श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆

☆  कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

फिर समय ने हाँक दी

गाड़ी उमर की

और कितना शेष है चलना।

 

बोझ दिन का उठाए

हम रात भर जागे

स्वप्न आँखों में लिए

बुनते रहे धागे

भोर ने फिर खोल दी

खिड़की ख़बर की

साँझ तक बस स्वयं को छलना।

 

यादें सब ठहर गईं

आइनों के दर पर

प्रतिबिंबित होता है

चेहरों वाला घर

छतों के झरोखे से

झाँकते शहर की

खुली हुई हर किताब पढ़ना।

 

रोशनी के पृष्ठ पर

अंधकार व्याप्त

सुलगते हैं हाशिए

संभावना समाप्त

बाँच रही हैं रातें

इबारत सफर की

सूरज का भी तय है ढलना।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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