श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुझी बुझी आंखें…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆

☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # श्री श्याम खापर्डे ☆

 ☆

बुझी बुझी आंखें

ना जाने

आकाश में क्या ढूंढती रहती है ?

मन ही मन बुदबुदाते हुए

ऊपर वाले से क्या पूछती रहती है ?

कब बदलेंगे हमारे हालात

कब होगी हम पर

सुखों की बरसात

कब बीतेगी यह काली रात

कब आएगी

जीवन में नई प्रभात

 

काल तो घात लगा कर बैठा है

अहंकार में अपनी गर्दन ऐंठा है

हमारे घर और

 हमारी झोपड़ियों को

बुलडोजर से मिटाया है

हमें खुले आकाश के तले

चिथड़ो में लिपटे

प्रचंड गर्मी में बैठाया है

परिवार और बच्चे

रो रहे हैं

महिलाओं संग वृद्ध

अपना आपा खो रहे है

मुंह में अन्न का

नहीं कोई निवाला है

पानी के लिए भी

नहीं कोई पूछने वाला है

पूरी बस्ती में

त्राहि त्राहि मचा है

विधाता तूने

यह कैसा खेल रचा है

हमारी उपासना का

क्या हमें यह मिला फल है ?

कितना भयानक

हमारा आने वाला कल है ?

 

कुछ सियासतदानों  ने

अपनी सियासत के लिए

हमें यहां बसाया था

क्या उन्हें हमारे आशियां को

उजाड़ते हुए

तरस नहीं आया था ?

 

किसी सरमायेदार की

यहां कॉलोनी

बनने वाली है

इसीलिए हमारी बस्ती

जबरदस्ती हमें

करनी पड़ी

खाली है

सब नियम कानून

ताक पर रखे हैं 

हम सब यहां पर

चिंतित और हक्के-बक्के हैं 

 

हम जानते हैं

इस सत्य को मानते हैं

उस कॉलोनी में

तुम्हारा भव्य मंदिर बनेगा

पूजा पाठ के लिए

एक पूजा स्थल तनेगा

तुम्हारा पुजारी और ट्रस्ट

बनेगा मालामाल

हम जैसे भक्त

सीढ़ियों पर बैठकर

हाथ में कटोरा लिए

भीख मांगते

सदा रहेंगे बेहाल

 

क्या हम और हमारी पीढ़ियां

भीख पर ही जिंदा रहेंगी ?

क्या अपने गरीब इंसान होने पर

शर्मिंदा रहेंगी?

क्या कभी होगा चमत्कार ?

क्या दूर होगा यह अंधकार ?

कब सुध लोगे  तुम पालनहार ?

क्या हमारे जीवन में कभी आएगी

झूमती हुई खुशियों की बहार ?

 

कभी यह इंतजार

अन्याय और अत्याचार

कोई सैलाब लायेगा

तो यह कॉलोनी

और तुम्हारा मंदिर भी

उस तूफान में

बह जाएगा /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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