श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता रात अब तो ढल गई…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४७ ☆

☆ # “रात अब तो ढल गई…” # ☆

तुमको क्या कहें  हम

बिन कहें कैसे रहें हम

रातों को कितने ख्वाब टूटे हैं =

टूटे ख्वाबों को कैसे सहें हम

 

रात जब धीरे-धीरे बढ़ती है

अंधेरे की काली चादर चढ़ती है

तूफान आते हैं फिजाओं में

हवाऐं नई कहानी गढ़ती है

 

घटाओं में चांद छुप जाता है

वक्त कुछ देर रुक जाता है

सितारे बस टिमटिमाते हैं

आसमान जमीन पर झुक जाता है

 

तुम्हारे आंचल में रात होती है

चुपके चुपके से बात होती है

दो जवां जिस्म जब मिलते हैं

यादगार वह मुलाकात होती है

 

खुशनुमां रात अब तो ढल गई

ढलते ढलते हमको छल गई

प्रीत तो आज भी अधूरी है

हमारे अरमानों पर कालिख मल गई /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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