मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ तुळस… लेखक : डाॅ. जयंत गुजराती ☆ प्रस्तुती – सौ. प्रज्ञा गाडेकर ☆

 वाचताना वेचलेले  तुळस… लेखक : डाॅ. जयंत गुजराती ☆ प्रस्तुती – सौ. प्रज्ञा गाडेकर “मी वेडी नाहीय्ये हो डॉक्टर, माझ्यावर विश्वास ठेवा. मी चांगल्या घरची तरीही मला वेडी ठरवली गेलीय. विनाकारण डांबून ठेवलेय या वेड्यांच्या इस्पितळात. मला गोळ्या इंजेक्शनं याची काहीच गरज नाहीये. उगाचच माझे हाल करताहेत सगळे. नर्स, वॉर्डबॉय, इथले डॉक्टरही. सांगून सांगून थकले मी. परोपरीने मी विनवण्या केल्या, हातापाया पडले पण पालथ्या घड्यावर पाणी. म्हातारी झाले म्हणून काय झाले? मी हिंडू फिरू शकते. चांगलं बोलते तशी वागतेही. काय न्यून आहे माझ्यात की मला या छोट्याशा खोलीत जखडून ठेवलंय? सुरूवातीस सगळे सांगतील तसं केलं,तरीही छळ मांडला गेलाच माझा." मी फाईलवरनं हात फिरवत होतो. ऐंशीला टेकलेल्या बाईचं बोलणं मी शांतपणे ऐकत होतो. तिच्या बोलण्यात ओघ होता. रडकथाच. पण ती रडत नव्हती. हतबलता डोळ्यांतून पाझरत असलेली. व्हेरी डेंजरस, व्हायोलंट, पझेसिव्ह, फाईलमधले शेरे व तिचं म्हणणं मेळ खात नव्हते. काउन्सेलर म्हणून नेमणूक झाल्यापासून इस्पितळातील एकूणएक पेशंटसच्या फाईली बघून झाल्या होत्या. नेहेमीच्या डॉक्टरांच्या उपचारांमधे दखल न घेता प्रत्येक केसमधे काऊन्सेलिंगची गरज आहे का हे...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 120 ☆ वैचारिक तरक्की ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ (ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सुधारीकरण की आवश्यकता”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 120 ☆ ☆ वैचारिक तरक्की ☆  युक्त, अभियुक्त, प्रयुक्त, संयुक्त, उपयुक्त ये सब कहने को तो आम  बोलचाल के हिस्से हैं किंतु इनके अर्थ अनेकार्थी होते हैं। कई बार ये हमारे पक्ष में दलील देते हुए हमें कार्य क्षेत्र से मुक्त कर देते हैं तो कई बार कटघरे में खड़ा कर सवाल-जबाब करते हैं। क्या और कैसे जब प्रश्न वाचक चिन्ह के साथ प्रयुक्त होता है तो बहुत सारे उत्तर...
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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – रावण दहन ☆ श्री सदानंद आंबेकर ☆

श्री सदानंद आंबेकर (श्री सदानंद आंबेकर जी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है। भारतीय स्टेट बैंक से स्व-सेवानिवृत्ति के पश्चात गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार   के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर योगदान के लिए आपका समर्पण स्तुत्य है। आज प्रस्तुत है श्री सदानंद जी  की पितृ दिवस की समाप्ति एवं नवरात्र के प्रारम्भ में समसामयिक विषय पर आधारित एक विशेष कथा “रावण दहन”। इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्री सदानंद जी की लेखनी को नमन।)  ☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा - रावण दहन ☆ श्री सदानंद आंबेकर ☆  दशहरे के दूसरे दिन सुबह,  चाय की चुस्कियों के साथ रामनाथ जी ने अखबार खोल कर पढना आरंभ किया। दूसरे ही पृष्ठ  पर एक महानगर  में कुछ व्यक्तियों के द्वारा एक अवयस्क लडकी के  सामूहिक शीलहरण का समाचार बडे़ से शीर्षक  के साथ दिखाई दिया। पूरा पढ़ने के बाद उनका मन जाने कैसा हो आया। दृष्टि  हटाकर आगे के पृष्ठ  पलटे तो एक  पृष्ठ पर समाचार छपा दिखा...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रतौंध☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ आपदां अपहर्तारं ☆ 🕉️ नवरात्र  साधना सम्पन्न हुई 🌻 आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में...
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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ न्यू जर्सी से डायरी… 10 ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है आपकी विदेश यात्रा के संस्मरणों पर आधारित एक विचारणीय आलेख – ”न्यू जर्सी से डायरी…”।) यात्रा संस्मरण ☆ न्यू जर्सी से डायरी… 10 ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  रुकी हुई कार सड़क पार करता आदमी आप को सड़क पार करता देख, बाअदब कोई मर्सडीज भी रुक जाए और स्टीयरिंग व्हील पर बैठा व्यक्ति मुस्करा कर आपको सड़क क्रास करने का इशारा करे, तो भारत में भले ही अजीब सा लगे, पर अमेरिका में स्टेट ला के अनुसार सड़क पर पहला अधिकार पैदल चलने...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 130 ☆ भक्तिपरक दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक 122 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिया जाना सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ (धनराशि ढाई लाख सहित)।  आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें  संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 130 ☆ ☆ भक्तिपरक दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆ ☆  वागीशा लिखवा रहीं, जीवन का मकरंद। छंद रचें मनहर सुखद , पुष्पित हो आनंद।। ...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #121 – बाल कथा – “जबान की आत्मकथा” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक बाल कथा – “जबान की आत्मकथा”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 121 ☆ ☆ बाल कथा – जबान की आत्मकथा ☆  "आप मुझे जानते हो?" जबान ने कहा तो बेक्टो ने 'नहीं' में सिर हिला दिया. तब जबान ने कहा कि मैं एक मांसपेशी हूं. बेक्टो चकित हुआ. बोला, " तुम एक मांसपेशी हो. मैं तो तुम्हें जबान समझ बैठा था."  इस पर जबान ने कहा, " यह नाम तो आप लोगों का दिया हुआ है. मैं तो आप के शरीर की 600 मांसपेशियों में से एक मांसपेशी हूं. यह बात और है कि मैं सब से मजबूत मांसपेशी हूं. जैसा आप जानते हो कि मैं एक सिरे पर जुड़ी होती हूं. बाकी सिरे स्वतंत्र रहते हैं." जबान...
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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सुजित साहित्य #129 – काळोख…! ☆ श्री सुजित कदम ☆

श्री सुजित कदम  कवितेचा उत्सव  ☆ सुजित साहित्य # 129 – काळोख…! ☆ श्री सुजित कदम ☆ काल पर्यंत अंधाराला  घाबरणारी माझी माय आज माझ्या डोळ्यांच्या आत मिट्ट काळोखात जाऊन बसलीय...! पुन्हा कधीही उजेडात न येण्यासाठी...! ©  सुजित कदम संपर्क – 117, विठ्ठलवाडी जकात नाका, सिंहगढ़   रोड,पुणे 30 मो. 7276282626 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈...
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मराठी साहित्य – विविधा ☆ ‘या सम हा’ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये  विविधा  ☆ 'या सम हा' ☆ श्री अरविंद लिमये ☆ इतर कोणत्याही शब्दांसाठी त्यांच्या अर्थदृष्ट्या अनुरुप असे पर्यायी शब्द सहज सुचतात. सांगता येतात. चित्र हा शब्द मात्र याला अपवाद आहे. चित्र या शब्दाची असंख्य विविध आकर्षक रूपे सामावून घेणारा पर्यायी शब्द सहज सांगता येणार नाही. चित्र या शब्दाची विविध रूपे आणि त्यात सामावलेल्या अर्थरंगांच्या वेगवेगळ्या छटा हेच या शब्दाचे सौंदर्य आहे.चित्रांचे जितके प्रकार तितकी त्याची रुपे.रेखाचित्र,रंगचित्र,तैलचित्र, जलरंगातलं चित्र, भित्तिचित्र, निसर्गचित्र, स्थिरचित्र, अर्कचित्र, व्यक्तिचित्र, छायाचित्र, त्रिमितिचित्र,हास्यचित्र,व्यंगचित्र असे असंख्य प्रकार.प्रत्येकाचं रुप, तंत्र, व्याकरण,निकष परस्पर भिन्न. तरीही ही सगळीच रुपं भावणारी ! हे सगळं सामावून घेणारा पर्यायी शब्द शोधून तरी सापडेल का? चित्रकला ही निसर्गाने माणसाला दिलेली एक अद्भूत देणगी आहे.चित्र या शब्दाची व्याप्ती अधोरेखित करणारी जशी विविध रुपे आहेत,तशीच चित्रकलेद्वारे होणाऱ्या अविष्कारातही वैविध्य आहे.त्यातील प्रत्येक आविष्कारासाठी लागणाऱ्या कॅनव्हासचेही अनेक प्रकार.ड्राॅईंग पेपर,चित्रकलेच्या विविध आकाराच्या वह्या,अक्षरं गिरवण्यासाठी जशा सुलेखन वह्या तशीच रेखाटनांच्या सरावासाठीच्या सराव चित्रमाला! हीच चित्रं जमिनीवर रेखाटली जातात ती रांगोळीच्या रुपात.या रांगोळ्यांच्याही कितीक त-हा.ठिपक्यांची रांगोळी,गालीचे, देवापुढे काढायची गोपद्म, शंख, स्वस्तिकांची रांगोळी,उंबऱ्यावरची रांगोळी,जेवणाच्या ताटाभोवतीची,औक्षण करण्यासाठीच्या पाटाखाली काढली...
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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ भूकंप – भाग 3 ☆ सौ अंजली दिलीप गोखले ☆

सौ अंजली दिलीप गोखले  जीवनरंग  ☆ भूकंप – भाग 3 ☆ सौ अंजली दिलीप गोखले ☆ मनाशी निर्धार करून घर सोडायचे ठरवले. पण आई बाबांना सोडून जाताना पुन्हा आकाश कोसळले. आईच्या डोळ्यातले अश्रू थांबायलाच तयार नव्हते. बाबाही सैरभैर झाले होते. आपल्या लाडक्या लेकीची अशी पाठवणी करायची म्हणजे मोठे संकट होते. मी निर्धाराने माझी बॅग भरली. त्या जरीच्या साड्या, चमचमते ड्रेस, दागिने, सगळे बाजूला सारले आणि फक्त साधे ड्रेस बॅगेत भरले. मला आता कुठल्याही गोष्टीचा मोह नको होता. आयुष्याचा मार्ग मी बदलणार होते. मग कशाला ती झगमग? तो मोह आणि त्या आठवणी. आत्याकडे जातानाच्या प्रवासात माझ्या मनात अनेक विचार उंचबळत होते. एक मात्र ठाम निर्णय मन देत होतं की पुन्हा स्टॅट नको, मॅथ्स नको त्याची आठवण नको. त्यापेक्षा पुन्हा बारावी सायन्सला ऍडमिशन घ्यायची. बायोलॉजी घेऊन. अगदी मेडिकलला नाही तर निदान नर्सिंग कोर्सला ऍडमिशन मिळवायची आणि लोकांच्या व्याधी दूर करण्यासाठी धडपडायचं. माझ्या दुःखामध्ये मला जसा इतरांनी आधार दिला, तसाच आधार आपण आता इतरांना द्यायचा. माझा हा विचार आत्याला आणि तिच्या मिस्टरांना एकदम पटला. त्यांच्या मते तसे करणे...
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