सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  जीवन।)

☆ मंजिरी साहित्य # १२ ☆

? कविता – जीवन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

शांति दूत नहीं दुनिया में,

बने हुए सब दानव आज l

पीड़ा बहती नयनों से अब,

इंसानियत का खत्म है काज ll

*

आशाओं के सर्व सपने अब,

नित चिताओं पर सोते l

देखें प्रतिपल लोचन जिनको,

सतत दिन रात रोते रोते ll

*

 नहीं सुनाई देता कलरव,

मन रूपी खग अब मौन हुआ l

हरियाली गुमसुम हो गई,

जीवन अब तो बना जुआ ll

*

हिंसक चील कौए अरु गिद्ध,

 खुले आकाश हैं मंडरातें l

वहीं शांतिदूत कबूतर,

छुपते होते डर जाते ll

*

सदा उदासी लिये पूर्ण मन,

दुःख का ओज भरा डेरा l

रात हो रही दैनिक लंबी,

कब होगा मन शांत सवेरा ll

*

आज बना ली हृद ने दूरी,

कैसे हम इसको पाटें l

आओ मिलकर बात करें सब,

इस जहर को मिल काटें ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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