हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विरोधाभास ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विरोधाभास… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

सम्बंधों में खाई चोट का

दोष  किसीको दूँ भी तो कैसे,

बटोरना उनका तंत्र रहा,

बाँटना मेरा मंत्र रहा,

पलड़े के एक ओर

दोनों साथ तुलते भी तो कैसे?

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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1

English Literature – Poetry ☆ Writing… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Writing… ~”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Writing… ~ ??

☆ 

“How do emotions well up so easily?

How do your words burst forth?

How do they emerge on a paper?

Let me see your writing in action..!”

 

He prodded inquisitively…

 

I lightly pricked the tip of

his finger with a pen…

 

“The day you feel the collective

pain in individual suffering,

You’ll automatically start writing

on your own, without any effort!

 ☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १७० ☆ कभी कभी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “कभी कभी…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १७० ☆

✍ कभी कभी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

दौलत का न दे काम पिटारा कभी कभी

पानी को पी पी दिन है गुज़ारा कभी कभी

*

आया न बचाने को ज़रूरत पै कोई फ़िर

इमदाद परखने जो पुकारा कभी कभी

*

सूली पे चढ़ा दूँ उसे क्या इतनी ख़ता पर

दिल पर है दिया ठेस जो प्यारा कभी कभी

*

गर्दिश में पड़ा कबसे निकलता नहीं मेरा

किस्मत का सुना पलटे सितारा कभी कभी

*

सब इश्क़ के ये सूदो-ज़िया जानता हूँ मैं

मैंने भी उठाया है खसारा कभी कभी

*

बे-अज़्म को आसान नहीं पाना हो सका

जो पास नज़र आया किनारा कभी कभी

*

बर्बादी का इल्जाम मेरी वक़्त पर मगर

लेते हैं बशर नाम तुम्हारा कभी कभी

*

अब तक हो पहेली की तरह एक तुम मुझे

होता नहीं बर्ताव गँवारा कभी कभी

*

दिलकश है फ़लक पर ये धनक आप देखिए

क़ुदरत ये दिखाती है नज़ारा कभी कभी

*

मिलने पे लगी हद से ज़ियादा ही बंदिशें

महताब को मैं छत पे उतारा कभी कभी

*

तौबा किये हैं जिससे बशर मानते नहीं

करते हैं मुहब्बत को दुबारा कभी कभी

*

हम उसको अरुण दोस्त कहें या कि मतलबी

देता वो नहीं साथ हमारा कभी कभी

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७४ – बदलते मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बदलते मौसम…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७४ ☆

✍ बदलते मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

एक पेड़ की

किसी डगाल पर

कुुछ पत्तियाँ हो चली है जर्द,

और उसी के सिरहाने

नई कोंपलें

खोल रही है स्वप्नील आँखें अपनी।

 

गिरने को तत्पर जर्द पत्तियाँ

जानती हैं, हवा की भाषा

वहीं,

कोंपलों ने अभी

शुरू की है अपनी भाषा गढ़नी ।

आँगन वही है,

चूल्हे की आँच वही,

बस धुएँ की दिशा

बदलती जान पडती है।

 

वो पगडंडियाँ,

जो बनी थी

दादा की आवक- जावक से,

पोता उन पर चलता तो है,

पर उसकी आँखें

खोजती है कोई नई राह

थके, सुस्त कदम

उसे पसंद नही

वो मुंतज़िर है सरपट दौड का।

नदी भी कहाँ

एक ही घाट से रहती है बंधी

युग- युगांतर तक।

 

सूरज अपनी जगह

अब भी अडिग है,

धरती अब भी

उसके चारों ओर घूम रही है;

और

अनंत काल से

होता आ रहा है

ॠतु परिवर्तन ।

यही तो है शाश्वत सत्य,

यही है प्रकृति का नियम।

 

पीढ़ियाँ भी

ऋतुओं की सगी है

एक जाती है,

तो दूसरी आती है,

पेड़ वही रहता है,

बस उसकी छाँव कि

भाषा बदल जाती है

ॠतुओं के साथ,

पीढियों के साथ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४५ – सूचना का अधिकार – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)  

☆  चुभते तीर # १४५ – व्यंग्य  – सूचना का अधिकार ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राज्य मुख्य सूचना आयुक्त कार्यालय के मुख्य बरामदे की जालीदार खिड़की पर पीतल की एक पुरानी और मटमैली घंटी पिछले बीस सालों से एक सन की खुरदरी रस्सी के सहारे लटकी हुई थी जिसके भीतर की गोल लोहे वाली जिभी बरसों पहले निकाल ली गई थी। उस घंटी की बनावट कभी दफ्तर में सुनवाई की बारी बताने के काम आती थी पर अब वक्त की धूल और सीलन से उसकी चमक पूरी तरह उड़ चुकी थी और वह खिड़की की जंग लगी सलाखों के बीच बेआवाज झूल रही थी। खिड़की के ठीक नीचे सीमेंट के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही धरमदास काका अपनी इमली की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले धरमदास काका दिन भर उस मूक घंटी को अपनी धुंधली आँखों से एकटक निहारते रहते थे। भवन परिसर में सुबह से ही आधुनिक पारदर्शी पोर्टल, डिजिटल शिकायत पेटियों और हाईटेक निगरानी तंत्र का प्रदर्शन करने के लिए शहर के बड़े-बड़े अफसरों, वकीलों और नेताओं की चमचमाती गाड़ियाँ आ रही थीं। मंच से नागरिक अधिकारों और सच को सामने लाने की कसमें खाते हुए लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए प्रवक्ताओं और सूट-बूट पहने अफसरों को खिड़की के कोने में लटकी उस बेजुबान पीतल की घंटी से कोई सरोकार नहीं था। दफ्तर का पुराना चपरासी मंगरू जब भी हाथ में फाइलों का बंडल लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगरू आज सूचना के अधिकार के इस मेले में इस गूंगी घंटी में कोई सच की बोली बजने की उम्मीद जगी क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की पर्चियां ही बाँटी जा रही हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

सूचना भवन में हाल ही में राजधानी के प्रशासनिक सुधार सचिवालय से नए मुख्य सूचना आयुक्त बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक डिजिटल ट्रैकिंग के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए ऑनलाइन पोर्टल कक्ष का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे धरमदास काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस खिड़की पर लटकी पुरानी घंटी पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को अंतरराष्ट्रीय सूचना दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल इंडिया के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक बेकार घंटी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और संस्थान के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय उद्घाटन सत्र का मुख्य भाषण समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे धरमदास काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई आरटीआई अर्जी का स्टेटस या बुढ़ापा पेंशन की अपील देखनी है तो भीतर काउंटर पर जाकर फॉर्म भरिए, इस तरह बाहर बैठकर खिड़की पर टँगी एक टूटी घंटी को घूरने से इस मुल्क की सरकारी फाइलों का सच बाहर नहीं आने वाला है।” धरमदास काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “आयुक्त साहब मैं किसी कागजी नकल या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस घंटी में वह खोया हुआ सच लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए सच की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस सूचना अधिकार दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके जनता को हर फाइल तक पहुँच दे रही है, फिर आपकी इस पुरानी पीतल की घंटी का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त पेशकार पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस आयोग के हर फैसले और हर अपील के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “आयुक्त साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस कस्बे में आरटीआई कानून की शुरुआत हुई थी और गरीबों के राशन की चोरी दबाने के लिए फाइलों में आग लगाई जाती थी तब काका के इकलौते बेटे सत्यप्रकाश ने इसी चौपाल पर खड़े होकर सच जानने के अधिकार की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “सत्यप्रकाश ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पीतल की घंटी से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब सत्यप्रकाश उस समय पूरे जिले का सबसे बहादुर और स्वाभिमानी युवा आरटीआई कार्यकर्ता था, जब राशन माफिया और भ्रष्ट ठेकेदार गरीबों के हक पर कुंडली मारकर बैठते थे तब सत्यप्रकाश ने इसी घंटी को खिड़की पर बांधकर कसम खाई थी कि जब भी किसी गरीब की फाइल दबाई जाएगी तो वह इसे बजाकर पूरे कस्बे को जगाएगा, उसने भूख से तड़पते सैकड़ों परिवारों को उनका हक दिलाया था और ऐलान किया था कि जब तक इस दफ्तर की आखिरी फाइल शीशे की तरह साफ नहीं हो जाएगी तब तक वह किसी भ्रष्ट तंत्र के आगे नहीं झुकेगा।”

धरमदास काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस घंटी की खुरदरी रस्सी को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे सत्यप्रकाश ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह घंटी केवल पीतल का ढक्कन नहीं बल्कि सच की आवाज है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से केंद्रीय पारदर्शिता आयोग का सबसे बड़ा लोक अधिकार आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस घंटी में नई जिभी लगाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी आरटीआई फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब सत्यप्रकाश ने करोड़ों के सरकारी घोटालों की पोल खोली थी तो देश के सबसे बड़े खनन और रियल एस्टेट सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए सत्यप्रकाश को अपनी बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट जनसंपर्क एजेंसी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी देकर खरीद लिया था। सत्यप्रकाश ने अपने सारे आदर्शों और उस घंटी का वास्ता ताक पर रखकर उन जांचों को दबाने वाली फाइलों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा पीआर माफिया बन गया जो आज सरकारों और उद्योगपतियों के काले कारनामों को छिपाने का सबसे बड़ा ठेका चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि सत्यप्रकाश तो खुद सच को दफन करने वाला सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर सूचना के अधिकार और पारदर्शिता का ढोंग करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप की आवाज को फाइलों में बंद करके बेच देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई सच्चाई के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस मूक घंटी को ताकते रह गए और पूरा सूचना भवन उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८२ ☆ कविता – सुबह सवेरे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “सुबह सवेरे…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८२ ☆

✍ कविता ☆ सुबह सवेरे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे कमरे की खिड़की पर

एक बुलबुल गाती है

सुबह सवेरे, एकदम सवेरे

पेड़ की डाली पर आती है

एक बुलबुल गाती है।

 

सूरज जब उगने को होता है

अंधेरा जब छँटने को होता है

जैसे ही घड़ी सुबह का आगाज़ देती है

तभी उसका गान शुरू होता है ।

तभी बुलबुल गाती है।

 

मुझे लगता है कभी-कभी

विट्ठल विट्ठल गा रही है

कभी लगता है ट्विंकल ट्विंकल

कभी कृष्ण कृष्ण  गा रही है ।

बहुत मीठी आवाज में

एक बुलबुल गाती है।

 

मेरी आँख खुलती हैं उसे सुनकर

मन में एक खुशी होती है उसे सुनकर

सुबह हो गई मैं सोचता हूँ

समय का भान होता है उसे सुनकर।

तय समय पर रोज गाती है।

एक बुलबुल गाती है।

 

बुलबुल को सुबह होने का ज्ञान

पता नहीं कैसे होता है

बादलों की ओट से लालिमा लिए

पर सूरज को होता है।

सूरज को जगा कर

बुलबुल उड़ जाती है

एक बुलबुल गाती है।

हर रोज गाती है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बालकनी।)

☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“माँ, सामने वाले अंकल रोज यहाँ क्यों बैठे रहते हैं?”

“शायद किसी का इंतज़ार करते हैं।”

“आपको कैसे पता?”

सुधा मुस्कुराई, “क्योंकि कभी तुम्हारे पापा भी ऐसे ही मेरा इंतज़ार किया करते थे।”

अंशु कुछ कहता, उससे पहले ही नीचे ब्रेक लगने की तेज आवाज गूँजी।

एक बाइक फिसली। युवक उछलकर सड़क पर गिरा। हेलमेट दूर जा छिटका।

“माँ!”

अंशु रेलिंग पकड़कर नीचे झुक गया।

सुधा के हाथ काँपने लगे। आँखों के सामने वही दृश्य कौंध गया—सड़क पर पड़ी कार, टूटे शीशे और अस्पताल से आया वह एक वाक्य—

“मैडम, इन्हें बचाया नहीं जा सका।”

विवेक की मौत को वर्षों बीत चुके थे, मगर उस एक क्षण ने समय को फिर वहीं रोक दिया था।

“माँ, कुछ हुआ तो नहीं?”

सुधा ने बेटे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“नहीं… आज बस एक पुराना हादसा सामने आ गया।”

नीचे लोग घायल युवक को उठाकर अस्पताल ले जाने लगे।

अंशु ने धीरे से पूछा, “पापा भी ऐसे ही गए थे?”

सुधा ने सिर हिलाया।

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर अंशु बोला, “माँ, आप फिर भी यहाँ क्यों आती हैं?”

सुधा ने सामने देखा।

“क्योंकि तुम्हारे पापा ने यहीं से मुझे पहली बार देखा था… और मैंने यहीं से उन्हें।”

अंशु ने माँ का हाथ थाम लिया।

सुधा ने गहरी साँस ली।

एक क्षण ने आज किसी अजनबी को सड़क पर गिराया था और वर्षों पहले उसी तरह के एक क्षण ने उससे उसका अपना संसार छीन लिया था।

वह धीरे से भीतर चली गई।

पीछे रह गई शाम, सड़क और वह जगह—जहाँ एक नजर ने जीवन दिया था और एक हादसे ने उसे छीन लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११० ⇒ ऊंची दुकान फीके पकवान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ऊंची दुकान फीके पकवान…“।)

?अभी अभी # १११० ⇒ आलेख – ऊंची दुकान फीके पकवान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब भी स्वादिष्ट व्यंजनों का ज़िक्र होगा, मीठे पकवान सबसे पहले याद आयेंगे। चौरासी की योनि में छप्पन भोग बार बार नसीब नहीं होते। इस भोग योनि में जब जीव का गला सूखता है तब अच्छे अच्छों को पानी याद आता है, लेकिन जब सामने गर्मागर्म केसरिया, रस भरी जलेबियाँ निकाली जा रही हों, तो मुंह से लार ही टपकेगी, आंख से आंसू नहीं।

पकवानों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, पसंद अपनी अपनी, पकवान अपना अपना!  कोई जलेबी से संतुष्ट तो कोई इमरती पर फिदा। सब पकवानों की किस्मत जुदा जुदा। आज के लोगों का पकवानों का व्याकरण इतना कमजोर है कि उन्हें रबड़ी, बासुंदी और कलाकंद में भेद ही नहीं पता। एक पाक कला प्रशिक्षण केंद्र में जब यह पूछा गया कि हलवाई किसे कहते हैं, तो एक जवाब यह भी आया, जो हलवा अच्छा बनाए उसे हलवाई कहते हैं। कहते हैं मुझको, हलवा हलवाई।।

आजकल हमें मीठा बोलने की नसीहत तो दी जाती है लेकिन साथ में यह भी हिदायत, कि मीठा कम खायें। क्या बच्चे क्या बूढ़े, क्या जमाना था, जब हमेशा लड्डू पेड़े और गुलाबजामुन का ही जिक्र होता था। गरीबों का भोजन दाल बाटी, आजकल स्वादिष्ट भोजन की गिनती में आ गया है। जो इंसान, घी में तरबतर, दो बाटी ठीक से नहीं खा सकता, उसके सामने मावा बाटी की बात करना, मावा बाटी का अपमान नहीं तो और क्या है।

आप जब किसी ऊंची मिठाई की दुकान से पकवान खरीदते हैं तो यह सोचकर ही खरीदते हैं कि यहां की मिठाई शुद्ध, मीठी व स्वादिष्ट ही होगी। और अगर पकवान फीके हुए तो शायद दूसरी बार कभी उस दुकान की ओर रुख नहीं करेंगे। यह जानते हुए भी, कि अधिक घी, मावा और शकर हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, हम मीठा खाने से समझौता नहीं करते।।

आज अगर कोई ऊंची मिठाई की दुकान वाला अगर अपना प्रचार इस तरह करता है तो क्या गलत करता है। फीके पकवान की ऊंची दुकान!  यहां शुगर फ्री, कोलोस्ट्रल फ्री, स्वादिष्ट मिठाइयां उपलब्ध हैं। मेरे शहर में तो आजकल ऊंची दुकानों में फीके पकवान मिलना शुरू भी हो गए हैं। गरीब आदमी मीठे को तरसता है, और अमीर आदमी शुगर फ्री के लिए। गरीब आदमी पसीना बहाता है कुछ मीठा खाने के लिए!  जब कि एक अमीर आदमी को शुगर फ्री मिठाई के लिए भी पैसा बहाना पड़ता है।

एक हमारे गंगा किनारे वाले छोरे, अरे वही पान वाले बनारसी बाबू, जो दो पैसे कमाने के बाद, के. बी.सी. के बिग बी बनकर भी साबुन, तेल और कुछ मीठा खिलाने से बाज नहीं आते, आजकल कमला पसंद पर उतर आए हैं। अब तो आप समझ गए, कौन बना बेवकूफ, और कौन बना करोड़पति। सबकी अपनी अपनी मति।।

हम तो आज भी किसी के घर जाते हैं और जब सौजन्यवश चाय कॉफी का न्योता स्वीकार नहीं करते, तो कुछ ठंडा हो जाए कहने पर, शिकंजी पर राजी हो जाते हैं और तब हमें नीबू की शिकंजी पेश कर दी जाती है। हम शिकंजी पी तो लेते हैं, लेकिन ईश्वर झूठ ना बुलवाए, उस वक्त भी हमारी आँखों के सामने, नागौरी की शिकंजी तैर रही होती है। मीठा हमारी कमजोरी है और नमकीन हमारी खूबी।

सब्जी में नमक हो न हो, भोजन के वक्त एक मुट्ठी सेंव सब स्वाद बराबर कर देती है। बढ़ते रहें इंदौर में मरीज और अस्पताल, सराफा और छप्पन दुकान की रौनक कभी कम नहीं होने वाली। ठाकुर जी का नित्य राजभोग भी होगा और छप्पन भोग भी। अपनी सेहत का खयाल रखें। दबाकर खाएं, डूबकर व्यायाम करें। अगर मीठे से परहेज हो, तो कोई ऐसी ऊंची दुकान तलाशें, जहां शुगर फ्री, फीके पकवान उपलब्ध हों। कैसी होती होगी, चाशनी वाली, शुगर फ्री, गर्मागर्म केसरिया जलेबी, और बिना नमक का नमकीन। नहीं होता यकीन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३३३ ☆ पितृपक्ष… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३३३ ?

☆ पितृपक्ष… ☆  प्रभा सोनवणे ☆

☆

पूर्वी रोज यायचा कावळा —

न चुकता,

तुम्ही असताना …

आणि तुम्हीही,

अंड्यातला पिवळा बलक —

देऊन टाकायचे दररोज त्याला !

तो यायचाच,

काव काव करत… नाष्ट्यासाठी!!

 

पण तुम्ही गेल्यापासून,

कावळा येत नाही दारात!

त्यालाही कळलं असावं,

 

आपला अन्नदाता–

निघून गेल्याचं !

 आता पितृपक्षातही येत नाही तो

दहीभाताची उंडी खायला!

कावळा तृप्त झालाय… की,

तुम्हाला मोक्ष मिळालाय?

सारे अनाकलनीय!

मला तरी !

☆

© प्रभा सोनवणे

६ ऑक्टोबर २०२६

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आत्मा… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ आत्मा… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

☆

सर्वाभूती एकचि

वसे तो आत्मा

नाही विभक्त

दुस-या पासोन..

 

गंधही नाही

कुटीलतेचा तया

विचार अन् वाणीला,

विमल अमर तो बघा..

 

नाते येथ विश्वासाचे

पावित्र्य नांदे,

नाही असत्याचा

स्पर्शही तया…

 

न जळे न उडे

न भिजे कधीही

ऐशा पावन आत्म्यास

साधनेचे द्यावे बल…

☆

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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