स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – महा-प्रस्थान के क्षण…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८७ – महा-प्रस्थान के क्षण…१ ✍

 काल दशित दस दिशाएँ

दग्ध दिनकर मौन हैं।

चन्दन चिता पर सो गया

लेकर विदा

यह कौन है?

आह इसका मुख

कि जिससे हो रहा

आलोक प्लावन,

सम्पुटित ज्यों पुण्यगीता

वेद के श्लोक पावन!

सिद्धि के सोपान वर से

वे अधर

कि जैसे शांति के स्वर है

हारी कितनी उम्र के

मुखर होकर, बोलना ही चाहते हैं।

पाँव हैं या प्रगति के पर्याय!

संभावना के ये सफल समुदाय के

मानो डोलना ही चाहते हैं

कि

स्यात् यह निद्रा 

अरुक छंदी यात्रा की श्रांति है.

किन्तु यह निष्कंप है

कैसी भयाकुल शांति है!

वातावरण में भ्रान्ति है!

जलती चिता की गोद मे

जो शीश रखकर सो रहा

कितना तरुण है!

झेल वज्राघात

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Bhavana Shukla
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सादर नमन