श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पुरुषार्थ…“।)
अभी अभी # १०९५ ⇒ आलेख – पुरुषार्थ
श्री प्रदीप शर्मा
हमारा समाज पुरुष-प्रधान है!
पुरुषार्थ शब्द पुरुष से जोड़ा गया है। व्याकरण में एक कॉमन जेंडर होता है। आदमी, इंसान और व्यक्ति शब्द वैसे ही प्रयुक्त होता है जैसे जनता! जनता में स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े जैसे शामिल माने जाते हैं, आदमी, इंसान और व्यक्ति का भी प्रयोग स्त्री-पुरुष पर समान रूप से किया जा सकता है। ” जनता ” में मर्द भी होते हैं, और ” भीड़ ” पुरुषों की भी हो सकती है। इंसान को झूठ नहीं बोलना चाहिए, यह सभी पर लागू होता है। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि इन सब शब्दों से पुरुष की ही बू आती है।
मर्दाना की तुलना में अगर हमारे पास मर्दानी शब्द है, तो पुरुष के लिए महिला और नर के लिए नारी। यह भी सच है कि पत्नी के बिना पति शब्द की उत्पत्ति नहीं हो सकती और बच्चे के जन्म के बिना माँ शब्द भी अस्तित्व में नहीं आ पाता।।
हम जिसे हिंदी में प्रयत्न कहते हैं, अंग्रेज़ी में effort कहते हैं, संकल्प शक्ति अथवा determination कहते हैं, जी जान लगाना कहते हैं, अपना सब कुछ दाँव पर जब लग जाता है, और उसका प्रतिफल नज़र आने लगता है, तब जाकर पुरुषार्थ जैसा शब्द सार्थक होता है।
चींटी में भी पुरुषार्थ होता है, और हाथी में भी। जहाँ एक नाज़ुक सी चिड़िया अपने छोटे छोटे पंखों के सहारे आसमान नाप लेती है, वहीं एक हट्टा-कट्टा बलशाली ‘ पुरुष ‘ अगर अपने दोनों पाँव उठा ले, तो पाँवों तले ज़मीन खिसकती नज़र आए। बस यही अंतर है इंसान के पुरुषार्थ और एक पंछी की उड़ान में।।
आप उसे परम पिता, परमेश्वर, प्रभु, ईश्वर, रब, पुरूषोत्तम, ख़ुदा, रहबर, ऊपर वाला, निराकार, निरंजन कुछ भी समझें, वह भगवान अर्थात परम पुरुष ही है जिसे omnipotent, और omnipresent कहा जाता है। मतलब यह कि वह है कोई परम पुरुष ही।
शक्ति के बिना पुरुष अधूरा है, पुरुषार्थ अधूरा है। यह शक्ति का संतुलन ही शिव को शक्ति से जोड़ता है और सृष्टि की रचना होती है। शक्ति-रहित पुरुषार्थ नपुंसकता है। और यही प्रकृति और पुरुष का मेल सृष्टि के सृजन का कारण बनता है।।
पुरूष अगर अहंकार है तो स्त्री समर्पण! एक ओर ममता है तो दूसरी ओर कर्तव्य-पालन।
पुरुष अगर शासक है तो स्त्री प्रशासन। पुरुष घर बना सकता है, लेकिन बिना स्त्री के वह घर, घर नहीं कहला सकता।
एक अधूरापन पुरुष में है, एक अधूरापन स्त्री में। दोनों का मिलन ही पूर्णता है, perfection है। यह संसार स्त्री-पुरुष के पहिए पर ही चल रहा है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं। दोनों में समानता, एक दूसरे के प्रति सम्मान ही सच्चा पुरुषार्थ है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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