स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – महा-प्रस्थान के क्षण – २।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८९ ☆
☆ – महा-प्रस्थान के क्षण – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
बूढ़े पिता सा
देखता आकाश
दृश्य यह कितना करुण है।
ज्वाल के सम्मुख लिए जल
और भी जन है,
जिनके टूटते मन हैं।
ठीक ऐसी ही दशा में…
भू, हवा, पर्वत, किरन, वन औ सुमन हैं।
त्यक्त वस्त्रों सी पड़ी
निस्पंद ये
परछाइयाँ,
मानो किसी का शापमय आदेश हो!
लग रहा-
जैसे कि खण्डित मूर्तियों का देश हो !
पाषाण जैसे प्राण भी तो
कर रहे हैं
आँसुओं में संतरण,
क्योंकि निष्प्रभ हो गई है
सभ्यता की व्याकरण।
आह! मेरे प्रश्न बालक, खो गये,
पगवाट में, वनवाट में,
और उनके ‘उत्तरों‘ का ‘ध्रुव‘
कि वह तो गया है
शान्ति वन के घाट में।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
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