डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ एक फोन की रोशनी ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“मम्मी, आज दिवाली पर चाचा लोग नहीं आएँगे?” आठ साल के अंश ने पूछा।
माँ ने दीये सजाते हुए कहा, “नहीं बेटा, इस बार नहीं।”
“क्यों?”
“बस… कुछ बात हो गई थी पापा और चाचा के बीच।”
शाम होते ही पूरा घर रोशनी से जगमगा उठा। मिठाइयाँ सजी थीं, नए कपड़े पहने जा चुके थे और पूजा की तैयारी हो रही थी। फिर भी घर कुछ अधूरा-सा लग रहा था।
अंश ने पूछा, “पिछली दिवाली चाचा यहीं बैठे थे न? और चिंटू के साथ मैं बाहर पटाखे चला रहा था… इस बार वह भी नहीं आएगा?”
पापा ने उसकी ओर देखा, फिर चुपचाप पूजा की थाली ठीक करने लगे।
अंश कुछ सोचकर बोला, “पापा, झगड़ा दिवाली से भी बड़ा होता है क्या?”
पापा के हाथ वहीं रुक गए।
कुछ देर बाद वे बालकनी में गए और फोन मिलाया।
“हैलो…” उधर से आवाज़ आई।
पापा कुछ पल चुप रहे, फिर धीरे से बोले, “पूजा अभी शुरू नहीं हुई है… आ जाओ।”
उधर भी कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर आवाज़ आई –
“भैया… बस दस मिनट में पहुँचता हूँ।”
अंश मुस्कुराते हुए दरवाज़े की ओर दौड़ गया।
उस रात घर के सारे दीये जल चुके थे… बस एक दीया फोन की घंटी के साथ जला था।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






