श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ कविवर डा. सुरेन्द्र लाल साहू निर्विकार  का  खंड काव्य – ‘हे नारी! हे आद्य सुमन!’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

निज पुत्र बलि दे जान बचाई,

धन्य धन्य हे ! पन्ना धाय।

आज जब मैं सुप्रसिद्ध कवि डा.  सुरेन्द्र लाल साहू के खंड काव्य हे नारी ! हे आध्य सुमन! की समीक्षात्मक चर्चा कर रहा हूं तो मुझे अपनी ही काव्य रचना की उपरोक्त पंक्तियां याद आ रही हैं।

डॉ. सुरेंद्र लाल साहू ‘निर्विकार’ द्वारा रचित खंड-काव्य ‘हे नारी! हे आद्य सुमन!’  भी  भारतीय नारी के त्याग  , संघर्ष , संवेदना और  सामाजिक  मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में नारी के गरिमामय  स्वरूप का एक यादगार दस्तावेज है। यह कृति केवल काव्य-संग्रह नहीं, अपितु हमारे राष्ट्रीय समाज के उस  वैचारिक  दर्शन की पड़ताल है जहाँ नारी के  सृजन  और त्याग की प्रेरक  चर्चा की गई है। कवि ने समाज में आ रहे वैचारिक परिवर्तनों और आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच पारिवारिक विघटन एवं नारी जीवन की त्रासदियों को अत्यंत मार्मिक भाषा में  व्यक्त किया है।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आधुनिकता के नाम पर पनप रही प्रवृत्तियों और उनके दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। कवि ने पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण तथा एकल परिवार की अवधारणा से उत्पन्न सामाजिक असंतुलन को बहुत ही तार्किक और वैचारिक धरातल पर रखा है। इसी संवेदनशील परिवेश के बीच जब कवि नारी के अंतर्मन की थाह लेता है, तो उसकी कविताएँ भावनाओं के ज्वार से भर जाती हैं। मन की अदम्य जिज्ञासा और ऊर्जा को व्यक्त करती हुई ये पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं:

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री उठ, ओ मन की तरंग।

लहरों में भर गति उमंग ॥

मदुल स्वरों को सरसाती

ऊर्मि में घुल-मिल समाती…

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‘मरु-थली’ शीर्षक कविता में कवि ने नारी के आंतरिक संताप और वेदना को अत्यंत खूबसूरती से शब्दों में ढाला है। जीवन के पथ पर आने वाले कंटक, राग-द्वेष और छल-छद्म की किरणें किस प्रकार प्राणों को विह्वल करती हैं, इसका जीवंत चित्रण इस खंड में देखने को मिलता है:

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तप्त जीवन मरु-थली में

प्रिय, कौन-सा स्पर्श शीतल

हर लेगा ताप धरा का

जो बरस कर शांत निर्मल।

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यही नहीं, नारी के नयन से बहने वाले अश्रु केवल पानी की बूंदें नहीं हैं, बल्कि वे उसके कठोर संघर्षों से तपे हुए अंतःकरण के वे मोती हैं जो उसकी आंतरिक शक्ति का परिचय देते हैं। ‘मोतियों से आँसू’ कविता में कवि ने बहुत ही दार्शनिक दृष्टिकोण से आँसुओं की सार्थकता को प्रतिपादित किया है:

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आँसू देखे हैं तुमने

जो दृगों से हैं निकलते

मोतियों का रूप धरकर

हैं कपोलों में बिछलते।

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संध्या की शांत बेला और जीवन का श्रम खंड-काव्य के आगे के पड़ाव में प्रकृति और मानव जीवन का अत्यंत रमणीय सामंजस्य दिखाई देता है। ‘संध्या’ कविता के माध्यम से कवि ने प्रकृति के परिवर्तनशील रूपों और परिश्रमी किसानों के जीवन की जीवंत झाँकी प्रस्तुत की है। दिनभर के प्रखर ताप और ऊर्जा के बाद जब संध्या अपनी काली झीनी चादर ओढ़कर धरा पर उतरती है, तो संपूर्ण परिवेश शांत और स्निग्ध हो उठता है:

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फैला किरणों का प्रखर जाल।

यत्र-तत्र अंतरिक्ष में, उड़ रहीं रश्मियाँ अराल।

हरित वसन पहने द्रुमदल, कुसुम लता तरुण-तृमाल…

संध्या है बिखरा रही, काले केशों का तम-जाल

अस्ताचल को बनाकर ढाल।

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आकृति प्रकाशन नयी दिल्ली से प्रकाशित इस कृति में कवि  की 44 काव्य रचनाएं  शामिल हैं। नारी की स्वानुभूत अभिव्यक्ति’ उपखंड के अंतर्गत संकलित ये रचनाएँ पाठक को आत्मावलोकन के लिए विवश करती हैं।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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