श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४८ ☆

अंदेशा बाढ़ का ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

जेठ सी दोपहरी

अंदेशा बाढ़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

 

छप्पर से छानी तक

एक सुगबुगाहट

आँखों में तैर रही

कोई अकुलाहट

इधर आँधियों से सब

पट गई धरा है

उधर नभ के आँगन में

बूँदों की आहट

 

टूट गया भ्रम सारा

बर्फ़ के पहाड़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

 

खेतों के प्राणों में

सोंधापन महके

वन-उपवन डाल-डाल

पत्ते-पत्ते चहके

नदी ताल पोखर घट

पनघट वंशीवट

सबके मन पावस के

रंगों से दहके

 

उग आया सपना फिर

बंजर में झाड़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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