हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९१ ⇒ कर्नाटक संगीत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कर्नाटक संगीत।)

?अभी अभी # ७९१ ⇒ आलेख – कर्नाटक संगीत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या यह शीर्षक कुछ कुछ राग दरबारी जैसा नहीं ! जब किसी ने मुझे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी तो पहले मुझे अपने आप पर हँसी आई, जिसे शास्त्रीय संगीत का सा रे ग म नहीं मालूम, उसे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी जा रही है। लेकिन जब राग दरबारी पढ़नी शुरू की, तो पता चला, व्यंग्य की भी सरगम होती है, कभी खुशी, कभी गम होती है।

कर्नाटक संगीत के साथ ऐसा नहीं ! यह किसी उपन्यास का नाम नहीं। सभी जानते हैं, कर्नाटक एक प्रदश है, जिसकी भाषा कन्नड़ है और जहां कावेरी नदी के जल को लेकर तमिलनाडु से अक्सर विवाद चलता रहता है। कर्नाटक की दो विधाएं महत्वपूर्ण हैं एक नाटक और संगीत। जहां शीर्षक ही कर्नाटक हो, वहां नाटक ना हो, यह संभव नहीं। संगीत की तरह नाटक भी एक विधा है जिसके लिए कर्नाटक जाना जाता है। फिर चाहे वह नाटक थियेटर का हो अथवा राजनीतिक। ।

जब भी देश में कहीं राजनीतिक उथल पुथल हुई है, दलबदल हुआ है, किसी प्रदेश के लोकतंत्र के सेवकों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी है, विधायकों को किसी सुदूर, गुप्त स्थान पर नजरबंद किया गया है। न जाने क्यों, इस सियासी नाटक के लिए बेंगलुरु एक सुरक्षित स्थान माना गया है। विश्वास अथवा अविश्वास के मत के दौरान ही देश के ये भावी कर्णधार अचानक अज्ञातवास से प्रकट हो जाते हैं, और लोकतंत्र की रक्षा कर उसे और मजबूत कर देते हैं।

एक कुशल अभिनेता और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड का नाम किसने नहीं सुना। वे कर्नाटक के ही नहीं, पूरे नाट्य जगत के गौरव रहे हैं। गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक का सभी भाषाओं में सफलतापूर्वक मंचन ही नहीं हुआ, इस नाटक पर उन्हें संगीत नाट्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। लोक नाट्य और लोक संगीत में हमारी सभ्यता और संस्कृति रची बसी है। नाटक और संगीत के बिना जीवन नीरस है। ।

कर्नाटक संगीत और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत समानता है, क्योंकि जहां सरगम है, वहीं संगीत है। संगीत गायन भी है और वादन भी। एक हिंदी फिल्म आई थी मोहरा। जिसका एक गीत बहुत मशहूर हुआ था। तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ! बोल कुछ अटपटे, फूहड़ से लगे थे लेकिन चूंकि यह गीत राग भीम पलासी पर आधारित था, इसलिए खूब चला। इसके बीच के आलाप में आपको कर्नाटक गायन शैली साफ नजर आती है। जो हमारे लिए राग यमन है वह कर्नाटक संगीत में कल्याणी है।

अगर आपने फिल्म पड़ोसन के गीत और संगीत पर ध्यान दिया होगा तो यह उत्तर और दक्षिण के संगीत का एक दुर्लभ फ्यूजन है।

लता का गीत शर्म आती है मगर, अभोगी की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति है। राग हंस ध्वनि कर्नाटक शैली का ही राग है।

जा तो से नहीं बोलूं कन्हैया।

राह चलत पकड़ी मोरी बैंया। ।

एक और कमाल।

कहते हैं, संगीत गंधर्व लोक की देन है। कर्नाटक के धारवाड़ जिले में जन्मे शिवपुत्र सिद्धारमय्या कोमकली मठ, जिन्हें हम कुमार गंधर्व के नाम से जानते हैं, इस कथन की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं। कर्नाटक शैली के इस गायक ने देवास की माता चामुण्डा देवी की शरण में अपनी संगीत साधना की धूनी ऐसी जमाई कि फिर वापस कर्नाटक जाने का नाम नहीं लिया। भीमसेन जोशी के अभंग से हटकर कबीर के भजनों को मालवी लोकगीतों

की शैली में, अध्यात्म को अपने सुरों में पिरोने का को काम कुमार गंधर्व ने किया वह शास्त्रीय संगीत की अमूल्य धरोहर है। ।

कृष्णा कावेरी का जल जिस तरह कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु की ही नहीं, जन जन की प्यास बुझाती है। हमने देश, प्रदेश ही नहीं, नदी पहाड़ों को भी बांट दिया। कहीं हवा और पानी का भी बंटवारा किया जाता है। कर्नाटक, नाटक और संगीत ही नहीं, अब तो आई टी सेक्टर में भी कमाल दिखा रहा है। नाटक हो या संगीत, हम कैसे भूलें कर्नाटक और वहां के नाट्य पुरुष गिरीश कर्नाड और सवाई कुमार गंधर्व के संगीत और गायन के क्षेत्र में उनके योगदान को। कुमार जी के ही शब्दों में ;

अवधूता, गगन घटा गहराई ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७३ ☆ आलेख – “महात्मा गांधी और नवरात्रि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७३ ☆

?  आलेख – महात्मा गांधी और नवरात्रि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हमारी संस्कृति में वर्ष में दो बार नवरात्रि वह सुअवसर होता है जब हम अपना मन तन का कंप्यूटर रिफ्रेश और रिफ्रेगमेंट कर लेते हैं।

नवरात्र पर्व व्रत आत्मसंयम, पूजा साधना, और धार्मिक अनुष्ठान का पर्व होता है। दशहरे पर रावण दहन बुराइयों के अंत करने के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

समाज यह सत्य याद रखे इसलिए हर साल सार्वजनिक रूप से रावण जलाया जाता है। गुजरात में गरबा नृत्य के उत्सव होते हैं।

गांधीजी ने कभी “नवरात्रि व्रत” को धार्मिक पारंपरिक रूप से  नहीं किया, पर वे राजनीती में सदैव अनशन और उपवास की ताकत से ही विजय प्राप्त करते रहे।

उनके जीवन में व्रत, त्याग और त्योहारों के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रहा है।

गांधीजी ने अपने आत्मअनुशासन के प्रयोगों में व्रत को महत्वपूर्ण भूमिका दी। उनकी “आत्मकथा, सत्य के प्रयोग” (The Story of My Experiments with Truth) में वर्णन है कि किशोरावस्था में माँ से प्रेरणा लेकर वैष्णव और शिव व्रतों का पालन किया करते थे। ज्यों ज्यों उनकी समझ विकसित हुई व्रत उनके लिए सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का माध्यम बन गया।

उनके व्रतों की सूची बताती है कि उन्होंने राजनीतिक अथवा सामाजिक कारणों से अनेक लंबे अवधि के उपवास किए। चौरी चौरा घटना के बाद हिंसा की निंदा के लिए, हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक उथल-पुथल के समय शांति बहाल करने के लिए, अस्पृश्यता के खिलाफ व अन्य अनेक अवसरों पर गांधी जी ने उपवास को ही अपना अस्त्र बनाया। गांधी की विचारधारा में यह द्वंद्व नहीं कि व्रत धर्म से बाहर हो बल्कि उन्होंने व्रत के  धार्मिक और नैतिक आयाम को स्वीकार किया उसे महत्व दिया। ऐसा कोई इतिहास नहीं  कि गांधीजी ने विशेष रूप से नवरात्रि व्रत को राजनीतिक या सार्वजनिक रूप से मनाया हो। त्यौहारों में भाषण देना या धार्मिक आयोजनों का नेतृत्व करना उनकी फितरत में नहीं था।

इतिहास मिलता है कि लंदन में भारतीय समुदाय के एक दशहरा उत्सव आयोजन में, जहाँ गांधी जी और विनायक दामोदर सावरकर को “दशहरा समारोह” का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिला, उस अवसर पर गांधी ने भगवान राम की अहिंसात्मक भूमिका की चर्चा की थी और उन्होंने यह शर्त रखी कि भाषणों में राजनीतिक प्रचार न हो। इस प्रकार दशहरा के धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में भी गांधी जी की उपस्थिति अधर्म पर धर्म की विजय के प्रवक्ता रूप में मिलती है।

उन्होंने  त्याग, सत्य, अहिंसा, आत्म नियंत्र के जो मूल्य दिए वे भारतीय संस्कृति से ही प्रेरित थे।

गांधी जी ने नवरात्रि व्रत या दशहरा उत्सव को पारम्परिक भक्तिपूर्ण तरीके से प्रमुखता नहीं दी, परन्तु उनके द्वारा स्वयं को  आत्म शुद्धि और सामाजिक लक्ष्य से जोड़ने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई उसमें यही नवरात्रि दशहरा जैसे पर्वों की पारंपरिक साधना है। यदि गांधी के सिद्धांतों का अनुकरण किया जाए तो त्याग, संयम, अहिंसा, सभी के लिए समान भाव से दशहरा, नवरात्रि पर्व मनाया जाए तो वह गांधी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४२ – छाया रूपेण संस्थिता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका आलेख “छाया रूपेण संस्थिता ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४२ ☆

🌻आलेख 🚩छाया रूपेण संस्थिता 🚩

सदियो से चली आ रही— वह दुर्गा की छाया ही तो है। माँ, कन्या, बहन, बेटी, बहु, अर्धांगिनी, स्वामिनी, दासी, सेविका, तत सम भाव रुप और ममता बदलते हुये।

जगह- जगह देवी कहलाने का अधिकार क्या ? सिर्फ नवरात्रे पर ही होती है। वात्सल्य, ममता को आँचल में छिपाये, वंश को पल्लवित करते, अपार नेह बरसाते, आशीष देते वह छाया ही तो है।

कभी शैलपुत्री, ब्रम्ह चारणी, चन्द्र घंटे, कुष्मांडा, स्कंध, कात्यायनी, कालरात्रि, दुर्गा, सिद्धिदात्री सभी रुप गुणों में पूजी जाती है।

स्व और समाज की प्रवृति से चंचला– आज भामिनी से भोगिता, भोगिनी की ओर बढ़ते – छाया रूपेण संस्थिता की श्रेष्ठता- श्रद्धा दोनों खंडन- खंडित, मूरत दर्शिता की भावना रंजित होते चली जा रही है।

या देवी सर्व भूतेशु श्रद्धा रूपेण संस्थिता को पावन करें जगदंबिका।

माँ के नवरात्रे पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४८ – देश-परदेश – न्याय व्यथा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४८ ☆ देश-परदेश – न्याय व्यथा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आप पूरे भारत के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाएंगे वहां बहुत सारे गाड़ियां सड़ती हुई आपको मिलेंगी…

यह गाड़ियां पूरी तरह से सड़ जाती हैं और एक अनुमान के मुताबिक भारत को हर साल लगभग 20000 करोड रुपए का नुकसान हो जाता है।

ब्रिटिश पार्लियामेंट में 1872 में ब्रिटिश एविडेंस एक्ट 1872 पारित किया था इसके अनुसार अपराधी के पास बरामद सारी चीजें एविडेंस के तौर पर पेश की जाएंगी और उन्हें सुरक्षित रखा जाएगा और उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा।

1872 में तो साईकिल का भी अविष्कार नहीं हुआ था फिर जब यही कानून ब्रिटिश सरकार ने भारत पर लागू कर दिया फिर यह भारतीय एविडेंस एक्ट 1872 बन गया था।

यानी यदि कोई अपराधी अपराध किया है फिर उसे पकड़ा जाता है तो वो जिस गाड़ी में होगा उस गाड़ी को भी एविडेंस बना लिया जाता है या किसी गाड़ी में अपराध हुआ है तो उसे भी एविडेंस एक्ट के तहत जप्त कर लिया जाता है या फिर दो गाड़ियों का एक्सीडेंट हुआ है तब दोनों गाड़ियों को एविडेंस एक्ट में जप्त कर लिया जाता है।

आश्चर्य होता है, किसी भी सरकारी वाहनों को इनसे मुक्त क्यों रखा गया है ? अगर ट्रेन में अपराध होता है तो आज तक नहीं देखा की पुलिस पूरी ट्रेन को जप्त कर के थाने में खड़ा की हो या किसी सरकारी बस में कोई अपराध हुआ हो या सरकारी बस या विमान में कोई मुजरिम पकड़ा गया हो तो पुलिस ने एविडेंस एक्ट के तहत सरकारी बस या विमान को उठाकर थाने में रखा हो।

और यह जितने भी वाहन पकड़े जाते हैं यह जब तक केस का फाइनल फैसला नहीं आ जाता तब तक थाने में पड़े रहते हैं और गर्मी बारिश सब झेलते हैं।

आपको तो पता ही है कि भारत में 50 से 60 साल मुकदमे की सुनवाई में लग जाती है तब तक यह वाहन पूरी तरह से सड़ जाते हैं और जब केस का निपटारा हो जाता है। तब यह वाहन कबाड़ तो छोड़िए सड़कर  जंग बन जाते हैं

सरकार ने एक बार कहा था कि हमने ब्रिटिश जमाने से चले आ रहे बहुत से कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन अब इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 में भी बदलाव करने की जरूरत है।

सोचिए कि एक वाहन बनाने में कितने घंटे की मजदूरी कितनी पावर कितना कच्चा माल लगा होगा और वह सब कुछ सड़ जाता है किसी के काम नहीं आता…!!

विचार करने वाली बात ये है, कि ये गाड़ियां किस काम आया ना पब्लिक के ना सरकार के… पूरा व्यर्थ हो जाता है..!

राष्ट्रीय क्षति और सीमित संसाधनों का खुले आम दुरुपयोग भी कहा जा सकता हैं। पुलिस स्टेशन के आसपास   कचरे के ढेर के सामान पड़ी हुई बाइक, कारें, ट्रक आदि से कीड़े पतंगे भी पैदा होते है। थाने में कार्यरत पुलिस वालों को तो मच्छर काटते ही है, वहां शिकायत करने जा रहे लोगों को भी मच्छर नहीं छोड़ते हैं।

यदि कुत्तों के मामले से फुर्सत हो गया हो, तो इस मामले में भी संज्ञान ले सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९० ⇒ छत्तीस का आंकड़ा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छत्तीस का आंकड़ा।)

?अभी अभी # ७९० ⇒ आलेख – छत्तीस का आंकड़ा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शुभ अशुभ की दुनिया में हमने आंकड़ों को भी नहीं छोड़ा। शादी की पत्रिका में जब गुण मिलाए जाते हैं तो बत्तीस शुभ माने जाते हैं और अगर यही गुण 36 हो गए तो समझिए पति पत्नी के बीच छत्तीस का आंकड़ा। भारतीय दंड संहिता में धोखाधड़ी और और बेईमानी की एक धारा है, 420 .इसी से शब्द बन गया है चार सौ बीसी। महान राजकपूर ने इसके आगे भी श्री लगाकर इन्हें श्री 420 बना दिया। नौ और दो ग्यारह होते हैं, लेकिन यहां तो हमने लोगों को भी, रायता फैलाने के बाद, नौ दो ग्यारह होते देखा है।

परीक्षा में कभी 33 % पर छात्र को उत्तीर्ण घोषित किया जाता था। अगर किसी को छत्तीस प्रतिशत अंक आ गए, तो समझो बेड़ा पार। शादी के लिफाफे में कभी ग्यारह, ५१, और 101 रुपए का रिवाज था। सिद्ध महात्माओं और जगतगुरू के आगे केवल 108 लगाने से काम नहीं चलता, श्री श्री 1008 लगाना ही पड़ता है।।

मालवा के बारे में एक कहावत है, “मालव धरती गहन गंभीर, पग पग रोटी, डग डग नीर “।

प्रदेश का प्रमुख शहर इंदौर कभी मुंबई का बच्चा कहलाता था। यहां एक नहीं, छः छः टेक्सटाइल मिल्स थी, जो मजदूरों की रोजी रोटी का प्रमुख साधन था। शहर में तब नर्मदा नहीं थी, लेकिन एक नहीं चार चार तालाब थे, यशवंत सागर, पिपल्या पाला, सिरपुर और बिलावली। लेकिन केवल यशवंत सागर ही इतना सक्षम था, कि पूरे नगर की प्यास बुझा दे। सब तरफ हरियाली थी और कभी यहां नौलखा यानी एक ही इलाके में नौ लाख पेड़ थे।

मानसून इस शहर पर हमेशा मेहरबान रहा है। कभी 36 तो कभी 56 बस, इसी के बीच, यहां का औसत बारिश का आंकड़ा रहा है। कालांतर में कपड़ा मिले बंद जरूर हुई लेकिन शहर का विकास नहीं रुका। तीन चरणों में नर्मदा मैया के चरण इस अहिल्या की नगरी पर पड़े और उसके बाद इस शहर का मानो कायाकल्प हो गया।।

आज यह महानगर स्मार्ट सिटी बनने जा रहा है। जिस शहर में कभी टेम्पो चला करते थे, अब वहां के लोग मेट्रो में सफर करेंगे। भाग तो सभी के जागे हैं लेकिन पानी की समस्या कम होने के बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। अप्रैल माह से ही बस्तियों में और सुदूर बहुमंजिला आवासीय परिसरों में पानी के टैंकर दौड़ने लग जाते हैं।

कल जहां खेत और गांव थे आज वहां कॉलोनियां बस गई हैं। ना तू जमी के लिए है और ना आसमान के लिए तेरा वजूद है सिर्फ 2BHK और 3 BHK के लिए। इस बार बारिश का आंकड़ा 36 इंच भी पार नहीं कर पाया है। आसमान से बारिश होती है, पानी जमीन में नहीं जाता सड़कों पर ही जमा हो जाता है। हमारा काम भी अब 36 इंच बारिश से नहीं। इंद्र सुनें और योग्य कार्यवाही करें। हम तो सिर्फ यह प्रार्थना ही कर सकते हैं ;

अल्लाह मेघ दे, पानी दे, छाया दे रे रामा मेघ दे श्यामा मेघ दे

अल्लाह मेघ दे, पानी दे, छाया दे रे रामा मेघ दे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०७ – श्राद्ध पक्ष के निमित्त ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ श्राद्ध पक्ष के निमित्त… ?

पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक श्राद्धपक्ष चलता है। इसका भावपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और कर्तव्य का निर्वहन है। व्यवहार पक्ष देखें तो पितरों को  खीर, पूड़ी व मिष्ठान का भोग इसे तृप्तिपर्व का रूप देता है। जगत के रंगमंच के पार्श्व में जा चुकी आत्माओं की तृप्ति के लिए स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म को भोज देना लोकातीत एकात्मता है। ऐसी सदाशय व उत्तुंग अलौकिकता भारतीय दर्शन में ही संभव है। यूँ भी सनातन परंपरा में प्रेत से  प्रिय का अतिरेक अभिप्रेरित है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने की ऐसी परंपरा वाला श्राद्धपक्ष संभवत: विश्व का एकमात्र अनुष्ठान है।

इस अनुष्ठान के निमित्त प्राय: हम संबंधित तिथि को संबंधित दिवंगत का श्राद्ध कर इति कर लेते हैं। अधिकांशत: सभी अपने घर में पूर्वजों के फोटो लगाते हैं। नियमित रूप से दीया-बाती भी करते हैं।

दैहिक रूप से अपने माता-पिता या पूर्वजों का अंश होने के नाते उनके प्रति श्रद्धावनत होना सहज है। यह भी स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने दिवंगत परिजन के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उनके गुणों का स्मरण करे। प्रश्न है कि क्या हम दिवंगत के गुणों में से किसी एक या दो को आत्मसात कर पाते हैं?

बहुधा सुनने को मिलता है कि मेरी माँ परिश्रमी थी पर मैं बहुत आलसी हूँ।…क्या शेष जीवन यही कहकर बीतेगा या दिवंगत के परिश्रम को अपनाकर उन्हें चैतन्य रखने में अपनी भूमिका निभाई जाएगी?… मेरे पिता समय का पालन करते थे, वह पंक्चुअल थे।…इधर सवारी किसी को दिये समय से आधे घंटे बाद घर से निकलती है। विदेह स्वरूप में पिता की स्मृति को जीवंत रखने के लिए क्या किया? कहा गया है,

यद्यष्टाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो: जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी का अनुसरण करते हैं। भावार्थ है कि अपने पूर्वजों के गुणों को अपनाना, उनके श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

विधि विधान और लोकाचार से पूर्वजों का श्राद्ध करते हुए अपने पूर्वजों के गुणों को आत्मसात करने का संकल्प भी अवश्य लें। पूर्वजों की आत्मा को इससे सच्चा आनंद प्राप्त होगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८९ ⇒ विवेक के पन्ने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विवेक के पन्ने।)

?अभी अभी # ७८९ ⇒ आलेख – विवेक के पन्ने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज़िन्दगी एक डायरी है, जिसे आप चाहे लिखें, न लिखें ! कुछ पन्ने विधाता लिखता है, कुछ हमारे द्वारा लिखे जाते हैं। फिर भी कुछ पन्ने कोरे ही रह जाते हैं। मेरी डायरी में भी एक पन्ना विवेक का है, जिस पर आज तक कुछ नहीं लिखा गया। कभी तो श्रीगणेश करना ही है ! सोचा, आज से ही क्यों न कर दूँ।

बुद्धि और ज्ञान के प्रदाता, ऐसा कहा जाता है, मंगलमूर्ति श्रीगणेश हैं ! विवेक के बारे में जब बात करो, तो लोग विवेकानंद तक चले जाते हैं। जब किसी बुद्धिमान को समझा-समझाकर हार जाते हैं, तो मज़बूरन कहना पड़ता है, भाई !अपने विवेक से काम लो।।

ऐसा कहा जाता है, बुद्धि का संबंध मन से है, और विवेक का अन्तर्मन से ! मन से तो हमेशा यही शिकायत रहती है, कि वह मनमानी करता है। इसीलिए कभी भी किसी बुद्धिमान व्यक्ति की मति फिर सकती है। विवेक का मामला थोड़ा अलग है। उस पर मन का नहीं अन्तर्मन का अंकुश जो है।

कभी कभी इंसान का विवेक भी काम नहीं आता। एक सज्जन किसी ज्ञानी के प्रवचन सुन घर लौटे ! ज्ञानी पुरुष की एक बात उन्होंने गाँठ बाँध ली थी ! हर काम विवेक से पूछकर किया करो अब तक वे स्वावलंबी थे। अपना काम स्वयं करते थे।

अब वे सारा काम विवेक से पूछकर करने लगे। विवेक पर भरोसा किया, और धोखा खाया, क्योंकि विवेक तो उनके लड़के का ही नाम था।।

बुद्धि और मन से परे प्रज्ञा का निवास है और विवेक उसकी रखवाली करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, और मत्सर का अन्तर्मन में प्रवेश वर्जित है। वैसे भी इनका कार्य-क्षेत्र मन तक ही सीमित है। केवल संयम ही हमें विवेक का मार्ग दिखला सकता है। और बिना मन को बस में किये संयम भी हाथ नहीं आता। योगानुशासन की यम-नियम ही बुनियाद हैं। हाथ-पाँव को तोड़ना-मरोड़ना कोई योग नहीं।

विवेक का पन्ना अति-वृहद है ! लेकिन यह स्थूल ज्ञान के शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हम होते जाएँगे, विवेक के पन्ने अपने आप खुलते जाएँगे। आइए, मन से पार चलें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८८ ⇒ धीमी गति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धीमी गति।)

?अभी अभी # ७८८ ⇒ आलेख – धीमी गति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिप्टन माने अच्छी चाय, और धीमी गति माने स्लो मोशन !कभी आकाशवाणी पर धीमी गति के समाचार प्रसारित होते थे। जब हम किसी को डिक्टेशन देते हैं, तो हमें अपने बोलने की गति को धीमा करना पड़ता है। वह पहले सुनता है, समझता है, और फिर लिखता है। सुनने और लिखने में तालमेल को ही डिक्टेशन कहते हैं।

हिंदी में धीमा और तेज़ के लिए दो शब्द प्रचलित हैं, चुस्त और सुस्त। लोग चुस्ती को तंदुरुस्ती और सुस्ती को बीमारी अथवा आलस्य से जोड़ लेते हैं। लाइफबॉय है जहाँ तंदुरुस्ती है वहाँ। टी वी के एक विज्ञापन में तो एक मोटे बच्चे का साबुन भी स्लो बताया गया है, धीते रहो, धोते रहो ! वहीं एक लड़की सिर्फ हैंड वाश लगाती है, और बैक्टीरिया ग़ायब। साबुन भी कहीं स्लो होता है। विज्ञापन क्या न कराए। ।

कुछ लोग चाय चुस्कियां ले लेकर पीते हैं, गर्म चाय को फूँक मार-मारकर ठंडी होने पर पीते हैं, तो कुछ इधर मुँह पर लगाई, और उधर खत्म। भोजन को चबा-चबाकर खाना चाहिए। कुछ लोग भोजन को चबाते ही रह जाते हैं, और सामने वाला पंगत छोड़कर उठ खड़ा होता है। जीवन में कहीं गति है, तो कहीं धीमी गति। कुछ तेज चलते हैं, कुछ धीमे ! जो धीमे चलते हैं, वे यह मानकर चलते हैं, जल्दी का काम शैतान का। धीरे चलिए, सुरक्षित पहुँचिये। और शैतान बाज़ी मार ले जाता है। इनका निर्णय सुरक्षित रखा रह जाता है।

कुछ लोग तेज आवाज में बात करते हैं, तो कुछ इतना धीरे बोलते हैं, कि शायद वे खुद भी नहीं सुन पाते। जो तेज़ आवाज़ में बात करते हैं, उनकी बात ग़लत होते हुए भी सही प्रतीत होती है, और जो धीमी आवाज़ में बातें करते हैं, वे मनमोहनसिंह कहलाते हैं। ।

कुछ की आवाज़ की गति तेज होती है तो कुछ लोग बड़े आराम से बोलते हैं। उनका एक वाक्य एक पेरेग्राफ जितना लंबा होता है, शब्दों की लंबाई के कारण नहीं, बोलने में ठहराव के कारण। एक उदाहरण पेश है।

हमारे शाखा प्रबंधक बहुत आराम से, रूक-रुककर बातें करते थे। वह मोबाइल का नहीं, ट्रंक कॉल का ज़माना था। बड़ी मुश्किल से कॉल लगता था, और तीन मिनिट में समाप्त हो जाता था। आप या तो कॉल एक्सटेंड करें, या फिर से लगाएं !

सुबह एकाएक उनके केबिन की घंटी बजी, उन्होंने टेलीफोन उठाया ! गुड मॉर्निंग सर, (pause)दिस इज़ बैंक ऑफ इंडिया, (pause) लक्ष्मी बाई नगर ब्रांच, (pause) इंदौर। (एक मिनिट पूरा) आय एम आर. आर. जोशी, (pause) ब्रांच मैनेजर, (pause)स्पीकिंग। ( दो मिनिट पूरे ) व्हाट कैन आय डू फ़ॉर यू सर्। और फ़ोन कट गया। तीन मिनिट पूरे। उन्होंने फिर से फ़ोन लगाया, लाइन नहीं मिली। । (अतिशयोक्ति अलंकार)

जो लोग बहुत आराम से बोलते हैं, उन्हें आप आराम से ही सुन सकते हैं ! अगर आप जल्दी में हैं, तो उनकी पूरी बात शायद ही सुन पाएँ। यही बात धीमी गति और तेज़ गति पर लागू होती है। पति-पत्नी साथ-साथ टहलने निकलते हैं, मुश्किल से दो कदम ही साथ चल पाते हैं, कि पति और पत्नी के बीच फासले बढ़ने शुरू हो जाते हैं। पति महोदय पीछे मुड़कर भी नहीं देखते कि उनकी पत्नी किस मोड़ पर है।

जहाँ गति है, वहाँ विकास है, प्रगति है, उन्नति है ! जहाँ धीमी गति है, वहाँ झुग्गी है, झोपड़ी है, चॉल है। अगर गति तेज है, तो स्मार्ट सिटी है, हेल्थ क्लब है, ट्रेड सेंटर है, ऑर्बिट मॉल है।।

हमारी गति चाहे धीमी हो या तेज़। हम जल्दी जल्दी बोलें या आराम से, कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सब अपने गंतव्य तक आराम से पहुँच जाते हैं। जीवन में कहीं कछुआ चाल है, तो कहीं खरगोश की गति और कहीं कहीं तो भेड़-चाल ! हम सबकी गति एक ही होना है। हम सब अपनी अपनी चाल से अपने गंतव्य तक पहुंचें, ईश्वर से यही प्रार्थना है। बहुत भागमभाग है जीवन में, थोड़ा सुस्ता लें।

शायद हमारे लिए ही सचिन दा कह गए हैं –

दम ले ले, दम ले ले घड़ी भर !

ये छैयां पाएगा कहाँ।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९३ ☆ प्रकृति शिक्षिका के रूप में… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख भीड़ में हम अकेले। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९३ ☆

☆ प्रकृति शिक्षिका के रूप में… ☆

मानव व प्रकृति का संबंध अनादि व अखंड है। प्रकृति का सामान्य अर्थ है–समस्त चराचर में स्थित सभी वनस्पति,जीव व पदार्थ, जिनके निर्माण में मानव का हाथ नहीं लगा; अपने स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य भी आ जाता है, जो प्रकृति का अंग है और शेष सृष्टि उसकी रंगभूमि है। सो! उसकी अन्त:प्रकृति उससे अलग कैसे रह सकती है? मनुष्य प्रकृति को देखता व अपनी गतिविधि से उसे प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित हो बदलता-संवरता है; तत्संबंधी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। उसी के माध्यम से वह जीवन को परिभाषित करता है। मानव प्रकृति के अस्तित्व को हृदयंगम कर उसके सौंदर्य से अभिभूत होता है और उसे चिरसंगिनी के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है और उसे मां के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है।

मानव प्रकृति के पंचतत्वों पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि, आकाश व सत्,रज,तम तीन गुणों से निर्मित है…फिर वह प्रकृति से अलग कैसे हो सकता है? जिन पांच तत्वों से प्रकृति का रूपात्मक व बोधगम्य रूप निर्मित हुआ है,वे सब इंद्रियों के विषय हैं। इन पांच तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ही असंख्य रूपों में मानव चेतना के कोश को कर्म, चिन्तन, कल्पना, भावना, भावुकता, संकल्प, जिज्ञासा, समाधान आदि से कितना समृद्ध किया है–इसका अनुमान मानव की उपलब्धियों से लगाया जा सकता है। प्रकृति का वैभव अपरिमित एवं अपार है। उसकी पूर्णता को न दृष्टि छू सकती है, न ही उसकी सीमाओं तक कान ही पहुंच सकते हैं और न ही क्षणों की गति को मापा जा सकता है। प्रकाश व शब्द की गति के साथ कौन दौड़ लगा सकता है? प्रकृति के अद्भुत् सामर्थ्य व निरंतर गतिशीलता के कारण उसमें देवत्व की स्थापना हो गयी तथा उसकी अतिन्द्रियता, अद्भुतता, उच्चता, गहनता आदि के कारण उसे विराट की संज्ञा प्रदान की गयी है। विराट में मानव,मानवेतर प्राणी व अचेतन जगत् का समावेश है। अचेतन जगत् ही प्रकृति है और जगत् का उपादान अथवा मूल तत्व है। वह स्वयंकृत, चिरंतन व सत्य है। उसका निर्माण व विनाश कोई नहीं कर सकता। प्रकृति के अद्भुत् क्रियाकलाप व अनुशासनबद्धता को देख कर मानव में भय, विस्मय, औत्सुक्य व प्रेम आदि भावनाओं का विकास हुआ, जिनसे क्रमश: दर्शन, विज्ञान व काव्य का विकास हुआ। सो! मानव मन में आस्था, विश्वास व आदर्शवाद जीवन-मूल्यों के रूप में सुरक्षित हैं और विश्व में हमारी अलग पहचान है। सम्पूर्ण विश्व के लोग भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं। रामायण व महाभारत अद्वितीय ग्रंथ हैं और गीता को मैनेजमेंट गुरू स्वीकारा जाता है। उसे विश्व के विभिन्न देशों में पढ़ाया जाता है। यह एक जीवन-पद्यति है; जिसे धारण कर मानव अपना जीवन सफलतापूर्वक बसर कर सकता है।

प्रकृति हमारी गुरू है, शिक्षिका है, जो जीने की सर्वोत्तम राह दर्शाती है। प्रकृति हमारी जन्मदात्री मां के समान है और हमारी प्रथम गुरू कहलाती है और जो संस्कार व शिक्षा हमें मां से प्राप्त होती हैं, वह पाठ संसार का कोई गुरू नहीं पढ़ा सकता। प्रकृति हमें सुक़ून देती है; अनगिनत आपदाएं सहन करती है और हम पर लेशमात्र भी आँच नहीं आने देती। वह हमारी सहचरी है; सुख-दु:ख की संगिनी है। दु:ख की वेला में यह ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाती भासती है, जो सुख में मोतियों-सम प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, दु:ख में प्रकृति मां के समान धैर्य बंधाती है।

प्रकृति हमें कर्मशीलता का संदेश देती है और उसके विभिन्न उपादान निरंतर सक्रिय रहते हैं।क्षरात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर, अमावस के बाद पूनम व विभिन्न मौसमों का यथासमय आगमन समय की महत्ता व गतिशीलता को दर्शाता है। नदियाँ निरंतर परहिताय प्रवाहशील रहती हैं। इसलिए वे जीवन-दायिनी कहलाती हैं। वृक्ष भी कभी अपने फलों का रसास्वादन नहीं करते तथा पथिक को शीतल छाया प्रदान करते हैं। वे हमें आपदा के लिए संचय करने को प्रेरित करती है। जैसे जल के अभाव में वह बंद बोतलों में बिकने लगा है। बूंद-बूंद से सागर भर जाता है और जल को बचा कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। वायु भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। परंतु मानव की बढ़ती लालसाओं ने जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के महल बनाकर पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत वृद्धि की है, जिसका विकराल रूप हमने कोरोना काल में आक्सीजन की कमी के रूप में देखा है; जिसके लिए लोग लाखों रुपये देने को तत्पर थे। परंतु उसकी अनुपलब्धता के कारण लाखों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। काश! हम प्रकृति के असाध्य भंडारण व असाध्यता का अनुमान लगा पाते कि वह हमें कितना देती है? हम करोड़ों-अरबों की वायु का उपयोग करते हैं; अपरिमित जल का प्रयोग करते हैं; वृक्षों का भी हम पर कितना उपकार है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कार्बन-डॉयोक्साईड लेकर हमें आक्सीजन देते हैं। इतना ही नहीं, वे हमें अन्न व फल-फूल देते हैं, जिससे हमें जीवन मिलता है।

मानव व प्रकृति का संबंध अटूट, चिरंतन व शाश्वत् है। प्रकृति विभिन्न रूपों में हमारे सम्मुख बिखरी पड़ी है। प्रकृति के कोमल व कमनीय सौंदर्य से प्रभावित होकर कवि उसे कल्पना व अनुभूति का विषय बनाता है, जो विभिन्न काव्य- रूपों में प्रकट होती है। यदि हम हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो प्रकृति हर युग में मानव की प्रेरणा-शक्ति ही नहीं रही, उसकी चिर-संगिनी भी रही है। वैदिक-कालीन सभ्यता का उद्भव व विकास प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में हुआ। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने प्रकृति के प्रति जहां अनुराग व्यक्त किया, वहीं उसके उग्र,रम्य व मानवीकरण आदि रूपों को अपनाया। ऋग्वेद मानव सभ्यता का प्राचीनतम ग्रंथ है। प्रकृति के दिव्य सौंदर्य से अभिभूत होकर जहां मानव उसके उन्मुक्त सौंदर्य का बखान करता है; वहीं विराट के प्रति भय, विस्मय श्रद्धा आदि की अनुभूतियों में अनंत सौंदर्य का अनुभव करता है। वाल्मीकि का प्रकृति-जगत् के कौंच-वध की हृदय-विदारक घटना से उद्वेलित आक्रोश व करुणा से समन्वित शोक का प्रथम श्लोक रूप में प्रस्फुरण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भावातिरेक या अनुभूति की तीव्रता ही कविता की मूल संजीवनी शक्ति है। महाभारत में प्रकृति केवल पर्वत, वन, नदी आदि का सामान्य ज्ञान कराती है। नल दमयंती प्रसंग में वह प्रकृति से संवेदनात्मक संबंध स्थापित न कर, स्वयं को अकेला व नि:सहाय अनुभव करती है।

कालिदास को बाह्य-जगत् का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकारा जाता है। उनका प्रकृति-चित्रण संस्कृत साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वे प्रकृति को मूक, चेतनहीन व निष्प्राण नहीं मानते, बल्कि वे उसमें मानव की भांति सुख- दु:ख व संवेदनशीलता अनुभव करते हैं। इस प्रकार अश्वघोष, भवभूति, भास, माघ, भारवि, बाणभट्ट आदि में प्रकृति का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है।

हिन्दी साहित्य के आदिकाल अथवा पूर्व मध्य-कालीन काव्य में प्रकृति का उपयोग पृष्ठभूमि, उद्दीपन व उपमानों के रूप में हुआ। विद्यापति के काव्य में प्रकृति कहीं-कहीं उपदेश देती भासती है और आत्मा परमात्मा में इस क़दर लीन हो जाती है, जैसे समुद्र में लहर और भौंरों का गुंजन नायिका को मान त्यागने का संदेश देता भासता है। वियोग में उनका बारहमासा वर्णन द्रष्टव्य है।

पूर्व मध्यकालीन काव्य में प्रकृति उन्हें माया सम भासती है तथा उन्होंने भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनाया है। कबीरदास जी ‘माली आवत देखि के, कलियन करि पुकार/ फूलि-फलि चुनि लहि, कालहि हमारी बारि’ के माध्यम से मानव को नश्वरता का संदेश देते हैं। दूसरी ओर ‘तेरा सांई तुझ में, ज्यों पुहुपन में वास/ कस्तूरी का मृग ज्यों फिरि-फिरि ढूंढे घास’ के माध्यम से वे मानव को संदेश देते हैं कि ब्रह्म पुष्पों की सुगंध की भाति घट-घट में व्याप्त है, परंतु अज्ञान के कारण बावरा मानव उसे अनुभव नहीं कर पाता और मृग की भांति वन-वन में ढूंढता रहता है। प्रेममार्गी शाखा के प्रवर्त्तक जायसी के काव्य में प्रकृति के उपमान, उद्दीपन व रहस्यात्मक रूपों का चित्रण हुआ है। वे चराचर प्रकृति में ब्रह्म के दर्शन करते हैं। समस्त जड़-चेतन प्रकृति में प्रेमास्पद के प्रतिबिंब को निहारते व अनुभव करते हैं। ‘बूंद समुद्र जैसे होइ मेरा/ मा हिराइ जस मिले न हेरा।’ जिस प्रकार बूंद समुद्र में मिलकर नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार आत्मा भी ब्रह्ममय हो जाती है।

रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास की वृत्ति प्रकृति-चित्रण में अधिक नहीं रमी, तथापि उनका प्रकृति-चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। प्रकृति उनके काव्य में उपमान व उद्दीपन रूप में नहीं आयी, बल्कि उपदेशिका के रूप में आयी है। संयोग में वर्षा व बादलों की गर्जना होने पर पशु-पक्षी व समस्त प्रकृति जगत् उल्लसित भासता है और वियोग में मन की अव्यवस्थित दशा में मेघ-गर्जन भय संचरित करते हैं। मानवीकरण में मनुष्य का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और मानव उसमें अपनी मन:स्थिति के अनुसार उल्लास, उत्साह, आनंद व शोक की भावनाएं- क्रियाएं आरोपित करता है। राम वन के पशु-पक्षियों से सीता का पता पूछते हैं। तुलसी सदैव लोक- कल्याण की भावना में रमे रहे और प्रकृति से उपदेश-ग्रहण की भावना में उन पर श्रीमद्भागवत् का प्रभाव द्रष्टव्य है–’आन छोड़ो साथ जब, ता दिन हितु न होइ/ तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि, तासु रिपु होइ।’ जब कुटुम्बी साथ छोड़ देते हैं, तो संसार में कोई भी हितकारी नहीं रह पाता। कमल का जनक जल जब सूख जाता है, तो उसका मित्र सूर्य भी उसे दु:ख पहुंचाता है।

कृष्ण भक्ति शाखा के अतर्गत सूर, नंददास, रसखान आदि को कृष्ण के कारण प्रकृति अति प्रिय थी। प्रकृति का आलंबन, उद्दीपन व आलंकारिक रूप में चित्रण हुआ है। वियोग में प्रकृति गोपियों को दु:ख पहुंचाती है और वे मधुवन को हरा-भरा देख झुंझला उठती हैं– ‘मधुबन! तुम कत रहत हरे/ विरह-वियोग स्याम सुंदर के ठाढ़ै,क्यों न जरे।’ कहीं-कहीं वे प्रकृति में उपदेशात्मकता का आभास पाते हैं और संसार के मोहजाल को भ्रमात्मक बताते हुए कहते हैं–’यह जग प्रीति सुआ, सेमर ज्यों चाखत ही उड़ि जाय।’ तोते को सेमर के फूल में रूई प्राप्त होती है और वह उड़ जाता है। सूर ने प्रकृति के व्यापारों का मानवीय व्यापारों से अतु्लनीय समन्वय किया है।

उत्तर मध्यकालीन को प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षित नहीं कर पाता। बिहारी को गंवई गांव में गुलाब के इत्र का कोई प्रशंसक नहीं मिलता। केशव को प्राकृतिक दृश्यों के अंकन का अवसर मिला,परंतु वे अलंकारों में उलझे रहे। बिहारी सतसई में जहां मानवीकरण व आलंबनगत रूप चित्रण हुआ, वहीं पर नैतिक शिक्षा के रूप में अन्योक्तियों का आश्रय लिया गया है। इनके प्रकृति-चित्रण में हृदय-स्पर्शिता का अभाव है। सो! प्रकृति उद्दीपन व उपमान रूप में हमारे समक्ष है। ‘ नहीं पराग,नहीं मधुर मधु,नहीं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यौ,आगे कौन हवाल’ के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। ‘जिन-जिन देखे वे सुमन, गयी सो बीति बहार/ अब अलि रही गुलाब की, अपत कंटीली डार।’ यह उक्ति सम्पत्ति-विहीन व्यक्ति के लिए कही गयी है तथा भ्रमर को माध्यम बनाकर प्राचीन वैभव व वर्तमान की दरिद्रावस्था का बखूबी चित्रण किया गया है।

भारतेन्दु युग आधुनिक युग का प्रवेश-द्वार है और इसमें नवीन व प्राचीन काव्य-प्रवृत्तियों का समन्वय हुआ है। प्रकृति मानवीय भावनाओं के अनुरूप हर्ष-विषाद को अतिशयता प्रदान करती, वियोगियों को रुलाती तथा संयोगियों को उल्लसित करती है। इनका बारहमासा वर्णन विरहिणी की पीड़ा को और बढ़ा देता है तथा कहीं-कहीं प्रकृति उपदेश देती भासती है। ‘ताहि सो जहाज को पंछी सब गयो,अहो मन होई’ (भारतेन्दु ग्रंथावली)। अत:जीव जहाज़ के पक्षी की भांति पुन: ब्रह्म में मिलने का प्रयास करता है। बालमुकुंद जी के हृदय में प्रकृति के प्रति सच्चा अनुराग है, जो आलंबन, उद्दीपन व उपमान रूप में उपलब्ध है।

द्विवेदी युगीन कवियों ने प्रकृति को काव्य का वर्ण्य-विषय बनाया है तथा प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है। श्रीधर पाठक, रूपनारायण पाण्डेय, रामनरेश त्रिपाठी आदि ने आलंबनगत चित्र प्रस्तुत किए हैं तथा स्वतंत्रतावादी कवियों ने रूढ़ रूपों को नहीं अपनाया, बल्कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में उसके साधारण चित्रमय, सजीव व मार्मिक रूप प्रदान किए हैं। पाठक ने कश्मीर सुषमा, देहरादून आदि कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्र उपलब्ध हैं। शुक्ल जी ने प्रकृति के आलंबन व त्रिपाठी ने पथिक व स्वप्न खंड काव्यों में प्रकृति का मार्मिक चित्रण किया  है। हरिऔध ने जहां ऐंद्रिय सुख की अनुभूति की, वहीं प्रकृति से उपादान ग्रहण कर नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत, पंचवटी, यशोधरा आदि काव्यों में मनोरम प्राकृतिक चित्रण उपलब्ध है। पंचवटी में प्रकृति की अपूर्व झांकी दिखाई देती है और प्रकृति मानव के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में संबंध स्थापित करती है। साकेत में प्रकृति का मानव व मानवेतर जगत् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वे प्रकृति को सद्गुणों से परिपूर्ण मानते हैं– ‘सर्वश्रद्धा, क्षमा व सेवा की, ममता की वह धर्म में भी प्रतिमा/ खुली गोद में जो उसकी, समता की वह प्रतिमा।’ प्रकृति ममतामयी मां है, जो समभाव से सब पर अपना प्रेम व ममत्व लुटाती है।उपदेशिका की भांति मानव में उच्च विचार व सदाशयता के भाव संचरित करती है। वे भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना के भाव जाग्रत करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहते हैं—‘पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे काम में/ फिर क्यों तुम्ही खोते हो, व्यर्थ के विश्राम में।’ कवि ने सर्वभूतों को सर्वदा व्यस्त दिखाते हुए देशवासियों को आलस्य त्यागने व जाग्रत रहने का संदेश दिया है। रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में प्रकृति के सुंदर, मधुर, मंजुल रूप प्रकट होते हैं, उग्र नहीं। वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मानव-व्यापारों व मानव- संवेदना का आभास पाते हैं।

छायावाद में प्रकृति को स्वछंद रूप प्राप्त हुआ है और उसका उपयोग आध्यात्मिक भावों के प्रकाशन के लिए हुआ है। प्रकृति कवि की चेतना, प्रेरणा व स्पंदन है। इसलिए छायावाद को प्रकृति काव्य के नाम से अभिहित किया गया है।यदि प्रकृति को छायावाद से निकाल दिया जाए, तो वह पंगु हो जाएगा। प्रसाद ने प्रकृति में चेतना का अनुभव किया और वह मधुर, कोमल व सुकुमार भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बन गयी, परंतु कवि ने कामायनी में प्रकृति के भयावह, विकराल व विराट आदि रूपों का दर्शन किया है। वे प्रकृति को सचेतन व सजीव मानकर उसमें अलौकिक सत्ता का दर्शन करते हैं तथा समस्त सृष्टि के कार्य-व्यापारों को सर्वोत्तम शक्ति द्वारा अनुप्राणित स्वीकारते हैं। प्रसाद ने संसार को रंगभूमि मानते हुए कहा है कि मानव यहां अपनी शक्ति के अनुसार संसार रूपी घोंसले में अपनी शक्ति के अनुसार ठहर सकता है, ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का संदेश देता है। पंत प्रकृति के उपासक ही नहीं, अनन्य मित्र थे। उनके काव्य में मानव और प्रकृति का एकात्म्य हो जाता है। मधुकरि का मधुर राग उन्हें मुग्ध करता है और वे ‘सिखा दो न हे मधुप कुमारि/ मुझे भी अपने मीठे गान'(पल्लविनी)। वे प्रकृति के सहचरी, देवी, सखी, जननी आदि रूपों को काव्य में चित्रित करके उनमें अलौकिक सत्ता का आभास पाते हैं और प्रकृति उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है।

निराला के काव्य में प्रकृति के चित्र दिव्य, समृद्ध व रहस्यात्मक रूप में आए हैं। उनके काव्य में दो तत्वों की प्रधानता है-रहस्यवाद व मानवीकरण। उनके काव्य विराटता व उदात्तता की दृष्टि से सराहनीय हैं। प्रकृति उसे सजीव प्राणी की भांति अपना रूप दिखाती, हाव-भावों से मुग्ध करती, संवेदना प्रकट करती उत्साहित करती है। इस प्रकार प्रकृति व मनुष्य का तादात्म्य हो जाता है। बादल प्रकृति को हरा-भरा कर देते हैं, जिससे प्रेरित होकर प्रकृति कर्त्तव्य- पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है।

महादेवी वर्मा सृष्टि में सर्वत्र दु:ख देखती हैं। प्रकृति उनके लिए सप्राण है तथा वे मानव व प्रकृति के लिए एक प्रकार की अनुभूति, सजीवता, विश्रंखलता, आत्मीयता व व्यापकता  का अनुभव करती हैं। वे संसार में प्रियतम को ढूंढती हैं । वे कभी प्रेम भाव में बिछ जाती हैं और जब प्रियतम अंतर्ध्यान हो जाते हैं, वे निराश होकर दु:ख-दैन्य भाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं—‘मैं फूलों में रोती, वे बालारुण में मुस्काते/ मैं पथ में बिछ जाती,वे सौरभ सम उड़ जाते।’ वे प्रकृति के चतुर्दिक प्रियतम के संदेश का आभास पाती हैं और प्रश्न कर उठती हैं — ‘मुस्काता प्रेम भरा नभ,अलि! क्या प्रिय आने वाले हैं?’ वे जीवन को संध्या से उपमित करती हैं ‘प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन’ ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ के माध्यम से वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। वेएक ओर प्रकृति में विराट की छाया देखती हैं और दूसरी ओर अपना प्रतिबिंब पाती हैं। वै छायावाद का आधार स्तंभ-मात्र नहीं हैं, रहस्य व अरूप की साधिका रही हैं।

प्रगतिवाद भौतिकवादी दर्शन है, जिस पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। समस्त सृष्टि का विकास दो वस्तुओं के संघर्ष से होता है, जो द्वंद्व का परिणाम है। यह वैज्ञानिक दर्शन है, जिसमें भावुकता के स्थान पर बुद्धि को स्वीकारा गया है।यह यथार्थवाद पर आधारित है। इन कवियों को जीवन से अनुरक्ति है और प्रकृति से प्रेम है।उन्होंने प्रकृति के उपेक्षित तत्वों व पात्रों को महत्व दिया है और प्रकृति उनके लिए शक्ति- प्रणेता है। वे दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन को देख जीवन के विकास के लिए परिवर्तन-शीलता को अनिवार्य मानते हैं। इनके गीतों पर लोकगीतों कि प्रभाव द्रष्टव्य है।

प्रयोगवादी कविता में प्रकृति के भावात्मक स्वरूप का ग्रहण हुआ अबोध बालक की तरह ईश्वर, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य के विभिन्न स्तरों पर प्रश्न करता है। इन कवियों ने जहां प्रकृति के उपेक्षित व वैज्ञानिक स्वरूपों को ग्रहण किया है,

वहीं प्रकृति में दैवीय सत्ता का आभास न पाकर , भौतिकता के संदर्भ में एक शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। इनका दृष्टिकोण भावात्मक न होकर, बौद्धिक है और प्रकृति के उपेक्षित स्वरूप(कुत्ता, गधा,चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, प्लेटफार्म, धूल, साइरन) को काव्य का विषय बनाया।इन्होंने असुंदर, भौंडे, भदेस आदि में सौंदर्य के दर्शन किए तथि युगबोध के अनुकूल प्रकृति का चित्रण किया। इन्होंने जहां प्रकृति को अपनी मानसिक कुंठाओं की अभिव्यक्ति का साधन बनाया, वहां नवीन उपमानों, बिम्बों को अपने काव्य में प्रतिष्ठित किया तथा मानवीकरण कर मनोरम चित्रण किया है।

नयी कविता प्रयोगवाद का विकसित चरण है तथा इसमें उपलब्ध प्रकृति चित्रण की विशेषता है–ग्राम्य चित्रपटी की अवधारणा। नयी कविता वाद मुक्त है तथा वे जो भी मन में आता है, कहते हैं। वे क्षणवादी हैं और हर पल को जी लेना चाहते हैं,क्योंकि वे भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनमें एक दर्शन का अभाव है। कई बार उन्हें प्रकृति के विभिन्न रूप स्पंदनहीन भासते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में शंका होने लगती है। नये कवियों की विषय-व्यापकता, नया भाव-बोध तथा नवीन दृष्टिकोण सराहनीय है। सो! प्रकृति व मानव का संबंध अनादि काल से शाश्वत् व अटूट रहा है। वह हर रूप में आराध्या रही है। परंतु जब-जब मानव ने प्रकृति का अतिक्रमण किया है, उसने अपना प्रकोप व विकराल रूप दिखाया है, जो प्राकृतिक प्रदूषण व कोरोना के रूप में हमारे समक्ष है। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव नियति के सम्मुख विवश व असहाय भासता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८७ ⇒ काका हाथरसी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ काका हाथरसी ।)

?अभी अभी # ७८७ ⇒ आलेख – काका हाथरसी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिस दिन पैदा हुए, उसी दिन इस संसार से विदा भी ले ली ! (18 सितंबर 1906 – 1995) हाथरस में पैदा हुए इसलिए प्रभुलाल गर्ग, काका हाथरसी हो गए । इनके हाथ में हास्य रस की रेखाएं अवश्य होंगी,इसीलिए सदा सबको हंसाते रहे ।

इनकी आस थी कि इनके निधन पर कोई आंसू ना बहाए। शोक सभा की जगह एक हास्य कवि सम्मेलन रखा जाए। चूंकि जन्म और मरण का एक ही दिन है, इसलिए प्रस्तुत है उनकी एक हास्य कविता ।

☆ सुरा समर्थन ☆ काका हाथरसी ☆

*

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान

देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान

किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर

जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं कायर

कहँ काका‘, कवि बच्चनने पीकर दो प्याला

दो घंटे में लिख डाली, पूरी मधुशाला

*

भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच

अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच

पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया

पीकर के रावण सीता जी को हर लाया

कहँ काकाकविराय, सुरा की करो न निंदा

मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा

*

ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार

ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार

अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ

जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ

पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले

लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले

*

पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान

नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान

खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा

डिब्बाकहना चाहें, निकले मुँह से दिब्बा

कहँ काकाकविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ

मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ

*

प्रेम-वासना रोग में, सुरा रहे अनुकूल

सैंडिल-चप्पल-जूतियां, लगतीं जैसे फूल

लगतीं जैसे फूल, धूल झड़ जाये सिर की

बुद्धि शुद्ध हो जाये, खुले अक्कल की खिड़की

प्रजातंत्र में बिता रहे क्यों जीवन फ़ीका

बनो पियक्कड़चंद‘, स्वाद लो आज़ादी का

*

एक बार मद्रास में देखा जोश-ख़रोश

बीस पियक्कड़ मर गये, तीस हुये बेहोश

तीस हुये बेहोश, दवा दी जाने कैसी

वे भी सब मर गये, दवाई हो तो ऐसी

चीफ़ सिविल सर्जन ने केस कर दिया डिसमिस

पोस्ट मार्टम हुआ, पेट में निकली वार्निश

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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