हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४७ – कविता – मन की बात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मन की बात…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४७ ?

? कविता – मन की बात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

जन गण के लिए मन की बात  इक सौगात है

जन-जन की हुकूमत से होती सीधी बात है

=2=

नायक सभी चौकन्ने हैं,जन-हित के वास्ते

प्रतिनिधि लोक-सेवक,जनता के साथ है

=3=

खुशबू से महक उठा लोकतंत्र का चमन

विकास के आँगन में खिला पारिजात है

=4=

सरकारी योजनाओं से हर  रास्ते रोशन

कौन कह रहा है अब अंधेरी रात है

=5=

सड़कों का जाल बिछ चुका,अब गाँव-गाँव में

देहात ने मिलाया शहरों से हाथ है

=6=

भेदभाव के समस्त क्लेश मिट गये

इंसान हैं सभी,कहाँ अब जात-पाँत है ?

=7=

रहता डरा-डरा अब,ना-पाक पड़ोसी

हिन्द की सेना बनी,अब वज्रपात है

=8=

दुरुस्त-चुस्त शासन,मुस्तैद प्रशासन

विकसित भारत से तय,मुलाक़ात है

=9=

अच्छे दिनों का दौर अब,आया है दोस्तो

विकास की यही तो नई शुरुआत है

=10=

‘राजेश’ विश्व गुरु है,ये देश हमारा

बलाओं-संकटों से सबको,अब निज़ात है

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११३ ⇒ हानि-लाभ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हानि-लाभ…“।)

?अभी अभी # १११३ ⇒ आलेख – हानि-लाभ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पुराने साहूकारी बही-खातों में अंदर कितनी भी लाभ-हानि हो, बही-खातों के ऊपर लाभ-शुभ ही लिखा जाता था। शुभ-लाभ में शुभ ही शुभ होता है, क्योंकि जब लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं, तो लाभ ही लाभ होता है!  लेकिन जीवन में हर इंसान को हानि और लाभ दोनों का अनुभव होता है।

आम आदमी के लिए सुख-दुःख, हानि-लाभ ईश्वर के अधीन होंगे, लेकिन राजनीति हमेशा केवल सत्ता के अधीन होती है। ईश्वर की सत्ता से परे होती है सत्ता की राजनीति।।

जिस तरह एक व्यापारी की नैतिकता हानि-लाभ से जुड़ी होती है, घोड़ा घास से यारी नहीं कर सकता, उसी तरह राजनीति में सत्ता की खातिर कभी लोक-लुभावन निर्णय लिये जाते हैं, तो कभी लोक-विरोधी। कभी शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को सरकार पलट देती है तो कभी sc/st के निर्णय को ताक में रखना पड़ता है। और सरकार इसी ताक में रहती है, कि कब मौका आए, और वह ताक में रखा निर्णय पुनः बहाल करे।

जब धंदा मंदा होता है, व्यापारी अधिक जमाखोरी करता है। बाज़ार के उठते ही वह उठ जाता है, और उसका गोदामों में पड़ा सामान मुँह-माँगी कीमत पर हाथों-हाथ उठ जाता है। कभी कभी जब मंदी ज़ोर पकड़ लेती है, तो मज़बूरी में घाटा उठाकर भी सामान उठा देता है, सर पकड़कर बैठ जाता है, और आसमान की ओर मुँह उठाकर कहता है –

जन्म-मरण, जस-अपजस,

हानि-लाभ, सब ईश्वर के हाथ।।

एक व्यापारी की तरह कभी कभी सत्ता का भी दीवाला निकल जाता है। 60 साल से चली आ रही पेढ़ी जनता का विश्वास खो बैठती है और विपक्ष में जा बैठती है। राजनीति पुरुषार्थ का खेल है!  इसमें रणछोड़ नहीं चलते। जंगबहादुर ही जंग जीतते हैं, लालबहादुर तो एक रेल दुर्घटना से ही व्यथित हो, मंत्री-पद से त्याग-पत्र दे देते हैं।

त्याग नहीं भोग की नीति का नाम है राजनीति!  एक राजनेता के लिए सत्ता का डंडी-चूम उपभोग और कुर्सी की देखभाल से बड़ा कोई कर्तव्य अथवा आदर्श नहीं हो सकता। त्याग के लिए जनता बैठी है न।।

जनता नहीं समझती!  उसके भले के लिए सरकार को कितने कड़वे और कठोर निर्णय लेने पड़ते है। सब्सिडी और आरक्षण जैसे कल्याणकारी क़दम अगर एक बार आगे बढ़ जाएं, तो महज भावुकता अथवा छोटे-मोटे आंदोलनों की परवाह नहीं की जाती। एक बार बढ़े हुए कदम पीछे नहीं लिए जाते। और खासकर चुनाव के वक्त तो कभी नहीं।

हम लाए हैं तूफान से कुर्सी निकाल के!  इस कुर्सी को रखना, मेरे नेता संभाल के।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २२१ ☆ गीत – ।। जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २२१ ☆

☆ गीत ।। जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।

सोच बदलते ही किस्मत का सितारा ही बदल जाएगा।।

**

जैसी होती है हमारी दृष्टि वैसा ही हम देख भी पाते हैं।

जो रंग आंखों में समाया वही ही हर जगह हम पाते हैं।।

बदला दृष्टिकोण जीवन नैया का किनारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

**

यदि विचार और सोच उलटी तो देखते भी गलत हैं।

अहंकार राग-द्वेष से तो आदमी का तन-मन जलत है।।

लेकिन सहयोग सरोकार से हर सहारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

**

बिना स्नेह-प्रेम के हमारे हर रिश्ते की हार हो जाती है।

बिन मधुरता के हर एक  बोली भी बेकार हो जाती है।।

बिन धन -दौलत के भी आपका गुजारा बदल जाएगा।

जरा नज़र बदल कर देखिए नज़ारा बदल जाएगा।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १९ – पर्यावरण दिवस!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण दिवस!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १९ ☆

☆ पर्यावरण दिवस!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

वृक्ष काटते जाते मानव, होगा क्या परिणाम रे ।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी,जब आएगी घाम रे ।।

खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे ।

जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे ।।

*

निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे ।

धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे ।।

रौद्र रूप जब धारे माता,  होगा क्या परिणाम रे ।

हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बना अभिराम रे ।।

 *

पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।

वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।

दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।

भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – सूचनाएँ ☆ संपादकीय निवेदन – सुश्री शांभवी जोशी – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सुश्री शांभवी जोशी

💐 अ भि नं द न 💐

वंदना प्रकाशन, मुंबई यांच्यातर्फे उत्कृष्ट मराठी वाङमय-निर्मितीसाठी मानाचा समजला जाणारा “आशीर्वाद पुरस्कार” दरवर्षी विविध प्रकारातील साहित्याला दिला जातो. या पुरस्काराचे हे २७वे वर्ष आहे.

या वर्षीच्या पुरस्कारांपैकी ‘कथासंग्रह’ या विभागातील पुरस्कार आपल्या समूहातील लेखिका सुश्री शांभवी जोशी यांना दिला जाणार आहे. या त्यांच्या संग्रहाचे नाव आहे..

“लाइफस्टाईल“. हा संग्रह मधुश्री प्रकाशन, पुणे यांनी प्रकाशित केला आहे.

हा पुरस्कार प्राप्त केल्याबद्दल आपल्या सर्वांतर्फे शांभवीताईंचे मनःपूर्वक खूप खूप अभिनंदन आणि यापुढच्या अशाच यशस्वी साहित्यिक वाटचालीसाठी असंख्य हार्दिक शुभेच्छा.

आजच्या अंकातील जीवनरंग सदरात वाचूया याच त्यांच्या संग्रहातली एक छान कथा.

 संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “ओळख” ☆ मंजुषा सुनीत मुळे☆

मंजुषा सुनीत मुळे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “ओळख” ☆  मंजुषा सुनीत मुळे  ☆

☆

सारी सृष्टी गोठवणारा थंडीचा कडाका …. थिजलेलं वातावरण ..

आम्ही आमच्या घरट्याच्या उबेत लपेटलेले .. ..

.. आणि दूर झाडाखाली कुणीतरी ..

.. गारठण्याची संवेदनाच जणू गोठलेला .. ..

.. .. .. बधीरसा .. शरीराने .. अन् मनानेही ।।

 

ग्रीष्माची धगधगती काहील ….सूर्याच्या साक्षीने होरपळणारी सृष्टी ..

आम्ही आमच्या घरट्याच्या सुखद गारव्यात विसावलेले .. ..

.. आणि तिकडे दूर कुणीतरी ..

.. निष्पर्ण झाडाची सावली शोधत ..

.. .. .. अंगांगाची आग उन्हानेच विझवणारा .. केविलवाणा ।।

 

सृष्टीलाच वाहून न्यायला आलेला धुंवाधार पाऊस ….फाटलेलं आभाळ ..

आम्ही आमच्या घरट्याच्या छपराखाली सुरक्षित .. पावसाची गंमत पहात .. ..

.. आणि दूर पलीकडे कुणीतरी ..

.. जणू वाहून जायलाच आलेला ..

.. .. .. पण नशिबाला धरून लोंबकाळणारा .. बिच्चारा ।।

 

 

.. .. .. कोण हा कुणीतरी ?? .. दरवेळी न चुकता दिसणारा ?? .. ..

 

.. .. .. .. अरे हे तर साक्षात दारिद्र्य ….

.. ..  पण भाग्य त्याचं थोर .. ..

.. आम्ही निदान अजून ओळखतोय तरी त्याला ..

.. .. लांबून का होईना .. पण ओळखतोय .. .. ..

☆

© मंजुषा सुनीत मुळे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ झपूर्झा ! गडे झपूर्झा! ☆ कल्याणी केळकर बापट ☆

कल्याणी केळकर बापट

? विविधा ?

☆ झपूर्झा ! गडे झपूर्झा! ☆  कल्याणी केळकर बापट ☆

(सात आक्टोबर  : पुण्यतिथी निमित्त)

कवी स्व केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले)

साहित्य वाचायची, समजून घ्यायची एकदा सवय झाली की मग आपोआप लिहायची पण सवय होते. लिहायच्या प्रत्येकाच्या पद्धती वेगवेगळ्या असतात आणि म्हणूनच मग आपल्याला प्रत्येक लिखाणात वेगवेगळी गोडी, खुमारी जाणवायला लागते.

आपले विचार, मत हे विस्तृत स्वरूपात मांडायच ठरवलं की ते भरपूर उदाहरण, दाखले देऊन वर्णन पर लिहिले की ते गद्य प्रकारात मोडतं आणि हेच आपले विचार, भावना अतिशय कमी शब्दात व्यक्त करता आल्यात तर ते पद्य ह्या प्रकारात मोडतं.

गद्य  म्हणजे दैनंदिन बोलण्याच्या नैसर्गिक प्रवाहातील, व्याकरणाचे नियम पाळून साध्या व सरळ भाषेत केलेले लेखन . यात कथा, कादंबरी, निबंध, नाटक, चरित्र, आणि पत्रे यांसारख्या साहित्य प्रकारांचा समावेश असतो. तर पद्य म्हणजे छंद, लय, यमक आणि विशिष्ट अक्षररचना किंवा मात्रेच्या नियमात बांधलेली कविता, अभंग, ओवी किंवा श्लोक-रूपी रचना होय हे गद्याच्या विरुद्ध असते, कारण यात भावनांना नाद आणि यमकाद्वारे काव्यात्मक रूप दिले जाते.

गद्य प्रकारात लिहिण्यापेक्षा पद्य प्रकारात मांडणं हे जास्त कठीण कारण किमान शब्दांत कमाल भावना वाचकांपर्यंत पोहोचवायच्या असतात.

एकदा साहित्याची आवड निर्माण झाली की मग आपोआप आपलं लक्ष, नजर ही त्यातील सौदर्यावर पडते. मग ते सौंदर्य कथा, कादबं-या, कविता, लेख चारोळ्या इत्यादी प्रकारांमध्ये आपल्याला आढळतं. मग आपल्याला आवडत्या प्रकारांमधील आपला अजूनअजून शोध सुरु होतो.

आजची तारीख म्हणजे ह्या साहित्यातील कठीण प्रकार आपल्या वेगळ्या आधुनिक काव्याच्या शैलीत मांडणाऱ्या केशवसुतांची जयंती. कवी केशवसुत यांचे संपूर्ण नाव कृष्णाजी केशव दामले असून त्यांना आधुनिक मराठी काव्याचे जनक मानले जाते.

इंग्रजी काव्यातील चौदा ओळींचा सॉनेट हा काव्यप्रकार ‘सुनीत’ या नावाने त्यांनी मराठीत लोकप्रिय केला. त्यांनी लिहिलेल्या कवितांपैकी फक्त 135 कविताच आज उपलब्ध आहेत.  त्यांच्या कवितांमध्ये अनेक प्रकारचे नानाविध विषय दिसून येतात. अन्याय, विषमता, अंधश्रद्धा, परस्पर स्नेहभाव, स्त्रीपुरुषांमधील प्रेम, त्याचबरोबर सामाजिक बंडखोरी, मानवतावाद, राष्ट्रीयत्त्व, गूढ अनुभवांचे प्रकटीकरण, आणि निसर्ग असे अनेक विषय त्यांनी अगदी सहजपणे हाताळले आहेत. इंग्रजी काव्य परंपरेतील रोमॅण्टिक समजला जाणारा सौंदर्यवादी दृष्टीकोन प्रथम मराठी साहित्यात आणि काव्यात आणण्याचा मान केशवसुतांकडे जातो.

त्यांची साहित्य, कविता ह्या बाबतीत स्पष्ट आणि परखड मतं होती. प्रत्येक कवीची प्रतिभा ही त्यांची स्वतःची स्वतंत्र असावी असे त्यांचे म्हणणे होते. काव्य हे कायम उत्स्फूर्त असावे ते कुठल्याही हुकूमानुसार नसावे असे त्यांचे म्हणणे होते.  त्यांच्या काव्य विचारांवर वर्डस्वर्थ, शेली, किटस् यांसारख्या इंग्रजी कवींचा मोठा प्रभाव होता, पण ह्या प्रभावाने  त्यांच्या भारतीय शैलीच्या मध्ये आला नाही हे पण खरे. ‘आम्ही कोण?’, ‘झपुर्झा’, ‘तुतारी’, ‘नवा शिपाई’ या त्यांच्या अत्यंत प्रसिद्ध व गाजलेल्या कविता आहेत.

भगवतगीतेतील स्थितप्रज्ञाच्या लक्षणांचा मुक्त आविष्कार आपल्याला त्यांच्या झपूर्झा ह्या कवितेत वाचायला आणि अभ्यासायला मिळतो. ह्या कवितेतील चार ओळी पुढीलप्रमाणे,

हर्षखेद ते मावळले, हास्य निमाले, अश्रु पळाले।

कंटक-शल्यें लव वठली; कांहीं न दिसे दृष्टीला l

प्रकाश गेला, तिमिर हरपला

      काय म्हणावें या स्थितिला ?—

                         झपूर्झा ! गडे झपूर्झा !

अशा ह्या प्रतिभावान कवींचे दिनांक 7 नोव्हेंबर 1905 रोजी दुःखद निधन झाले. 

©  कल्याणी केळकर बापट

9604947256

बडनेरा, अमरावती

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ‘प्रकाशाच्या सावल्या…’ ☆ शांभवी मंगेश जोशी ☆

सुश्री शांभवी मंगेश जोशी

?जीवनरंग ?

☆ ‘प्रकाशाच्या सावल्या…’ ☆ शांभवी मंगेश जोशी ☆

पालखी खांद्यावर घेतली नि माझा रोम-रोम शहारला!, भक्तिभावानं अवघी काया पुलकित झाली, डोळे आनंदाश्रूंनी भरून गेले.

त्या गुरुवारी प्रथेप्रमाणं सायंकाळी साग्रसंगीत पूजा आरती झाली नि पूर्व दरवाजापासून प्रदक्षिणा सुरू झाली. पश्चिम दरवाजाला पालखीला आधार देऊन उभं केलं. दत्तमहाराजांची पदं आणि स्तोत्रं सुरू झाली. ईश्वरीय जाणिवेनं माझ्या सर्वांगातून विजेचं चैतन्य वहात होतं. ह्यालाच साक्षात्कार म्हणत असावेत असं मनोमन वाटून गेलं. समोर उभा असलेला अफाट

 जनसमुदाय मला दिसत नव्हता. फक्त दत्तमहाराजांची मूर्ती डोळ्यांना दिसत होती. अननुभूत अशा प्रसन्न जाणिवेनं मी पूर्णपणे विलीन झालो होतो. तीन प्रदक्षिणा पूर्ण झाल्या आणि अत्यानंदात मी हरखून गेलो.

याचसाठी केला होता अट्टाहास… !

खरोखर! दत्तमहाराजांच्या पालखीची सेवा मिळणं ही साधी सोपी गोष्ट नव्हती. अनेकजण त्यासाठी आस लावून बसले होते. ते भाग्य माझ्या पदरात पडलं होतं. एवढ्या दिवसांची तपश्चर्या होती. व्रतस्थ आणि नेमस्त जीवनाची ती फलश्रुतीच होती. शिवाय माझ्या वडिलांची आणि आजोबांची पूर्वपुण्याई.

मी श्रीपाद अवधूत पंत! आप्पा म्हणजे माझे वडील अवधूत महामुनिश्वर पंत! महामुनिश्वर गोरक्षनाथ पंत म्हणजे माझे आजोबा. माझ्या वडिलांच्या जन्मानंतर लगेचच माझी आजी वारली. तेव्हापासून आजोबांनी स्वतःला दत्तमहाराजांच्या सेवेत झोकून दिलं. वडिलांना वेदांचं, उपनिषदांचं ज्ञान दिलं. कठोर अनुशासनात ते त्यांच्याकडून ध्यानधारणा, जपतप सारंकाही करून घेत. आजोबांसारखेच वडीलही अधिकारी पुरुष बनले. आजोबांची दत्तात्रेयांवर नितांत श्रद्धा होती. वडीलही आजोबांच्या पावलावर पाऊल ठेवून दत्तभक्त झाले. आजोबांची परंपरा त्यांनी पुढे चालू ठेवली. योगायोग असा की आजीसारखीच माझी आईपण माझ्या जन्मानंतर लगेच निवर्तली. म्हणून लग्न करायचंच नाही, अविवाहित राहून भक्तिमार्गात राहायचं असं मी ठरवून टाकलं होतं. वडिलांनाही माझं अध्ययन आणि दत्तमहाराजांची सेवा याशिवाय दुसरं विश्वच उरलं नाही. म्हणूनच माझ्या खांद्यावर पालखी पाहून त्यांना कृतकृत्य वाटलं. रात्री झोपतांना आप्पांनी अपार कौतुकानं माझ्याकडं पाहिलं. पालखीची सेवा मला मिळाली म्हणून त्यांच्या उरीपोटी माझ्याबद्दल प्रेम दाटून आलं. ज्या असोशीनं त्यांनी मला ज्ञान दिलं, त्याचं सार्थक झालं. त्यांच्या जन्माची तीच जणू इतिकर्तव्यता होती.

त्यांचा प्रेमळ हात माझ्या मस्तकावर ठेवून आप्पा म्हणाले, ‘‘गुरुदेवांनी सोनं केलं बघ आपल्या जन्माचं! आता हे पालखीचं कार्य तू पुढं नेशील, मी डोळे मिटायला मोकळा. ’’

माझे डोळे मात्र भरून आले. त्यांच्या हातातून, स्पर्शातून त्यांचे आशीर्वाद मला मिळाले. आशीर्वादाबरोबर साता जन्माचं संचितच जणू त्यांनी मला दिलं.

त्या रात्री अतीव समाधानानं मी झोपी गेलो. सारी रात्र खांद्यावर पालखीची जाणीव मला होत होती. पहाटे रोजच्यासारखी जाग आली. स्नान, संध्या, पूजा, उपासना झाली. प्रत्येक क्षणी खांद्यावर पालखीत दत्तमहाराज असल्याची जाणीव होती. त्याचवेळी पुढच्या गुरुवारच्या पालखीची मी वाट पहात होतो. गुरुवार आला. पुन्हा खांद्यावर पालखी घेऊन प्रदक्षिणा झाल्या. तीच धन्यता, तेच समाधान! अपूर्व! तरीही अपुरं! पुन्हा-पुन्हा, पुन्हा-पुन्हा आणि पुन्हा-पुन्हा! प्रत्येक गुरुवारी. नित्याचंच. समाधानही तेच होतं मन व्यापून टाकणारं नि काळजात भरून रहाणारं. दर गुरुवारी खांद्यावर पालखीत आणि एरवी पालखीशिवाय दत्तमहाराज सतत माझ्यासवेच असायचे आणि त्यांच्याबरोबर मी दिव्य आनंदात! हा दिव्य आनंदाचा कुंभ माझ्या काळजात ओतप्रोत भरलेला होता. त्याला कधीही ओहोटी लाहणार नाही याची मला खात्री होती. कारण माझी श्रद्धा आणि वाडवडिलांचे आशीर्वाद यांची मोठी पुंजी माझ्याजवळ होती. माझं रोजचं जगणं, रोजची दिनचर्या, दत्त, दत्त आणि दत्तमय होऊन गेली होती.

दररोज सकाळी आठ ते दहा वाजेपर्यंत मी मंदिरात असे. अनेक भक्तांची पादुकांना अभिषेक करण्यासाठी रांग लागलेली असे. ते सर्व अभिषेक करण्याची नित्यसेवा माझी होती. गाभार्‍यात कुणालाच प्रवेश नव्हता. गाभार्‍याचा एक दरवाजा म्हणजे एक छोटीशी कमान होती. त्या कमानीतून लोक फक्त अभिषेकाचे ताट आत सरकवत आणि गोत्र सांगत. त्यांचे पूर्ण दर्शनही आम्हाला आतून होत नसे. त्या दिवशी खूप अभिषेक झाले. दहा वाजता दोन सुंदर हातांनी एक तबक आत सरकवले. मला वाटतं तोच क्षण होता. बहुधा! ज्या क्षणी माझ्या काळजातला आनंदाचा कुंभ डळमळायला सुरुवात झाली असावी. पण मला मात्र त्याची यत्किंचितही जाणीव नव्हती.

ते गोरेपान सुंदर हात मी पहातच राहिलो. लांबसडक, निमुळती बोटं आणि नक्षीदार बिलवर! त्यातच माझी नजर अडकून पडली.

आप्पा पण तिथेच होते गाभार्‍यात. ते म्हणाले, ‘‘दहा वाजले. आता वेळ संपली अभिषेकाची. उशीर झाला आहे. ’’

‘‘हो उशीर झालाय, पण मी खूप वेळची रांगेत उभी आहे. कृपया नाही म्हणू नका, माझा नवसाचा अभिषेक आहे. ’’

‘‘मागे किती लोक आहेत रांगेत? ’’ आप्पांनी विचारलं. ‘‘नाही, आता कुणीच नाही. ’’

आप्पा म्हणाजे, ‘‘ठीक आहे, पण नेहमी दहाच्या आत येत जा. ’’

‘‘हो गुरुजी. ’’

‘‘गोत्र सांगा. ’’

‘‘गार्ग्य’’.

 एवढा मंजुळ आवाज मी कधीच ऐकला नव्हता आणि एवढे सुंदर हातही मी कधीच पाहिले नव्हते. आप्पांनाही बहुदा त्या मंजुळ आवाजातलं आर्जव ऐकून नाही म्हणायला जमलं नसावं.

 ‘‘श्री अभिषेक करून घे. ’’

मी आप्पांनी दिलेली आज्ञा शिरसावंद्य मानली.

शेवटचा अभिषेक केला. प्रसाद दिला नि रोजच्या दिनक्रमात मी बुडून गेलो. दुसर्‍या दिवशी त्या सुंदर हातांनी अभिषेकाचं ताट सरकवलं. गोत्र सांगितलं. तिसर्‍या आणि चौथ्या दिवशी तर सकाळी आठ वाजता पहिलंच तबक त्या हातांनी सरकवलं. मीच विचारलं ‘‘गार्ग्य का? ’’ आप्पांनी चमकून माझ्याकडं पाहिलं.

‘‘रोज अभिषेक करता का? ’’

‘‘हो अकरा दिवसांचा नवस आहे. ’’

नकळत मी त्या सुंदर हातांची वाट पहात राहिलो. काही कारण नसतांना. खरचंच त्यानंतर सात दिवस ते हात मला दिसत राहिले आणि मी आनंदीत होत राहिलो. इथंच धोक्याची सूचना माझ्या लक्षात यायला हवी होती. ती आली नाही, कारण पुढं खूप काही वेगळंच घडायचं होतं माझ्या आयुष्यात.

माझी नित्यसेवा, उपासना चालूच होती मनोभावे. एक दिवस पंचांग घेऊन सभामंडपात बसलो होतो. रोज तासभर बसत असे, तो शिरस्ताच होता. कुणा-कुणाचे प्रश्न असत. त्यांना पंचांगात पाहून उत्तर देत असे.

अचानक त्या सुंदर हातांनी एक कागद माझ्या पुढे ठेवला. त्या ओळखीच्या हातांकडे मी पहात राहिलो. तेवढ्यात तो ओळखीचा मंजुळ आवाज कानावर पडला, ‘‘पत्रिका पहायची होती’’. हातांसारखाच तो आवाजही सुखावणारा होता.

‘‘काय प्रश्न आहे? ’’

‘‘लग्न कधी होईल? ’’

मी पत्रिका नीट पाहिली आणि सांगितलं, ‘‘तुळशीच्या लग्नानंतर पहिल्या मुहूर्ताला. ’’

‘‘खरंच? ’’ तिनं आनंदून विचारलं. मी वर पहात म्हटलं ‘‘खरंच’’.

त्या सुंदर हातांइतकीच ती सुंदर होती. अप्रतिम लावण्यवती.

माझ्या उत्तरानं ती आनंदून गेली. तिच्या सुंदर हातांनी मला नमस्कार केला. मी समोरच पहात राहिलो. ती निघून गेली तरी तिचा सुंदर चेहरा मला दिसत राहिला.

उठून उभा राहिलो. तेव्हा समोरच्या आरशात माझं लक्ष गेलं. मला आश्चर्यच वाटलं. यापूर्वी असं कधीच माझ्या प्रतिमेकडे लक्ष गेलं नव्हतं. आरसा तर पूर्वीपासून होता. माझ्या आयुष्यात काही नवीन प्रतिमा उभरण्याची तर चिन्ह नसावीत?

छे! काहीतरीच! मी मान झटकली. पुन्हा स्वतःच्या आरश्यात न्याहाळू लागलो. ‘‘तसा मीही चांगला आहे दिसायला. शेंडी काढून भांग पाडला तर अजूनच देखणा दिसेन. ’’

हे काय चाललं होतं माझ्या डोक्यात? आजपर्यंत कधी असे विचार माझ्या ध्यानीमनी नव्हते. मी असं कधी स्वतःला मोठ्या आरशात पाहिलं नव्हतं. हंऽ काहीतरीच. म्हणून मी पुन्हा मान झटकली.

‘‘मी तुमची दक्षिणा दिलीच नाही. ’’ ती पुन्हा आली होती. मी चमकून पहात राहिलो. खरं तर मी भान हरखून पहात होतो. तिनं भानावर आणलं.

‘‘नाही का, लग्न कधी होईल म्हणून प्रश्न विचारला. ’’

‘‘कुणाचं लग्न. ’’

‘‘इश्य! ’’ म्हणून ती लाजली.

भानावर आलेला मी परत भान हरपून पहात राहिलो.

‘‘सांगा ना!… दक्षिणा? ’’

दचकून मी म्हटलं, ‘‘छे छे काहीतरीच! दक्षिणा कसली? ’’

ती हसली आणि निघून गेली. तिचं हसणं म्हणजे गुलाबपाण्याचं शिंपणच. त्यानं सुखावून माझं लक्ष पुन्हा आरशातल्या माझ्या छबीकडे गेलं. क्षणभर माझ्या शेजारी ती मला दिसली. वाटलं छान दिसतोय जोडा. या विचारासरशी माझं मन आकाशात तरंगू लागलं.

‘‘श्रीपाद अरे चल, कीर्तनाची वेळ झाली. ’’ माझं विमान धाडदिशी जमिनीवर आदळलं. माझ्या अधीर मनाला मी गप्प केलं. लग्न, स्त्री याचा कधी विचार केला नव्हता. मला करायचाही नव्हता. ‘‘श्रीपादऽ’’ पुन्हा आप्पांची हाक आली. ‘‘आलो… आलो. आप्पा’’ म्हणून मी धावत कीर्तनगृहात गेलो. आप्पा पेटीचा भाता उघडून तयार होते. मी येताच त्यांनी सूर धरला. मीही ठोकून ठोकून तबला लावू लागलो. खरं तर माझे विचार… सैरभैर धावणारे… ठोकून लावण्याची गरज होती. ते जमेना म्हणून तबलाही सुरात लागेना. माझ्या मनात त्या सौंदर्यवतीचा लागलेला सूर मात्र सुटेना!

शेवटी मी तबल्यावर थाप दिली. भास्करबुवांचं कीर्तन सुरू झालं. सुरू झालं अन् संपलं. संपल्यावरही मी वाजवतच होतो. आप्पा ओरडले, तेव्हा दचकून थांबलो. सार्‍या कीर्तनभर मी काय वाजवत होतो कुणास ठावूक! माझ्या डोळ्यासमोर आमची दोघांची… माझी आणि त्या लावण्यवतीची आरशात प्रतिमा दिसत होती. रात्री झोपतांना आप्पा म्हणाले, ‘‘श्री, अरे आज भजनी ठेक्याच्या ऐवजी त्रिताल वाजवत होतास, बुवा भजन म्हणत असतांना बुवा तुझ्याकडे बघत होते. तुझं अजिबात लक्ष नव्हतं. काय चाललंय तुझ्या डोक्यात? ’’

‘‘हं… ! दमला असशील. झोप आता. ’’ मी कुशीवर वळून झोपण्याचा प्रयत्न करीत होतो. पण डोळ्यापुढं तीच दिसत होती. ती, तिचं हसणं, तिचं ते गुलाबपाण्याचं शिंपण, तिचे सुकोमल हात… तिचा मृदुमधूर कानात रुंजी घालणारा आवाज!! छे छे छे काय पहात होतो मी? कशासाठी? माझा काय संबंध तिच्याशी? ती… ती कोण – ती? मला तर तिचं नावही माहीत नव्हतं. पत्रिका पाहिली पण तिचं नावही नाही विचारलं. हे सारं थांबवलंच पाहिजे. असा निश्चय करून मी झोपेची आराधना करू लागलो.

त्यानंतर दोन-चार दिवस ती कुठेच दिसली नाही. वाटलं बरं झालं. विषयच संपला. पण दुसरे दिवशीच पहाटे-पहाटे ती दिसली. मी मंदिराच्या पायर्‍या चढतांना अचानक तिच्या हातातली फुलांची परडी माझ्या पायाशीच लवंडली. हा खूपच शुभसंकेत वाटला मला. ती लगबगीने तिच्या सुंदर हातांनी फुलं वेचू लागली. तिच्या चेहर्‍यावर लज्जेचे भाव मला जाणवले. म्हणजे तिच्याही मनात… ? छे! चालली परत माझी गाडी रूळ सोडून!

त्याच दिवशी माझ्या मनाचं पाखरू पुन्हा पंख लावून उडू लागलं. ती एका वयस्कर स्त्रीसमवेत आप्पांसमोर बसली होती. ती स्त्री आप्पांना काही कागद दाखवत होती. ती लाजत होती. मला वाटलं तिची आई… की कोण माझ्यासाठी ह्या सौंदर्यवतीचा प्रस्ताव मांडत होती, किंवा मांडत असावी. असं वाटल्यावर माझ्या मनाचं पाखरू उडणारच ना! उंच… उंच… ! पण… पण मी तर निश्चय केला होता ना लग्न न करण्याचा?

रात्री झोपतांना आप्पा त्या संबंधात मला काही विचारतील, सांगतील असं मला वाटत होतं. किंबहुना मी वाट पहात होतो. पण आप्पांनी चकार शब्दानं काही विषयसुद्धा काढला नाही.

त्यानंतर जवळजवळ महिनाभर ती दिसलीच नाही. कुणाजवळ काय न् कशी चौकशी करणार? माझी बेचैनी वाढत होती. जेवढा मी तिच्या विचारापासून दूर जाण्याचा प्रयत्न करत होतो तेवढा त्यात अधिकाधिक अडकत चाललो होतो. रात्रीची झोप लागेना. थोडी लागली तरी स्वप्नात ती दिसत होती.

त्याचा परिणाम पहाटे उठण्यावर, माझ्या जपावर, साधनेवर होत होता. जेवणही जात नव्हतं. अशक्तपणा आला होता. सगळं आरोग्य बिघडलं होतं. कशातच स्वारस्य वाटत नव्हतं. बुद्धीला समजत होतं, तिचा विचार करण्यात काहीच अर्थ नाही. काही संबंध नाही. पण मन काही ऐकत नव्हतं. वाटत होतं कदाचित आप्पांना त्या स्त्रीनं माझ्यासाठी विचारलं असेल. आप्पांनी परस्पर नाहीम्हणून सांगितलं असेल का? आप्पांना काही विचारण्याचा धीरही होत नव्हता. आप्पांना नको आहे का माझं लग्न? या विचारासरशी मी सटपटलो. आप्पांना काय मला तरी कुठं हवं होतं लग्न आतापर्यंत? पण आता… ? माझ्या मनातल्या युद्धामुळं माझी हालत दिवसेंदिवस खराब होत चालली होती.

आप्पांच्याही लक्षात आलं असावं. आप्पा म्हणालेसुद्धा, ‘‘कारे श्री नीट जेवत नाहीस? चेहरा सुरकुतल्यासारखा दिसतोय. काही होतंय का? तब्येतीकडे दुर्लक्ष करू नकोस रे बाळा. काही त्रास होत असेल तर विश्रांती घे चार दिवस… ’’

‘‘नाही आप्पा तसं काही नाही. ’’

‘‘अरे नाही काय, मी पहातोय तुला नीट जेवण जात नाही. वैद्यांना तब्येत दाखवायची का? ’’

‘‘नाही आप्पा काही काळजी करू नका. ’’

हे सगळं थांबवायला हवं. मी मनाला कठोरपणं बजावलं. दत्तमहाराजांच्या सेवेत खंड पडता कामा नये. उद्या गुरुवार आहे. पालखीची सेवा रुजू करायलाच पाहिजे. आमची तीन पिढ्यांची सेवा, साधना… अशी खंडीत होता कामा नये. दत्तमहाराज काही वावगं होऊ देणार नाहीत. माझ्या भरकटणार्‍या मनाला मी श्रद्धेनं बांधून ठेवलं. आता ती दिसूच नये असं मी म्हटलं. खरंच माझं मन

शांत झालं असं मला तरी वाटलं.

आणि तो क्षण आला. जे हवंसं होतं. पण मी टाळत होतो. गुरुवारची पालखी नेहमीप्रमाणे निघाली. दोन प्रदक्षिणा झाल्या. तिसर्‍या प्रदक्षिणेला पालखी पश्चिम दरवाजाला मी टेकवली. स्तोत्र आणि पदं झाली. करुणात्रिपदी झाली, शेवटचं पद सदानंदानं सुरू केलं. सुरेख आवाज लागला होता. अंतरीच्या तळमळीनं तो गात होता.

 ‘‘आवर मना तू आवर मना

 सांगे तुजला दत्तराणा! ’’

माझं मन शांत होत होतं. तेवढ्यात पुढं वीज चमकावी तसं झालं. पश्चिम दरवाजाच्या समोर काळ्या नक्षीदार खांबाला टेकून ती उभी होती. डोळे मिटून भक्तिभावानं पदं ऐकत होती. ऐकतांना तिची निश्चल समाधी लागली होती. ती… तीच ती! जिला मी विसरू म्हणता विसरू शकत नव्हतो. तिलाही बंद डोळ्यांपुढे मीच दिसत असेन का?

मी भान हरपून तिच्याकडे पहात राहिलो. पहातच राहिलो. तिचा केतकी वर्ण, कमानदार भुवया, कमनीय आकृती… काळ्या दगडात कोरलेलं सुरेख चकाकणारं शिल्प असावं तशी! केवळ अनुपम लावण्य! मी भान हरपून पहातच राहिलो. पद संपल्यावर सदानंदानं मागच्या बाजूनं पालखी उचलली. पण मी जागेवरच उभा… पुतळ्यासारखा! ‘‘श्रीऽ अरे श्रीऽ… ’’ तो हाका मारत होता. पण माझ्या कानात काहीच शिरत नव्हतं. सारा जनसमुदाय मला खाणाखुणा करू लागला पण मी ढिम्म! हळूहळू लोकांमध्ये कुजबूज सुरू झाली. ती वाढत गेली. जगदीशनं मला हलवून हाक मारली. पण माझ्या सार्‍या संवेदनाच गोठून गेल्या होत्या. सारं शरीर जडशीळ झालं होतं. माझी पापणीही हलत नव्हती. शेवटी माझ्या बाजूने पालखी सदानंद आणि जगदीशने हलकीच पुढे नेली.

प्रसाद घेऊन जनसमुदाय परतला. तीही निघून गेली. पण ती माझ्या नजरेत तशीच! मीही जागेवर तसाच. थोड्यावेळानं जगदीश व सदा आले. तरीही मी तसाच होतो. त्यांनी पुन्हा मला हलवलं. तेव्हा त्यांच्या लक्षात आलं, माझं अंग तापानं फणफणत होतं. त्यांनी उचलून मला घरी नेलं. आप्पांना सांगितलं. वैद्यांना घरी बोलावलं. कपाळावर पट्ट्या, चाटण, काढा सारं काही झालं. मी बराही झालो. पण माझी मनःस्थिती पार बदलून गेली होती. ऐन पौर्णिमेला अंधार दाटून आला.

पालखीचा दिव्य आनंद कुठे लुप्त झाला? दत्तमहाराजांची कृपा, आजोबांची, आप्पांची पुण्याई मला त्यांच्याकडून मिळालेलं संचित, सारं.. सारं कुठे गेलं? त्या सर्व जाणीवाच माझ्या मनातून लुप्त झाल्या. खांबाला टेकून उभी असलेली ती तरुणीच मला दिसत होती. हे काय होत होतं? ज्या गोष्टीचा मी चुकून कधी विचार केला नाही ते माझ्या मनात कुठून आश्रयाला आलं. छे छे हे योग्य नाही अशी मनाची समजूत काढेपर्यंत बुधवार आला.

‘‘श्रीपाद बरा आहेस ना? ’’ रात्री झोपतांना आप्पांनी विचारलं. ‘‘हो आप्पा’’ असं म्हणून मी डोळे मिटले. पण माझी मलाच खात्री नव्हती. ‘‘पालखीच्या स्पर्शानं नक्की बरं वाटेल तुला’’ त्यांच्या भाबड्या आशीर्वादाने मला भडभडून आलं. मी हो म्हटलं न् आतल्याआत कढ दाबत राहिलो.

गुरुवारी संध्याकाळी पालखी घेऊन निघालो. खाली बघतच दोन प्रदक्षिणा पूर्ण केल्या. पश्चिम दरवाजाला मात्र माझ्या नजरेनं दगा दिला. त्या खांबाकडे नजर गेली. खांबापाशी ती सौंदर्यवती होतीच. पण आज तिच्या शेजारी एक देखणा तरुण उभा होता. हो माझ्यापेक्षाही खूप देखणा… दोघं एकमेकांकडे बघत होते. माझ्या काळजात तीव्र कळ आली. पुन्हा मागच्या गुरुवारसारखं होऊ नये म्हणून मी जगदीशच्या खांद्यावर पालखी दिली न् खाली बसलो.

बसलो, ते पुन्हा उठूच शकलो नाही. प्रसादाचं आवरल्यावर सदा नि जगदीश आले. मला उचलून घरी घेऊन गेले. काढा, औषधं, चाटण सारं झालं… पण गुण येईना. माझ्या पायातलं त्राणच गेलं. पायातलं नि मनातलंही!

ती सौंदर्यवती दिसली नि माझ्या खांद्यावरच चढून बसली पालखीत! म्हणजे मीच बसवली. पण पालखीतल्या दत्तमहाराजांचं काय? आयुष्यभर मला दत्तमहाराजांशिवाय विषय नव्हता. हे असं का झालं, कळत नव्हतं! हे चूक आहे हे कळत होतं, पण वळत नव्हतं. आज तर तिच्या शेजारी त्या तरुणाला पाहून मी विद्ध झालो.

सदा नि जगदीशकडून मला कळलं, तिचं नाव नक्षत्रा साने. शहरातून इथे तिच्या मावशीकडे आली होती आणि तो उद्धव क्षेत्रमाडे. भारतीय विमानसेवेत पायलट आहे. त्या दोघांचं पुढच्या महिन्यात लग्न आहे.

हे ऐकल्यावर माझी जगण्याची इच्छाच संपली. मी खाणंपिणं सोडलं. औषधं बंद केली. वैद्य म्हणाले, ‘‘ह्याला काहीतरी मनाचा आजार असावा. शहरात मानसोपचार तज्ज्ञाला दाखवायला हवं. ’’ आप्पांनी खूप समजावलं, पण मी नाहीच गेलो शहरात किंवा मानसोपचार तज्ज्ञाकडे.

आप्पांची आता सारी भिस्त दत्तमहाराजांवर होती. पण मला आता महाराजांसमोर जाण्याचीही लाज वाटत होती. त्यांच्या जागी मी तिला बसवलं होतं. तिच्या गावीही ते नव्हतं. पण मी मात्र स्वतःला अपराधी समजून खंगत होतो.

तिचं लग्न झाल्याचं कळलं. आता तर जीवच नकोसा झाला. बळं बळं आप्पा मला कसेबसे दोन घास खाऊ घालत. तेही बिचारे हतबल झाले होते. दिवसेंदिवस माझी हालत फारच वाईट झाली. शरीराचा सापळा झाला. केस, दाढी वाढली. हातापायातलं त्राण गेलं. एक दिवस सदानी मला देवळाच्या ओसरीत नेऊन बसवलं. खांबाला टेकून आणि आता तो रोजच मला तिथंच बसवू लागला. जरा शुद्ध हवा लागेल म्हणून. पण मी तसाच! आणखी खंगत चाललेला. अशी किती वर्ष गेली कुणास ठाऊक. आता मला भगवे कपडे घातले जायचे. दर्शनाला येणारे सहज नमस्कार करायचे.

एक दिवस सदानी मला सांगितलं तिच्या नवर्‍याच्या विमानाचा अपघात झाला आहे आणि तो बेपत्ता आहे. आणि चमत्कारच झाला. एवढ्या दिवसानंतर मी स्वतःच्या पायावर उभा राहिलो. स्वतःच्या हातांनी थोडं दूध प्यायलो. पुन्हा भगव्या कपड्यांत तिथंच बसून राहिलो. आप्पांच्या डोळ्यांना घळाघळा धारा लागल्या. त्यांनी दत्तमहाराजांचे आभार मानले. मी मात्र आणखीनच तोंड खाली घातलं. दत्त महाराजांना दिसू नये म्हणून.

एक दिवस सहज म्हटलं ‘‘आज पाऊस पडेल… ’’ खरंच पाऊस पडला. कुणाला तो माझ्या शब्दांचा परिणाम वाटला. कुणाची गाय हरवली म्हटलं, ‘‘घाटाच्या पायर्‍यांवर असेल. बोला फुलला गाठ पडली गाय सापडली. ’’

हल्ली वरचेवर असं होऊ लागलं. लोक माझ्या पाया पडू लागले. मला काही-बाही विचारू लागले. मी सांगितलेलं खरं होऊ लागलं असं लोक म्हणू लागले. पालखीच्या सेवेचं फळ इथं दिसत असावं. दत्तमहाराजांची सेवा कधी वाया जाणार नाही. माझं ते झालं ते माझ्यामुळेच. पूर्वसुकृतच असेल ते… तर माझ्या भाकितामुळे मला बराच बोलबाला झाला. दत्तमहाराजांनंतर

लोक माझ्या दर्शनाला येऊ लागले.

एक दिवस ‘ती’ आली. माझ्या पायांवर डोकं ठेवून रडू लागली. म्हणाली, ‘‘महाराज माझं सौभाग्य आता कुठं असेल? कधी भेटेल? अपघातात बेपत्ता झाले आहेत ते. कसे असतील? ’’

मला काय वाटलं कुणास ठाऊक! म्हटलं पौर्णिमेला चालत येईल आपल्या पायांनी. खरंच पौर्णिमेला तो चालत आला. दत्तमहाराजांनी माझ्या तोंडून तिचं भविष्य सांगितलं. ते खरं झालं. दोघंही जोडीने आले माझ्या दर्शनाला. दोघांनी माझ्या पायावर डोकं ठेवलं. मी हातानं आशीर्वाद दिला ‘‘अखंड सौभाग्यवती भव’’ असं म्हणायचं होतं. पण तोंडून शब्दच फुटेना. माझी वाचाच गेली कायमची. ती मात्र दर पौर्णिमेला येते माझ्या दर्शनाला.

माझ्या जीवनात भर अमावस्येला चांदणं पसरतं लख्ख! त्या चांदण्यांच्या प्रकाशात. माझं जगणं म्हणजे त्या प्रकाशाच्या सावल्याच. सतत प्रकाशाच्या शोधात, स्वतः मात्र कायम अंधारलेल्या.

© शांभवी मंगेश जोशी

संपर्क – सुमन फेज 4, धर्माधिकारी मळा, एस्सार पेट्रोल पंपामागे, सावेडी, अहमदनगर 414003

फोन नं. 9673268040, shambhavijoshi76@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “पितृपक्षातील आगळं वेगळं कायमस्वरूपी अन्नदान… !!!” ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆

डॉ अभिजीत सोनवणे

© doctorforbeggars 

? मनमंजुषेतून ?

☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “पितृपक्षातील आगळं वेगळं कायमस्वरूपी अन्नदान… !!!” ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆

नुकतंच गणपती विसर्जन झालेलं, तरीही रस्त्यावर अफाट गर्दी, त्या गर्दीतून मी वाट काढत चाललो होतो, डोक्यात पितृपक्ष, पैशाचे नियोजन, अन्नदान कोणत्या योग्य ठिकाणी करता येईल याची ठिकाणं मनात आठवत चाललो होतो…. एकूण डोक्यात सगळा सावळा गोंधळ….

अंगावरचे दीडशे किलोचे साहित्य, त्यात ही गर्दी आणि उन्ह, मी वैतागून गेलो होतो.

अशात आमच्या भिक मागणाऱ्या परंतु एका चुणचुणीत मुलाने मला सर सर म्हणून हाक मारली आणि मला थांबवलं. मी गाडी बाजूला घेतली.

‘काय रे बोल पटपट पुढे जायचं आहे… ‘ 

‘सर एक बोलायचं होतं… ‘

‘बोल ना पटपट थोडा गडबडीत आहे… ‘

‘सर कसं बोलू? ‘

तो त त प प करायला लागला.

‘बोल रे कसा पण…. पण पटपट बोल’ 

मी हातातल्या घड्याळाकडे पाहत म्हणालो 

‘ते सर कसं आहे ना… ‘

‘अरे मुद्द्याचं बोल ना बाबा… ‘

‘सर मी एक लाकडी टेबल बघितला आहे, कॅम्पमध्ये एक मस्जिद आहे, त्याच्या आड बाजूला एक जागा आहे, तिथे मी एक धंदा लावायचा म्हणतोय, तिथली परमिशन मिळाली आहे, आता तुमची मदत लागेल. ‘ एका दमात आवंढा गिळत तो बोलला.

‘सांग ना काय लागेल? ‘

 ‘सर कसं सांगू? कसं मागू? ‘ 

‘कसं पण सांग रे बाबा, पण बोल ना’ 

– – मी पुन्हा घड्याळाकडे पाहत म्हणालो.

‘नाही म्हणजे तुम्हाला जमेल का? असा विचार करत होतो, आधीच तुमच्या मागे एवढे खर्च आहेत, त्यात तुमच्या अंगावर पुन्हा माझा खर्च…. ‘

‘अरे काय खर्च आहे तो तरी सांग ना बाबा… ‘

‘सर… सर… काय बोलू…. ‘ त्याला पुढचे शब्द आठवत नव्हते.

‘आठवल्यावर बोल, मला आता जाऊ दे गडबडीत आहे. ‘ असं म्हणून मी गाडीला किक मारली.

सर सर म्हणत त्याने गाडीवरचा हात ओढून धरला…. मला पुढेच जाऊ देईना.

त्याची एवढी अजिजी आणि तळमळ पाहून मला लगेच लक्षात आलं, एखादा व्यवसाय टाकण्यासाठी याला अफाट खर्च लागणार आहे आणि तो त्याला माझ्याकडून हवा होता…

मी परत थांबलो…

थांबल्यावरही पुन्हा तेच… ‘सर सर कसा बोलू… ?

आता माझी खात्री पटली, याला अपेक्षित असणारा खर्च खूप मोठा आहे.

लटक्या रागाने मी त्याला म्हणालो, ‘आता बोल नाही तर फटका खाशील.

खूप मोठी ताकद एकवटून शेवटी तो बोलला, ‘सर मला जिथे जागा मिळाली आहे, तिथे इस्त्रीचे एकही दुकान नाही, मी जर हा इस्त्रीचा व्यवसाय तिथे टाकला तर चांगला चालेल. ‘

पैशाचा भला मोठा आकडा ऐकायची तयारी ठेवून मी तोंडावरचा रुमाल काढून त्याच्याकडे रोखून पहात विचारले, ‘यात मी तुला काय मदत करू? ‘

‘सर मला धंद्याला लागते ती इस्त्री फक्त तुम्ही घेऊन द्या…. ‘

मी उडालोच, “ ही इस्त्री मागण्यासाठी तू माझा तास घालवलास? “

‘हां सर धंद्याला लागणाऱ्या इस्त्रीची किंमत जास्त असते, साडेतीन ते चार हजार रुपये तरी लागतात. तुम्ही इतक्या लोकांचे करता त्यात माझा हा खर्च तुमाला झेपेल का, याचा विचार आला, म्हणून तोंडातून शब्द येत नव्हते. ‘

.. अंगठ्याने जमीन टोकरीत तो खाली मान घालून म्हणाला.

मी गाडीवरून खाली उतरून त्याला जवळ घेतले.

बाब एका किरकोळ इस्त्रीची, पण माझ्या अंगावर असणाऱ्या आधीच्या जबाबदाऱ्यांचा विचार करून, त्याने ती सुद्धा किती नम्रतेने मागितली होती…. मला त्याचं कौतुक वाटलं…!

आपल्या आयुष्यात आपण एखाद्याला कोणतीही गोष्ट मागताना, खरंच त्याची आपल्याला काही देण्याची परिस्थिती आहे का? त्याच्या इतर काही व्यथा आहेत का? सध्या आपल्याला काही देण्याच्या मनस्थितीत तो आहे का, याचा आपण विचार तरी करतो का… ?

आणि हा… ???

ज्याला आजपर्यंत लोकांनी भिकारी म्हणून दूर लोटले, अशा या माणसामध्ये समोरच्या व्यक्तीची परिस्थिती जाणून घेऊन मग आपली मागणी पुढे घेऊन येणे, तेही अत्यंत नम्रतेने…. हा संस्कार याच्यात कुठून आला असेल… ?

– – आपली वेदना कुणीतरी संवेदना म्हणून जपतंय याचा आनंद खूप मोठा असतो… !

डोक्यात हे विचार सुरू होते, मी गप्प उभा होतो, माझं हे गप्प बसणं म्हणजे त्याला नकार वाटला. माझ्या हातातून हात सोडवत तो अत्यंत नम्रतेनं पाया पडून निघाला, जाताना म्हणाला हरकत नाही सर, पुन्हा कधीतरी बघू, यावेळी त्याचा चेहरा रडवेला झाला होता…

…. चंदन हे शितल असतंच, पण मनापासून केलेलं वंदन हे त्याहून जास्त शीतल असतं…. !

ऑक्टोबर हिटच्या रणरणत्या उन्हात त्याचं वागणं म्हणजे थंडगार वाऱ्याची झुळूक वाटली मला….

बाब होती एका इस्त्रीची, आपल्या सर्वांच्याच घरात एखादी इस्त्री कुठल्यातरी कोपऱ्यात पडलेली असते, ही इस्त्री एखाद्याच्या जगण्याचं साधन बनून त्याला माणसात आणू शकेल, असा कधी विचारही आपल्या डोक्यात येत नाही.

(अशा अनेक वस्तू आपल्या घरात आजही पडून आहेत, ज्यांचा आपल्याला फारसा काही उपयोग नसतो, परंतु समोरच्या व्यक्तीला दिल्या तर यातून तो सन्मानानं जगू शकतो, असो, याविषयी पुन्हा केव्हा तरी)

मी त्याला प्रेमाने थांबवलं, ‘ इस्त्री ची किंमत काय आहे? ‘ 

‘सर धंद्याला लागणाऱ्या इस्त्रीची (Heavy Duty Commercial) किंमत जास्त असते साधारण साडेतीन ते चार हजार रुपये’ त्याने पुन्हा खाली मान घातली.

त्याला म्हटलं “ इथून पुढे चार दिवस बाजारात फिर, चांगल्यात चांगली heavy duty commercial इस्त्री शोधून ठेव. चांगल्यातल्या चांगल्या चांगल्या कंपनीची असावी, गॅरंटी वॉरंटी असावी, पैसे लागू देत कितीही…. येत्या दोन दिवसात आपण मोटरसायकल वरून जाऊ आणि तुला हवी ती इस्त्री घेऊन येऊ, करू आपण व्यवसाय सुरू…. ”

त्याचा विश्वासच बसेना, ‘खरंच सर? खरंच सर?? ‘ म्हणत चार वेळा तरी त्याच्या डोळ्यातून पाणी आलं आणि त्याने ते पालथ्या-मुठीने पुसले.

‘दुकानाला नाव पण मी सोहम म्हणूनच देणार आहे सर’, हे बोलताना आनंद त्याच्या चेहऱ्यावर मावत नव्हता.

या जगात आईच फक्त अशी आहे…. जी नऊ महिने सांभाळते…… कळा सोसते, जन्माला घालते आणि जन्म झाल्यानंतर आनंदाने त्या बाळाला दुसऱ्याचं नाव देते… !

…. मला या आई सम हा वाटला…. !

येड्या म्हणत मी त्याला छातीशी लावणार, इतक्यात तो पायाशी झुकला, यावेळी त्याचा हात खरोखर चंदनासारखा भासला…. !

येत्या चार ते पाच दिवसात त्याला हवी ती इस्त्री घेऊन देण्याचे वचन देऊन मी तिथून निघालो.

गाडीवर पुन्हा पितृपक्षातील अन्नदानाचेच विचार…

आपण रोज अनेकांना अन्नदान करत आहोत, परंतु ते एका व्यक्तीला एकाच वेळी पुरते…

.. हा जेव्हा कामाला लागेल त्यावेळी तो रोजच्या रोज सन्मानाने स्वतः खाईल आणि स्वतःची ऐपत निर्माण झाल्यावर इतरांनाही नक्की अन्नदान करेल… !

.. आपोआप एक साखळी निर्माण होईल, अन्नदानाची आणि माणुसकीची सुद्धा… !

एका वेगळ्या अर्थाने पितृपक्षात घडलेले हे एक वेगळ्या प्रकारचे अन्नदान होते.

– – पितृपक्षात खऱ्या अर्थाने घडलेले हे अन्नदान माझ्यासाठी सर्वोच्च होते आणि पुढेही राहील…. !

 

© डॉ अभिजित सोनवणे

डाॕक्टर फाॕर बेगर्स, सोहम ट्रस्ट, पुणे

मो : 9822267357  ईमेल :  abhisoham17@gmail.com,

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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मैं भी नाना! ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

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☆ “मैं भी नाना!”  ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

☆

मैं भी नाना!

सामान्य जनता एकेरीच संबोधते अशा माणसांच्या यादीत नाना पाटेकरही आहेत. ते आज गेले आणि प्रथेप्रमाणे मिडिया, वृत्तपत्रे, दूरचित्रवाहिन्या प्रसिद्ध लोकांच्या प्रतिक्रिया घेत आहेत. या प्रतिक्रियांमध्ये नाना कसे होते हे पाव भाग आणि ते मला मी कसा भारी, महान इत्यादी आहे हे म्हणायचे हा उर्वरीत भाग असतो, हे लक्षात येतेच. असो.

जी गोष्ट मी इथं आता लिहितो आहे, ती मला गेल्या कित्येक वर्षांत जाहीर सांगायची होती आणि नशिबात असेल तर प्रत्यक्ष नानांच सांगायची होती! तो प्रसंग आता आयुष्यात येणार नाही!

मी आता ५९ वर्षांचा झालो आहे आणि त्यासाठी मला स्वत:ला काहीही करावं लागलं नाही. पण माझ्या आयुष्यात असा चार-दोन वर्षांचा काळ येऊन गेला की बरेच लोक मला नाना म्हणून संबोधायला लागले… ते का हे मला अगदी सुरुवातीला उमगले नव्हते. १९९३ वर्ष होते आणि मी एका महाविद्यालयात नियमित शिकण्याचा जाण्याचा प्रयत्न करीत होतो. त्यावेळी चित्रपटगृहात जाऊन चित्रपट पाहावेत इतके पैसे जवळ नसायचे. आणि त्यामुळे चित्रपटगृहांकडे फिरकण्याचीही फारशी वेळ येत नसे. नव्याने प्रदर्शित होणार असलेल्या, झालेल्या चित्रपटांची पोस्टर्स तिथेच बाहेर लावलेली असायची. क्रांतिवीर प्रदर्शित झाला त्याचे पोस्टरही त्यामुळे माझ्या पाहण्यात आलेले नव्हते. विविध भारती रेडीओ स्टेशनवर चित्रपटाच्या प्रसिद्धीसाठी श्राव्य कार्यक्रम लागत असत. त्यातही क्रांतिवीर कानांवर पडला नाही.

राष्ट्रीय सेवा योजनेच्या एका युवक महोत्सवासाठी मी अमरावती विद्यापीठात गेलो होतो. या महोत्सवात मी एका नाट्यात भाग घेतला होता आणि निवेदकाचं काम पार पाडलं होतं… नाटक संपलं आणि प्रेक्षकांतून आवाज आला… ए… नाना! ही आरोळी काही चिडवणे या प्रकारातील नव्हती.

नंतर कुणीतरी मला असं सांगितलं की क्रांतिवीर हिंदी चित्रपट आला आहे, त्यात नाना पाटेकर मुख्य भूमिकेत आहेत… आणि तुझा आताच अवतार दिसतो तसाच नानांचाही आहे… अर्थात थोडाफारच! बारीक केस, बारीक दाढी, भेदक डोळे आणि मुख्य म्हणजे वेगवान गोलंदाजासारखं भरभर बोलणं! त्यावेळी माझी शारीरिक ठेवणही जवळजवळ तशीच होती. पण नानांशी साधर्म्य असलंच तर अगदी दोन एक टक्के असावं. पण बोलण्याची पद्धत नाना ज्यावेळी वेगवान संवाद म्हणतात तशी होती आणि आहे. अर्थात संवादाची ती शैली नानांची स्वत:ची आहे… आणि माझा वाचादोष! नानांचे संवाद लोकांना समजत होते म्हणून आवडत होते… तसं माझं नाही…. जे माझ्या दीर्घ सहवासात आहेत त्यांनाच सवयीने माझे बोलणे समजू शकते. इतरांसाठी वंदे भारत जवळून निघून जावी आणि डबे मोजता येऊ नयेत.. अशी स्थिती होते. खरं तर मी भाषण करायला नको… मात्र मला ती करावी लागत. आणि भाषण करताना करताना मानसिक तणावामुळे कदाचित या स्पीडला ब्रेक लागत असावा. अमरावती विद्यापीठाच्या त्या कार्यक्रमात मला गटप्रमुख म्हणून एका विषयावर बोलणे भाग होते… मी बोललो… आणि काही क्षणांसाठी नाना झालो बहुदा.

१९९१ मध्ये नानांचा ‘प्रहार’ येऊन गेला होता.. पण पाहता आलेला नव्हता.. पण विषय माहीत झाला होता… भारतीय लष्कराचा विषय हाताळला होता त्यात. त्यावेळी मलाही लष्करातच जायचं होतं… आणि त्यामुळे बोलण्यात, वागण्यात त्याचं प्रतिबिंब पडणे साहजिकच होतं. त्यावेळी स्वत:चे फोटो फक्त कॉलेज आय कार्डसाठीच काढावे अशी आर्थिक स्थिती होती. पुढे भोपाळ विद्यापीठातही अशाच एका कार्यक्रमासाठी निवडलो गेल्याने जावेच लागले… अर्थात अवतार तसाच होता. मूळात त्या कार्यक्रमाला तत्कालीन राष्ट्रपती शंकर दयाल शर्मा साहेब यायचे असल्याने तपासणी कडक होती. मला पोलिसांनी आत सोडलं नव्हतं सुरुवातीला… विविध कागदपत्रं दाखवावी लागली. याही कार्यक्रमात मी बोललो आणि माझ्यावरच नाना शिक्का त्यावेळेपुरता तरी पक्का झाला. कालांतराने शारीरिक बदल होत गेलेच. आणि माझ्यात नाना आता औषधालाही उरलेले नाहीत!

मी नानांच्या आवाजाची, संवादफेकीची नक्कल करावी, असे मला सुचवले गेले होते. हा प्रयत्न मी कधीच केला नाही. नानांच्या आवाजाची नक्कल सर्वांत जास्त केली जाते हे सर्वांना ठाऊक आहे. याबद्दल विचारले गेले की नाना म्हणायचे… माझ्या आवाजाच्या नकलेमुळे त्यांची घरं चालत असतील तर बरंच आहे की!

आधी प्रहारच्या रूपाने भारतीय लष्करविषयक प्रेम, त्यासाठी त्यांनी बेळगावच्या कमांडो प्रशिक्षण केंद्रात पूर्ण केलेलं प्रशिक्षण, त्यांचं कारगिलमधील प्रत्यक्ष सीमेवर जात सेवा बजावणं, पुढे मराठवाड्यातील दुष्काळग्रस्त शेतक-यांच्या कुटुंबियांसाठी केलेल्या अतुलनीय कामावर उमटलेली नाम-मुद्रा या वर इतर अनेक गोष्टींमुळे नाना आपले वाटत गेले. त्यांच्या सारखं आपल्याही वागता, बोलता आलं पाहिजे असं अनेकांना वाटतं यात नवल नाही. ANGRY YOUNG MAN म्हणून अमिताभ बच्चन यांनी त्यांची एक IMAGE उभी केली होती. नानांना यासाठी विशिष्ट वयोगट लागला नाही…. ते ANGRY MAN म्हणून जनमानसात रुजून गेले!

नानांना सतत काहीतरी व्यक्त करायचं आहे, असं त्यांच्या प्रत्येक मुलाखतीत वाटत राहायचं आणि ते तसं निर्भीडपणे करीतही असत. नाम अर्थात नाना पाटेकर आणि मकरंद अनासपुरे यांच्या नावांच्या आद्याक्षरांनी बनलेलं नाम फौंडेशनच्या माध्यमातून नानांनी उभं केलेलं काम त्यांच्याविषयीचा आदर कमालीचा दुणावून गेलं. अशा नानाविध बाबी सांगता येतील आणि येणा-या ब-याच दिवसांत नाना चर्चेत दिसत राहतील.

अशाच एक मुलाखतीत नाना अगदी उद्वेगाने म्हणाले होते… ”विहिरीच्या काठावर बसावं… एकटंच. जवळपास ऐकायला, बघायला कुणीही नसावं, दोन कॅमेरे लावावेत आपल्यावर रोखलेले आणि सांगून टाकावं…. सगळं खरं खरं…. आणि मग.. ! ” पुढचे ते काही बोलले नाहीत…. आपण समजून घ्यायचं!

आता त्यांना जे सांगायचं होतं ते त्यांच्यासोबत चितेत जळून जाईल… ते उठून म्हणतील कदाचित.. आ गये मेरी मौत का तमाशा देखने!

असो. आपण नानांसारखं असावं, असं वाटण्यात काहीही गैर नाही… पण तसं कुणी असू शकतं का?

मी शोधाशोध केली तर माझा नानासदृश अवतारातील एखादा फोटो गावेलही कुठं तरी.. पण तो कुणाला दाखवण्याची हिंमत मी करणार नाही…. कुठं नाना आणि कुठं मी? मी फार तर मनातल्या मनात म्हणून शकेन… मैं भी नाना!

(नानांना भावपूर्ण निरोप देताना मनातलं.) 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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