डॉ भावना शुक्ल
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा।)
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बरगी जल के बाँध में, गूँजी चीख हज़ार।
गोद मिली है नर्मदा, समा रहे जलधार।
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अश्रु बहे कैसे? रुकें, देखा जब ये त्रास।
हृदय फटा मन रो पड़ा, बुझी जीवनी आस।।
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करुण दृश्य यह देखकर, मौन रहा आकाश।
सोए नीर समाधि में, कैसे? हों विश्वास।।
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माँ ने थामा लाल को, लहर बहाती साथ।
बढ़ा रही माँ नर्मदा, देती अपना हाथ।।
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अन्तस आहत हो रहा, सुनकर करुण पुकार।
असमय घटना देखकर, मचता हाहाकार।।
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© डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक… प्राची
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