श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आस्था और ग्रीन मोटिवेशन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २६७ ☆ आस्था और ग्रीन मोटिवेशन… ☆
आस्था… यह केवल पूजा की थाली में रखे दीपक की लौ नहीं होती,
आस्था वह शक्ति है जो मनुष्य को अंधेरों में भी रोशनी ढूँढने की प्रेरणा देती है।
और हरियाली… यह केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं,
यह धरती का प्राण, प्रकृति की धड़कन और हमारे जीवन की ऊर्जा है।
आस्था और हरियाली जब एक साथ जुड़ते हैं,
तो मनुष्य के भीतर एक अद्भुत शक्ति जन्म लेती है।
यही शक्ति है ग्रीन मोटिवेशन।
आस्था हमें जोड़ती है, हरियाली हमें जीवित रखती है
जब हम किसी मंदिर, किसी वृक्ष, या किसी पवित्र स्थल पर जाते हैं,
तो मन अपने आप शांत हो जाता है। क्यों?
क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया हर संपर्क,
हमें हमारे मूल से जोड़ता है।
धरती माता से जुड़ी यह भावना ही आस्था है।
और जब इसी आस्था में हम हरियाली का संकल्प जोड़ते हैं,
तो यह आस्था केवल व्यक्तिगत नहीं, समाज का बल बन जाती है।
हर पौधा एक प्रार्थना है, हर वृक्ष एक आशीर्वाद
यदि हम समझ लें कि—
“पेड़ लगाना सिर्फ पर्यावरण का काम नहीं, यह पूजा का एक रूप है।”
तो हर मनुष्य का दृष्टिकोण बदल जाएगा।
एक पौधा लगाना मतलब
धरती को दिया गया श्रद्धा का दीप,
एक वृक्ष को बचाना मतलब
आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीर्वाद छोड़ देना।
आस्था का असली अर्थ ही यही है —
जहाँ हम रहते हैं, जिस हवा को साँस लेते हैं,
उसको पवित्र, सुरक्षित और जीवनदायी बनाना।
ग्रीन मोटिवेशन: आत्मा को जगाने वाली प्रेरणा
ग्रीन मोटिवेशन बाहरी नहीं,
यह भीतर उठने वाला वह भाव है जो कहता है—
“मैं बदलूँगा, तो संसार बदलेगा।”
जब मन में आस्था हो और हाथों में कर्म…
तब कोई कठिनाई बड़ी नहीं लगती।
आज का समय हमसे यही मांग करता है कि
हम अपनी आस्था को केवल मंदिर की सीढ़ियों तक न रखें,
बल्कि हर पेड़, हर पौधे, हर पत्ते तक पहुँचाएँ।
धरती हमारी माता है, और माता को केवल पूजा नहीं, सुरक्षा चाहिए
हम रोज़ माँ को प्रणाम करते हैं,
पर उसी धरती-माता के आँगन में
यदि कूड़ा फेंक दें, पेड़ काट दें,
तो यह कैसी आस्था?
सच्ची भक्ति वही है जिसमें
हम धरती को हरा-भरा रखें,
हवा को स्वच्छ और जीवन को संतुलित बनाएँ।
जब आप पौधा लगाते हैं,
धरती आपको आशीर्वाद देती है—
स्वास्थ्य का, मानसिक शांति का, और समृद्धि का।
अन्ततः आस्था यदि दीपक है, तो हरियाली उसकी लौ
आस्था हमें दिशा देती है।
हरियाली हमें जीवन देती है।
और इन दोनों का संगम ही
एक सुंदर, स्वस्थ और संतुलित भविष्य बनाता है।
आपके मन में जो हरियाली के प्रति सम्मान और प्रेम है,
वह स्वयं में एक साधना है।
ईश्वर आपको यह पुण्य भाव सदैव देता रहे।
आपका हर कदम किसी पौधे की तरह
फलता-फूलता रहे।
आस्था भी बने, हरियाली भी रहे
और जीवन हर दिन अधिक उजला होता जाए।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
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