हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ लिखना सीखें आप भी – कहानी लेखन महाविद्यालय ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका)

श्री विजय कुमार 

( सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक   श्री विजय कुमार जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। शुभ तारिका का 56 वर्ष का इतिहास रहा है। मैं स्वयं अपने सैन्य जीवन में 1972 से 1980 तक इस पत्रिका का सदस्य रहा हूँ। मेरी पीढ़ी के साहित्यकारों ने अवश्य ही कहानी लेखन महाविद्यालय, अम्बाला के विज्ञापन अपने समय में देखे होंगे और पुराने पोस्टकार्ड एवं अंक संजो रखे होंगे। इस महाविद्यालय ने प्रतिष्ठित लेखकों की एक पीढ़ी का मार्गदर्शन किया है जो साहित्य, पत्रकारिता, आकाशवाणी, दूरदर्शन  एवं फिल्मों में विभिन्न पदों पर सुशोभित है। एक  पेज  से तारिका के नाम से प्रारम्भ शुभ तारिका तक इस पत्रिका का अपना इतिहास रहा है। मैं इस संस्थान  एवं पत्रिका को इतने वर्षों के पश्चात भी विस्मृत नहीं कर पाया और अंततः श्री कमलेश भारतीय जी के सहयोग से खोज निकाला। यह आलेख संभवतः आपको विज्ञापन लगे किन्तु,ऐसा समर्पित संस्थान 56 वर्षों से सतत चल रहा है, यही उन समर्पित सदस्यों के परिश्रम का परिणाम है।

ई-अभिव्यक्ति की ओर स्व डॉ महाराज कृष्ण जैन जी को विनम्र श्रद्धांजलि । इस संस्थान को सतत जीवन देने के लिए सुश्री उर्मि कृष्ण जी को सादर नमन। संस्थान के इतिहास एवं वर्तमान जानकारी को हमारे पाठकों से साझा करने के लिए आदरणीय श्री विजय कुमार जी, सह संपादक ” शुभ तारिका” का हार्दिक आभार।)

☆ लिखना सीखें आप भी – कहानी लेखन महाविद्यालय ☆

‘लिखना सीखें आप भी’ शीर्षक से शुभ तारिका तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में आप एक विज्ञापन पढ़ते होंगे/हैं। दो कमरों में संचालित कहानी-लेखन महाविद्यालय, ‘कृष्णदीप’, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी-133001 (हरियाणा) के विषय में आप भी जानिए –

मैं आज ‘डा. महाराज कृष्ण जैन’ द्वारा स्थापित किए गए ‘कहानी-लेखन महाविद्यालय’ के विषय में कुछ लिख रहा हूं। ‘कहानी-लेखन महाविद्यालय’ के संस्थापक डा. महाराज कृष्ण जैन ने कहानी लिखना सिखाने के लिए इस विद्यालय की शुरूआत 1964 में की थी। ‘लिखना सीखें आप भी’ कहानी लिखना सिखाने के लिए रचनात्मक पाठ्यक्रम है। डा.जैन के परिचय के बाद जानिए उनके द्वारा स्थापित विद्यालय को।

अम्बाला (हरियाणा) के एक छोटे से शहर अम्बाला छावनी में जन्म लेकर सारे देश और विदेश में लोकप्रिय हुए साहित्यकार, कहानीकार डा. महाराज कृष्ण जैन। उनका जन्म, पालन, शिक्षा, विवाह और जीवन एक कठिन किन्तु साहसिक संघर्ष का साक्षी है। पांच वर्ष की अल्पायु में यह बालक पोलियो का शिकार हुआ और जीवनपर्यन्त पहियाकुर्सी पर चला। यह शारीरिक अस्वस्थता उनके दृढ़ इरादों में कभी आड़े नहीं आई।

कई अनियमितताओं, अभावों और अव्यवस्थाओं के बीच डा. जैन ने अपनी पढ़ाई पूरी की। 1968 में पंजाब यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। विषय था – ‘प्रेमचन्दोत्तर उपन्यासों में नारी की परिकल्पना का विकास’।

हिन्दी साहित्य के अतिरिक्त डा.जैन अंग्रेजी, विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्र, होम्योपैथी, फोटोग्राफी के अच्छे ज्ञाता थे। संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, फ्रेंच भाषाएं उन्हें आती थीं। उनके पुस्तकालय में चुटकुलों से लेकर कालिदास, शेक्सपीयर, लाओत्से, कृष्णमूर्ति, ओशो, रविंद्र, शरत, प्रसाद, श्रीनरेश मेहता, निर्मल वर्मा, अज्ञेय सभी की पुस्तकें संकलित हैं। वे सबसे अधिक पैसा पुस्तकें खरीदने में ही खर्च करते थे। ‘विश्व की प्रसिद्ध कहानियां’ पुस्तक का अनुवाद और संपादन उन्होंने किया। दिलीप भाटिया द्वारा संकलित व उर्मि कृष्ण द्वारा संपादित ‘गुरु नमन’ (डा. महाराज कृष्ण जैन के लेख) पुस्तक भी प्रकाशित हुई है।

पर्यटन, प्रकृति, फूल-पौधे, वन और वनवासी जीवों से उन्हें खूब लगाव था। विश्व में पाये जाने वाले अधिकांश पेड़-पौधों और फूलों के नाम उन्हें ज्ञात थे। विश्व के रहस्यों को जानने में भी उनकी विशेष रुचि थी।

डा. जैन बौद्धिक व मानसिक रूप से अत्यन्त स्वस्थ और सजग थे। उनका मनोबल देखते ही बनता था। एक जगह कमलेश भारतीय लिखते हैं–‘ऐसा लगता था कि जैसे उनकी व्हील चेयर न होकर कोई पौराणिक ग्रंथों का रथ हो, जो उन्हें दूर दराज तक ले जाने में ही नहीं कल्पना की उड़ान भरने में भी सक्षम है।’

विष्णु प्रभाकर लिखते हैं– ‘उनसे मिलकर मैं निश्चित ही भाव-विह्नल हो उठता था। वे कहानी लेखकों का मार्गदर्शन ही नहीं करते थे बल्कि मानव जीवन के रहस्यों का आह्नान भी करते थे। सागर से गहरे, नदियों से मीठे, कवि मन, एक पारखी, एक कद्रदान–कितनी-कितनी उपमाएं मिली हुई हैं डा. जैन को। उर्मि कृष्ण कहानी-लेखन महाविद्यालय के माध्यम से डा. जैन से परिचित हुई थीं, उनकी विलक्षण सर्वोन्मुखी प्रतिभा से अभिभूत होकर वह डा. जैन के साथ प्रणय सूत्र में बंध गयीं।’

कहानी उपन्यास लेखन में विशेष रुचि रखने वाले डा.जैन ने 1964 में कहानी-लेखन महाविद्यालय की स्थापना की। रचनात्मक लेखन में पत्राचार द्वारा मार्गदर्शन देने वाला यह भारत का प्रथम संस्थान था।

डा. महाराज कृष्ण जैन और कहानी-लेखन महाविद्यालय का नाम लेखकों के बीच में एक चिरपरिचित नाम है जो आज भी चर्चा में रहता है। कितने ही लेखक जो कलम पकड़ कर कागज पर मन के भावों को उतारना चाहते थे, वे कहानी-लेखन महाविद्यालय से जुड़े और उनकी प्रतिभा पूर्ण रूप से विकसित होकर सामने आई।

देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों में डा. जैन ने कहानी को न केवल लिखा व लिखना सिखाया बल्कि बहुत करीब से जिया भी।

‘कहानी-लेखन महाविद्यालय’ रचनात्मक लेखन में पत्राचार द्वारा शिक्षण देने वाला संभवतः भारत का प्रथम संस्थान है। डा. महाराज कृष्ण जैन स्वयं ने लेखन करते हुए जिन कठिनाइयों का सामना किया उन्हीं कठिनाइयों में मार्गदर्शन देने के लिये इस पाठ्यक्रम की शुरूआत 1964 में पत्राचार माध्यम से की गई। कहानी-लेखन के अतिरिक्त पत्रकारिता का शिक्षण भी कुछ समय बाद इसमें आरंभ किया गया। जिस समय इस पत्राचार पाठ्यक्रम की शुरूआत हुई (1964) उस समय भारत में रचनात्मक लेखन में मार्गदर्शन की कोई अवधारणा नहीं थी। पत्राचार माध्यम से तो हमारे देश में कहीं कोई शिक्षण नहीं चल रहा था।

आज इस संस्थान द्वारा कहानी-कला के अतिरिक्त लेख और फीचर लेखन, पत्रकारिता और संपादन, पत्रिका- संचालन, पटकथा लेखन, प्रेक्टिकल इंग्लिश आदि कोर्स चलाये जा रहे हैं। इस समय एक उप कोर्स फीचर एजेंसी संचालन भी सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। भारत में ही नहीं, इसके सदस्य नेपाल, सऊदी अरब, मारीशस, इंग्लैंड, अमेरिका, जापान सभी जगह फैले हैं।

पत्राचार शिक्षा के लाभ
पत्राचार शिक्षा में आप घर बैठे अध्ययन कर सकते हैं। आपको किसी कालेज या विश्वविद्यालय में नहीं जाना पड़ता और न घर से दूर छात्रावास आदि में रहने की समस्या है।

हमारे विशाल देश में सभी स्थानों पर सभी विषयों की शिक्षा की व्यवस्था करना संभव नहीं है। पत्राचार-शिक्षा से देश के सुदूर और पिछड़े से पिछड़े स्थानों के व्यक्ति भी अपने इच्छित विषयों का अध्ययन कर सकते हैं।

पत्राचार अध्ययन आपकी सुविधा पर चलता है, कालेज की सुविधा पर नहीं। आप अपनी नौकरी या व्यवसाय में संलग्न रहते हुए भी कुछ घण्टे अध्ययन के लिए निकाल कर अपनी योग्यता बढ़ा सकते हैं।

सुविधाएं
सदस्यों को पहले प्रति पन्द्रह दिन बाद दो पाठ, इस प्रकार एक मास में चार पाठ भेजे जाते थे। (पाठों की संख्या कुछ पाठ्यक्रमों में कम और कुछ में अधिक हो सकती है।) डाक व्यवस्था में गड़बड़ी से बहुत सी डाक गुम होने के कारण आजकल दो बार में पूरे पाठ रजिस्ट्री डाक से भिजवाए जा रहे हैं।

पाठों के साथ सदस्यों के अध्ययन की जांच के लिए समय-समय पर कुछ अभ्यास-पत्र तथा प्रश्न-पत्र दिये जाते हैं। अभ्यास-पत्र सदस्य के अपने दोहराने के लिए होते हैं। प्रश्न-पत्रों के लिखित उत्तर संस्थान में भेजने होते हैं।

आप अपने खाली समय में पाठ पढ़ें। इसके उपरांत प्रश्न-पत्र के उत्तर लिखकर भेजने होते हैं। शिक्षक उसका निरीक्षण करने के बाद उस पर टिप्पणी और सुझाव देते हैं। संशोधित उत्तर-पुस्तिका तथा टिप्पणी आपको अगले पाठों के साथ भेज दी जाती है।

पाठ्यक्रम में कोई भी कठिनाई या समस्या आने पर आप संस्थान से सहायता और परामर्श ले सकते हैं।

सदस्य अपनी किसी भी कठिनाई के सम्बन्ध में संस्थान से निःसंकोच पत्र-व्यवहार कर सकते हैं। उनके सभी प्रश्नों व शंकाओं का समाधान किया जाता है।

एक पाठ्यक्रम की अवधि लगभग 6 मास होती है किन्तु यह विद्यार्थी की आवश्यकता के अनुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती है। अवधि बढ़ाने का कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाता। पाठ्यक्रम पूर्ण होने पर प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

पाठयक्रम पूर्ण होने के पश्चात् भी सदस्य पूर्ववत् हर प्रकार की सहायता, सहयोग एवं परामर्श प्राप्त कर सकते हैं। (इसके लिये कुछ सेवा शुल्क देना होता है।)

इन पाठों के अध्ययन और अभ्यास में प्रति सप्ताह केवल 3-4 घंटे का समय लगता है। अतः इससे आपकी पढ़ाई अथवा नौकरी में जरा भी बाधा न पड़ेगी। बल्कि आपकी पढ़ाई में ये पाठ्यक्रम सहायक ही सिद्ध होंगे।

कोर्स करने के लिए
सरकारी कर्मचारी या सैनिकों को पाठ्यक्रम करने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। अनेक सरकारी कर्मचारियों तथा सैनिकों ने ये कोर्स किये हैं/कर रहे हैं।

कहानी-लेखन महाविद्यालय एक प्राइवेट संस्थान है। यह पिछले 56 वर्षों से भारतभर में प्रसिद्ध है। अतः इसके प्रमाण पत्र की बहुत महत्ता व प्रतिष्ठा है। वैसे आज दुनिया में महत्त्व प्रमाण-पत्रों को नहीं, काम में कुशलता को दिया जाता है। संस्थान के कोर्स आपको विषय और क्षेत्र का पूरा ज्ञान व कुशलता देते हैं। इन पाठ्यक्रमों को करने के लिए आपके पास कोई भारी-भरकम डिग्री की अनिवार्यता नहीं है। आपका हिन्दी का ज्ञान अच्छा होना चाहिए। संस्थान के किसी भी कोर्स के लिए वर्ष में आप जब भी चाहें प्रवेश ले सकते हैं। इसके लिए आवेदन-पत्र तथा निर्धारित शुल्क आपको भेजना होता है। ये आते ही आपका कोर्स आरंभ कर दिया जाता है।

आवेदन-पत्र एवं शुल्क ‘शुभ तारिका, केनरा बैंक, अम्बाला छावनी, अकाउंट नं. 0200201001906,  IFSC Code CNRB0000200 के नाम से भेजना होता है, किसी व्यक्ति विशेष के नाम से नहीं। अधिक जानकारी के लिए मोबाइल नंबर 9813130512 संपर्क कर सकते हैं।

अन्य सुविधाएं
‘शुभ तारिका’ इस संस्थान का अनुवर्ती उपक्रम है। इस मासिक पत्रिका में साहित्यिक कृतियों के अतिरिक्त कई रोचक स्तम्भ भी चलाये जा रहे हैं। यह पत्रिका देश और विदेश में लोकप्रिय है। इससे कई प्रसिद्ध लेखकों के नाम जुड़े हुए हैं। इस पत्रिका में छपने के लिए विद्यालय के सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है।

कहानी-लेखन महाविद्यालय संस्थान वर्ष में एक बार देश के अलग-अलग क्षेत्रों में लेखक मिलन शिविर, पत्रकारिता कार्यशाला का आयोजन करता है। इस आयोजन के पीछे सम्पूर्ण देश-विदेश में फैले अपने सदस्यों का मिलन, मार्गदर्शन तथा देश-विदेश की भाषा, संस्कृति का जुड़ाव और परिचय कराना होता है। ये शिविर सफलतापूर्वक चलाये जा चुके हैं। इसमें कहानी-लेखन महाविद्यालय के सदस्य, शुभ तारिका के पाठक और अन्य सभी देश-विदेशों के इच्छुक लेखक, साहित्यकार बन्धु बहुत उत्साह से भाग लेते हैं। आजकल ये शिविर शिलांग (मेघालय) में पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलांग के मानद सचिव डा.अकेलाभाइ (कहानी-लेखन महाविद्यालय के सदस्य) द्वारा हर वर्ष (2002, फिर 2008 से लगातार) आयोजित किये जा रहे हैं। इनके द्वारा डा. जैन की स्मृति में हर वर्ष लेखकों को ‘डा. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान’ दिये जा रहे हैं।
5 जून 2001 को डा. महाराज कृष्ण जैन का अचानक निधन हो गया। तब से उनकी पत्नी सुश्री उर्मि कृष्ण संस्थान का सारा कार्यभार देख रही हैं।

जब डा. जैन ने लेखन के कोर्स आरंभ किये तो बहुत से नामी लेखकों ने कहा कि क्या प्रशिक्षण से कोई लेखक बन सकता है? लेखन और प्रतिभा तो ईश्वरीय देन होती है।

यह सवाल शुरू से आज तक कई व्यक्ति करते आए हैं और करते ही रहते हैं। जब गायन, वादन, नृत्य, चिकित्सा और कई तरह के व्यावहारिक ज्ञान के लिये प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है तो लेखन के लिये क्यों नहीं? नये लेखक जिसके पास भाव, भाषा, शब्द तो होते हैं किन्तु वे उन्हें व्यक्त करने, उनकी सही प्रस्तुति देने में गड़बड़ा जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें प्रशिक्षण की आवश्यकता जरूरी है, सहायता भी। आज के युग ने तो प्रमाणित कर दिया है कि जीवन के हर क्षेत्र में प्रशिक्षण की आवश्यकता है, मानसिक और शारीरिक दोनों क्षेत्रों में। शिक्षण द्वारा ही प्रगति, उन्नति संभव होती है। स्कूल, काॅलेज में 15 साल पढ़ लेने के बाद भी हर व्यक्ति को जीवन के क्षेत्र में उतरने के लिये किसी न किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता रहती ही है।

पटकथा लेखन को छोड़कर बाकी सभी पाठ्यक्रम डाॅ. महाराज कृष्ण जैन स्वयं ने लिखे हैं। इसमें उनकी धर्मपत्नी श्रीमती उर्मि कृष्ण ने उनकी लगातार सहायता की है। पटकथा लेखन का कोर्स फिल्म संस्थान के एक प्रसिद्ध व्यक्ति से सहायता लेकर तैयार किया गया था।

आज ऐसा कोई भी पत्र या पत्रिका नहीं है जहां पर कहानी-लेखन महाविद्यालय के सदस्य उच्च पद पर विराजमान न हों। बहुत से तो आकाशवाणी, टीवी, फिल्मों में भी कार्यरत हैं।

तो यदि आपकी लेखन में रुचि है और कुछ करना चाहते हैं तो आप निदेशक, कहानी-लेखन महाविद्यालय, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी-133001 (हरियाणा) के पते पर 30 रुपये भेजकर विवरणी मंगा सकते हैं।

श्री विजय कुमार, सह-संपादक ‘शुभ तारिका’

संपर्क – 103-सी, अशोक नगर, अम्बाला छावनी-133001, मो.: 9813130512

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 15 ☆ गीत हूँ मैं ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी रचना गीत हूँ मैं. )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 15 ☆ 

☆ गीत हूँ मैं ☆ 

 

सावनी मनुहार हूँ मैं

फागुनी रसधार हूँ मैं

चकित चंचल चपल चितवन

पंचशर का वार हूँ मैं

विरह में हूँ, मिलन में हूँ

प्रीत हूँ मैं

 

तीर हूँ, तलवार हूँ मैं

ऊष्ण शोणित-धार हूँ मैं

हथेली पर जान लेकिन

शत्रु काँपे काल हूँ मैं

हार को दूँ हार, जय पर

जीत हूँ मैं

 

सत्य-शिव-सुंदर सृजन हूँ

परिश्रम कोशिश लगन हूँ

आन; कंकर करूँ शंकर

रहा अपराजित जतन हूँ

शुद्ध हूँ, अनिरुद्ध शाश्वत

नीत हूँ मैं

 

जनक हूँ मैं-जननि लोरी

भ्रात हूँ मैं, भगिनि भोरी

तनय-तनया लाड़ हूँ मैं

सनातन वात्सल्य डोरी

अंकुरित पल्लवित पुष्पित

रीत हूँ मैं

 

भक्त हूँ, भगवान हूँ मैं

भगवती-संतान हूँ मैं

शरण देता, शरण लेता

सगुण-निर्गुण गान हूँ मैं

कष्ट हर कल्याणकर्ता

क्रीत हूँ मैं

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 14 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 14/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 14 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

उनके हाथों में मेहंदी लगाने

का यह फायदा हुआ

कि रात भर हम उनके

चेहरे से ज़ुल्फ हम हटाते रहे..

  

 The advantage of applying mehndi 

On her hands was that I kept on

Removing the tufts of hair from 

Her face throughout the night…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 अगर इश्क़ करो तो

अदब ए  वफ़ा भी सीखो

ये चंद दिनों की बेकरारी

मोहब्बत नहीं होती..

  

  If you love someone then

Learn to practise loyalty too

A few days of restlessness

Is not construed as love…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 उनके हाथों में मेहंदी लगाने का

ये फायदा हुआ…

की रात भर उनके चेहरे से

ज़ुल्फ हम हटाते रहे…

  

 Reward of applying mehndi on her

Hands was that I was privileged 

To remove the bangs of hair from 

Her face throughout the night…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 तेरी एक झलक ही काफ़ी 

है जीने के लिए पर दिल का 

मोह ही है सारी उम्र मिल 

जाये तो भी कम है

 

Your one glimpse alone is

Just enough to live for but it’s the 

Fascination of heart that finds

It less even if it get entire lifetime

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – भारतीय ज्योतिष शास्त्र भाग 2 – भारतीय ज्योतिष शास्त्र में हस्तरेखा का महत्व ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  जनसामान्य  के  ज्ञानवर्धन के लिए भारतीय ज्योतिष विषय पर एक शोधपरक आलेख भारतीय ज्योतिष शास्त्र भाग 2  – भारतीय ज्योतिष शास्त्र में हस्तरेखा का महत्व . भारतीय ज्योतिष शास्त्र के दोनों आलेखों के सम्पादन  सहयोग के लिए युवा ज्ञाता  श्री आशीष कुमार जी का हार्दिक आभार।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – भारतीय ज्योतिष शास्त्र भाग 2  – भारतीय ज्योतिष शास्त्र में हस्तरेखा का महत्व

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में हस्तरेखाओं का अलग ही महत्व है, व्यक्ति के कार्यशील हाथों तथा उसकी बनावट को देख कर बहुत कुछ जाना तथा समझा जा सकता है, हाथ व्यक्ति के शरीर का बहुत महत्वपूर्ण अंग है, पौराणिक मान्यता केअनुसार हमारे दिन की सुरूआत ही हाथों के दर्शन से होती है तथा हाथों के द्वारा किये गये शुभ कर्मों की शुरुआत ही दान धर्म से होती है जो जीवन में सुख शांति और समृद्धि के साथ-साथ सौहार्द का वातावरण भी सृजित करती है श्रद्धा से जुड़े हुए हाथ और झुके सिर विनम्रता सौम्यता तथा श्रद्धा का बोध कराते हैं जो हमारी संस्कृति के संवाहक है उनमें अलग ही आकर्षण होता है। पौराणिक नियम के अनुसार सर्वप्रथम व्यक्ति को निद्रा से जागने के बाद अपने हाथों को ही देखना चाहिए इससे व्यक्ति  मुखदर्शन के दोष से बच  सकता है इसलिए व्यक्ति को सुबह अपना हाथ ही देखना चाहिए।

कर दर्शन का मंत्र है—-

कराग्रे वसते लक्ष्मी ,कर मध्ये सरस्वती।

करमूले स्थितो ब्रह्मा  प्रभाते कर दर्शनम्।

अथवा

ब्रह्मामुरारी त्रिपुरांतकारी भानूसषि भूमि सुतौ बुधश्च।

गुरूश्चशुक्रौ शनिराहु केतव: सर्वे ग्रहा शांतु कराभवंते।।

अर्थात् हाथ में धन की देवी लक्ष्मी विद्या की देवी सरस्वती तथा सृष्टि कर्ता ब्रह्मा का निवास है। तथा हाथ में ही नवग्रहों का निवास है उनकी आराधना से ग्रहों के कोप का समन होता है। इसीलिए भारतीय ज्योतिष में ये बड़ा महत्व पूर्ण हो जाता है एक कुशल हस्तरेखा विशेषज्ञ हाथों की बनावट रंग रूप आकृति प्रकृति तथा उनमें बनने मिटने वाली रेखा देख कर बहुत कुछ भविष्यवाणी कर सकता है। मणिबंध रेखा से ही हस्तनिर्माण की शुरुआत मानी जाती है हाथों में नवग्रहों का स्थान भी ज्योतिष विज्ञानियों द्वारा निर्धारित किया गया है। तथा हाथों में ही हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा और आयु रेखा होती है, जिसे देखकर मानव का जीवन काल हृदय की भावना तथा बुद्धिमत्ता का आकलन किया जाता है।

एक चतुर हस्तरेखा विशेषज्ञ ही ठीक-ठाक भविष्य वाणी हाथ देख कर कर सकता है,रेखायें समय के साथ बनती तथा मिटती रहती है जो बहुत कुछ संकेत देती है। इनका संबंध मनोविज्ञान से भी बहुत गहराई से जुड़ा है। हाथों में स्थित नवग्रहों के उभरे अथवा दबे क्षेत्र तथा अनेक चिन्ह बहुत कुछ संकेत करते हैं उन्हें पढ़ना एक विशेषज्ञ हस्तरेखा विज्ञानी के लिए बहुत ही आसान है। जिस प्रकार जातक के जन्म के समय की खगोलीय स्थिति जन्मकुंडली में कालखंडों के ग्रहों नक्षत्रों के स्वभाव प्रभाव का अध्ययन करने में सहायक होती है। उसी प्रकार हस्तरेखा भी जातक के भूत भविष्य वर्तमान को दर्शाती है। इसका निर्धारण हस्तरेखा ही करती है। व्यक्ति बुद्धिहीन है अथवा बुद्धिमान यह तो हस्तरेखा विषेषज्ञ देखते भांप लेता है,क्योकि बुद्धिमान व्यक्ति का हाथ कोमलता युक्त लालिमा लिए होता है, वहीं मोटी बुद्धि वाले व्यक्ति का हाथ कठोर होता है तथा उसके हाथों की रेखाएं अस्पष्ट होती है। उसी प्रकार शारीरिक बनावट आदि भी हस्तरेखाओं के द्वारा भविष्य वाणी के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभातीं है जो विषय विशेषज्ञों के शोध की विषय वस्तु है।

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

विशेष – प्रस्तुत आलेख  के तथ्यात्मक आधार ज्योतिष शास्त्र की पुस्तकों पंचागों के तथ्य आधारित है भाषा शैली शब्द प्रवाह तथा विचार लेखक के अपने है, तथ्यो तथा शब्दों की त्रुटि संभव है, लेखक किसी भी प्रकार का दावा प्रतिदावा स्वीकार नहीं करता। पाठक स्वविवेक से इस विषय के समर्थन अथवा विरोध के लिए स्वतंत्र हैं, जो उनकी अपनी मान्यताओं तथा समझ पर निर्भर है।

 

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 19 ☆ राणी ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है  उनका एक श्रृंगारिक रचना  “राणी“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 19 ☆

☆ राणी

 

अगं नाव काय तुझं ये राणी

तुझा बिल्लोर चांदणीवाणी

तुझ्या नखऱ्यावरी,

वाहिन दुनिया सारी

चंद्र पुनवेचा देईन निशाणी।।

 

राग आलाय राणीला लटका

नको मारु गं  मानेला झटका

कर झटका दुरी,

हास गं पळभरी

तुझ्या हास्यात मी,पाणी पाणी।।

 

झोके कमरेला देऊ नको नाना

होई कलिजाचा खजिना रिकामा

पाहुनी सिंहकटी,

माझी फिरली मती

तुझ्या कमरेत,जादू दिवाणी।।

 

तुझ्या गजऱ्यात मन माझं अडलं

तुझ्या पिरमात  मन  माझं  पडलं

तुझ्या मनावरी,

तुझ्या तनावरी

राज्य करीन,मी राजावाणी।।

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (22) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण)

श्रीभगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ।।22।।

भगवान ने कहा-

सत,रज,तम गुण किसी से जिसे न दुःख न द्वेष

होने न होने से भी जिसे न कोई कलेश।।22।।

भावार्थ :  श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश (अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता होती है, उसका नाम ‘प्रकाश’ है) को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह (निद्रा और आलस्य आदि की बहुलता से अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतन शक्ति के लय होने को यहाँ ‘मोह’ नाम से समझना चाहिए) को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है। (जो पुरुष एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अन्तःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहादि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं, यही उसके गुणों से अतीत होने के प्रधान लक्षण है)।।22।।

 

Light, activity and delusion,-when they are present, O Arjuna, he hates not, nor does he long for them when they are absent!।।22।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ नामकरण ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

आज प्रस्तुत है एक सार्थक लघुकथा  नामकरण । कृपया आत्मसात करें।

☆ लघुकथा : नामकरण    

 

कच्चे घर में जब दूसरी बार भी कन्या ने जन्म लिया तब चंदरभान घुटनों में सिर देकर दरवाजे की दहलीज  बैठ गया । बच्ची की किलकारियां सुनकर पड़ोसी ने खिड़की में से झांक कर पूछा -ऐ चंदरभान का खबर ए ,,,?

-देवी प्रगट भई इस बार भी ।

-चलो हौंसला रखो ।

-हां , हौसला इ तो रखेंगे बीस बरस तक । कौन आज ही डिग्री की रकम मांगी गयी है । डिग्री ही तो आई है । कुर्की जब्ती के ऑर्डर तो नहीं ।

-नाम का रखोगे ?

-लो । गरीब की लड़की का भी नाम होवे है का ? जिसने जो पुकार लिया सोई नाम हो गया । होती किसी अमीर की लड़की तो संभाल संभाल कर रखते और पुकार लेते ब्लैक मनी ।

दोनों इस नाम पर काफी देर तक हो हो करते हंसते रहे । भूल गये कि जच्चा बच्चा की खबर सुध लेनी चाहिए ।

पड़ोसी ने खिड़की बंद करने से पहले जैसे मनुहार करते हुए कहा -ऐ चंदरभान, कुछ तो नाम रखोगे इ । बताओ का रखोगे?

-देख यार, इस देवी के भाग से हाथ में बरकत रही तो इसका नाम होगा लक्ष्मी । और अगर यह कच्चा घर भी टूटने फूटने लगा तो इसका नाम होगा कुलच्छनी ।

पड़ोसी ने ऐसे नामकरण की उम्मी द नहीं की थी । झट से खिड़की के दोनों पट आपस में टकराये और बंद हो गये ।

 

©  कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

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मराठी साहित्य – कविता ☆ दीनानाथा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  “दीनानाथा।)

☆ दीनानाथा ☆

 

नाही झाली भेट तुझी

नाही वाचली मी गीता

माय बापाच्या चरणी

फक्त ठेवला मी माथा

 

तेथे भेट तुझी झाली

गाली हसला तू होता

माझ्या हाताला लागली

जणू तुकयाची गाथा

 

नाही व्हायचे वाल्मिकी

राम नाम गाता गाता

होवो श्रावणा सारखी

माझ्या आयुष्याची कथा

 

माझ्या भाग्याची थोरवी

कीर्ति आई यश पिता

हात त्यांचे डोईवरी

काय मागू दीनानाथा

 

माया मोहाची पायरी

नको घराला रे दाता

लालसेचा घडा मनी

त्याला घाततो पालथा

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ बंधन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ बंधन

खुला आकाश,

रास्तों की आवाज़

बहता समीर

गाता कबीर,

सब कुछ मौजूद

चलने के लिए…,

पर ठिठके पैर

खुद से बैर

निढाल तन

ठहरा मन…,

हर बार सांकल,

पिंजरा या कै़द

ज़रूरी नहीं होते

बांधे रखने के लिए..

 

©  संजय भारद्वाज

प्रातः 11.57, 5.7.2019

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 

 

 

 

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 12 – केदार शर्मा – 2 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी  अनभिज्ञ हैं ।  उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार  : केदार शर्मा – 2 पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 12 ☆ 

☆ केदार शर्मा -2 ☆

उनकी आत्मकथा, द वन एंड लोनली केदार शर्मा को मरणोपरांत 2002 में प्रकाशित किया गया था, जिसे उनके बेटे विक्रम शर्मा ने संपादित किया था।

जिसमें उन्होंने पृथीराज कपूर के साथ सम्बंधों का खुलासा किया है।

मुंबई के रंजीत स्टूडियोज के लिए 1942 में केदार शर्मा ‘विषकन्या’ बना रहे थे। इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर, साधना बोस और सुरेंद्र नाथ प्रमुख भूमिका में थे। केदार शर्मा और पृथ्वीराज कपूर में कलकत्ता (अब कोलकाता) के दिनों से बहुत गहरी दोस्ती थी और दोनों एक दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। बाद में दोनों कोलकाता से मुंबई आ गए थे। ‘विषकन्या’ की शूटिंग के दौरान केदार शर्मा ने इस बात को नोटिस किया कि पृथ्वीराज कपूर जब भी शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचते तो वो बहुत उदास रहते हैं। शूटिंग के पहले और बाद में भी गुमसुम रहते हैं और सेट पर किसी से बातचीत नहीं करते। केदार शर्मा लगातार इस बात को नोट कर रहे थे लेकिन पृथ्वीराज कपूर से पूछ नहीं पा रहे थे।

एक दिन अवसर मिल ही गया। पृथ्वीराज कपूर शॉट देने के बाद सेट के एक कोने में जाकर बैठ गए। केदार शर्मा उनके पास पहुंचे, उनका हाथ पकड़कर बोले कि अगर इसमें बहुत व्यक्तिगत कुछ न हो तो मैं आपकी उदासी का कारण जानना चाहता हूं। मुझे लगता है कि आप किसी खास वजह से बेहद परेशान हैं। आप मुझ पर भरोसा रखकर उदासी की वजह बताइए, मैं उसको दूर करने की कोशिश करूंगा। इतना सुनकर पृथ्वीराज कपूर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और जोर से केदार का हाथ पकड़कर बोले, ‘केदार! मैं अपने बेटे राजू को लेकर बहुत चिंतित हूं। किशोरावस्था की उलझनों में वो मुझे भटकता हुआ लग रहा है, मैंने उसको पढ़ने के लिए कॉलेज भेजा लेकिन वहां पढ़ाई से ज्यादा वो लड़कियों में खो गया है।’ इतना बोलकर पृथ्वीराज कपूर चुप हो गए।

केदार शर्मा ने पृथ्वीराज कपूर के कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘अपने बेटे को मुझे सौंप दो लेकिन एक वादा करो कि मेरे और उसके बीच दखलअंदाजी नहीं करोगे। मैं उसको रास्ते पर ले आऊंगा, ठीक उसी तरह जिस तरह से कोई गुरू अपने चेले को लेकर आता है। मैं उसको अपना असिस्टेंट डायरेक्टर बनाने के लिए तैयार हूं।’ यह सुनकर पृथ्वीराज कपूर का दुख कुछ कम हुआ।

अगले दिन वो अपने बेटे राजू को लेकर केदार शर्मा के पास पहुंचे। कपूर खानदान की परंपरा के मुताबिक राजू ने केदार शर्मा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। केदार शर्मा ने राजू को उनके बचपन के दिनों की याद दिलाई, जब वो कोलकाता में रहते थे और पिता के साथ स्टूडियो आते थे। एक दिन जब केदार शर्मा रील देख रहे थे तो राजू ने उनसे जानना चाहा था कि रील में कैद चित्र पर्दे पर चलने कैसे लगते हैं। तब केदार शर्मा ने राजू को कहा था कि एक दिन मैं तुम्हें इसका रहस्य बताऊंगा। अब केदार शर्मा ने राजू से कहा, ‘रील का रहस्य जानने का समय आ गया है। तुम अब मेरे साथ काम करो। आज से तुम मेरे असिस्टेंट डायरेक्टर हो।’

केदार शर्मा 1945 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा जो इंग्लैंड और हॉलीवुड की यात्रा की और चार्ली चैपलिन, वॉल्ट डिज्नी और सेसिल बी डीमिल से मिले।

  • बेस्ट चिल्ड्रन्स फिल्म, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह वेनिस में 1957 में जलदीप के लिए मिला था।
  • 1956: सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: जलदीप
  • भारतीय फिल्म निर्देशकों का एसोसिएशन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
  • भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए 1982 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा स्वर्ण पुरस्कार
  • महाराष्ट्र सरकार का राज कपूर पुरस्कार (उनकी मृत्यु के बाद 1999 में सम्मानित)

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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