ई-अभिव्यक्ति: संवाद- 50 ☆ ई- अभिव्यक्ति का आज का अंक अनुजवत मित्र स्वर्गीय आनंद लोचन दुबे जी को समर्पित ☆☆ हेमन्त बावनकर

प्रिय आनंद 

?  ?अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि  ?  ?

ई-अभिव्यक्ति: संवाद- 50 ☆ ई- अभिव्यक्ति का आज का अंक अनुजवत मित्र स्वर्गीय आनंद लोचन दुबे जी को समर्पित

प्रिय मित्रों,

 वैसे तो इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति एक विशिष्टता लेकर आता है और चुपचाप चला जाता है। फिर छोड़ जाता है वे स्मृतियाँ जो जीवन भर हमारे साथ चलती हैं। लगता है कि काश कुछ दिन और साथ चल सकता । किन्तु विधि का विधान तो है ही सबके लिए सामान, कोई कुछ पहले जायेगा कोई कुछ समय बाद। किन्तु, आनंद तुमसे यह उम्मीद नहीं थी कि इतने जल्दी साथ छोड़ दोगे। अभी 19 मई को ही तो तुमसे लम्बी बात हुई थी जिसे मैं अब भी टेप की तरह रिवाइंड कर सुन सकता हूँ। और आज दुखद समाचार मिला कि 20 मई 2020 की रात हृदयाघात से तुम चल बसे।

प्रिय मित्रों, आप जानना नहीं चाहेंगे यह शख्सियत कौन है ? आपके लिए मित्र आनंद, भारतीय स्टेट बैंक, सिमरिया, कटनी शाखा का शाखा प्रबंधक था। किन्तु, मेरे लिए मेरा अभिन्न अनुजवत मित्र था।  हमारे 1984 में  मित्रवत सम्बन्ध बनायें कब अनुजवत बन गए हम समझ ही नहीं  पाए और मैं सारी जिंदगी अग्रज का सम्बन्ध निभाता चला गया। उसने भी ताउम्र वह अनुजवत सम्बन्ध  बड़ी संजीदगी से निभाया रक्त संबंधों से भी अधिक संजीदगी से। पुत्र पुत्री के विवाह के समय से लेकर प्रत्येक सुख दुःख में एक रिश्तेदार से भी अधिक संजीदगी से निभाया रिश्ता कैसे भूल सकता हूँ।? जब भी सुख के क्षण थे तो दूर रहकर भी ह्रदय के पास साथ ही रहकर हमनें खुशियां बांटी और तुम सदैव दुःख के क्षणों में मेरा सम्बल बने। हर समय मुस्कराते रहे, खुशियां बाँटते रहे और अपना दुःख बिना किसी से साझा किये अपने ह्रदय में जोड़ते रहे और शायद यह इसी की परिणीति हो, पता नहीं ऐसा क्यों मेरा ह्रदय कहता है ? मैं कहता था वीआरएस ले लो तो तुम कहते बस गुड़िया की शादी हो जाए फिर वीआरएस लेकर मिलेंगे बैठेंगे, गपशप करेंगे, घूमेंगे फिरेंगे और आराम से जिंदगी गुजारेंगे। आखिर वे क्षण कल्पना में ही रहे और तुम्हारे साथ ही चले गए. ऐसे में मुझे वह अंग्रेजी कहावत याद आती है “man proposes and god disposes”.

प्रिय आनंद, तुमसे ही सीखा था रिश्ते और दोस्ती के मायने फिर तुम्हारे लिए एक कविता लिखी, किन्तु, साहस जुटा कर बता न पाया कि वह कविता तुम्हारे लिए ही थी। एक दिन फेसबुक पर पोस्ट किया और तुमने दो शब्दों में प्रत्युत्तर दिया “सुन्दर विचार”।  इन दो शब्दों को संजो कर रखा है,  जिसका अर्थ मेरे और तुम्हारे सिवाय कोई नहीं जान सकता। आप सब से साझा कर रहा हूँ वह रचना

 ?   रिश्ते और दोस्ती  ?  

सारे रिश्तों के मुफ्त मुखौटे मिलते हैं जिंदगी के बाजार में

बस अच्छी दोस्ती के रिश्ते का कोई मुखौटा ही नहीं होता

 

कई रिश्ते निभाने में लोगों की तो आवाज ही बदल जाती है

बस अच्छी दोस्ती में कोई आवाज और लहजा ही नहीं होता

 

रिश्ते निभाने के लिए लोग ताउम्र लिबास बदलते रहते हैं

बस अच्छी दोस्ती निभाने में लिबास बदलना ही नहीं होता

 

बहुत फूँक फूँक कर कदम रखना पड़ता है रिश्ते निभाने में

बस अच्छी दोस्ती में कोई कदम कहीं रखना ही नहीं होता

 

जिंदगी के बाज़ार में हर रिश्ते की अपनी ही अहमियत है

बस अच्छी दोस्ती को किसी रिश्ते में रखना ही नहीं होता

 

किन्तु, मैं आप सबसे यह सब क्यों कह रहा हूँ ? संभवतः इसलिए कि यदि पहचान सकें तो पहचानने का प्रयास करें अपने आस पास अपने ऐसे ही किसी प्रिय मित्र को। आपको हर तरह के सम्बन्ध बहुत मिलेंगे किन्तु ऐसे अनुज अथवा अग्रज मित्रवत सम्बन्ध शायद न मिल सके। और यदि वास्तव में आपके ऐसे मित्र हैं तो उन्हें धर्म, जाति या समुदाय से परे संजो कर रखें। उन्हें खोइयेगा मत मेरे ये शब्द नहीं मेरे अनुभव हैं।

संयोगवश डॉ मुक्ता जी का आज प्रकाशित आलेख आज ज़िंदगी : कल उम्मीद पठनीय है।

बस इतना ही।

हेमन्त बावनकर

22 मई  2020

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ विभाजन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

आज  इसी अंक में प्रस्तुत है श्री संजय भरद्वाज जी की कविता  “ विभाजन “ का अंग्रेजी अनुवाद  Division” शीर्षक से ।  हम कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी के ह्रदय से आभारी  हैं  जिन्होंने  इस कविता का अत्यंत सुन्दर भावानुवाद किया है। )

☆ संजय दृष्टि  ☆  विभाजन

लहरों को जन्म देता है प्रवाह

सृजन का आनंद मनाता है,

उछाल के विस्तार पर झूमता है

काल का पहिया घूमता है,

विकसित लहरें बाँट लेती हैं

अपने-अपने हिस्से का प्रवाह,

शिथिल तन और

खंडित मन लिए प्रवाह

अपनी ही लहरों को

विभक्त देख नहीं पाता है,

सुनो मनुज!

मर्त्यलोक में माता-पिता

और संतानों का

कुछ ऐसा ही नाता है!

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

( 8.35 बजे, 18 मई 2019)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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English Literature – Poetry ☆ The Pandemic Prism ☆ Colonel Jayant Khadilkar

Colonel Jayant Khadilkar

(We proudly welcome Colonel Jayant Khadilkar  on e-abhivyaktiColonel Jayant Khadilkar was commissioned in June 1980 into the Corps of Signals. He is an Alumnus of National Defence Academy, Pune and Indian Institute of Science, Bengaluru. Academically brilliant, he was awarded Plaque of Honour in Signals Young Officers Course and Army Chief’s Gold Medal in the Signals Degree Engineering Course. He is an expert in Electronic and Information Warfare.  He was awarded the first prize for his MBA thesis on the use of Decision Making techniques in Electronic Warfare.  Colonel Jayant pursues writing as a hobby, to capture his thoughts on topics of current public interest.  Today, we present his contemporary poetry The Pandemic Prism.)

The Pandemic Prism

Ever in  the news since late 2019 November

Novel Corona is what we call this character

Spreads through humans to cover its ground

It is invisible but is sure to be lurking around

 

Incomparable suffering it has caused

Travel  and business too, it has paused

With no  definite cure  worth the name

Humans, the sure victims of this game

 

Such is the ferocity of  wretched damnation

That one wrong move may wipe out a nation

So let’s cooperate with authorities to function,

assist in their efforts,  causing no confusion

 

Though we had always turned a blind eye

To one’s  own  greed  and others’  misery

And it required a Corona to shake us all

To pull us out of our self-imposed reverie

 

It’s time to learn to respect each other,

empathise and grant dignity of  labour

For, the next Corona version may require

Any one  of us to be the  front line soldier

 

Nature may have a different shade

of this Corona episode and disaster

For it has caged the greedy humans

And allowed other things to prosper

 

Now  air is ever fresh, waters are clean

Birds’re    chirping,  countryside is green

Even the humankind, although confined

Is  networking  with  gusto so far unseen

 

Forced out of the mindless rush

We  are  back  as being  humans

Instead of  those  rats in the race

without any  feelings or emotions

 

© Col Jayant Khadilkar, Veteran

Pune

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English Literature – Poetry ☆ Division ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Poetry  “विभाजन” published today as ☆ संजय दृष्टि ☆ विभाजन   We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages) for this beautiful translation.)

☆  The Division ☆

Flow gives rise

to the waves,

Celebrates its creation,

Rejoices over

its rising expansion…

Time-wheel rotates,

But  the expanded

waves divide themselves…

 

With the tired body

and broken heart,

The Flow finds itself

unable to see

the division of its

very own waves…!

 

O’ Mankind!

The relationship,

in this mortal world,

between the parents

and their offsprings,

is something

similar to this only…!

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 1 ☆ ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। आज से आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सकारात्मक आलेख  ‘ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का’।)

☆ किसलय की कलम से # 1 ☆

☆ ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का ☆

ईश्वर साक्षी है, जिसने समय से सबक नहीं लिया वह सदा ही मुसीबत में पड़ा है। समय सबको एक बार पूर्वाभास अवश्य कराता है, लेकिन अपने में मशगूल आज के इंसान को अच्छे या बुरे वक्त की आहट या दस्तक सुनाई ही नहीं पड़ती। समय जब बुरे वक्त की दस्तक देता है तब हम दुनियादारी के शोर में कुछ सुन नहीं पाते, चिंतन-मनन की बात तो बहुत दूर की है। इसी तरह जब अच्छे वक्त की आहट होती है तब भी हम सुनना नहीं चाहते। उन अच्छे दिनों को ईशकृपा मानने के बजाय स्वयं की उपलब्धि मान बैठते हैं, जबकि यह अच्छा वक्त केवल आपके कर्मों का फल नहीं होता। इसमें हमारे परिवार, हमारे समाज एवं हमारी प्रकृति की भी भागीदारी होती है। यदि इंसान इस सत्सूत्र को जान ले तो वह सभी प्राणियों व प्रकृति से मित्रवत व्यवहार करने लगेगा, इस प्रकार ‘जियो और जीने दो’  वाक्य के चरितार्थ होने देर नहीं लगेगी।

हमने देखा है कि किसी कार्य के प्रारंभ होने से पूर्व ही उस कार्य की परिणति के विचार मानस पटल पर उभरने लगते हैं। ज्ञानवान तो इन विचारों की बारीकियों को पकड़ लेते हैं लेकिन आम आदमी का पूरा ध्यान सफलता के आभासी उत्स में ही डूबा रहता है। वह कमियों को सिरे से नकारता रहता है। यही भ्रम उस कार्य के परिणाम पर भी प्रभाव डालता है।

पेड़-पौधों व जंगलों के घटते क्षेत्रफल से उत्पन्न पानी का अभाव, गर्मी का प्रकोप, शुद्ध वायु की कमी, वन्यजीवों की घटती संख्या एवं पृथ्वी के हठात दोहन से आज प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अब तो आदमी परेशानी महसूस करने लगा है। बुरे वक्त की दस्तकों व चेतावनी  सुनकर हमने कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाए। बढ़ते कांक्रीट जंगलों, असंयत खानपान की वजह से बीमारियाँ तथा स्वास्थ्यगत कमजोरियाँ बढ़ती जा रही हैं, बावजूद इन सबके इन दस्तकों से किसी ने जीवन शैली में सुधार करने की कोशिश नहीं की।

आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व की ही बात करें तो क्या इतनी भयानक और आधिक्य में बीमारियाँ होती थीं। आज तो हम न बीमारियों के नाम और न ही डॉक्टरों के प्रकार गिन पाते। और तो और उस समय के इंसान ने आज पाई जाने वाली बीमारियों की कल्पना तक नहीं की होगी कि ऐसी भी कोई बीमारियाँ हो सकती हैं, जो चमगादड़, सूअर, घोड़े, कुत्ते, बिल्ली या साँप-बिच्छू के खाने से भी होंगी। सोचते भी कैसे, क्योंकि हमने कभी सुना भी नहीं था कि लोग इन जीव-जंतुओं को कच्चा भी खाते होंगे। हमारे देश में तो ‘अहिंसा परमोधर्मः’ पर चलने वाले लोग वनस्पतियों तक को अनावश्यक क्षति पहुँचाने को  हिंसा मानते थे, लेकिन आज ये सब अतीत की बातें हो गई हैं।

वक्त ने दस्तक दी हिंसा बुरी बात है, पर क्या सांप्रदायिक दंगे और आतंकवाद कम हुए? वक्त ने दस्तक दी-प्रेम भाईचारे की, क्या ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के भाव जगे। इसके विपरीत विश्व के विभिन्न देश आज लड़ाई-झगड़े और अपने वर्चस्व की खातिर इंसानियत की हद भी पार करने से नहीं चूक रहे। आज परमाणु युद्ध और स्पेसवार के आगे भी व्यापार युद्ध,पानीयुद्ध और सबसे बड़े युद्ध ‘वायरस वार’ की दस्तक और सुगबुगाहट हम सुन पा रहे है। क्या यह इंसान के लिए अत्यंत संवेदनशील एवं विचारणीय समय नहीं है? आज राष्ट्रीय सीमाओं और हीन विचारों से ऊपर उठकर प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करने का वक्त है। आज कोविड-19 नामक विश्वव्यापी महामारी के चलते जब सारी दुनिया थम सी गई है। आज जैसे हर घर में एक अजीब सा मौन पसरा हुआ है। लोगों की मनःस्थिति का पता लगाना मुश्किल हो गया है। ये  ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ जैसी स्थिति है, परंतु इन दिनों हमारे पास पर्याप्त समय है जब हम मानव जीवन की उपादेयता, शांतिपूर्ण सामाजिक वातावरण तथा प्रकृति से निकटता स्थापित करने विषयक कुछ सकारात्मक चिंतन-मनन कर सकते हैं। कहा भी गया है कि इंसान को दुख या मुश्किल के क्षणों में ही अच्छा-बुरा, सत्य-असत्य, लाभ-हानि कुछ ज्यादा ही दिखाई देने लगता है। विगत जीवन की अनेकानेक यादें स्मृत हो उठती हैं।

अतः ये समय है सकारात्मक सोच के क्रियान्वयन का। हम समय निकालकर अपने जीवन की उपादेयता व सामाजिक सद्भावना पर चिंतन-मनन करें और उस पर अमल करना आज से ही प्रारंभ करें। मुझे विश्वास है इससे हमारे मन निर्मल होंगे और मानव समाज निश्चित रूप से सकारात्मक दिशा में अग्रसर होगा।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 47 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  “भावना के दोहे। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 47 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

 

दूर-दूर तक देश में,हैं कितने अभियान।

दृढ़ता से संकल्प लो, तभी मिलेगा ज्ञान।।

 

रखें धैर्य साहस सदा,मन में हो विश्वास।

जीवन-यात्रा में कभी, टूट न जाए आस।।

 

आज विश्व में हो रही, जन्म-मरण की जंग।

संयम लाएगा सदा, जीवन में फिर रंग।।

 

मानव संकट से घिरा, सूझे नहीं निदान।

देना होगा कब तलक, अपनों का बलिदान।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 38 ☆ भाषा आँखों की अलग …. ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी  का  एक भावप्रवण रचना “भाषा आँखों की अलग …. ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 38 ☆

☆ भाषा आँखों की अलग .... ☆

आँखों से आँखें करें, आपस में तक़रीर

देखो मूरख लिख रहे,आँखों  की तक़दीर

 

आँखें ही तो खोलतीं,दिल के गहरे राज़

प्यार मुहब्बत इश्क़ का,करती हैं आगाज़

 

आँखों से ही उतरकर,दिल में बसता प्यार

दिल से उतरा आँख से,बरसाता जल धार

 

प्यासी आँखें खोजतीं,सदा नेह जल धार

जिन आँखों में जल नहीं,वो निष्ठुर बेकार

 

गहराई जब आँख की,देखे कोई और

आँखों में ही डूबता,रहे न कोई ठौर

 

आँखें ही तो पकड़तीं,सबकी झूठ जबान

दिल-जबान के भेद की,करतीं वे पहचान

 

भाषा आँखों की अलग,इनकी अलग जबान

आँख मिलाते समय अब,सजग रहें श्रीमान

 

आँखों को भाता सदा,कुदरत का नव रंग

सुंदरता मन मोहती,आँखों भरी उमंग

 

आँखों में सपने बसें,बसती हैं तसवीर

आँखों से ही झलकती, इन नैनों की पीर

 

आँखों से ही हो सदा,खुशियों की बरसात

भीगी आँखें रात-दिन,छलकातीं जज्बात

 

आँखें जग रोशन करें,आँखें रोशन दान

आँखों में संतोष है,सूरज ज्योतिर्मान।।

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य – मंदिर ह्रदयीचे. . . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता  “मंदिर ह्रदयीचे. . . ! )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य ☆

☆ मंदिर ह्रदयीचे. . . ! ☆

जखमांवरती मलम लावले, आई संज्ञेचे

अलगद  आले, भरून सारे, घाव अंतरीचे

असे हे दैवत ममतेचे, पहा ना मंदिर ह्रदयीचे.

 

आयुष्याला तोलून धरले, अज्ञात ताजव्याने

त्या शक्तीचे दर्शन घडले, आई रूपाने

असे हे दैवत ममतेचे, पहा ना मंदिर ह्रदयीचे.

 

आई म्हणजे  अमृत पान्हा, संचित जीवनाचे

वात्सल्याची आभाळमाया, जीवन घडवीते

असे हे दैवत ममतेचे, पहा ना मंदिर ह्रदयीचे.

 

एकच आता दैवत माना, मनी माऊलीचे

संस्काराने जिने घडविले, मंदिर सौख्याचे

असे हे दैवत ममतेचे, पहा ना मंदिर ह्रदयीचे

 

(श्री विजय यशवंत सातपुते जी के फेसबुक से साभार)

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  Buddha#1 –  First Step to being Spiritual ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ BUDDHA –  FIRST STEP TO BEING SPIRITUAL☆ 

Video Link >>>>

FIRST STEP TO BEING SPIRITUAL

(This video gives an understanding of abstaining from unwholesome deeds and cultivating wholesome ones.)

It has been said in the Dhammapada, “Abstain from all unwholesome deeds, perform wholesome ones, purify your mind – this is the teaching of enlightened persons.”

What are unwholesome deeds and what are the wholesome ones?

Any action that harms others, that disturbs their peace and harmony is a sinful action, an unwholesome action. Any action that helps others, that contributes to their peace and harmony, is a pious action, a wholesome action.

There are three types of Wrong Conduct a human being is capable of – Wrong Conduct with Words, Wrong Conduct with Body and Wrong Conduct with Mind.

There are four sub divisions of Wrong Conduct with Words – false speech, slanderous speech, harsh speech and idle chatter.

Abstaining from false speech: Herein someone avoids false speech and abstains from it. One speaks the truth, is devoted to truth, reliable, worthy of confidence, not a deceiver of people.

Abstaining from slanderous speech: One avoids slanderous speech and abstains from it. What one has heard here one does not repeat there, so as to cause dissension there; and what one has heard there one does not repeat here, so as to cause dissension here.

Abstaining from harsh speech: One avoids harsh language and abstains from it. One speaks such words as are gentle, loving, soothing to the ear; such words as go to the heart, and are courteous, friendly, and agreeable to many.

Abstaining from idle chatter: One avoids idle chatter and abstains from it. One speaks at the right time, in accordance with facts, speaks what is useful, one’s speech is like a treasure, uttered at the right moment, accompanied by reason, moderate and full of sense.

WRONG CONDUCT WITH BODY

There are three sub divisions of Wrong Conduct with Body – taking life, taking what is not given and sexual misconduct.

Abstaining from the taking of life: Herein someone avoids the taking of life and abstains from it. Without stick or sword, conscientious, full of sympathy, one is desirous of the welfare of all sentient beings.

Abstaining from taking what is not given: One avoids taking what is not given and abstains from it; what another person possesses of goods and property, that he does not take away with thievish intent.

Abstaining from sexual misconduct: One avoids sexual misconduct and abstains from it.

WRONG CONDUCT WITH MIND

There are three sub divisions of Wrong Conduct with Mind – covetousness, ill will and wrong view.

Abstaining from covetousness: Here someone avoids being covetous: one is not a coveter of another’s goods and property.

Abstaining from ill-will towards others: One avoids a mind of ill-will and hatred towards other beings.

Abstaining from wrong view: One avoids wrong view, distorted vision.

There are three types of Right Conduct a human being is capable of – Right Conduct with Words, Right Conduct with Body and Right Conduct with Mind.

How can one “perform wholesome” deeds? One can perform wholesome deeds by practising right speech, right action, and right conduct with mind.

Right speech means speaking in ways that are trustworthy, harmonious, comforting, and worth taking to heart. When you make a practice of these positive forms of right speech, your words become a gift to others.

Right action is behaving peacefully and staying in harmony with fellow human beings.

Right mental conduct is having goodwill for others and cultivating the right view.

To “purify your mind”, you have to cultivate wholesome states and abandon unwholesome states by seeking wisdom and practising meditation.

This is the essence of the teaching of enlightened persons.

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (6) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः ।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌ ।।6।।

धृति, संघात व चेतना ,सब मिल इकतीस क्षेत्र

इनसे विविध प्रकार का सीमित है प्रक्षेत्र ।।6।।

भावार्थ :  तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति (गीता अध्याय 18 श्लोक 34 व 35 तक देखना चाहिए।)– इस प्रकार विकारों (पाँचवें श्लोक में कहा हुआ तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए।) के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।।6।।

 

Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (the body), fortitude and intelligence-the Field has thus been described briefly with its modifications.।।6।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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