हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक

भारतीय जीवन में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं हैं, वे मन की तैयारी और सांस्कृतिक चेतना की एक निरंतर यात्रा हैं। कोई भी पर्व अचानक नहीं उतरता; वह धीरे-धीरे ऋतुओं की चाल के साथ हमारे भीतर स्थान बनाता है।

फाल्गुन की चहल-पहल और रंगों की स्मृतियों के बाद जब चैत की आहट सुनाई देती है, तब कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन मानो जीवन की गति को थोड़ा थाम लेने का अवसर देते हैं। यह समय बाहरी उत्सवों की चकाचौंध से अधिक भीतर की सजगता का समय होता है—एक ऐसी साधना, जिसमें मन स्वयं को आगामी पर्वों के लिए तैयार करता है।

इन्हीं दिनों में आती है शीतला अष्टमी। लोकजीवन में यह बसोरा के रूप में भी जानी जाती है। इस दिन रसोई की अग्नि को विश्राम दिया जाता है और एक दिन पूर्व बनाया गया बासा भोजन श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण परंपरा प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर लोकबुद्धि का गहरा संतुलन छिपा है—स्वास्थ्य, स्वच्छता और संयम का संतुलन।

शीतला माता की पूजा करते हुए घरों में एक अलग प्रकार की शांति उतर आती है। चूल्हा भले ही न जले, पर श्रद्धा की एक उजली लौ पूरे घर में फैल जाती है। यह विराम हमें स्मरण कराता है कि जीवन में निरंतर गति जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है ठहरना भी।

यही ठहराव आगे आने वाले नवरात्रि की भूमिका भी रचता है। शक्ति की आराधना का यह महान पर्व केवल नौ दिनों की उपासना भर नहीं, बल्कि उससे पहले की यह मानसिक तैयारी भी उसका एक महत्वपूर्ण आधार है। कृष्ण पक्ष के ये दिन हमें संकेत देते हैं कि अब अपने भीतर की अनावश्यक व्यग्रताओं को धीरे-धीरे कम किया जाए, घर-आँगन को सहेजा जाए और मन में श्रद्धा के लिए एक निर्मल स्थान बनाया जाए।

भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि यहाँ हर बड़े उत्सव से पहले एक शांत प्रस्तावना होती है—जैसे संगीत से पहले की धुन, या भोर से पहले का वह सन्नाटा जिसमें प्रकाश जन्म लेता है।

इस दृष्टि से देखें तो शीतलाष्टमी केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक क्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें आने वाली नवरात्रि की ऊर्जा के लिए भीतर से तैयार करता है।

कृष्ण पक्ष के ये पंद्रह दिन इसलिए रिक्त नहीं हैं।

वे मन को संयत करने की एक साधना है

ताकि जब शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़े,

तो उसके साथ हमारी आस्था और बलवती हो सके।

शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति ने उत्सवों के बीच ऐसे शांत पड़ाव रचे हैं, जहाँ मन स्वयं से संवाद कर सके। शीतलाष्टमी का यह सहज विराम और नवरात्रि की आने वाली ऊर्जा—दोनों मिलकर हमें यह स्मरण कराते हैं कि शक्ति की उपासना केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता और संतुलन से पूर्ण होती है।

कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन हमें ठहरकर देखने का अवसर देते हैं—अपने भीतर, अपने परिवेश में और अपनी परंपराओं में। जब मन का आकाश निर्मल हो जाता है, तभी आस्था का चंद्रमा पूर्णता की ओर बढ़ता है,इसीलिए हमारे उत्सव केवल मनाए नहीं जाते—

वे पहले भीतर जागते हैं,

फिर जीवन में उजाला भर देते हैं।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अन्नपूर्णा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अन्नपूर्णा ? ?

खरी दुनिया की

किसी भाषा का कोई शब्द

नहीं लिख पायेगा

वह भाव

जो देखा मैंने

अपने नवजात शावकों

के साथ

अलसाई पड़ी

बकरी की आँखों में,

इन शावकों का बीजारोपण

करनेवाले नर साथी

के अंत से अज्ञात नहीं है वह,

इन्हें, इनसे पहले और

इनके बाद जने जानेवाले शावकों

विशेषकर नर शावकों का भविष्य

उसकी पुतली की कोर में दबे

ललिया गये आतंक में दीखता है,

तब भी निरंतर जनती है

वह शावक

तन में प्राण रहने या

जनने की क्षमता समाप्ति पर

उसी अंत पर पहुँचने तक,

मनुष्यो और मनुष्यों की संतानो!

मुझे दिखता है दृश्य

स्वर्ग से उतरते

उस उड़नखटोले का

जो निश्चित ही

नहीं भेजा गया है

मेरे-तुम्हारे-हमारे या

हम में से किसी के लिए,

ये भेजा गया है

उस बकरी के लिए

जो मेरे-तुम्हारे-हमारे लिए

आजीवन बनी रही अन्नपूर्णा,

और

अन्नपूर्णा का स्वर्ग जाना

किसी भी पंथ में

वर्जित नहीं है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०३ ☆ आलेख – “भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०३ ☆

?  आलेख – भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का ‘ललित’ पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में ‘मैं’ का अहंकार नहीं, बल्कि ‘मैं’ की आत्मीयता घुली होती है। जब वे ‘कदम की फूली डाल’ या ‘आम्र-मंजरी’ की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द ‘अर्थ’ ही नहीं देते, बल्कि ‘ध्वनि’ और ‘दृश्य’ भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की ‘तरलता’ है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह ‘तुम चंदन हम पानी’ भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार ‘आँगन का पंछी और बनजारा मन’ में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में ‘बनजारा’ बनकर भटकना चाहता है।

उनका सबसे चर्चित निबंध ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में ‘मुकुट के भीगने’ अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।

कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान

पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे ‘सांस्कृतिक यात्री’ बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४१ ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान।)

?अभी अभी # ९४१ ⇒ आलेख – गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है। हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है। कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बढ़ाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, कव्वाली, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का। इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है। आप स्वयं गुणों की खान हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८९ ☆ गीत – तुझको चलना होगा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८९ ☆ 

☆ गीत – तुझको चलना होगा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

धीरे – धीरे बढ़ो मुसाफिर

जीवन है अनमोल।

दुख चाहे जितने भी आएं

मुख में मिश्री घोल।।

 

चलना ही जीवन की नियति

तुझको चलना होगा।

जागो ! उठो दूर है मंजिल

देख स्थिति ढलना होगा।

 

सत, असत की बल्लरियों में

देख कहाँ है झोल।।

 

लक्ष्य बनाकर बढ़ना पथ पर

औ’ स्वयं विश्वास करो।

मृत्यु तो जीवन का गहना

मत रोना कुछ हास करो।

 

पंछीगण को देख निकट से

भोर में भरें किलोल।।

 

जो सोया है, उसने खोया

आँख खोल मत डर प्यारे।

अपनी मदद स्वयं जो करते

उस पर ही ईश्वर वारे।

 

परिभाषा जीवन की अद्भुत

सदैव तराजू तोल।।

 

संशय, भ्रम में नहीं भटकना

यह जीवन नरक बनाते।

द्वेष – ईर्ष्या वैर भाव भी

सदा अँधेरा यह लाते।

 

सच्चाई की जीत लिखी है

आगे होगा गोल।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३ – लघुकथा- प्रेरणा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “प्रेरणा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३

☆ लघुकथा – प्रेरणा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

खुद कमा कर पढ़ाई करने वाले एक छात्र की सिफारिश करते हुए कमलेश ने कहा, “यार योगेश! तू उस छात्र की मदद कर दें. वह पढ़ने में बहुत होशियार है. डॉक्टर बन कर लोगों की सेवा करना चाहता है.”

“ठीक है मैं उस की मदद कर दूंगा.  उस से कहना कि मेरी नई नियुक्त संस्था से शिक्षाऋण का फार्म भर कर ऋण प्राप्त कर लें.” योगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “मगर, मैं चाहता हूं कि तू उस की निस्वार्थ सेवा करें. उसे सीधे अपने नाम से पैसा दान दें.”

“नहीं यार! मैं ऐसा नहीं करना चाहता हूं ?”  यौगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “इस से तेरा नाम होगा ! लोग तूझे जिंदगी भर याद रखेंगे.”

“हाँ यार. तू बात तो ठीक कहता है. मगर,  मैं नहीं चाहता हूं कि उस छात्र की मेहनत कर के पढ़ने की जो प्रेरणा है वह खत्म हो जाए.”

“मैं उसे जानता हूं, वह बहुत मेहनती है. वह ऐसा नहीं करेगा”, कमलेश ने कुछ ओर कहना चाहा मगर, यौगेश ने हाथ ऊंचा कर के उसे रोक दिया.

“भाई कमलेश ! यह उस के हित में है कि वह मेहनत कर के पढाई करें”, कह कर यौगेश ने अपनी आंख में आए आंसू को पौंछ लिए, “तुम्हें तो पता है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंक कर पीता है.”

यह सच्चाई सुन कर कमलेश चुप हो गया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ ☆ व्याख्यान : हिंदी लोकल से ग्लोबल — हिंदीतर प्रांत मातृभाषा दिवस, युवा रचनापाठ ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ व्याख्यान : हिंदी लोकल से ग्लोबल — हिंदीतर प्रांत मातृभाषा दिवस, युवा रचनापाठ ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆

शुक्रवार, दिनांक 6 मार्च 2026 को हिंदी विभाग मॉडर्न महाविद्यालय, शिवाजीनगर, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति और वैश्विक हिंदी परिवार, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में हिंदीतर प्रांत मातृभाषा दिवस, युवा रचनापाठ और व्याख्यान का आयोजन मॉडर्न महाविद्यालय में किया गया थाl

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि डॉ. जवाहर कर्णावट डॉक्टर दामोदर खडसे डॉ. सुनील देवधर, डॉ. नीलम जैन, डॉ. प्रेरणा उबाळे, स्वरांगी साने के हाथों सरस्वती पूजन संपन्न हुआ और युवा पाठ कार्यक्रम का उद्घाटन हिंदी विभाग की परंपरा के अनुसार पौधे को पानी देते हुए उसे सींचकर काव्यपाठ करने वाले हमारे हिंदी के प्रिय छात्रों के शुभ करकमलों से कार्यक्रम का उद्घाटन किया गयाl

हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेरणा उबाळे ने कार्यक्रम के आरंभ में हिंदी विभाग में विभागाध्यक्षा के रूप में पिछले 10 वर्षों से अविरत चलने वाली विभिन्न गतिविधियों से परिचय कराया – जैसे, आज का शब्द, आज का मुहावरा, अरुणिमा साहित्यिक पत्रिका, राष्ट्रीय हिंदी निबंध लेखन प्रतियोगिता, विज्ञापन लेखन प्रतियोगिता, काव्यपाठ, हिंदी फिल्म क्लब, फिल्म स्क्रीनिंग, विभिन्न विषयों पर आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशालाएं, बिदाई समारोह, पुराने छात्रों का स्नेहमिलन, विभिन्न व्याख्यानमालाएँ आदि की जानकारी अतिथि मान्यवर और उपस्थितों को दीl सभी का स्वागत उन्होंने शॉल और मॉडर्न महाविद्यालय की पत्रिका देते हुए कियाl

युवा रचना पाठ में उस्मान मोहम्मद (कश्मीर), शाहिद बशीर (कश्मीर), सदुर्शना अरूणागिरी (श्रीलंका), मुकेश रावत(कुमाऊं, हिमालय), साक्षी कांबले, योगेश काले, विद्या केलकर-सराफ (महाराष्ट्र), ने अपनी मातृभाषाओं में अनुक्रमत: कश्मीरी, तमिल, कुमाऊनी, हिंदी, मराठी, भाषा में सारगर्भित कविताएं पढ़ीl इन छात्रों की कविताओं ने सबका मन मोह लियाl इस समय हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय नेl युवा रचना पाठ होने के बावजूद भी हिंदी विभाग के आरंभिक समय की एक छात्रा को निमंत्रित किया थाl हिंदी विभाग के प्रथम अध्यक्ष डॉ. श्रीरंग संगोराम की छात्रा रह चुकी हैंl विद्या केलकर- सराफ (1979) ने मॉडर्न महाविद्यालय और हिंदी विभाग की स्मृतियों को तजा करते हुए अपनी कविता पढ़ीl साथ ही अनेक वर्षों बाद विभाग में आने की ख़ुशी जताईl भूतकाल और वर्तमान समय के हिंदी विभाग के छात्रों के काव्यपाठ का सुंदर मिलाप यहाँ दिखाई दियाl

डॉ. प्रेरणा उबाळे ने अतिथि मान्यवारों का परिचय करायाl इसके बाद महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्याध्यक्ष और आकाशवाणी पुणे के पूर्व सहायक निदेशक, हिंदी लेखक डॉ. सुनील देवधर ने व्याख्यान के आयोजन और हिंदी के वैश्वीकरण के संदर्भ में भूमिका सामने रखीl इस्रायल का उदाहरण देते हुए उन्होंने यह बताया कि हिब्रू भाषा कैसे अनिवार्य करने के बाद जीवंत हो उठीl

प्रस्तुत कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि डॉ. जवाहर कर्णावट, भोपाल ने “हिंदी लोकल से ग्लोबल” विषय पर अपना व्याख्यान दियाl उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि जब हमें हवा, भोजन और पानी शुद्ध चाहिए तो हिंदी शुद्ध क्यों नहीं ? उन्होंने यह प्रश्न उपस्थित किया कि हम हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में क्यों लिखते हैं ? हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के विश्व में विस्तार की जानकारी उन्होंने प्रदान की? डॉ. जवाहर कर्णावट ने विश्व के लगभग 60 देशों में यात्रा करते हुए वहां हिंदी की स्थिति का जायजा लेकर ‘विश्व में हिंदी’ शीर्षक पुस्तक की रचना की वह पुस्तक उन्होंने हिंदी विभागाध्यक्षा डॉ. प्रेरणा को प्रदान कीl डॉ. जवाहर कर्णावट हिंदी भाषा, साहित्य के संदर्भ में संपूर्ण विश्व में अनुसंधान कार्य कर रहे हैंl उनके हिंदी से संबंधित समर्पण भाव से किए गए कार्य के कारण फिजी की संसद में उन्हें हिंदी सेवी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका हैl

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. दामोदर खडसे, जिन्होंने भारतीय सभी मंत्रालयों, समितियों, संस्थाओं से जुड़कर हिंदी से संबंधित कार्य किया है तथा नई शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं के संदर्भ में जिनका ठोस योगदान रहा हैl उन्होंने अपने व्याख्यान में प्रवासी हिंदी साहित्यकार तथा विदेशों में व्याप्त हिंदी की स्थिति और गति के संदर्भ में अपने अनुभव कथन किएl

इस कार्यक्रम को डॉ. नीलम जैन प्रवासी हिंदी साहित्यकार का सानिध्य प्राप्त हुआl उन्होंने अपने भाषण में भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, प्रवासी हिंदी साहित्य और वैश्विक हिंदी के संदर्भ में सबसे संवाद कियाl साथ ही प्रस्तुत कार्यक्रम के आयोजन हेतु डॉ. प्रेरणा को बधाई दीl

कार्यक्रम का आभारज्ञापन कवयित्री, पत्रकार डॉ. स्वरांगी साने ने कियाl वैश्विक हिंदी परिवार की प्रांत संयोजक के रूप में संयुक्त तत्वाधान में हिंदी विभाग से जुड़कर इस कार्यक्रम के आयोजन में वह सक्रियता से जुटी रहीl

इस अवसर पर हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय के प्रा. सूरज बिरादर, रेशमा कांबले, शुभम राऊत उपस्थित थे तथा विभाग के स्नातक और स्नातक स्तर के छात्र बड़ी संख्या में मौजूद थेl इस कार्यक्रम में हिंदी कहानीकार डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव, नाटककार डॉ. रमेश मिलन भारतीय संस्कृति की अध्येता डॉ. ममता जैन, हिंदी कवि हितेश व्यास, मंजू चोपड़ा, श्री. देशमुख आदि हिंदी-मराठी लेखक पत्रिकाओं के कुछ संपादक, अन्य महाविद्यालयों के प्राध्यापक भी उपस्थित रहेंl संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रेरणा उबाळे ने कियाl कार्यक्रम के अंत में काव्यपाठ करने वाले सभी छात्रों को प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गयाl संपूर्ण कार्यक्रम अत्यंत सुचारू ढंग से संपन्न हुआl सभी मान्यवरो ने स्व. शंकरराव कानिटकर हिंदी विभागीय ग्रंथालय को भेंट दीl ग्रंथालय को 600 पुस्तकें प्रदान करने वाले डॉ. दामोदर खड़से और अन्य विद्वानों ने अपनी पुस्तकें संजोकर रखने पर प्रसन्नता व्यक्त कीl

साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे

अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय, शिवाजीनगर, पुणे

संपर्क- 7028525378

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कविता… ☆ श्री विनायक कुलकर्णी ☆

श्री विनायक कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ? 

☆ कविता… ☆ श्री विनायक कुलकर्णी ☆ 

[वृत्त. वनहरिणी (मात्रा ८+८+८+८)]

मी प्रतिभेच्या प्रासादातिल शब्द हवे ते निवडत जातो

वेगवेगळ्या भाव भावना कविते मधुनी गुंफत जातो

यमक साधते नकळत माझ्या वृत्त बद्घता जमून येते

एक एक मी माझी कविता शब्द कृपेने घडवत जातो

काळ सुखाचा असतो जेंव्हा कविता माझी उजळत असते

प्रेमा मधला गंध लेवुनी मनास माझ्या सुखवत असते

क्षण दुःखाचे असता भवती कविता सुध्दा दुःखी होते

तरि आशेचा किरण होउनी धीर देत मज जगवत असते

 *

तिला शारदा बहाल करते अलंकार शब्दांचे भारी

अभंग होते कधी कविता करून येते विठ्ठल वारी

होते दोहा गीत गझल अन् ओवी सुध्दा कविता बनते

स्वातंत्र्याची मशाल बनते अन् क्रांतीची बने तुतारी

 *

ज्ञानोबाची असते वारी ही नाम्याची असे पायरी

अभंग होउन ही तुकयाचे मुक्त हिंडते दारोदारी

मुक्ताईची कान्हाईची जनामायची गाउन ओवी

दळावयाला कांडायाला घरी आणते तीर्थे चारी

© श्री विनायक कुलकर्णी

मो – 8600081092

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९५ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९५ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- वखरे साहेबांनी माझ्या डोक्यावरचं ओझं किती अलगद उतरवून घेतलं होतं! त्यांचे आभार मानून मी जायला वळणार एवढ्यांत त्यांनी मला थांबवलं.

“लिमये, माझ्या घरच्या जबाबदाऱ्या अजून पूर्ण व्हायच्यात. त्या तशा झाल्या असत्या तर मीही तुम्ही घेतलाय तसाच निर्णय घेतला असता. सोs यू आर आॅन राईट ट्रॅक. गो अहेड. ऑल द बेस्ट. एन्जॉय अॅंड बी हॅप्पी! ” ते म्हणाले होते.

त्यांचे शब्द माझ्यासाठी सदिच्छाच नव्हते फक्त तर त्यांच्या तोंडून ‘तो’ च देत असावा असे आशीर्वादही होते!)

मनाला स्पर्शून गेलेला हाच विचार सोबत घेऊन मी माझ्या केबिनमधे आलो. आता इथला आपला अन्नाचा शेर अल्पकाळाचाच. जाण्यापूर्वी सगळी कामं पूर्ण करायला हवीत. असा विचार करीत मी बसायला माझी खुर्ची ओढली एवढ्यांत माझ्या लक्षात आलं की आजच्या

इनवर्ड मेलमधे आलेलं माझ्या नावाचं एक बंद एन्व्हलप शिपायाने आधीच तिथं माझ्या टेबलवर पेपरवेटखाली ठेवलेलं होतं. पाहिलं तर ते आमच्या नागपूर रिजनल आॅफिसकडून आलेलं होतं. मी ते न फोडता तसंच बाजूला सरकवून पुन्हा त्यावर पेपरवेट ठेवून दिला. आणि माझ्या समोरची इतर महत्त्वाची कामं हातावेगळी करायला सुरुवात केली. कारण त्या पत्रात बाकी दुसरं कांही नसणार हे गृहितच होतं. याआधीही नागपूर रिजनल ऑफिसकडून मला साधारण दोन महिन्यांपूर्वी एक पत्र आलं होतंच. आमची अकोला ब्रॅंच नागपूर रिजनच्या अखत्यारीत होती आणि अकोल्याला माझी ट्रान्स्फर व्हायला निमित्त ठरलेल्या अनियमित कर्ज खात्यांबद्दल जे गंभीर प्रश्न निर्माण झालेले होते त्यामुळे होणाऱ्या बॅंकेच्या आर्थिक नुकसानीला कोण जबाबदार हे ठरवण्याचे प्रोसेस पूर्वीच सुरू झालेले होते. त्या कार्यप्रणालीचाच एक भाग म्हणून आधी आलेले ते पत्र! त्या पत्रात ‘तुम्ही तेथे मॅनेजर म्हणून कार्यरत असताना या बुडीत होऊ पहाणाऱ्या कर्जांची वसुली करण्यासाठी आवश्यक पावले उचलली गेली नव्हती असे निदर्शनास आले आहे. याबद्दलचे आपले म्हणणे आठ दिवसांच्या आत लेखी कळवावे’ असे सूचित केलेले होते. ते पत्र वाचून भीति वाटण्याऐवजी तेव्हा मला हसूच आले होते. कारण मला तो कागदी घोडे नाचवण्याचा हास्यास्पद प्रकारच वाटला होता. खरंतर या गंभीर त्रुटी मी तिथे चार्ज घ्यायच्या आधीच आॅडिटमधेच रिपोर्ट झाल्या होत्या. त्याला जबाबदार असलेल्या आधीच्या मॅनेजरची तेथून उचलबांगडीही झाली होती. आणि ती घाण उपसण्यासाठीच माझी तिथे बदली झाली होती. सेन्ट्रल ऑफिसच्या सूचनेप्रमाणे सहा कर्जखातेदारांविरूध्द क्रिमिनल केसेस् दाखल करून इतर थकीत खातेदारांविरूध्दही वसुलीच्या नोटिसा पाठवून मी पाठपुरावा सुरूही केलेला होता. त्या ब्रँचमधल्या पाच महिन्यांच्या अल्पवास्तव्यात एक जबाबदार ब्रॅंच मॅनेजर म्हणून जे करायचे ते वेळोवेळी रिजनल ऑफिस आणि सेंट्रल ऑफिस या दोघांचेही मार्गदर्शन घेऊन मी तत्परतेने केलेले होते आणि प्रत्येक खात्याबद्दलची रिपोर्टिंग्जही त्या त्या वेळी सर्व वरिष्ठ कार्यालयांना पाठवत आलो होतो. या सगळ्याची मुद्देसूद सविस्तर माहिती देऊन ‘मी माझ्या कर्तव्यात कोणतीही कसूर केलेली नसल्याने होणाऱ्या आर्थिक नुकसानीला मला जबाबदार ठरवता येणार नाही’ असे त्या पत्राला उत्तर दिले होते त्यालाही दोन महिने होऊन् गेले होते. त्यामुळेच आज मला आलेलं ते समोरच्या इन्व्हलपमधलं पत्र हे मी पूर्वी पाठवलेल्या त्या लेखी उत्तराची पोच आणि त्या प्रश्नाला रिजनल आॅफिसने दिलेली क्लिनचीट असणार याबद्दल मला शंका नव्हतीच. पण…?

पण साधारण तासाभराने मला इतर कामांमधूनच थोडा निवांतपणा मिळताच मी ते एन्व्हलप फोडून आतलं पत्र वाचलं आणि मला हादराच बसला. ते मला वाटलं होतं तसं साधं पत्र नव्हतं. ती मला आलेली एक नोटीस होती. क्षणभर कां होईना कांहीतरी अभद्र घडत असल्याच्या आशंकेने मी अस्वस्थ झालो.

‘तुम्ही सदर कर्ज खात्यांबाबतचा पाठपुरावा समाधानकारक केलेला नसल्यामुळे तुम्ही मांडलेली कैफियत स्वीकारता येणार नाही. ‘ असे नमूद करून ‘ सदर खात्यांमधील अनियमितता आणि आर्थिक नुकसानीस तुम्हाला कां जबाबदार धरू नये? ‘ अशी मला बजावलेली ती ‘शो काॅज नोटीस’ च होती.

माझी भूमिका स्वच्छ होती. त्यामुळे ते पत्र वाचल्यानंतर उमटलेली माझी पहिली नकारात्मक प्रतिक्रिया क्षणकाळच टिकली. शांतपणे विचार केल्यानंतर एक गोष्ट मला स्पष्टपणे जाणवली. माझ्या अकोला ब्रॅंचमधील वास्तव्यादरम्यान नागपूरचे तेव्हाचे रिजनल मॅनेजर आणि मी या कर्जखात्यांच्या संदर्भात सतत संपर्कात असायचो. किंबहुना सेन्ट्रल आॅफिस आणि म्हणून झोनल आॅफिस या दोन्हीकडून माझ्या इतकाच त्यांच्यामागेही या गंभीर प्रकरणांबाबतचा ससेमिरा असायचाच. मी आणि ते दोघांच्या जवळजवळ एकाचवेळी प्रमोशन मिळून ट्रान्स्फर्स झालेल्या. आज ते तिथेच असते तर हा प्रश्नच निर्माण झाला नसता. पण आता तिथे आलेले नवीन रिजनल मॅनेजर आम्हा कुणालाच ओळखत नव्हते. त्यामुळे त्यांनी चुकीच्या पध्दतीने धसाला लावलेल्या या प्रश्नात ते मलाही गुंतवू पहात होते. त्यामागे त्यांचा नेमका काय उद्देश होता ते मला समजत नव्हतं. मी कितीही निर्दोष असलो तरी ते सिद्ध करून यातून बाहेर पडणं अवघड नसलं तरी मनस्ताप देणारं आणि वेळखाऊ ठरणारंही होतं. जे करायचं ते अतिशय विचारपूर्वक आणि शांतपणे करायला हवं आणि तेही ताबडतोब हे माझ्या लक्षात आलं!

स्वेच्छानिवृत्तीसाठीची ती आकर्षक योजना, सर्वांशी मोकळेपणाने चर्चा करून त्यासाठी अर्ज करायचा मी घेतलेला निर्णय, त्यामधे सेंट्रल आॅफिसच्या नुकतेच प्रमोशन मिळालेल्या आम्हा सर्वांच्या संदर्भातल्या धोरणामुळे निर्माण झालेली अनिश्चितता हे सगळे अडसर वखरेसाहेबांशी मोकळेपणाने चर्चा केल्यानंतर दूर झालेत असं वाटलं होतं पण तो असा एक चकवाच ठरला होता तर! दु:ख माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीत आता पुन्हा अडसर निर्माण होणार याचं नव्हतंच. आपल्यावर होणाऱ्या अन्यायाविरुद्ध आपण कांहीही करू शकत नाही याचं दु:ख होतं!

आज जवळजवळ पंचवीस वर्षांनंतर या सगळ्याच घटनांकडे वळून पहाताना मला माझ्या बाबांचे शब्द आठवतात.

‘कर्ता करवता ‘तो’च. आपण फक्त निमित्तमात्र’ असं ते म्हणायचे. त्याचा नेमका अर्थ या सर्व घटनाच मला समजावून सांगू पहातायत असंच वाटू लागलं!

आज आलेलं हे पत्र वाचण्यापूर्वी फक्त तासभरच आधी मी माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीच्या निर्णयाला वखरेसाहेबांची संमती घेऊन बाहेर पडलो होतो ते जग जिंकून आल्याच्या आनंदातच! वखरेसाहेबांना मी माझ्या या निर्णयामागची माझी भूमिका

मोकळेपणाने समजावून सांगितल्यानेच त्यांनी मनापासून आपल्याला पाठिंबा दिला असंच मला वाटलं होतं. इथं समोर हाकेच्या अंतरावर असणाऱ्या अपेक्षित अशा वळणावर वळायचं कीं आहे त्या सरळ रस्त्यानेच पुढे जात रहायचं याचा निर्णय घेणारा आता मीच आहे असंच मला वाटलं होतं! माझ्या मनात आलेल्या या ‘मी’ मधे कणभर कां होईना ‘अहं’ होताच! पण नंतर अगदी

अल्पकाळातच तो ‘अहं’ पूर्णतः नाहीसा झाला तो हे पत्र आल्यानंतर! आता मी करतो म्हणून कांहीही होणार नाहीय यांची स्पष्ट जाणीव मला झाली. मी निमित्तमात्र आहे आणि करता करवता ‘तो’च आहे हेच खरे! आता या क्षणी ‘तो’ बुध्दी देईल तसं करत जायचं आणि जे घडेल तेच ‘त्या’चा प्रसाद म्हणून स्वीकारायचं. तो अन्याय असो वा अन्यायाचं निराकरण. असं ठरवलं आणि मन शांत झालं. त्याचवेळी अचानक इंटरकाॅमवर वखरेसाहेब…!

“लिमये, तुमचा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड करायला आत्ताच स्टाफ डिपार्टमेंटला पाठवलाय. आता लगेचच तुम्ही व्ही. आर. एस. घेताय ही बातमी आपल्या ऑफिसमधे षटकर्णी होईल बघा… ‘ असं म्हणून ते गंमतीने हसत होते. पण.. ते ऐकून मनाला स्पर्शू पहाणारा आनंद मात्र माझ्या हातातल्या ‘त्या’ पत्राकडे लक्ष जाताच मलूल होऊन गेला..!

या पत्राबद्दल वखरे साहेबांना आत्ताच कल्पना द्यायला हवी. माझा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड होण्यापूर्वी त्यांना हे समजायलाच हवं.. ‘ मी भानावर आलो. झरकन् उठून बाहेर आलो. ‘ते’ पत्र हातात घेऊन वखरेसाहेबांच्या केबिनकडे धाव घेतली…! माझी पावलं या क्षणी प्रकाशवाटेकडे धाव घेतायत कीं मिट्ट काळोख्या अंधारवाटेकडे हे मात्र फक्त ‘त्या’लाच,… त्या कर्त्या-करवत्यालाच माहित होतं!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ आत्मनिर्भर — भाग – १ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

डॉ. ज्योती गोडबोले 

? जीवनरंग ❤️

☆ मुखवटे — भाग – १ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले 

भावनाला या ऑफिस मध्ये नोकरी मिळाल्यावर तिचा आनंद गगनात मावेना. इतके दिवस तिला एमबीए असूनही मनासारखी नोकरी मिळत नव्हती. या ऑफिसचे जॉइनिंग लेटर आल्यावर भावना मनापासूम खूषच झाली.

पहिल्या दिवशी ऑफिस मध्ये गेल्यावर शेजारच्या क्युबिकल मध्ये बसलेला हसतमुख तरुण हिला बघून बाहेर आला.

हॅलो, मी भार्गव परचुरे. तुमच्या आधी सहा महिने जॉईन झालो. वेलकम टू होरायझन कंपनी.

आपल्याएवढाच असलेला हा हसतमुख तरुण बघून भावनाला हायसं झालं. त्याने सगळ्या स्टाफशी तिची ओळख करून दिली.

हे तुमचं टेबल. त्याने तिला तिचं टेबल दाखवलं आणि तो कामाला निघून गेला.

भावना मध्यमवर्गीय चौकोनी कुटुंबातली मुलगी. चार खोल्यांचा साधासुधा फ्लॅट आणि आईवडील भाऊ आणि ही असं कुटुंब.

भावना दिसायला सुरेख स्मार्ट तर होतीच. जरा महत्त्वाकांक्षी आणि उच्च रहाणीची आवड असलेली सुद्धा.

ऑफिसमध्ये भावना चार महिन्यात रुळून गेलीसुद्धा. तिची आणि भार्गवची चांगली मैत्री झाली.

अचानक ऑफिस मध्ये मुंबईहून बदलून एक स्मार्ट तरतरीत तरुण जॉईन झाला. हॅलो मी मकरंद साने.

त्याने सगळ्याना आपली ओळख करून दिली.

किती स्मार्ट होता मकरंद. किती पॉश कपडे होते त्याचे. त्याच्या परफ्यूमने ऑफिसमध्ये सुंदर गंध दरवळला.

मकरंद पण होता एमबीए. भावनाच्या पलीकडेच त्याचे टेबल होते.

आता टिफिन च्या सुट्टीत भार्गव आणि भावनाबरोबर मकरंद पण त्यांना जॉईन झाला. , मकरंदचं घर मुंबईला होतं. इथे मात्र तो एका मित्राबरोबर रूम शेअर करून रहात होता.

“मी पुण्याला कायम नाही रहाणार रे बाबा. लवकर मुंबईला जातो बघ खटपट करून. माझं स्वतःचं सुंदर घर आहे मुंबईला. मकरंद म्हणायचा.

भार्गवपेक्षा भावना पटकन आकर्षित झाली मकरंदकडे. भार्गव ला टाळून बऱ्याच वेळा ती त्याच्या मोटर सायकलच्या मागे बसून लांब लंचला जाई.

भार्गव हे निमूटपणे बघत होता.

भार्गव एकदा म्हणाला”काय भावना,, काय म्हणतोय नवा मित्र?

 बरेच वेळा दिसतेस हल्ली मकरंद बरोबर. लग्न झालंय बरं का त्याचं.

सांगितलं असेलच तुला ना. ”

“भार्गव, बरीच माहिती आहे रे तुला बाकीच्या जगाची. हो, सांगितलं आहे बरं त्याने. ”भावनाला राग आला भार्गवचा.

भार्गव हसला म्हणाला” हे बघ. ते काहीही असो. माझं प्रेम आहे तुझ्यावर. ते काही कमी होणार नाही. करतेस का लग्न माझ्याशी?

आपलं बाबा सगळं सरळसरळ असतं. मी एकुलता एक आहे.. श्रीमंत नाही पण परिस्थिती मस्त आहे आमची. जबाबदारी नाही काही. बघ. विचार कर”.

भावना म्हणाली “, काही नको. मला नाही लग्न करायचं इतक्यात. ”

भार्गव म्हणाला ओके. पण विचार करशील तेव्हा माझं नाव लक्षात असू दे म्हटलं. आपलं प्रेम आहे तुझ्यावर. ”भार्गव हसून तिथून निघून गेला.

भावनाला हसू आलं. तिला भार्गव मनापासून आवडायचा पण आता मकरंदने तिला चांगलीच भूल घातली होती.

त्या दिवशी मकरंद आणि भावना सहज लॉंग ड्राईव्हला गेले.

भावना म्हणाली, काय रे मकरंद, बायको कशी आहे तुझी?

सांगितलं नाहीस मला तिच्याबद्दल काहीही. ”

मकरंदचा चेहरा पडला. ”अग काय सांगायचं, सांगण्या सारखं काहीही नाही ग. अगदी दुर्मुखलेली आणि रडतराव आहे आमची लीना मॅडम. सतत तक्रारी.

मी म्हणून सहन करतोय बरं. पण आमचं अजिबात पटत नाही ग भावना. मला तुझ्यासारखी बायको मिळालीअसती तर किती भाग्यवान ठरलो असतो मी.

मी घटस्फोट घ्यायच्या विचारात आहे. ते सगळं झालं की करशील माझ्याशी लग्न? थांबशील ना माझ्यासाठी? ”मकरंद डोळ्यात पाणी आणून म्हणाला.

भावना म्हणाली, ते बघू नंतर. आधी म्हणतोस तसा नक्की घटस्फोट तर घे”. मकरंद म्हणाला, गेले कित्येक वर्षे माझा तिच्याशी शारीरिक संबंध पण आलेला नाही. त्याही बाबतीत सगळा उजेडच आहे लीनाच्या बाबतीत. ” 

मला तुझ्यासारखी रसिक हुशार आनंदी मुलगी हवी होती ग बायको म्हणून. ”मकरंदने सुस्कारा सोडला. भावनाला त्याच्याबद्दल मनापासून वाईट वाटलं. देव तरी कशा विजोड जोड्या जमवतो ना. तिच्या मनात आलं.

त्या दिवशी ती घरी गेली तर तिला आश्चर्याचा धक्काच बसला.

हॉलमध्ये भार्गव खुशाल तिच्या आईवडिलांशी गप्पा मारत होता.

चहा झालेला दिसत होता.

भावना आल्याबरोबर भार्गव म्हणाला “या या. तुमचीच वाट बघत होतो. आई, चहा द्या ना भावनाला. खूप काम असतं हो हल्ली आम्हाला ऑफिस मध्ये. ’ भावना ओरडून म्हणाली, तू इथं आमच्या घरी काय करतो आहेस भार्गव? ”

भावनाचे वडील म्हणाले, भावना ही काय पद्धत ग तुझी बोलायची?

सॉरी म्हण त्यांना आधी.

समोरच्या गुप्तेकाकांना त्यांचे पार्सल द्यायला आले होते हे. सहज आपलं नाव बघितलं आणि मग तुझं नाव घेऊन म्हणाले, हिच्याच ऑफिस मध्ये मी काम करतो.

आम्हीच बोलावलं त्यांना चहाला. ”

भार्गव हसत होता.

भावना अगदी ओशाळून गेली.

सॉरी हं. मला नव्हतं माहीत. ”ती नरमाईने म्हणाली. होतं असं कधीकधी भावना. भार्गव म्हणाला.

चलो बाय. भेटू पुन्हा म्हणत तो निघून गेला.

आई म्हणाली”, किती चांगला मुलगा आहे ग हा. गुप्ते काका आजारी असतात ना, त्याच्या वडिलांचे मित्र आहेत ते. हा मुलगा त्यांची औषधे न चुकता आणून देतो.

त्याला नव्हतं माहीत ग की हे तुझं घर आहे ते. ”

भावनाला अगदी गिल्टीवाटलं. सॉरी हो बाबा. चुकलंच माझं. ”

उद्या मी सॉरी म्हणेन त्याला पुन्हा. ”

त्या नंतर भावनाचे पंधरा दिवस अगदी गडबडीत गेले. वर्क लोड खूप होतं आणि मकरंद दोन आठवडे रजेवर होता. त्याचेही काम भावनालाच बघायला लागलं. हा मकरंद फोनसुद्धा का उचलत नाहीये म्हणून चिडचिड झालीच होती तिची.

त्या दिवशी लंचब्रेक मध्ये भार्गव म्हणाला, मला ऑफिसच्या कामासाठी पुढच्या आठवड्यात मुंबईला जावं लागणार आहे आपल्या हेड ऑफिसला.

भावना येतेस का तू पण मुंबईला? टाक की एक दिवस रजा.

माझं काम झालं की मस्त हिंडू. आणि आणखी एक तुला आवडेल असं काम.

ऑफिसमधून मकरंदचा पत्ता घेऊ आणि त्याला सरप्राईज म्हणून भेटून पण येऊ. आवडेल तुला? ”भार्गवने तिला आवर्जून विचारलं.

भावनाला त्याचं मनापासून कौतुक वाटलं. किती सरळ आहे हा मुलगा. माझी मकरंदशी वाढत असलेली मैत्री बघूनही हा जेलस नाही होत.

भार्गव तिला आणखीचआवडायला लागला.

“खरंच की रे भार्गव. जाऊया का आपण? येते मी तुझ्याबरोबर. मस्त आऊटिंग होईल मला बघ. आणि खरंच भेटून येऊ मकरंदला. सरप्राईज देऊ त्याला. ”भावना आनंदाने म्हणाली.

भावनाने त्या दिवशी रजा टाकली.

भार्गवला ऑफिस मुंबईला जाण्यासाठी कार देणार होतं.

मग तर काय.

भावनाला न्यायला भार्गव तिच्या घरी गेला.

भावना तयार होऊन खाली आली. “माय माय. कसली ग वंडरफुल दिसते आहेस तू या ब्लॅक टाईट्स आणि मरून टॉप मध्ये. मार्व्हलस”.

भार्गवने दिलखुलास पावती दिली.

कार मुंबईच्या दिशेने धावू लागली.

वाटेत गप्पा मारताना भावनाच्या लक्षात आलं किती हुशार आणि बहुश्रुत आहे भार्गव. इंग्लिश आणि मराठीही तो अफाट वाचतो. त्याचे जनरल नॉलेज फारच छान आहे.

नकळत तिच्या मनात आलं, मकरंद किती कमी आहे याच्यापुढे.

सिनेमाशिवाय आणि त्यांच्या गॉसिपशिवाय त्याला कशातच इंटरेस्ट नसतो. फक्त छान कपडे हॉटेलिंग आणि खरेदी यापलीकडे जग नाही मकरंदचं.

भार्गवचं ऑफीसचं काम झालं.

त्याने भावनाला एका सुंदर हॉटेल मध्ये नेलं. समुद्रकाठी असलेलं ते सुंदर हॉटेल, नारळाच्या झावळ्यानी बनवलेल्या छोट्या हट्स. आणि सुंदर जेवण. बरोबर असलेला हा उमदा हुशार तरुण. इतका आनंद आपल्याला आजपर्यंत मकरंदच्या सहवासात अनेक वेळा राहूनही मिळाला नाही असं भावनाच्या मनात आलंच. पण तरीही मकरंद ची मोहिनी काही उतरत नव्हती भावनाच्या मनावरून.

“चला. आता जायचं ना मकरंदच्या घरी? मी ऍड्रेस घेतलाय त्याचा. ” भार्गव म्हणाला.

“हो जाऊया. किती आनंद आणि आश्चर्य वाटेल ना त्याला. ’ भावना म्हणाली.

भार्गव म्हणाला “, मला बघून नाही पण तुला बघून मात्र नक्की होईल आनंद त्याला. ” भावना हसली आणि म्हणाली, “ शेवटी पुरुष ते पुरुषच. चला आता मकरंदच्या घरी.”

ड्रायव्हरने दिलेल्या पत्त्यावर बरोबर कार नेली. एका सोसायटीमध्ये रो हाऊसच्या रांगेत एका बंगल्यासमोर कार उभी राहिली. बाहेरची पाटी मात्र सांगत होती, हे कोणा कर्नल पाटणकर यांचे घर आहे. श्री व सौ पाटणकर.

– क्रमशः भाग पहिला 

© डॉ. ज्योती गोडबोले

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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