत्थर में सूँड़ उभर आती है और किसी चट्टान का प्राकृतिक उभार गजानन का आभास देने लगता है।

गणेश स्वयं प्रकृति और कल्पना के बीच एक सहज सेतु बना देते हैं।

वे हमारे मन में बसते हैं।

मूर्तिकार मिट्टी से गणेश गढ़ता है।

भक्त पत्थर में गणेश देख लेता है।

और कभी-कभी प्रकृति ऐसी आकृति बना देती है कि दोनों के बीच का अंतर ही मिट जाता है।

लंदन में गणेश की यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

कुछ दूरी पर British Museum के संग्रह में भारत से आई गणेश की अनेक प्राचीन प्रतिमाएँ हैं।

 ओडिशा की 12वीं शताब्दी की एक बलुआ-पत्थर प्रतिमा में गणेश चार भुजाओं के साथ कमल पर खड़े हैं और उनके पास उनका वाहन मूषक भी अंकित है। दूसरी, 13वीं शताब्दी की प्रतिमा में गणेश लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। यह पंचमुखी गणेश का अत्यंत विशिष्ट रूप है।

एक और 13वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा, जिसे British Museum ने Figure of Ganesha के रूप में दर्ज किया है, कभी लंदन के Horniman Museum और Brent Museum की Celebrating Ganesha प्रदर्शनियों में भी दिखाई गई थी। यानी लंदन में गणेश केवल किसी प्रवासी समुदाय की धार्मिक आस्था का हिस्सा मात्र नहीं हैं। भारतीय कला के इतिहास और वैश्विक संग्रहालय संस्कृति में भी उनकी अपनी जगह है।

Wimbledon में Shree Ghanapathy Temple है। इसकी कहानी तो जैसे लंदन में गणेश की जीवंत यात्रा है। 1979 में कुछ श्रीलंकाई हिंदू परिवार एक स्थानीय सभागार में गणेश की एक प्रतिमा के साथ नियमित पूजा के लिए जुटने लगे। वही प्रतिमा आज मंदिर की Utsavar Ghanapathy मानी जाती है। 1981 में पुराने Presbyterian Church भवन को रूपांतरित करके मंदिर का महाकुंभाभिषेक हुआ। मंदिर अपने इतिहास में इसे यूरोप का पहला पूर्णतः हिंदू मंदिर बताता है।

यह रोचक है कि पुराने चर्च में अब मंदिर है। इसी तरह पिछले दिनों मैने हैरो में आयोजित कवि गोष्ठी का उल्लेख अपनी डायरी में किया था , वह आयोजन स्थल भी मंदिर है, जो पहले चर्च ही था।

Tejendra Sharma

इस समय तो लंदन में गणेशोत्सव का वातावरण भी है। London Ganesh Utsava Samithi ने 14 से 26 सितंबर 2026 तक प्रतिदिन गणेश पूजा, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और 26 सितंबर को विसर्जन का कार्यक्रम घोषित किया है।

इस तरह एक ही शहर में गणेश के कितने रूप दिखाई देते हैं।

कहीं वे प्रकृति की अनायास रचना हैं।

कहीं सदियों पुराने भारतीय शिल्प में सुरक्षित हैं।

कहीं वे प्रवासी समुदाय की स्मृतियों और आस्था के साथ जीवित हैं।

और संग्रहालय में खड़े हुए मेरे भारतीय मन को अचानक फ्रांस से आए पत्थर में वे परिचित स्वरूप में दर्शन देते हैं।

मुझे आज Natural History Museum की इस Gogotte ने यही सोचने को विवश किया कि शायद आस्था केवल पूजा का विषय नहीं, दृष्टि का भी विषय है।

भूविज्ञानी उस आकृति में पृथ्वी का इतिहास पढ़ता है।कलाकार उसकी आकृतियों में सौंदर्य देखता है।

और भक्त उसमें गणेश दर्शन करता है।

कौन सही है?

शायद प्रश्न ही गलत है।

हर दृष्टि अपने अनुभव का अर्थ लेकर आती है। विज्ञान हमें बताता है कि यह आकृति कैसे बनी। आस्था हमें बताती है कि उसे देखकर हमारे भीतर क्या जागा।

फ्रांस की धरती पर करोड़ों वर्ष पहले बनी इस प्राकृतिक संरचना को लंदन में देखकर मेरे भीतर गणेश जागे।

और मन में यही आया—

गणेश शायद केवल मंदिर में विराजते देवता नहीं हैं। वे उस क्षण में भी हैं, जब हमारी दृष्टि किसी अनगढ़ वस्तु में अर्थ, सौंदर्य और मंगल का आकार पहचान लेती है।

आज मैंने गणेश जी को लंदन में खोजा नहीं।एक प्राकृतिक पत्थर ने मुझे उन्हें दिखा दिया।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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