श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके संतोष के दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८३ ☆

संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

(तुलसी माँ की कथा) 

तुलसी माँ पिछले जनम, थीं वृंदा का रूप |

ईश विष्णु की भक्ति में, खूब गईं थीं डूब |

जालंधर से जब हुआ, वृंदा का सुविवाह  |

वृंदा पत्नी धर्म का, पूर्ण किया निर्वाह ||

देव-असुर  में जब हुआ, बहुत बड़ा संग्राम |

जालंधर भारी पड़ा, मचा खूब कुहराम ||

वृंदा ने तब ही किया, पूजन वंदन ध्यान |

वृंदा पुण्य प्रताप से, हारे देव महान ||

जगदीश्वर से देवता, करने लगे गुहार |

हमें सुरक्षित कीजिये, जालंधर संहार ||

वृंदा जैसी भक्त से, छल पर करें विचार|

कहें विष्णु इस युद्ध में, विजय मिले या हार ||

देव सभी करने लगे, विनती बारम्बार |

विष्णु जी ने तब लिया, जालन्धर आकार ||

पहुँचे वृंदा महल में, धर जालंधर रूप |

पूजा से वृंदा उठीं, इच्छा हुई विरूप  ||

जब वृंदा ने पग छुए, रूठे सब सत्कर्म |

जालन्धर की मृत्यु का, वृंदा समझीं मर्म ||

वृंदा ने जब क्रोध में, दिया विष्णु को श्राप |

बन जाओ पाषाण तुम, हुईं सती चुपचाप ||

उद्भव पावन स्थान पर, तुलसी पादप आप |

बोल उठे यह देख कर, क्षमा करें सब पाप ||

वृंदा के सुसतीत्व को, दिया बहुत सम्मान |

पूजन मेरे संग हो, सदा मिलेगा मान ||

सतवंती की शक्ति से, चकित स्वयं भगवान |

नारी की महिमा बड़ी, उसका हो सम्मान ||

तुलसी शालिग्राम का, करिए साथ विवाह |

एकादश तिथि में मिले, देवाशीष अथाह ||

आँगन तुलसी राखिये, बिन तुलसी घर सून |

रहता मन “संतोष” तब, खुशियाँ होतीं दून ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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