स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – हमारा प्यारा नगर जबलपुर। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५०

☆ बापू का सपना…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

रेवातट पर बसा जबलपुर पावन प्यारा शहर हमारा

जिसकी मनभावन माटी ने हमें संवारा हमें निखारा

इसके वातावरण वायु जल नभ ने नित ममता बरसाया

इसके शिष्ट समाज सरल ने सदा नया उत्साह बढाया

 *

इसके प्राकृत दृश्य और इतिहास ने नित नये स्वप्न जगाये

इससे प्राप्त विशेष ज्ञान ने पावन सुखद विचार बनाये

 *

भरती है आल्हाद हृदय मे इसकी सुदंर परंपराये

इसकी धार्मिक भावनाओ ने भक्तिभाव के गीत गुजाये

 *

इसकी हर हलचल में दिखता मुझको एक संसार सुहाना

श्वेत श्याम चट्टानो में है भरा प्रकृति का सुखद खजाना

 *

दूर दूर तक फैला दिखता विंध्याचल का हरित वनांचल

कृपा बांटता प्यास बुझाता माँ  रेवा का पावन आंचल

 *

इसकी ही धडकन ने मुझको बना दिया साहित्यिक अनुरागी

संवेदी मन में ज्ञानार्जन की उत्सुकता उत्कण्ठा जागी

 *

यहीं ज्ञान वैराग्य भक्ति तप मे रत है साधू सन्यासी

उद्योगो व्यापारो व्यवसाये में है कर्मठ सब नगर निवासी

 *

शिक्षा रक्षा और चिकित्सा के कई है संस्थान यहाॅ पर

सडक रेल औं वायुयान की यात्राओं हित साधन तत्पर

 *

सहज सुलभ सुविधायें सभी वे जो जीवन हित हैं सुखकारी

बाल युवा वृद्धो के जीवन हित संभव सुविधाये सारी

 *

लगता मेरा शहर मुझे प्रिय अनुपम सब नगरों से ज्यादा

परिवारी स्वजनों से ज्यादा यहाँ सबो का भला इरादा

 *

इसकी सात्विक रूचि से संपोषित है मेरी जीवन धारा

यह ही पालक पोषक और परम प्रिय पावन नगर हमारा

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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