स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – महाराणा प्रताप। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७१ ☆  

☆ महाराणा प्रताप…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अपनी त्याग तपस्या प्रण का स्मारक जो आप है

वह इतिहास पुरुष भारत का अनुपम वीर प्रताप है।।

*

गीत लिखे है बलिदानों के उसने हल्दी घाटी में

खुशबू है उसके विश्वासों की चित्तौड़ी माटी में।।

*

आती है ध्वनि अब भी चेतक के विश्वासी टापों की

सुन पड़ती आवाजें दम्भी अकबर के संतापों की ।।

*

भामाशाह की भावनाओं के चित्र नजर जो आते हैं

हर पढ़ने वाले की आंखों में आंसू भर आते हैं।।

*

पढ़ते जब भी पृष्ठ युद्ध के पुस्तक में इतिहासों की

रुक सी जाती गति पढ़ने वाले भावुक की सांसों की ।।

*

कैसा था प्रताप वह जिसकी वन में कटी जवानी थी।

और संग में जिसके भूखी बिटिया थी औ’ रानी थी।।

*

कैसी सुदृढ़ भावना थी गहरी मन में उस राणा की

सभी सुखों को लात मार जिसने चिन्ता की बाना की।।

*

अकबर भी भौंचक था उसकी सोच समझ कुर्बानी पर

थी जिसकी दुनियां न्यौछावर मातृभूमि के पानी पर।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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