श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जानवर और इंसान…“।)
अभी अभी # १०९८ ⇒ आलेख – जानवर और इंसान
श्री प्रदीप शर्मा
इंसान की जानवर से तुलना इंसान का अपमान है! जिस मनुष्य योनि के लिए देवता भी तरसते हों, उसकी तुलना एक जानवर से कैसे की जा सकती है। चौरासी लाख योनियों के फेरे के बाद ही जीव का मनुष्य के रूप में जन्म होता है।
इंसान मुँह से खाना खाता है, जानवर भी मुँह से ही खाता है। लेकिन दोनों के खाने में अंतर है। इंसान कायदे से अपने दोनों हाथों का उपयोग करता है, कभी चम्मच तो कभी फॉर्क, यानी काँटे का उपयोग करता है। वहीं जानवर कहीं भी सीधा जाकर मुँह मार देता है। इंसान को जानवर से तमीज़ सीखने की ज़रूरत नहीं।।
इतना ही नहीं, अधिकतर जानवर या तो माँसाहारी होते हैं, या फिर केवल घास-फूस से ही पेट भर लेते हैं। यह इंसान ही है जो पहले अपने इष्ट को छप्पन पकवानों का भोग लगा, प्रसन्न करता है, बाद में स्वादिष्ट व्यंजनों से अपनी क्षुधा शांत करता है। भोजन को पकाना, और उसे मिर्च-मसालों से सुरुचिपूर्ण, चटपटा बनाना कोई जानवर क्या जाने।
जानवर बेशर्म है, कपड़े नहीं पहनता, स्कूल नहीं जाता, पढ़-लिखकर एक बड़ा जानवर नहीं बन पाता, क्योंकि भगवान ने बुद्धि सिर्फ इंसान को ही दी है, जानवर को नहीं। जानवर को हमेशा जानवर ही रहना है और इंसान को तो भगवान बनना है।।
यही इंसान जब शैतान बन जाता है, संसार में अनाचार, अत्याचार करता है, तो मज़बूर होकर ईश्वर को इस धरती पर जन्म लेना पड़ता है। इंसान ने कई बार जानवर बनने की कोशिश की, लेकिन जानवर हमेशा अपनी हद में रहा। न तो वह देखादेखी मेंइंसान बना, और ना ही हैवान। अपनी हद में रहना ही इंसानियत है, यह जानवर एक जानता है, इंसान नहीं।
कितनी बार सुनने में आता है, यह आदमी इंसान नहीं जानवर है! बड़ा आश्चर्य होता है सुनकर। कभी किसी जानवर ने जंगल में कई घोटाला नहीं किया, रिश्वत नहीं खाई। किसी गीदड़ की हिम्मत नहीं हुई कि जंगल के राजा के सिंहासन पर कब्ज़ा कर ले। जंगल को जंगल बनाये रखने के लिए कई प्रोजेक्ट टाइगर इंसान अमल में लाता है, लेकिन इंसान को केवल इंसान बनाए रखने का उसके पास कोई प्रोजेक्ट नहीं है।।
जंगल और जानवर स्वावलंबी है, तब तक जब तक इंसान वहाँ पाँव नहीं रखता! इंसान के वहाँ पाँव रखते ही, जंगल और जानवर दोनों खतरे में आ जाते हैं। लेकिन बदनाम एक जंगली जानवर ही है, इंसान नहीं। कब तक हम एक इंसान को जानवर कहकर, जानवर को बदनाम करते रहेंगे।
थक- हारकर, मज़बूरी में कभी-कभी हमारे मुख से सत्य निकल ही आता है। इससे तो जानवर ही अच्छा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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