श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मेरी अर्ज…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६७ ☆

☆ # “मेरी अर्ज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तुम क्या जानो

घर से बेघर होने का दर्द

एक झोपड़ी बनाने पर भी

सर पर चढ़ जाता है कर्ज

 

जो फतवे दे रहे हैं

बस्तियां उजाड़ दो

वह मद में चूर है

उनका है ना इलाज मर्ज

 

एक तरफ मौसम का कहर

एक तरफ नफरत का जहर

एक तरफ आंखें आंसुओं से है तरबतर

इंसा कितना हो गया है खुदगर्ज

 

किससे करें शिकायत

किससे करें फरियाद

हाकिम इस शहर का

बड़ा ही है बेदर्द

 

अहं के होड़ में

हथियारों की दौड़ में

युद्ध रुकने पर बचेगी

बस गर्द ही गर्द

 

जो निशक्तों के आंसू पोंछे

सदा उनके हित सोंचे

हक के लिए लड़े दुनिया से

वही है सच्चा मर्द

 

प्रीत का मंदिर बनाओ

रिश्तो से सजा घर बसाओ

मुस्कुराते हर पल बिताओ

यही है सबसे मेरी अर्ज/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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