श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बेटियां…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆
☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆
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हमारा एक मित्र सुबह मॉर्निंग वॉक में मिला
मिलते ही करने लगा
आजकल नहीं मिलने का गिला
यार दिन भर क्या करते हो ?
क्या यहां पर नहीं रहते हो ?
मैंने कहा मित्र
मैं अपनी पत्नी के संग बच्चों के पास चला जाता हूं
कुछ दिन वहां रहता हूं
इसलिए रोज नहीं आता हूं
उसने पूछा,
बच्चे कहां पर रहते है?
मैंने कहा,
एक बेटा और तीन बेटियां हैं
सभी विवाहित है
वे देश के तीन कोने में है
और हम यहां इस कोने में है
उसने लंबी सांस भरी
और बोला,
एक बात करूं खरी खरी
तुम बहुत भाग्यशाली हो
जो बच्चों के साथ समय बिताते हो
खुशी खुशी रिटायरमेंट के दिन बिताते हो
भाई,
हमारे साथ तो प्रश्न चिन्ह है
परिस्थितियों बहुत भिन्न है
एक ही बेटा और बेटी है
दोनों अपने परिवार में व्यस्त है
अपने परिवार संग मस्त है
हम जब भी बहु बेटे के पास जाते हैं
कुछ दिन मुश्किल से रह पाते हैं
हमारी पत्नी और बहू में
रोज होती जंग है
पारिवारिक शांति होती भंग है
वैसे ही वृद्धावस्था में बीमारियों की समस्याएं क्या कम है
बेटे का उदास चेहरा देखकर
लगता है कि अपराधी हम है
मन मारकर घर वापस आ जाते हैं
दोबारा नहीं जा पाते है
आप ही बताओ यार
कहां जाए ?
कहां मान सम्मान और प्यार पायें ?
क्या सब कुछ हमारे लिए छलावा है ?
रिश्तो में प्यार बस एक दिखावा है ?
मैंने कहा नहीं मित्र
तुम्हें प्यार, सम्मान, अपनापन
इज्जत, प्रतिष्ठा, आदर और मान
एक ही जगह मिल सकता है
तुम्हारे जीवन में खुशियों का फूल खिल सकता है
तुम्हें खुशी प्रसन्नता मन से सत्कार
दिल से तुम्हें प्रेम का व्यवहार
तुम्हें मनपसंद व्यंजन
मनपसंद सुकून भरी रातें
मन में ताजगी भर दें
ऐसी ममतामयी बातें
एक ही जगह मिल सकती है
जो तुम्हें अपना समझती है
वह है तुम्हारी बेटी
उसका परिवार
जो करती है तुमसे मन से प्यार
बाकी सब रिश्ते पानी के बुलबुले है
जो स्वार्थ में अपने तुमको जीवन भर छले है
आजकल बेटिंया
जीते जी बेटे का फर्ज निभा रही है
और
मरने के बाद भी अंतिम संस्कार का भार
खुद के कंधे पर उठा रही है
मित्र वह लोग धन्य है
जिनकी बेटियां है
वह बुढ़ापे का सहारा ही नहीं
घी, शक्कर में लिपटी
रोटियां है
यह आज की
कटु सच्चाई है
जो स्वार्थी संसार ने
हमें दिखाई है/
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© श्याम खापर्डे
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