श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆
☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆
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यह माना कि जिंदगी का आखिरी प्रहर है
बहुत जी लिए अब किस बात का डर है
कभी अंधेरों ने धमकाया
कभी उजालों ने भरमाया
कभी हवाओं ने जुल्म ढाया
कभी मौसम ने है रुलाया
कभी हार नहीं मानी
यह खुद्दारी का असर है
बहुत जी लिए अब
किस बात का डर है
यह चिलचिलाती धूप
झुलसाती हुई रूप
‘लू ‘ चल रही है खूब
सांस हो रही है चुप
धरा पर भीषण गर्मी का
मचा हुआ कहर है
बहुत जी लिए अब
किस बात का डर है
जुल्म सहते सहते
सदियां बीत गई है
हक अधिकारों के लिए
लड़ने की क्या रीत नई है?
तोड़कर रूढ़ियों को आती
यह नई सहर है
बहुत जी लिए अब
किस बात का डर है
उनकी आवाज बने
जो बेबस बेघर हैं
उनके आंसू पोंछे
जिनका जीवन बदतर है
दिलों में ज्योत जलाएं
अंधेरा बहुत पथ पर है
बहुत जी लिए अब
किस बात का डर है
लाचार निर्धन शोषितों के लिए
चलो कुछ करते हैं
इनके लिए जीते हैं
इनके लिए ही मरते है
नेक इरादा हो तो
आसान हर सफर है
बहुत जी लिए अब
किस बात का डर है
हमारे पथ पर चलकर
आगे कई लोग आएंगे
आजादी के जश्न में
नए तराने गुनगुनाएंगे
इन दीवानों के कदमों में
अर्पित हमारा सर है
बहुत जी लिए अब
किस बात का डर है
यह माना जिंदगी का आखिरी प्रहर है
बहुत जी लिए अब किस बात का डर है /
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© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो 9425592588
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