हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बचपना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बचपना ? ?

बच्चों को उठाने के लिए माँ-बाप अलार्म लगाकर सोते हैं। जल्दी उठकर बच्चों को उठाते हैं। किसीको स्कूल जाना है, किसीको कॉलेज, किसीको नौकरी पर। किसी दिन दो-चार मिनट पहले उठा दिया तो बच्चे चिड़चिड़ाते हैं। माँ-बाप मुस्कराते हैं, बचपना है, धीरे-धीरे समझेंगे।…धीरे-धीरे बच्चे ऊँचे उठते जाते हैं और खुद को ‘सेल्फमेड’ घोषित कर देते हैं।

सोचता हूँ कि माँ-बाप और परमात्मा में कितना साम्य है! जीवन में हर चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए जाग्रत और प्रवृत्त करता है ईश्वर। माँ-बाप की तरह हर बार जगाता, चाय पिलाता, नाश्ता कराता, टिफिन देता, चुनौती फ़तह कर लौटने की राह देखता है। हम फ़तह करते हैं चुनौतियाँ और खुद को ‘सेल्फमेड’ घोषित कर देते हैं।

कब समझेंगे हम? अनादिकाल से चला आ रहा बचपना आख़िर कब समाप्त होगा?

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 6:52 बजे,28.8.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधनासंपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र दी जावेगी । 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भाव भक्ति के साथ: पूजन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन

*

मातु सरस्वती पूजन कीन्हा ।

विद्या ज्ञान आप वर दीन्हा ।।

श्वेत वस्त्र पुस्तक वर धारी ।

कमल आसनी आन पधारी।।

*

मंगलकाज हुए सब जाते ।

मूढ़ मती के भाग्य जगाते।।

वीणा वादिन हंस वाहिनी ।

सप्त सुरों की आप दायिनी।।

*

कई बार अनजाने ही बहुत से ऐसे कार्य हो जाते हैं, जिनको कोई करना नहीं चाहता , सब कुछ पूर्व निर्धारित तरीके से नहीं हो सकता ।  केवल प्रयास आपके द्वारा हो ऐसा करते रहें परन्तु परिणाम क्या होगा इसकी  चिन्ता न करें । आप कर्म के अधिकारी हैं  कर्ता नहीं ।

सारे दुःख का कारण यही होता है कि हम स्वयं को कर्ता समझने की भूल कर बैठते हैं और अनजाने ही उन गलतियों के जिम्मेदार बन जाते हैं जो  की ही नहीं गयी ।

इसे इस दृष्टि से  देखें, जो होगा अच्छा होगा  इसमें ही सबका कल्याण है । हर पल को भगवान का उपहार समझते हुए आनन्द के साथ जियें और जीने दें।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७२ ☆ ललित निबंध – “हीरे की तलाश” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७२ ☆

?  ललित निबंध – हीरे की तलाश ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नर्मदा का हर कंकड़ शंकर कहा गया है तो पन्ना जिले की मिट्टी में हीरे की भौतिक तलाश की जाती है, जहां प्रकृति ने अपने अद्वितीय उपहार को छिपा रखा है। पर जीवन भौतिकता से बढ़कर जीवंत चेतना है, जो हमें एक गहन और व्यापक दृष्टिकोण देती है। यह दृष्टिकोण हमें हीरक व्यक्तित्व की तलाश करने को प्रेरित करता है , स्वयं को हीरे जैसा मूल्यवान और आभामय बनाने को प्रेरित करता है।  व्यक्ति की आंतरिक चमक, उसकी चेतना, और उसके मानवीय गुण एक अद्वितीय हीरे की तरह भीड़ में भी अलग चमकते हैं।

रत्नों में हीरे अपनी दुर्लभता और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं,  मानव जीवन में भी व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसकी आत्मा, और उसकी चेतना ऐसी ही हीरक होती है। व्यक्ति की ईमानदारी , हजार मनकों की माला में उसे अलग चमकता हीरे जैसा मनका बना कर प्रस्तुत करती है। जैसे  मिट्टी को खोदकर हीरा निकाला जाता है, वैसे ही जीवन के अनुभवों और संघर्षों के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर के हीरक गुणों को निखारता है। यह सतत प्रक्रिया है । जहां व्यक्ति अपने आंतरिक संसाधनों को पहचानता है और उन्हें निरन्तर बेहतर बनाते हुए विकसित करता है। व्यक्ति के गुरु , परिवार, समाज किसी जौहरी की भांति व्यक्ति को निरंतर जीवन पर्यंत गढ़ते रहते हैं।

हीरक व्यक्तित्व की यह तलाश हमें भीड़ के कंकडो में हीरे की खोज का  व्यापक दृष्टिकोण देती है ।  व्यक्ति को उसके समग्र स्वरूप में आकलित किया जाता हैं, न कि केवल उसके बाहरी आवरण या उपलब्धियों से। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना और सतरंगी चमक से मूल्यवान होता है, वह किस आभूषण के कैसे डब्बे में रखा गया है वह उतना महत्व नहीं रखता जितना हीरे की मौलिकता । पारखी पल भर में कृत्रिम हीरे और वास्तविक प्राकृतिक हीरे में अंतर समझ लेता है। प्रकृति कोयले को करोड़ों वर्षों के उच्च तापमान में गलाकर , भारी दबाव में दबाकर उसे हीरा बनाती है। उस कच्चे हीरे को चमकदार  रूप में तराशे जाने के लिए  जौहरी उसे काटते  छांटते हैं। वैसे ही एक व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों सहानुभूति, करुणा, साहस, और ज्ञान को तराशने  से महान बनता है। यह दृष्टिकोण हमें जीवन को  गहन और अर्थपूर्ण यात्रा के रूप में देखने को प्रेरित करता है। व्यक्ति को  हीरा बनाने में उसका परिवेश , उसके शिक्षक, उसकी परिस्थितियां अहम भूमिका निभाते हैं।

हर व्यक्ति में एक अद्वितीय हीरा छिपा होता है, जिसे पहचानने और तराशने की जरूरत होती है। जैसे  हीरा तराशने से उसकी चमक और सौंदर्य बढ़ता है, वैसे ही व्यक्ति के गुणों को विकसित करने से उसका व्यक्तित्व निखरता है। व्यक्ति अपने अनुभवों, सीखने की प्रक्रिया, और आत्म-विश्लेषण के माध्यम से अपने भीतर के आभामय हीरे को प्रकट कर सकता  है।

इस तलाश में हम पाते हैं कि जीवन एक सतत विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया है। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना से चमकता है, वैसे ही व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों और चेतना से महान बनता है। यह प्रक्रिया एक गहन आत्म अनुसंधान है।  हीरक व्यक्तित्व की तलाश एक गहन और व्यापक यात्रा है, जो हमें जीवन के हर पहलू में एक अद्वितीय सौंदर्य और अर्थ खोजने को प्रेरित करती है। यह यात्रा हमें अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानने, उन्हें विकसित करने, और जीवन को एक गहन और अर्थपूर्ण अनुभव बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। जीवन को भीड़ में कंकड़ सा खो देना है या हीरा बनाकर अमर कर दें, यह स्वयं हमारे ही हाथों तथा सोच से संभव है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८६ ⇒ बाप कमाई ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बाप कमाई ।)

?अभी अभी # ७८६ ⇒ आलेख – बाप कमाई ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुनने में भले ही आपको यह अच्छा ना लगे, बाप तक क्यों चले गए, आप भाषा को थोड़ा झाड़ पोंछ लें, इसे अपने पिताजी की खून पसीने की, मेहनत की कमाई कह लें, लेकिन इससे सच नहीं बदलने वाला, कहलाएगी वह बाप कमाई ही।

सोचिए, आप जब पैदा हुए थे, तो क्या साथ लाए थे, मां ने आपको जन्म दिया, उसका दूध पीकर तो आप पले बढ़े, कैसे उतारेंगे दूध का कर्ज़, कभी सोचा है। माता पिता के कर्ज़ से उऋण होना इतना आसान भी नहीं।।

भले ही उस जमाने में आपके पिताजी दो पैसे कमाते थे फिर भी पूरे परिवार का पेट पालते थे।

आज जितनी जनसंख्या और महंगाई तब भले ही ना हो, फिर भी परिवार आज की तुलना में अधिक बड़ा और भरा पूरा होता था। नहीं पढ़ाया आपको किसी महंगे पब्लिक स्कूल में, फिर भी संस्कार तो दिए। बड़ों का आदर सम्मान करना, उन्हें प्रणाम करना।

जो भी चीज घर में आती थी, सबको बराबरी से बांटना, आपके त्योहारों पर कपड़े लत्तों का खयाल रखना, बीमार होने पर दवा दारू की व्यवस्था करना, कमाने वाला एक, और खाने वाले दस,

फिर भी अपने से अधिक आपका ध्यान रखा, तब जाकर आप आज इस स्थिति में आ गए कि आपको यह शब्द भी चुभने लगा।।

मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं कि मैं तो आज भी बाप कमाई ही खा रहा हूं। मेरे माता पिता को गुजरे कई वर्ष गुजर गए, लेकिन जो अपार धन संपत्ति मेरे नाम कर गए हैं, वह पीढ़ियों तक खत्म नहीं होने वाली। आपको शायद भरोसा ना हो, अतः संक्षेप में उसका विस्तृत वर्णन दे रहा हूं।

मेरी माता से मुझे विरासत में संतोष धन मिला, और वह भी इतना कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। जीवन भर केवल दो साड़ियों में अपना गुजारा करने वाली मेरी मां का पेट तब तक नहीं भरता था, जब तक घर के सभी सदस्यों का भोजन ना हो जाए। सादगी ही उनका आभूषण था, लेकिन वह अपनी सभी बहू बेटियों को सजा धजा देखना चाहती थी। दूसरों की खुशी में खुश होना, और उनके दुख दर्द में उनका हाथ बंटाना उनका स्वभाव था।।

इसके बिल्कुल विपरीत मेरे पिताजी स्वभाव से ही रईस थे। संघर्षों के बीच, मेहनत पसीने के बल पर, ईमानदारी, व्यवहार कुशलता, समय की पाबंदी और दरियादिली से, हमें अभावों से उन्होंने कोसों दूर रखा। मोहल्ले का पहला रेडियो हमारे घर ही आया था, जिसकी लाइसेंस फीस पोस्ट ऑफिस में भरने वे खुद जाते थे।

घर में रिश्तेदारों और चिर परिचित लोगों का आना जाना लगातार बना रहता था। तब रिश्तेदार भी महीनों और हफ्तों रुका करते थे, घर में उत्सव सा माहौल सदा बना रहता था। लेकिन मजाल है कभी गरीबी में आटा गीला हुआ हो। आज जैसा नहीं, कि अतिथि तुम कब जाओगे।।

खुद्दारी, आत्म सम्मान और स्वाभिमान हम सबको उनसे ही विरासत में मिले हैं। माता पिता के आशीर्वाद से बड़ी कोई बाप कमाई नहीं होती। वे हमारे लिए जमीन जायदाद भले ही नहीं छोड़ गए हों लेकिन उनकी साख और पुण्याई ही हमारी कुल जमा पूंजी है, जो उनके आशीर्वाद से अक्षुण्ण और सुरक्षित है। उनकी नेकी, ईमानदारी, और समय की पाबंदी ही हमारी बाप कमाई है। आज भी इस दुनिया में हमारे जैसा कोई रईस और सुखी इंसान नहीं, क्योंकि आज भी हमारे ऊपर हमारे माता पिता का वरद हस्त है, उनका स्थान हमारे हृदय में है और उनका आचरण हमारे व्यवहार में।

माता पिता हमारे प्रथम गुरु होते हैं और पालक भी ! हमारी सभी सांसारिक, भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों में उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहता है। आप क्या सोचते हैं, उनको रूष्ट कर कभी आप ईश्वर को मना लेंगे।।

हम भी खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ ही जाएंगे, लेकिन अपनी आशीर्वाद रूपी बाप कमाई साथ लेकर जाएंगे, क्योंकि ऐसे माता पिता कहां सबको नसीब से मिलते हैं। रफी साहब एक सीधे सादे नेकदिल इंसान थे, कितनी मासूमियत से वह इतनी बड़ी बात कह गए ;

ले लो, ले लो

दुआएं मां बाप की

सर से उतरेगी

गठरी पाप की ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221 – लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय– ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपायकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221

☆ लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

आजकल हर कोई ऑनलाइन काम करता है. बैंकिंग, शॉपिंग, ईमेल, सोशल मीडिया आदि सभी काम ऑनलाइन किए जाते हैं. ऐसे में हमारी ऑनलाइन सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका पासवर्ड भी एआई से हैक हो सकता है?

जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि एआई का इस्तेमाल करके हैकर्स आपके कीबोर्ड की आवाज सुनकर आपका पासवर्ड पता लगा सकते हैं. इस तरीके को अकाउस्टिक साइड चैनल अटैक कहा जाता है.

इस अटैक में हैकर्स आपके पासवर्ड डालते समय आपके कीबोर्ड की आवाज को रिकॉर्ड करते हैं. इसके बाद वे इस आवाज को एआई से प्रोसेस करते हैं और आपके पासवर्ड का अनुमान लगाते हैं.

शोध में पाया गया है कि एआई 95% सटीकता के साथ आपके पासवर्ड का अनुमान लगा सकता है. यह बात बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि आजकल लोग बहुत ही कमजोर पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं.

अगर आप अपने पासवर्ड को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. सबसे पहले, आपको एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.

दूसरा, आपको अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.

तीसरा, आपको अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर नहीं रखना चाहिए. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.

एआई से हैकिंग से बचने के लिए कुछ उपाय

एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करें. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.

अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल न करें. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.

अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर न रखें. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.

अपने सिस्टम को हमेशा अपडेट रखें. सॉफ्टवेयर अपडेट में अक्सर सुरक्षा से जुड़े सुधार होते हैं जो आपके सिस्टम को हैकिंग से बचाने में मदद करते हैं.

अनजान लिंक पर क्लिक न करें. अनजान लिंक पर क्लिक करने से आपके सिस्टम में मैलवेयर आ सकता है जो आपके पासवर्ड को चुरा सकता है.

सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल सावधानी से करें. सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल करने से आपके पासवर्ड को चुराने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आपके पासवर्ड को एन्क्रिप्ट करना चाहिए या आपके पासवर्ड को किसी पासवर्ड मैनेजर में रखना चाहिए.

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

18-08-2023

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८५ ⇒ सोचने की आज़ादी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सोचने की आज़ादी।)

?अभी अभी # ७८५ ⇒ आलेख – सोचने की आज़ादी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारी अभिव्यक्ति हमारे सोच का ही परिणाम होती है। जो हम बोलते हैं अथवा लिखते हैं, वे या तो हमारे विचार हो सकते हैं अथवा किसी और से प्रभावित विचार। इसमें हमारी शिक्षा, संस्कार, परिवेश और लोगों की संगति भी शामिल होती है।

जितना हम सोचते हैं, क्या हम उतना व्यक्त कर पाते हैं। अभिव्यक्ति पर सबसे पहला अंकुश हमारा स्वयं का होता है। हमें सोच समझकर अपने विचार प्रकट करने पड़ते हैं। जल्दबाजी में अथवा आवेश व आक्रोश में अक्सर ऐसा कुछ हमारे द्वारा कह दिया जाता है, जिसके लिए हमें बाद में पछतावा भी हो सकता है। इसीलिए तौल मोल कर बोलने की सलाह दी जाती है।।

अभिव्यक्ति वही होती है, जो प्रकट होती है। वे ही कालांतर में शब्द, विचार, दर्शन एवं कथा, प्रवचन, भाषण अथवा उपदेश बन जाते हैं। वैसे तो बिना सोचे विचारे कुछ भी कहा अथवा लिखा नहीं जा सकता, फिर भी अगर कुछ ऐसा प्रकट हो जाता है तो वह असंतुलित, अमर्यादित अथवा ऊटपटांग की श्रेणी में आता है। होश में कही बात ही अभिव्यक्ति कहलाती है।

कई बार अभिव्यक्ति पर अंकुश लगे हैं। कुछ आरोपों प्रत्यारोपों पर मानहानि तक बात पहुंची है। कई पुस्तकें, फिल्में प्रतिबंधित हुई हैं। हमारे देश में तो आपातकाल का काला अध्याय भी लिखा जा चुका है। समझदार उसमें भी बहुत कुछ व्यक्त कर जाते हैं। आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप एक साथ प्रभावी हुई थी। विरोध न लिखकर किया जा सकता था न बोलकर। ऐसे में नईदुनिया के संपादक श्री राजेन्द्र माथुर ने संपादकीय का पन्ना खाली ही छोड़ दिया। केवल काली स्याही ही विरोध का प्रतीक बन गई। एक ऐतिहासिक अभिव्यक्ति जो जन जन तक, विरोध प्रकट करने का माध्यम बन गई।।

आज अभिव्यक्ति की आजादी अपने चरम पर है। सोशल मीडिया एवं डिजिटल इंडिया जितना मुखर आज है, इसके पहले कभी नहीं रहा। सामाजिक अन्याय, अपराध जगत और ड्रग माफिया के खिलाफ जंग और समाज में जागरूकता लाने का काम तो सनसनी, सी आई डी, सावधान इंडिया जैसे टीवी सीरियल अरसे से करते आ रहे हैं लेकिन अब तो टीवी न्यूज वाले चैनल भी 24 x 7 (कमर्शियल ब्रेक को छोड़कर) एक ही मुद्दा स्पेशल डिश की तरह परोस रहे हैं। कहीं इनका प्रभाव भी पड़ रहा है और कहीं दवाब भी। परिणाम अथवा दुष्परिणाम आपकी सोच पर आधारित है।

सोचने की आजादी अभिव्यक्ति की आज़ादी से बहुत बड़ी है, विस्तृत है, विशाल है। उस पर किसी तरह की बंदिश अथवा सेंसरशिप लगाना संभव नहीं। अगर आपका चिंतन मौलिक है तो सार्थक है और अगर केवल दूसरों के विचारों को ही अपने सोच का आधार बनाते हैं, तो मौलिक चिंतन की संभावनाएं क्षीण हो सकती हैं।।

चिंतन, मनन दो ऐसे शब्द हैं, जो गंभीर किस्म के सोच से जुड़े हुए हैं। इसमें, अभ्यास, अध्ययन और स्वाध्याय तीनों का समावेश होता है। जो परिश्रम एवं पीड़ा से प्रकट होता है, उसे सृजन कहते हैं। सृजन में पीड़ा भी है और सुख भी। ऐसा कहा जाता है, यह स्वाभाविक होता है। पुरुष मां नहीं बन सकता। लेकिन वह किसी पर प्यार लुटा सकता है, किसी पर कुर्बान तो हो सकता है।

यों तो हमारा मस्तिष्क एक वर्कशॉप की तरह रात दिन काम करता रहता है। काम भी चलता रहता है और सोच विचार भी। घर बैठे बैठे जिसके बारे में सोचा, वहीं पहुंच गए। जब कोई कहता है, कहां खो गए हैं आप, तब आप विचारों के आकाश से ज़मीन पर उतर आते हैं। जागते हुए चेतन मन, और सोते हुए अवचेतन मन को चैन कहां आराम कहां।।

हमारा सोच ही हमें इंसान बनाता है। क्या सोच भी घटिया हो सकता है ! जब हमारे विचारों पर राग, द्वेष, क्रोध, लालच, अहंकार और स्वार्थ हावी हो जाता है तो हमारी सोच भी वैसी ही हो जाती है। अतः सात्विक सोच ही हमारे विचारों पर नकेल है। कोई दूसरा आपको क्यों अनुशासित करे, क्या आप स्वयं सक्षम नहीं।

दुनिया में अच्छा बुरा सब मौजूद है। आपमें इतनी समझ आ गई कि आप गीला और सूखे कचरे में भेद करने लगे। लेकिन कभी कचरे को आपने सहेजा नहीं।

सुबह होते ही कचरा पेटी का रास्ता दिखा दिया। कुछ विचार भी कचरा हो सकते हैं उन्हें मन से बाहर निकालना होगा। सफाई मन से शुरू होती है तब मानवता तक उसकी पहुंच होती है।

अच्छी सोच, अच्छी अभिव्यक्ति। अच्छे विचार। प्रेम, मुस्कुराहट और थोड़ी करुणा का मिक्सड अचार, सुविचार। सुप्रभात !

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८४ ⇒ हिंदी डे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हिंदी डे।)

?अभी अभी # ७८४ ⇒ आलेख – हिंदी डे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पिंकी ने स्कूल से घर आते ही अपनी माँ से प्रश्न किया, माँम, ये हिंदी डे क्या होता है ! मेम् ने हिंदी डे पर हिंदी में ऐसे essay लिखने को कहा है !

बेटा, जैसे पैरेंट्स डे होता है, वैलेंटाइन्स डे होता है, वैसे ही हिंदी डे भी होता है। इस दिन हम सबको हैप्पी हिंदी डे विश करते हैं, एक दूसरे को बुके देते हैं, और हिंदी में गुड मॉर्निंग और गुड नाईट कहते हैं। ।

मॉम, यह निबंध क्या होता है ? पता नहीं बेटा ! सुना सुना सा वर्ड लगता है। उनका यह वार्तालाप मंगला, यानी उनकी काम वाली बाई सुन रही थी ! वह तुरंत बोली, निबंध को ही एस्से कहते हैं, मैंने आठवीं क्लास में हिंदी दिवस पर निबंध भी लिखा था।

पिंकी एकाएक चहक उठी !

मॉम ! हिंदी में essay तो मंगला ही लिख देगी। इसको हिंदी भी अच्छी आती है ! मंगला को तुरंत कार्यमुक्त कर दिया गया। मंगला आज तुम्हारी छुट्टी। पिंकी के लिए हिंदी में, क्या कहते हैं उसे, हाँ, हिंदी डे पर निबंध तुम ही लिख दो न ! तुम तो वैसे भी बड़ी फ़्लूएंट हिंदी बोलती हो, प्लीज। ।

मंगला ने अपना सारा ज्ञान, अनुभव और स्मरण-शक्ति बटोरकर हिंदी पर निबंध लिखना शुरू किया। उसे एक नई कॉपी और महँगी कलम भी उपलब्ध करा दी गई थी। मुसीबत और परिस्थिति की मारी मंगला को वैसे भी मज़बूरी में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। लेकिन पढ़ाई में उसकी रुचि कम नहीं हुई थी। वह खाली समय में अखबार के अलावा गृहशोभा और मेरी सहेली के भी पन्ने पलट लिया करती थी।

और ” हिंदी दिवस ” पर मंगला ने बड़े मनोयोग से निबंध तैयार कर ही लिया। पिंकी और उसकी मॉम बहुत खुश हुई। पिंकी ने उस निबंध की सुंदर अक्षरों में नकल कर उसे असल बना स्कूल में प्रस्तुत कर दिया।।

पिंकी के हिंदी डे के essay को स्कूल में प्रथम पुरस्कार मिला और मंगला को भी पुरस्कार-स्वरूप सौ रुपए का एक कड़क नोट और एक दिन का काम से ऑफ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ – महा-लेखनिक गजानन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख  – महा-लेखनिक गजानन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

“ॐ गं गणपतये नमो नमः”

नमस्कार पाठक गण!

विगत दिनों हमने गणपती के उत्सव का आनंद मेला मनाया| अच्छे खासे दसों दिनों तक बाल गणेश के आगमन का यह उत्सव हम बड़े ही लाड़ प्यार, अनुराग और धूम धाम से मनाते हैं| क्या रौनक, क्या भक्ति गीत, क्या मोदक और लड्डू खिलाए जाते हैं उन्हें सुबह-शाम! लक्ष्य बस एक ही है! बुद्धि के देवता गजानन को प्रसन्न करना! उनके समक्ष एक ही प्रार्थना होती है, सद्बुद्धि का सदुपयोग करते हुए जग में जो भी मंगल है, वह हमारे जीवन में प्रवेश कर उसे समृद्धि प्रदान करे!  हमें पूर्ण विश्वास है कि चौंसठ कलाओं के दाता गणेश जी यह वरदान देकर हमें अनुग्रहित करेंगे! हम जानते हैं कि हमारा परम प्रिय गजवदन प्रत्यक्ष बुद्धि का देव है| परन्तु एक वक्त उसे लेखनिक होना पड़ा, यानि इसका अर्थ यह हुआ कि इस बुद्धिजीवी को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा निर्देशित स्क्रिप्ट को, प्राचीन पद्धति से, संभवतः ताड पत्र पर लिखना पड़ा था। समग्र देव देवताओं द्वारा अग्रमानांकित गणेश को यह करने के लिए बाध्य करने वाले कोई और नहीं, बल्कि महर्षि वेद व्यास ही थे। वैसे भी ऋषियों का अनुरोध देवताओं के लिए आदेश ही होता था।

हुआ यूँ कि महर्षि वेदव्यास अपने समग्र जीवन के मधुर-कटु अनुभवों को एक महाकाव्य के रूप में रचना चाहते थे। उन्होंने उसका नाम ‘जय संहिता’ रखा। (हालाँकि, इस ग्रंथ के पूर्ण होने के बाद इसका नाम बदलकर ‘महाभारत’ कर दिया गया।) जब वेदव्यास ने इतने अति विस्तृत महाकाव्य रचने का बीड़ा उठाया, तो उन्हें अपनी सीमित क्षमता का एहसास हुआ। वे सोचने लगे, “मैं सोचते-सोचते एक श्लोक लिखूँगा! फिर दूसरा श्लोक… हे भगवन! अगर मैंने अपनी सारी ऊर्जा लिखने में ही लगा दी, तो अगला श्लोक लिखने की शक्ति कहाँ से लाऊँगा?” ऐसी दुविधा में फंसे व्यास मुनि ब्रह्मा जी से प्रार्थना करने लगे, “हे सृष्टिकर्ता, क्या कोई ऐसा है जो मेरे श्लोकों का उच्चारण करने के तुरंत बाद उन्हें लिख सके? कृपया मेरे महाकाव्य को पूर्ण करने के लिए किसी कुशल लेखनिक की व्यवस्था करें।” अब ब्रह्मा, जिन्हें वेदव्यास की बुद्धिमत्ता का पूरा अंदाज़ा था, सोच में पड़ गए। उनके पास सभी देवताओं का बायोडाटा था ही। उन्होंने वेदव्यास को आदेश दिया, “मुझे विश्वास है कि कैलाश पर्वत पर बसे शिव और पार्वती के पुत्र गणेश आपका कार्य संपन्न करेंगे। आप उनसे अनुरोध करें।”  

ब्रह्मदेव की आज्ञा के अनुसार व्यास मुनी ने गजानन की आराधना प्रारम्भ की| उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए श्री गणेश ने प्रकट होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिए| तब महर्षि व्यास ने श्री गणेश से अपनी इच्छा व्यक्त की। व्यास की यह प्रार्थना सुनकर गणेश ने उनके समक्ष एक शर्त रखी। “जब मैं लिखने बैठूँ, तो मैं चाहता हूँ कि आप जो भी बताएं, वह बिना किसी रूकावट के बताएं, उसमें एकरूपता हो। मैं बीच में कोई विराम नहीं लेना चाहता। अन्यथा, मेरी एकाग्रता भंग हो जाएगी और फिर मैं चला वापस कैलाश को! ” बड़े प्रयासों से जिस उद्दिष्ट को साध्य किया था उस महा लेखनिक की शर्त को स्वीकार करने के अलावा व्यास जी के पास कोई विकल्प नहीं था| अब शर्त रखने की बारी वेद व्यास की थी। उन्होंने कहा, “हे गणेश जी! मेरी भी आपसे एक शर्त है कि आप श्लोक को पूरी तरह समझे बिना न लिखें, अर्थात श्लोक का अर्थ पूरी तरह समझ लेने के बाद ही लिखें।” (मित्रों, देखिये, आजकल के विद्यार्थियों को बिना दिमाग लगाए नोट्स लेने की आदत है। उनके लिए यह कितना प्राचीन उपाय है|) गणेश जी द्वारा रखी गई यह शर्त स्वीकार करने के बाद व्यास जी के श्लोकों का पाठ और गणेश जी का लेखन कार्य बड़ी तेजी से शुरू हो गया। व्यास जी को जल्द ही अनुभूति हो गई कि गणेश जी को सारे श्लोक समझने के लिए कुछ ही क्षण काफ़ी हैं। अब व्यास जी ने अपने श्लोकों को और जटिल बनाना शुरू कर दिया। बीच-बीच में वे गणेश जी के सामने पहेलियाँ भी रखते थे। गणेश जी को ये बातें समझने में थोड़ा ज़्यादा समय लगता था और उस दौरान व्यास जी अगले श्लोकों पर मनन करते थे। इस प्रकार एक लाख से भी अधिक श्लोकों वाले इस महाभारत नामक महाकाव्य की रचना हुई। इसीलिए कहा जाता है कि जो महाभारत में है, वहीं और सिर्फ वहीं इस संसार में भी है। क्यों भला? वेद व्यास के विराट ज्ञान भंडार, बुद्धिमत्ता, प्रज्ञा और अनुभवों के कथन को ज्ञान के दाता गणेश ने उनकी कलम के रूप में आशीर्वाद जो दिया था! 

मित्रों, आज भी भारत के उत्तराखंड राज्य में बद्रीनाथ शहर के पास माणा गाँव में गणेश गुफा और व्यास गुफा स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि व्यास गुफा वही गुफा है जहाँ महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी। इस गुफा के पास ही गणेश गुफा है जहाँ, भगवान गणेश ने व्यास के कहने पर महाकाव्य महाभारत का लेखन किया था।

मैं विघ्नहर्ता श्री गजानन और महाकवि महर्षि वेद व्यास दोनों के चरणों में नम्रतापूर्वक नमन करती हूँ!

टिप्पणी  – गणेश जी को अर्पित इस भक्तिरस पूर्ण रचना का आनंद लीजिये| 

गणेश पंचरत्नम | वंदे गुरु परम्परा |    रचना- आदि शंकराचार्य

गायक सूर्यगायत्री और कुलदीप एम पै, संगीत- रचना- कुलदीप एम पै

© डॉ. मीना श्रीवास्तव

ठाणे 

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – drmeenashrivastava21@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४७ – देश-परदेश – International Sudoku Day: 9th September ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४७ ☆ देश-परदेश – International Sudoku Day: 9th September ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे बचपन में ये “पहेली” हल करने वाली किताबें या पत्रिकाएं नहीं हुआ करती थी। घर के बुजुर्ग अवश्य गणित, सामाजिक और व्यवहारिक विषयों पर पहेलियां बुझाते थे।

शेर, बकरी और घास को नाव में कैसे ले जा सकते हैं, जैसी समस्या का समाधान बताना पड़ता था। हरी थी, मन भरी थी, राजा जी के बाग में दुशाला लिए खड़ी थी। कौन सी वस्तु है ? मक्का या भुट्टा इसका उत्तर देना पड़ता था।

दस सेब को छह लोगों में कैसे बराबर बांट सकते है, जैसे प्रश्न पूछ कर गणित जैसे जटिल विषय की परख की जाती थी। ये सुडोकू द्वारा गणित विषय की बुद्धिमता का पैमाना तो अस्सी के दशक के आरम्भ हुआ था।

आज वर्ष के नौवें माह की नौवीं तारीख़ है, इसीलिए सुडोकू जिस को भी 9 x 9 के कॉलम में खेला जाता हैं। इसीलिए आज के दिन ही जापान में ये खेलना आरंभ हुआ था।

इस खेल में पेंसिल और रबर की आवश्यकता भी होती हैं। अंक या शब्द लिखते समय गलती को सुधारा जा सकें। समाचार पत्र में प्रतिदिन सुडोकू खेलने के लिए ही अनेक लोग पेपर खरीदते हैं, वर्ना उनको पेपर से कोई लेना देना नहीं होता हैं। अब तो मोबाइल में भी सुडोकू उपलब्ध हैं। शब्द ज्ञान में वृद्धि करने के लिए ” वर्डकू” खेला जा सकता हैं। अंग्रेज़ी के अलावा स्थानीय भाषा में भी खूब खेला जाता हैं।

मानसिक एकाग्रता बढ़ाने के लिए बहुत अच्छा खेल है। आप अकेले ही खेलते हैं, कोई साथी की आवश्यकता नहीं होती हैं। विगत कुछ वर्षों से सोशल मीडिया के बुखार के कारण, इस खेल से लोग दूरी बना लेते हैं। बॉलीवुड के सितारे और क्रिकेट के खिलाड़ी भी इसका प्रचार नहीं करते हैं। वर्तमान में लोग चंचलता को अधिक तरजीह देते हैं। व्हाट्स ऐप और ऐ आई के फर्जी वीडियो देखने का नशा जो परवान चढ़ चुका है।

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© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०६ – मेरी भाषा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०६ ☆ मेरी भाषा… ?

14 सितम्बर अर्थात हिन्दी दिवस। विभिन्न सरकारी कार्यालयों में हिन्दी पखवाड़ा मनाया भी जा रहा है।

वस्तुत: भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। कूटनीति का एक सूत्र कहता है कि किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भाँति समझा और संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएँ लादने की कोशिश की।

असली मुद्दा स्वाधीनता के बाद का है। राष्ट्रभाषा को स्थान दिए बिना राष्ट्र के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने की  प्रवृत्ति के परिणाम भी विस्फोटक रहे हैं।

यूरोपीय भाषा समूह के प्रयोग से ‘कॉन्वेंट एजुकेटेड’ पीढ़ी, भारतीय भाषा समूह के अनेक  अक्षरों का उच्चारण नहीं कर पाती। ‘ड़’, ‘ण’  अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। ‘पूर्ण’, पूर्न हो चला है, ‘शर्म ’ और ‘श्रम’ में एकाकार हो गया है। हृस्व और दीर्घ मात्राओं के अंतर का निरंतर होता क्षय, अर्थ का अनर्थ कर रहा है। ‘लुटना’ और ‘लूटना’ एक ही हो गये हैं। विदेशियों द्वारा की गई ‘लूट’ को ‘लुटना’ मानकर हम अपनी लुटिया डुबोने में अभिभूत हो रहे हैं।

लिपि नये संकट से गुजर रही है। इंटरनेट खास तौर पर फेसबुक, एक्स, वॉट्सएप, इंस्टाग्राम पर अनेक लोग देवनागरी के बजाय रोमन में हिन्दी लिखते हैं। ‘बड़बड़’ के लिए barbar/ badbad  (बर्बर या बारबर या बार-बार) लिखा जा रहा है। ‘करता’, ‘कराता’, ‘कर्ता’ में फर्क कर पाना भी संभव नहीं रहा है। जैसे-जैसे पीढ़ी पेपरलेस हो रही है, स्क्रिप्टलेस भी होती जा रही है।

संसर्गजन्य संवेदनहीनता, थोथे दंभवाला कृत्रिम मनुष्य तैयार कर रही है। कृत्रिमता की  पराकाष्ठा है कि मातृभाषा या हिन्दी न बोल पाने पर व्यक्ति संकोच अनुभव नहीं करता पर अंग्रेजी न जानने पर उसकी आँखें स्वयंमेव नीची हो जाती हैं। शर्म से गड़ी इन आँखों को देखकर मैकाले और उसके वैचारिक वंशजों की आँखों में विजय के अभिमान का जो भाव उठता होगा, ग्यारह अक्षौहिणी सेना को परास्त कर वैसा भाव पांडवों की आँखों में भी न उठा होगा।

हिन्दी पखवाड़ा, सप्ताह या दिवस मना लेने भर से हिंदी के प्रति भारतीय नागरिक के कर्तव्य  की इतिश्री नहीं हो जाती। आवश्यक है कि नागरिक अपने भाषाई अधिकार के प्रति जागरुक हों। समय की मांग है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ एकसाथ आएँ।

बीते सात दशकों में पहली बार भाषा नीति को लेकर  वर्तमान केंद्र सरकार संवेदनशील और सक्रिय दिखाई दे रही है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता, भारत और भारतीयता के पक्ष में स्वयं प्रधानमंत्री ने पहल की है। नयी शिक्षा नीति में भारत सरकार ने पहली बार प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने को प्रधानता दी है। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय भाषाओं का प्रवेश हो चुका है,  यह सराहनीय है।

केदारनाथ सिंह जी की प्रसिद्ध कविता है, जिसमें वे कहते हैं,

जैसे चींटियाँ लौटती हैं/ बिलों में,

कठफोड़वा लौटता है/ काठ के पास,

वायुयान लौटते हैं/ एक के बाद एक,

लाल आसमान में डैने पसारे हुए/

हवाई-अड्डे की ओर/

ओ मेरी भाषा/ मैं लौटता हूँ तुम में,

जब चुप रहते-रहते/

अकड़ जाती है मेरी जीभ/

दुखने लगती है/ मेरी आत्मा..!

अपनी भाषाओं के अरुणोदय की संभावनाएँ तो बन रही हैं। नागरिकों से अपेक्षित है कि वे इस अरुण की रश्मियाँ बनें।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्री गणेश साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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