श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पराधीन लोकतंत्र…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४५ ☆
☆ # “पराधीन लोकतंत्र…” # ☆
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हम सीधे-साधे भोले भाले हैं
इस मतलबी दुनिया से बहुत निराले हैं
सभी है मित्र यहां
कोई नहीं अमित्र यहां
हम मित्रता को
दिल से निभाने वाले हैं
जिनके सफेद वस्त्र है
उनके स्याह चरित्र है
उजले उजले है चेहरे
पर दिल के काले काले है
हमने जीवन भर संघर्ष किया
अपने मूल्यों पर उत्कर्ष किया
माथे पर कोई शिकन नहीं
पर पैरों में अभी भी छालें है
हमने ताने सुने तिरस्कार सहा
हमने गालियां सुनी कुछ ना कहा
भेदभाव भरी दुनिया में
सीने में चुभते हुए भाले हैं
एक जून की रोटी है
किस्मत ही खोटी है
गरीबी विकराल है
भूख है पर दूर निवाले है
विधाता क्या लिख गया
जो कुछ था सब बिक गया
ना घर रहा ना छत रही
फुटपाथों के पाले है
यह बेबंद अर्थतंत्र है
पराधीन लोकतंत्र है
तानाशाही चरम पर है
शायद गुलामी के दिन आने वाले /
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© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो 9425592588
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




