श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बिरज की ग्वालन की व्यथा।)

☆ शशि साहित्य # ३ ☆

? कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

दो दिन बीते ,कान्हा नहीं पहुंचे,

काहे नहीं आया, माखन चोर.. ?

🍚

ए ललना.. तू कहां रह गयो,!

 अब तक क्यों ना आयो रे..

अब तो मैंने नीची कर दी,

क्या मटकी हाथ ना आई रे…

राह तक रही मोरी अखियां,

क्यों बिसरा दी मोरी गलियां..

बेसुध हो रहे प्राण हमारे,

बाट जोहते चांद सितारे,

खो गई रुनझुन पायल से,

बयार ना आई अमराई से..

कान्हा अब तो आजा तू..

ना करुं कभी शिकायत,

अब तोरी मेहतारी से…‍‍।

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments