श्री जयपाल
(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘ आधार प्रकाशन से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक । प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।
आज प्रस्तुत है “जयपाल की पांच प्रेम कविताएं”।
☆ “जयपाल की पांच प्रेम कविताएं” ☆ श्री जयपाल ☆
☆ शिकायत ☆
वह लिखती रही प्रेम-पत्र
करती रही शिकायत
जवाब भी मिलता रहा
साथ में मिलती रही शिकायत भी
पर होता रहा इंतजार
इस सबके बावजूद
या यूं कहिए
बची रही शिकायत
बचा रहा इंतजार
बचा रहा प्रेम भी !
☆ प्रेम ☆
प्रेम पर लिखा गया बहुत
कहा भी गया बहुत
पर हर बार रह गया
कुछ अनकहा
कुछ अनलिखा
कुछ रहस्यमयी सा
क्या था वह
जो रह गया हर बार ही
क्या करोगे जानकर !
☆ औरत और पतंग ☆
औरत पतंग बनकर
उड़ लेती है हवा में
हंस लेती है बादलों के साथ
नाच लेती है
अंग-संग उड़ते पक्षियों के
आदमी की नजर बचाकर !
☆ प्रेम से मुठभेड़ ☆
उन्होंने प्रेम-विवाह किया था
वे हर किसी को प्यार करते थे
उनका प्यार कुछ था ही ऐसा
दुःख दर्द में शामिल होते थे
इंसानियत के लिए प्रतिबद्ध
अन्याय के खिलाफ मर मिटने को तैयार
कहते थे इस दुनिया को बदल कर रहेंगे
हर कोई करेगा एक दूसरे से प्यार
ऐसी दुनिया बनाएंगे
कि सब रहेंगे प्रेम से
एक दिन वे निकल पड़े
दुनिया में प्रेम भरने
फिर एक दिन पता चला
पुलिस मुठभेड़ में मारे गए !
☆ तुम ☆
प्रिये !
एक दिन धूप को देखा
हंसते-हँसाते,
खिलते-खिलखिलाते
खेलते हुए बच्चों संग लुका-छिपी
कूदते-फांदते-उछलते हुए
गुनगुनाते हुए पहाड़ी गीत
☆ प्रिये ! ☆
फिर एक दिन धूप को देखा
गुमसुम बेजान सी
बर्फ सी जमी हुई
बंद मकान सी
पत्र-विहीन शाखा सी
प्रिये !
यह धूप थी या तुम थी …!
© श्री जयपाल
संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





