हिंदी साहित्य – आलेख ☆ मेरी विरासत : एक अनन्त संवाद ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 मेरी विरासत : एक अनन्त संवाद 🌷

हर व्यक्ति अपने भीतर एक अदृश्य संसार लिये चलता है—विचारों, अनुभवों, मूल्यों और संवेदनाओं का ऐसा उत्तराधिकार जो हमारे जीवन-मार्ग को चुपचाप दिशा देता है। मेरी अपनी विरासत किसी एक नाम या किसी सीमित परम्परा की नहीं। यह एक बहती हुई धारा है, जो सदियों के शान्त आत्मचिन्तन से उपजी है—ऐसी पंक्तियों में व्यक्त, जो आदेशों जैसी नहीं, बल्कि भीतर छिपे सत्य का स्नेहिल भान कराती हैं।

मेरे लिये इस विरासत का मूल बहुत सरल है—

🌱 “अहं ब्रह्मास्मि – मैं उसी अनन्त सत्ता का अंश हूँ।”

🌱 “तत्त्वमसि – और तुम भी वही हो।”

ये वाक्य मेरे भीतर यही कहते हैं कि मेरी और संसार की सीमाएँ उतनी ठोस नहीं जितनी दिखती हैं। जो मुझमें है, वही तुममें है; जो तुममें है, वही समस्त सृष्टि में स्पंदित है।

जीवन को लेकर मेरा दृष्टिकोण भी इसी सरलता में उतर आता है—

🌱 “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…”

अर्थात, मनुष्य केवल अपने कर्म का चयन कर सकता है, पर फल पर अधिकार नहीं रख सकता।

यह विचार मुझे हर स्थिति में संतुलित रखता है। बस अपना श्रेष्ठ प्रयास करते रहो—बाक़ी जीवन की लय पर छोड़ दो। अपेक्षा कम हो तो मन हल्का रहता है।

इसी समझ से एक सहज करुणा जन्म लेती है—अपने लिये नहीं, सबके लिये। मेरे भीतर हमेशा इन शुभकामनाओं की ध्वनि गूंजती है:

🌱 “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः…”

सब सुखी हों, सब रोग-शोक से मुक्त हों।

🌱 “सर्वेषां स्वस्तिर् भवतु, सर्वेषां शान्तिर् भवतु…”

सबके लिये कल्याण हो, सबके लिये शान्ति हो।

ये केवल प्रार्थनाएँ नहीं; यह वह संवेदना है जो किसी एक समुदाय या समूह की नहीं होती—यह मनुष्य होने की सामूहिक विरासत है। हम सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े हुए हैं।

इसी क्रम में एक गहरी और व्यापक प्रार्थना भी मेरे मन को छूती है:

🌱 “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”

इसका सरल अर्थ है—यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण ही उत्पन्न होता है; पूर्ण में से पूर्ण निकाल भी लो तो भी पूर्ण ही शेष रहता है।

यह पंक्तियाँ हमें समग्रता का बोध कराती हैं—कि सृष्टि की नींव कमी नहीं, बल्कि पूर्णता है। जीवन तब सहज हो जाता है जब हम अपने भीतर और बाहर इसी पूर्णता को पहचानने लगते हैं।

मेरी विरासत मुझे यह भी सिखाती है कि ज्ञान कभी एक-रूपी नहीं होता:

🌱 “एकं सत्यं, विप्राः बहुधा वदन्ति।”

सत्य एक है, पर उसकी अभिव्यक्ति अनेक रूपों में हो सकती है।

यह विचार मन को ख़ुला रखता है—सुनने, सीखने और समझने के लिये। कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं, और कोई भी मार्ग अकेला नहीं।

और फिर वह अनादि-प्रार्थना, जो हर खोजी हृदय की धुन है—

🌱 “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय…”

असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

यह जीवन के उस शाश्वत प्रयत्न का स्वर है—साफ़ देखने, स्पष्ट सोचने और भीतर के आलोक तक पहुँचने का।

इस संवाद की शुरुआत क्यों?

मेरा प्रयास किसी विचार-धारा की तुलना करना या किसी मत को परिभाषित करना नहीं है। यह सिर्फ़ एक विनम्र कोशिश है—उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को समझने की, जिसने मुझे भीतर से आकार दिया है।

मैं इसे इसलिए साझा कर रहा हूँ, क्योंकि विरासत कोई स्थिर वस्तु नहीं—यह एक जीवित संवाद है। जब हम विचार करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, अनुभव बाँटते हैं, तो यह और समृद्ध होती जाती है।

इसी आशा के साथ यह यात्रा आरम्भ की है—अनन्त, मुक्त और सतत्—जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात जोड़ सकता है, और हम सब मिलकर अपने भीतर की रोशनी को थोड़ा और स्पष्ट कर सकते हैं।

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४९ ⇒ ड ऽऽ र और भय ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ड ऽऽ र और भय…“।)

?अभी अभी # ८४९ ⇒ आलेख – ड ऽऽ र और भय ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कैसी कैसी जोड़ी बनाई है भगवान ने, राम और श्याम और जय वीरू की जोड़ी तो ठीक, डर और भय की भी जोड़ी। दोनों बिलकुल जुड़वा लगते हैं, हूबहू डिट्टो एक जैसे, शक्ल सूरत से रंगा बिल्ला माफिक, डरावने और भयंकर।

अजी साहब छोड़िए, सब आपका वहम है, डर और भय की तो कोई शक्ल ही नहीं होती। जंगल मे

अकेले जाओ तो डर लगता है, चिड़ियाघर में कितना मजा आता है। जब तक हम सुरक्षित हैं, निडर और निर्भय हैं, जहां किसी ने सिर्फ बोला सांप, बस हो गया कबाड़ा। भय का सांप अथवा सांप का भय तो हमारे अंदर बैठा है।

कहीं डंडे का डर तो कहीं बंदूक का डर, बेचारे बेजुबान जानवर को भी हम चाबुक से डराते हैं।

वाह रे सर्कस के शेर।।

इतना बड़ा शब्दकोश आखिर बना कैसे! क्या कम से कम शब्दों से काम नहीं लिया जा सकता, प्यार मोहब्बत, लाड़ प्यार! बच्चे को लाड़ मत करो प्यार ही कर लो। हटो जी, ऐसा भी कभी होता है। क्या एक भगवान शब्द से आपका काम चल जाता है। इतने देवी देवता, एक दो से ही क्यों नहीं काम चला लेते।

हर शब्द के पीछे एक अर्थ छुपा होता है। आपको डरावने सपने आते हैं, आपकी नींद खुल जाती है, अरे यह तो सपना था, कोई डर की बात नहीं! आपके अवचेतन में भय के संस्कार है, इसीलिए तो डरावने सपने आते हैं। छोटे छोटे बच्चे नींद में चमक जाते हैं, एकदम रोना शुरू कर देते हैं, उनके सिरहाने चाकू रखा जाता है। चाकू सुरक्षा कवच है और गंडा तावीज भी। मानो या ना मानो।।

डर से ही डरावना शब्द बना है, और भय से भयंकर! जगह जगह भयंकर सड़क दुर्घटना की खबरें मन को व्यथित कर देती हैं। कुछ लोग इतनी तेज गाड़ी चलाते हैं भाई साहब, कि उनके साथ तो बैठने में भी डर लगता है।

खतरों से खेलना कोई समझदारी नहीं। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

हमें बचपन से ही डराया गया है, कभी भूत से तो कभी बाबा से! आजकल के बच्चे भूत से नहीं डरते, क्योंकि वे ब्ल्यू व्हेल जैसे खेल खेलते हैं। अब हम बाबाओं से डरते नहीं, उनसे ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं। वे भी हमें ज्ञान बांटते हैं, भगवान से डरो।।

पढ़ने से कैसा डरना, लेकिन सबक याद नहीं होने पर मास्टरजी की छड़ी से तो डर लगता ही था। कहीं परीक्षा का डर तो कहीं साइंस मैथ्स का डर। हमारे गणित का डर तो अभ्यंकर सर भी दूर नहीं कर पाए।

कोई अमर नहीं, हमारा शरीर नश्वर है, फिर भी कोई मरना नहीं चाहता। शुभ शुभ बोलो। मरने की बात अपनी जुबान पर ही मत लाओ, क्योंकि हम सबको मृत्यु का भय है। हम नचिकेता नहीं जो यम की छाती पर जाकर खड़े हो जाएं।।

क्या आपको नहीं लगता, ये डर और भय और कोई नहीं, जय विजय ही हैं। मैं आपको जय विजय की कथा नहीं सुनाऊंगा, लेकिन ये कभी वैकुंठ के द्वारपाल थे, बेचारे शापग्रस्त हो गए और आसुरी शक्ति बने भगवान विष्णु को फिर भी नहीं छोड़ रहे। कभी रावण कुंभकर्ण तो कभी कंस शिशुपाल। आज के हिटलर स्टालिन भी शायद ये ही हों।

डर और भय ही कलयुग के जय विजय हैं। अगर आपने इन पर काबू पा लिया तो समझो आपका स्वर्ग का नहीं, वैकुंठ का टिकिट कट गया, यानी आप जन्म मृत्यु के चक्कर से बाहर निकल गए।।

ये सब कहने की बातें हैं।

क्या आपको आज के हालात से डर नहीं लगता।

क्या आप नहीं चाहते, लोग निडर होकर चैन की नींद सोएं। इसलिए हमें हमेशा जागरूक रहना होगा, खतरा देश के बाहर से भी है और अंदर भी।

हमें देश की, संविधान की और लोकतंत्र की रक्षा करनी है।

हम पहले लोगों को भयमुक्त वातावरण देंगे और बाद में अपने अंदर के जय विजय यानी डर और भय को भी देख लेंगे। आखिर इतनी जल्दी भी क्या है। सुना है नेटफ्लेक्स पर कोई बढ़िया हॉरर मूवी लगी है, मजेदार है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८८ ☆ ~ न्यूयार्क से ~ “उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८८ ☆

? ~ न्यूयार्क से ~ उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर: स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने तपस्या की थी यहां 

महाकाल की नगरी उज्जैन केवल बाबा महाकाल के कारण ही नहीं, बल्कि कर्म, न्याय और मोक्ष की गहरी अवधारणाओं से जुड़े भगवान श्री चित्रगुप्त मंदिर के कारण भी विशेष पहचान रखती है। क्षिप्रा नदी के पवित्र तट रामघाट, अंकपात क्षेत्र में स्थित यह मंदिर उन विरले तीर्थों में गिना जाता है, जहाँ मृत्यु के बाद मिलने वाले न्याय, कर्मों के लेखा-जोखा और मोक्ष की परंपरा को महसूस किया जा सकता है। प्राचीन अवंती या उज्जयिनी की इस तपोभूमि को भगवान श्री चित्रगुप्त की साधना का स्थल माना जाता है, जहाँ उन्होंने तपस्या कर सर्वज्ञता और समस्त जीवों के कर्मों का लेखा रखने की दिव्य शक्ति प्राप्त की थी। 

मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने दीर्घ तपस्या के दौरान अपने ही मन में अंकित एक दिव्य पुरुष की कल्पना की, वह चित्र मन के अंतरतम में गुप्त हो गया, इसी से “चित्रगुप्त” नाम की उत्पत्ति मानी जाती है।

ब्रह्मा ने इस दिव्य पुरुष को आदेश दिया कि वे महाकाल की नगरी उज्जैन जाकर कठोर तपस्या करें और मानव कल्याण के लिए ऐसी शक्तियाँ अर्जित करें, जिनसे वे समस्त प्राणियों के पाप पुण्य और कर्मों का सूक्ष्मतम लेखा रख सकें। लोक परंपरा में यही स्थान आगे चलकर श्री चित्रगुप्त धाम , धर्मराज चित्रगुप्त मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ ।

आज भी भगवान श्री चित्रगुप्त की प्रतिमा को एक हाथ में कर्मों की पुस्तक और दूसरे हाथ से लेखा करते हुए दर्शाया गया है। 

यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की परंपरागत रचना लिए हुए है, जिसमें गर्भगृह, मंडप और ऊँचा शिखर प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। गर्भगृह में स्थापित भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति को सफेद संगमरमर की शांत, गंभीर और न्यायमूर्ति भाव वाली प्रतिमा के रूप में वर्णित किया जाता है, जो भक्तों को अपने कर्मों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है। रामघाट स्थित धर्मराज श्री चित्रगुप्त मंदिर में यमराज, धर्मराज और यमुना के साथ चित्रगुप्त की संयुक्त उपासना की परंपरा भी मिलती है, जिससे यह स्थल मृत्यु, धर्म, पवित्रता और न्याय , इन चारों के अनूठे संगम के रूप में देखा जाता है। 

कथाओं के अनुसार, उज्जैन के इसी क्षेत्र में भगवान चित्रगुप्त ने दीर्घकालीन तप कर वह दिव्य शक्ति पायी, जिसके बल पर वे यमलोक में प्रत्येक आत्मा के लोक-परलोक के कर्मों का खाता तैयार करते हैं। इसी कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल पूजा ही नहीं, बल्कि आत्म-मंथन, अनुशासित जीवन और सत्यनिष्ठ आचरण का संकल्प भी करते हैं ताकि मृत्यु के बाद उनके पक्ष में उत्तम लेखा लिखा जाए। कायस्थ समाज, जो श्री चित्रगुप्त को अपना आदि–देव और कुलदैव मानता है, इस मंदिर को ‘कायस्थों के चार धाम’ के रूप में अग्रणी स्थान देता है , और कार्तिक शुक्ल द्वितीया (चित्रगुप्त पूजा ,यम द्वितीया) पर यहाँ विशेष अनुष्ठानों, लेखनी, बही की पूजा और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक एकता को व्यक्त करता है। 

उज्जैन के धर्मराज–चित्रगुप्त मंदिर से कई जीवंत लोककथाएँ भी जुड़ी हैं, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को  बढ़ाती हैं। एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि वनवास के बाद भगवान राम ने शिप्रा तट पर इसी क्षेत्र में आकर धर्मराज–चित्रगुप्त की विशेष पूजा की और अपने पिता दशरथ सहित पूर्वजों का तर्पण कर पितृऋण से मुक्ति की प्रार्थना की थी। इसीलिए आज भी बहुत से लोग यह विश्वास लेकर आते हैं कि शिप्रा में स्नान और चित्रगुप्त मंदिर में विधिवत पूजा तर्पण से पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्माओं को शांति और उन्नति प्राप्त होती है। 

आधुनिक समय में इस मंदिर की एक अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारिक मानी जाने वाली लोकपरंपरा ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। यहाँ ऐसे अनेक श्रद्धालु पहुँचते हैं जो असहनीय रोग, दीर्घकालीन पीड़ा या जीवन मृत्यु के संघर्ष में उलझे अपने परिजनों के लिए या तो चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करते हैं या फिर शांत, पीड़ामुक्त मृत्यु के रूप में मोक्ष का वरदान माँगते हैं।

 प्रचलित विश्वास यह है कि सच्ची आस्था से की गई विशेष पूजा के बाद चौबीस घंटे के भीतर या तो कष्टों से राहत मिलती है या फिर अत्यंत शांतिपूर्ण प्रस्थान का मार्ग खुल जाता है, इसलिए इसे कई लोग रूपक रूप में “मौत का वरदान” माँगने वाला मंदिर भी कहने लगे हैं, जबकि भक्त इसे वास्तव में “मोक्ष और कष्टमुक्ति” की याचना मानते हैं। 

स्थानीय परंपरा में यह धारणा भी प्रचलित है कि इस मंदिर के ऊपर से कर्क रेखा गुजरती है, जो इसे ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष ऊर्जा–क्षेत्र बनाती है और ग्रहदोषों, विशेषकर कालसर्प, राहु–केतु आदि के समाधान के लिए यहाँ दीपदान और विशेष पूजा कराई जाती है। कई पीढ़ियों से यहाँ सेवा कर रहे पुरोहितों के अनुसार रामघाट का यह मंदिर कम से कम सैकड़ों वर्षों से नियमित पूजा अर्चना का केंद्र है, और उनके वंश द्वारा सत्रहवीं, अठारहवीं शताब्दी से यहाँ आराधना किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। समय समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार, नई प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और ट्रस्ट के गठन जैसी प्रक्रियाएँ भी हुईं, जिनके कारण इसे “श्री चित्रगुप्त धाम” के रूप में व्यवस्थित धार्मिक केंद्र का रूप मिला। 

समग्र रूप से देखें तो उज्जैन का श्री चित्रगुप्त मंदिर केवल एक देवालय भर नहीं, बल्कि भारतीय धर्मदर्शन के “कर्म सिद्धांत” का जीवंत विद्यालय है, जहाँ हर दर्शन यह स्मरण कराता है कि मृत्यु के बाद न्याय निश्चित है और उसका आधार हमारे अपने कर्म ही हैं। महाकालेश्वर, कालभैरव और  शक्तिपीठों के साथ स्थित यह धाम उज्जैन की बहुरंगी आध्यात्मिक विरासत में उस कड़ी के रूप में जुड़ता है जो भक्ति के साथ-साथ जिम्मेदार, न्यायपूर्ण और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देती है । इसलिए जब यह कहा जाता है कि “स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने यहाँ तपस्या की थी”, तो इसके पीछे वही भाव निहित है कि यह स्थल मनुष्य को अपने भीतर के न्यायाधीश, अपने ही ‘चित्रगुप्त’ को जगाने की प्रेरणा देता है।

यह मंदिर न केवल कायस्थों के लिए बल्कि समूचे हिंदू समाज , पौराणिक, ऐतिहासिक, ASI, पर्यटन हर दृष्टि से जन महत्व की विरासत है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

इन दिनों न्यूयार्क में

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४८ ⇒ किताब और कैलेंडर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताब और कैलेंडर …“।)

?अभी अभी # ८४८ ⇒ आलेख – किताब और कैलेंडर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किताबें रोज छपती हैं, कैलेंडर हर वर्ष छपते हैं। किताब में क्या छपेगा, इसका निर्णय लेखक करता है, कैलेंडर में क्या छपेगा, इसका निर्णय समय करता है, इसीलिए किताब को कृति और कैलेंडर को काल निर्णय भी कहा जाता है। एक लेखक को लोग कम जानते हैं, लाला रामस्वरूप को कौन नहीं जानता।

मैं समय हूं। मेरे समय में किताब को पुस्तक कहा जाता था और टीचर को शिक्षक। टेक्स्ट बुक, पाठ्य पुस्तक कहलाती थी और lesson पाठ कहलाता था। सर और टीचर को अध्यापक और गुरु जी कहा जाता था और अटेंडेंस को हाजरी। जब क्लास में नहीं, कक्षा में हाजरी भरी जाती थी, तब छात्र यस सर अथवा प्रेजेंट सर नहीं, उपस्थित महोदय कहा करते थे।।

कैलेंडर की तरह हर वर्ष पाठ्य पुस्तकें भी बदली जाती थी। उधर कैलेंडर का साल बदलता, इधर हमारी कक्षा भी बदलती और पाठ्य पुस्तक भी।

किताबें पढ़कर और पढ़ लिखकर ही व्यक्ति पहले ज्ञान अर्जित करता है और फिर बाद में किसी किताब की रचना करता है। एक किताब की तुलना में एक कैलेंडर छापना अधिक आसान है। इसीलिए जो अधिक पढ़ लिख जाते हैं वे किताबें ही छापना पसंद करते हैं, कैलेंडर नहीं।।

हम भारतकुमार मनोजकुमार का उपकार नहीं भूलेंगे, जिसने कैलेंडर को एक नया अर्थ दिया और वह भी एक, इकतारे के साथ। हर साल कैलेंडर छाप दिया, और उसके बाद? इकतारा बोले, सुन सुन, क्या कहे ये तुझसे, सुन सुन, सुन सुन सुन।

सृजन, सृजन होता है, चाहे फिर वह किसी कैलेंडर का हो, अथवा किसी पुस्तक का। उत्सव तो बनता है, कहीं सृजन की मेहनत कुछ महीनों की है, तो कहीं कई वर्षों की। प्यार के खत की तरह, किसी पुस्तक के सृजन में, किसी बालक के जन्म में, वक्त तो लगता है।।

जिन्हें गुरु नहीं मिलता, वे निगुरे कहलाते हैं, जिनकी संतान नहीं होती, वे निःसंतान कहलाते हैं लेकिन जो लेखक किसी पुस्तक का सृजन नहीं कर पाए, उसे आप क्या कहेंगे।

आप कैलेंडर छापें, ना छापें, एक पुस्तक अवश्य छापें, आप पर मां सरस्वती की कृपा हो।

जो खुशी एक मां को अपने बालक के जन्म पर होती है, वही खुशी किसी लेखक को अपनी पहली रचना प्रकाशित होने पर होती है। खुशी तो बनती है, एक विमोचन तो बनता है।।

हर साल कैलेंडर छपते हैं, लाखों करोड़ों किताबें छपती हैं, लेकिन समय का विधान देखिए, जब देश दुनिया की जनसंख्या बढ़ती है, तो हमें जनसंख्या नियंत्रण का खयाल आता है। लेकिन इसमें गलत कुछ भी नहीं।

जो गलत है, वह गलत है।

खूब किताबें छापो, खूब कैलेंडर छापो, खूब पैसा कमाओ, लेकिन जब कमाने वाले हाथों से खाने वाले हाथ बढ़ जाते हैं, तो गरीबी में आटा गीला हो ही जाता है। बच्चे दो ही अच्छे, लेकिन हां, मगर हों भी अच्छे।।

एक लेखक को भी अपनी रचना से उतना ही प्रेम होता है जितना मां बाप को अपनी औलाद से। पुत्र मोह तो महाराज दशरथ को भी था और महाराज धृतराष्ट्र को भी। कहां एक के चार और कहां एक के सौ। आजकल हमारे लेखक भी तेंदुलकर और विराट कोहली की तरह अपनी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या, रनों की तरह बढ़ा रहे हैं। कोई रन मशीन है तो कोई बुक मशीन। हाल ही में कुछ लेखक अपनी प्रकाशित पुस्तकों का अर्द्ध शतक तो मार ही चुके हैं। कुछ नर्वस नाइंटीज़ में अटके हैं, उनकी मां शारदे सेंचुरी पूरी करे।

आप कैलेंडर चाहे मोहन मीकिंस का लें, अथवा किंगफिशर का, एक लाइफ टाइम पंचांग से ही काम चला लें, हर साल नया कैलेंडर भी खरीदें, लेकिन कृपया खुद कैलेंडर ना छापें। अगर छापने का इतना ही शौक है, तो अपनी किताबें छापें, कोई बैन नहीं, कोई नियंत्रण नहीं।

और हां जो छाप रहे हैं, उनसे जलें नहीं। विमोचन तो पुस्तक के जन्म का अवसर होता है, उस पर बच्चा और जच्चा को आशीर्वाद दें, अनावश्यक कुढ़कर अपशुकन तो ना करें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ब्रह्मांड ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ब्रह्मांड ? ?

-इस दुनिया के अलावा मेरे भीतर एक और दुनिया बसती है, समुद्री जीव-जंतुओं की दुनिया। खारे पानी के भीतर की दुनिया मुझे बेहद आकर्षित करती है। रंग-बिरंगी मछलियाँ, व्हेल, शार्क, डॉलफिन, ऑक्टोपस, शैवाल, कवक, कोरल और जाने क्या-क्या…, पहले ने कहा।

-मेरे भीतर की दुनिया में अंतरिक्ष है, आकाशगंगा हैं। उल्का पिंड हैं, धूमकेतु हैं। इस दुनिया में सौरमंडल है। सूर्य है, बृहस्पति है, शनि है, शुक्र है, मंगल है, बुध है, यूरेनस है, नेपच्यून है, और भी घूमते अनेक ग्रह हैं, ग्रहों पर बस्तियाँ हैं, बस्तियों में रहते एलियंस हैं…, दूसरे ने कहा।

-मेरे भीतर तो अपनी धरती के जंगल हैं जो लगातार मुझे बुलाते हैं। घने जंगल, तरह-तरह के जंगली जानवर, जानवरों का आपसी तालमेल! सोचता हूँ कि इस जंगल के इतने भीतर चला जाऊँ कि किसी दिन डायनासोर को वहाँ टहलता हुआ देख सकूँ…, तीसरे ने कहा।

-मेरे भीतर की दुनिया कहती है कि मैं पर्वतों पर चढ़ने के लिए पैदा हुआ हूँ। चोटियाँ मुझे आवाज़ लगाती हैं। हर ग्लेशियर में जैसे मेरी आत्मा का एक टुकड़ा जमा हुआ हो। पैर उठते हैं और चोटियाँ नापने लगते हैं।

-मेरे भीतर की दुनिया में है भूगर्भ…मेरी दुनिया में पेड़-पत्ते हैं….मेरी दुनिया तो पंछी हैं…मैं चींटियों की सारी प्रजातियों और उनकी जीवनशैली के बारे में जानना चाहता हूँ…।

अनगिनत लोग, हरेक के भीतर अपनी एक दुनिया..!

-एक बात बताओ, यह आदमी जो हमेशा खोया-खोया-सा रहता है, इसके भीतर भला कौनसी दुनिया बसती होगी?

-उसके भीतर दुनिया नहीं, पूरा ब्रह्मांड है। इसकी दुनिया, उसकी दुनिया, हमारी दुनिया, तुम्हारी दुनिया, हरेक की दुनिया उसके भीतर है। आँखों से दिखती दुनिया के साथ आदमी के अंतर्मन की दुनिया उसके भीतर है। आदमी को देखने, जानने, खंगालने की दुनिया है। उसकी अपनी दुनिया है, उसका अपना सौरमंडल है। वह अपनी दुनिया बनाता है, अपनी दुनिया चलाता है, वही अपनी दुनिया में प्रलय भी लाता है। उसके भीतर सृजन है, उसीके भीतर विसर्जन है।…वह कर्ता है, लेखनी से नित अपनी सृष्टि रचता है। वह लेखक है।

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४७ ⇒ राजनीति और व्यंग्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “राजनीति और व्यंग्य…“।)

?अभी अभी # ८४७ ⇒ आलेख – राजनीति और व्यंग्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

राजनीति एक शास्त्र है और व्यंग्य एक सहित्यिक विधा! जो कभी शास्त्र था, वह एक शस्त्र कब से बन गया, कुछ पता नहीं चला। वैसे तो अरस्तु को राजनीति शास्त्र का जनक माना जाता है, लेकिन भारत के संदर्भ में चाणक्य पर आकर सुई अटक जाती है। कौटिल्य शब्द से ही कूटनीति टपकती है, और कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र के बिना सभी शास्त्र अधूरे हैं।

विडंबना देखिये, अर्थशास्त्र पर अर्थ हावी हो गया, और राजनीति शास्त्र पर राजनीति। बुद्धि पर बुद्धिजीवी भारी पड़ गया और ज्ञान पर ज्ञानपीठ। और व्यंग्य जो शास्त्र नहीं था, हास्य की पगडंडियों से चलता चलता साहित्य की प्रमुख धारा में शामिल हो गया। अगर कल का राजनीति शास्त्र आज अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है, तो व्यंग्य भी किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं।।

कितने दुःख का विषय है, राजनीति से व्यंग्य है, और तो और व्यंग्य में राजनीति भी है, लेकिन राजनीति में आज व्यंग्य का नितांत अभाव है। याद आते हैं वे दिन जब संसद में ज़ोरदार बहस होती थी, शायरी होती थी, नोंकझोंक होती थी, हंगामे भी होते थे, लेकिन किसी का अपमान नहीं होता था। शून्यकाल में बहस चलती थी। प्रश्नोत्तर काल में मंत्री महोदय पर विपक्ष द्वारा प्रश्नों की बौछार कर दी जाती थी। सत्ता से अधिक लोगों में विपक्ष के लिए सम्मान था।

यूँ कहने को तो व्यंग्य और राजनीति का चोली दामन का साथ है, लेकिन दोनों की आपस में बोलचाल तक बंद है। व्यंग्य बंद कमरे में फलता-फूलता है, राजनीति सड़क पर उतर आती है। व्यंग्य पर कोई कीचड़ नहीं उछाल सकता, लेकिन अगर किसी व्यंग्यकार ने राजनीति पर कीचड़ उछाला, तो यह आपे में नहीं रहती। राजनीति को नहीं दोष परसाई।।

राजनीति में पार्टी होती है, हर पार्टी का झंडा होता है, नेता होता है, पार्टी का कोई नाम होता है। व्यंग्य इस बारे में बहुत कमजोर है। उसके पास कोई नाम नहीं, नेता नहीं, झंडा नहीं, कोई नारा नहीं। वह विघ्नसन्तोषी है! नेता, नारे, पार्टी र झंडे किसी को वह नहीं बख्शता। अतः उसे समाज में वह सम्मान प्राप्त नहीं होता जो राजनीति को होता है।

जनता नेता की दीवानी होती है, किसी व्यंग्यकार की नहीं। हमारा व्यंग्यकार कैसा हो, परसाई जैसा हो, कोई नहीं कहता।

गुटबाजी और अवसरवाद राजनीति और व्यंग्य में समान रूप से हावी है। वंशवाद के बारे में व्यंग्यकार पूरा कबीर है। कमाल के पूत होते हैं उसके! एक व्यंग्यकार का लड़का कितना भी बड़ा हो जाए, अपने पिता के जूते में पाँव डालना पसंद नहीं करता। राजनीति में तो पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं।।

शेक्सपियर के शब्दों में राजनीति और व्यंग्य Strange bedfellows हैं। राजनीति का काम व्यंग्य के बिना आसानी से चल जाता है, लेकिन व्यंग्य को राजनीति की बैसाखी की ज़रूरत पड़ती है। लेकिन व्यंग्यकार जब उसी बैसाखी से राजनीति की पिटाई कर देता है, तो बात बिगड़ जाती है। मेरी बिल्ली मुझ पर म्याऊँ! लेकिन बिल्ली बड़ी चालाक है। वह किसी के टुकड़ों पर नहीं पलती। जहाँ भी मलाई मिलती है, मुँह मार लेती है।

ज़िन्दगी में हास परिहास हो, व्यंग्य विनोद हो! राजनीति में कटुता समाप्त हो। सहमति-असहमति का नाम ही पक्ष-विपक्ष है। घर घर में विवाद होते हैं, कहासुनी होती है, स्वभावगत विरोध भी होते हैं। लेकिन जब गृहस्थी की गाड़ी आसानी से चल सकती है, तो राजनीति की क्यों नहीं। सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिये हैं। दोनों समान रूप से मज़बूत हों। राजनीति में जब व्यंग्य और विनोद का समावेश होगा, तब ही यह संभव है। आईना साथ रखें। किसी को आइना दिखाने के पहले अपना मुँह देखें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५५ – देश-परदेश – साइबर क्राइम ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५५ ☆ देश-परदेश – साइबर क्राइम ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त पेपर क्लिपिंग्स, व्हाट्स ऐप के माध्यम से प्राप्त हुई। आज रविवार को प्रातः कालीन साप्ताहिक साथियों से चर्चा का दिन हैं, इसीलिए आज एक एस बी आई बैंक अधिकारी के साथ हुए साइबर क्राइम पर ही केन्द्रित था।

जबलपुर निवासी श्री अनिल जी ननहोरिया ने विगत 22 नवंबर 2025 को 76 लाख गवां दिए हैं। साथियों ने फ्रॉड आदि से बचने के लिए अपने अपने विचार प्रस्तुत किए, जोकि आपके विचारार्थ निम्नानुसार हैं। आप के मन भी अवश्य कुछ ना कुछ विचार आ रहें होंगे, चाहें तो सब के लिए सांझा कर सकते हैं।

एक साथी ने बताया कि बैंक खाते के लिए एक अलग मोबाइल कनेक्शन रखना चाहिए। जिसकी जानकारी किसी को भी नहीं देवें।

एक दूसरे साथी ने जानकारी दी कि सभी बैंक खाते (FD,SB आदि) पत्नी के साथ Joint operation में करवा लेवें।

एक साथी ने तो ये भी कह दिया कि अधिकतम बचत राशि को बच्चों के नाम कर देवें, और भजन करें।

कहने वाले तो ये भी कहने लगे कि सोना खरीद कर लाकर में रख देना चाहिए, दिन दोगुना रात चौगुना महंगा हो जाएगा। एक और साथी लपक कर बोले, जमीन खरीद कर रख दो, ताकि कोई रंगदार कब्जा कर लेवें।

अंत में एक साथी ने कबीर का दोहा ” पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय” सुना कर आज सभी साथियों के चाय नाश्ते का बिल भर कर अपने कथन को प्रमाणित कर दिया।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४६ ⇒ बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी…“।)

?अभी अभी # ८४५ ⇒ आलेख – बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बुद्धिमान तो सभी होते हैं, लेकिन सभी बुद्धिमान बुद्धिजीवी नहीं होते! एक श्रमजीवी की तरह जिसकी आजीविका ही बुद्धि से चलती हो, वह बुद्धिजीवी। शेष को आप चाहें तो बुद्धिवादी कह सकते हैं।

हमारे यहाँ मनीषी और विद्वान होते थे, ये बुद्धिजीवी कब चले आए, कुछ पता ही नहीं चला। चाय की क्रांति के साथ ही अंग्रेज़ कॉफ़ी भी ले आए। हम कहवा, काढ़ा तो पीते ही थे, कॉफ़ी हाउस में जाकर कॉफ़ी भी पीने लगे। इस कॉफ़ी के कप में से ही नशीली जिन की तरह कॉफ़ी का जिन्न भी निकल आया। कांग्रेस के ज़माने में इन प्यालों में कई क्रांतियाँ हुईं।।

क्या दिन थे वे! कॉफ़ी हाउस में बैठकर काँग्रेस को कोसा करते थे। जॉर्ज, अटल, लोहिया और चारु मजूमदार की बातें होती थी। वह दिनमान, धर्मयुग और ज्ञानोदय का युग था। साप्ताहिक रविवार जब तक हाथों में नहीं आ जाता, Sunday नहीं मनता था। वह शौरी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और एम जे अकबर का युग था। विपक्ष एकजुट नहीं था, लेकिन जगन्नाथराव जोशी और अटल बिहारी बाजपेयी की आम सभाओं में भारी भीड़ रहती थी। सरकार बुद्धिजीवियों को पुरस्कार और सम्मान दोनों प्रदान करती थी।

लोहिया के अंग्रेज़ी विरोधी आंदोलन ने अंग्रेज़ी के भाव और बढ़ा दिए। वह एनआरआई का नहीं, ब्रेन ड्रेन का ज़माना था। विदेश प्रवास की खबर अखबार में छपती थी, फ़ोटो सहित। अंग्रेज़ी के प्रोफेसर धड़ल्ले से हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास लिख रहे थे, और साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के चहेते बने हुए थे।।

अंग्रेज़ी सहित्य पर अमेरिकन साहित्य का साया मंडरा रहा था। युद्ध की त्रासदी का असर विश्व साहित्य पर पड़ रहा था। दोस्तोवस्की, सार्त्र, काफ्का और कामू बुद्धिजीवियों की एक नई जमात खड़ी कर रहे थे। कुंठा और संत्रास ने शून्यवाद (nihilism) को जन्म दे दिया था। हेमिंग्वे हीरो wining, dining और concubining का प्रतीक बनकर रह गया था। भारतीय लेखन में भी ये प्रतीक घर कर गए थे। लेखक प्रगतिशील और जनवादी हो चले थे।

ऐसे वक्त में आपातकाल लगा और जेपी ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल बजा दिया। दूसरी आज़ादी को लोग ज़ल्द ही भूल गए और अंततः सन 2014 में कांग्रेस-युग का अंत हो गया। देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत वाली बीजेपी सरकार का गठन हुआ।।

तब तक गंगा नें बहुत पानी बह चुका था। जेपी की तरह अन्ना भी नेपथ्य में चले गए थे। केजरीवाल दिल्ली में बैठ बीजेपी से किला लड़ा रहे थे। गुजरात का चायवाला 56 इंच का सीना लेकर बनारस पहुँच चुका था। गंगा की सफाई अभियान के साथ स्वच्छ भारत अभियान और कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखा जाने लगा था।

सरकार का समर्थन और विरोध लोकतंत्र में कोई नई बात नहीं! लेकिन लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार सत्ता ने विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। बुद्धिजीवी भरमाने लगे। विश्व हिंदी सम्मेलन सांस्कृतिक सम्मेलन कहलाने लगे तथा अय्याश मार्क्सवादी बुद्धिजीवी साहित्यकारों से दूरी बनाई जाने लगी।।

बुद्धिजीवी भी सरकार के समर्थन और विरोध में खड़े हो गए। पुरस्कार वापसी ने आग में घी का काम किया और सरकार के समर्थक पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित हो गए। आज बुद्धिजीवी मात्र एक गाली बनकर रह गया है। भोली-भाली जनता को सरकार के खिलाफ करने वाला अर्बन नक्सल नहीं तो फिर और क्या है।

समझदारी में कितनी बुद्धि और कितने विवेक का मिश्रण होना चाहिए, 40-60 के अनुपात में जिस देश में ईमानदारी-बेईमानी का मिश्रण होता हो, कहना मुश्किल है। आप अगर समान अनुपात में, बुद्धि का सदुपयोग करते हैं, तो व्यावहारिक और समझदार हैं। इससे कम ज़्यादा में आपके बुद्धिहीन अथवा बुद्धिजीवी होने का खतरा है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४५ ⇒ विचार – प्रवाह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार – प्रवाह…“।)

?अभी अभी # ८४५ ⇒ आलेख – विचार – प्रवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बहता पानी निर्मला!

गंगा आये कहां से,

गंगा जाये कहां रे।

लहराये पानी में

जैसे धूप छांव रे।।

हमारे विचारों का प्रवाह भी गंगा के बहते पानी के समान ही है। एक बार अंजुलि में नदी के प्रवाह से जो जल हम भरते हैं, दूसरी बार वह जल नहीं होता। कोई नयी जलधारा हमारे हाथ में नीर समा जाती है। विचारों का आवागमन भी कुछ इसी प्रकार का होता है। जो विचार हाथ लग गया, अर्थात जिसे जब्त कर लिया गया, लिख लिया गया, वह अक्षर बन जाता है, शेष विचारों की आकाश गंगा में प्रवाहित हो जाता है।

नदी का उद्गम पहाड़ होते है।

विचारों का उद्गम मन, बुद्धि, अस्मिता और अहंकार होते है। मन का काम संकल्प विकल्प करना है। बुद्धि हमें सोचने पर मजबूर करती है। अस्मिता हमें संस्कार, परिवार और कुल मर्यादा का स्मरण करवाती है और अहंकार हमारा वर्तमान अस्तित्व है। हमारी राष्ट्रीयता, हमारा नाम, उपाधि और रुतबा सभी जगह अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है।।

जागृत अवस्था में तो विचार आना स्वाभाविक है, सुषुप्तावस्था में भी स्वप्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। वहां हमारा मन जाग रहा होता है। केवल गहरी नींद, ध्यान और अचेतावस्था में मन को शांति मिल पाती है। समुद्र की गहराई है गहरी नींद में, और ध्यान में, लेकिन वहां मोती नहीं, सिर्फ सुख चैन है, निर्विकल्प समाधि है।

जितने भी चिंतक, विचारक और दार्शनिक हुए हैं, उनके केवल वे ही विचार मूर्त रूप ले पाए हैं, जो कहीं लिपिबद्ध हुए हैं, उनके भी कई विचार प्रकट ही नहीं हो पाए। बस मन – मन मस्तिष्क में आए और बादलों की तरह बिना बरसे, मंडरा कर चले गए। विचारों का प्रवाह कभी रुकता नहीं, जो हाथ लग गया, वह सूत्र, जो फिसल गया, वह अन्तर्ध्यान।।

विचारों के प्रवाह को रोकना ध्यान कहलाता है। ध्यान करने की कोई विधि नहीं होती। सांस के आने जाने पर ध्यान देने को कहा जाता है। मन पर एक चौकीदार बिठा दिया। ध्यान कर रहे हैं, और ध्यान कहीं और है। पहले सिर्फ दरवाजे पर ध्यान दो। मन की किवड़िया अगर खुली है, तो सजना तो द्वार से प्रवेश करेंगे ही। अगर विचार नहीं, तो संकल्प विकल्प भी नहीं। कोई कविता नहीं, कोई कहानी नहीं, कोई उपन्यास नहीं, कोई महाकाव्य नहीं। विचारों का प्रकटीकरण ही सृजन है।

आनंद और सुख को कोई परिभाषित नहीं कर पाया। गूंगे ने गुड़ चखा, भर पाया। विचार अच्छे भी होते हैं और बुरे भी। वेदव्यास अगर देवताओं के गुरु हैं तो असुरों के शुक्राचार्य भी गुरु हैं। हिटलर, मार्क्स, लेनिन और अरस्तू एक विचार है। आस्तिकता और नास्तिकता विचारों के दो ध्रुव हैं, पूरब और पश्चिम है। विचारों का उगना और अस्त होना ही उनकी नियति है। विचारों से ही इतिहास बनते और बिगड़ते हैं।।

कुछ विचार हमारे होते हैं, कुछ हम किताबों से, कथित महापुरुषों से, हमारे आराध्य ग्रंथों एवं पुराणों से ग्रहण कर लेते हैं और फिर अपने विचार प्रकट करते है। उन पर बहस होती है, विवाद होते है। जब हम सही होते हैं, तो प्रसन्न होते हैं, जब कोई हमें गलत साबित करता है, तो अप्रसन्न होते हैं।

विचारों का दृष्टा बनना भी ध्यान की एक विधि है। मन को विचार से अलग रख पाना ही दृष्टा भाव है। भाव को विचार से श्रेष्ठ माना गया है। विचार चिंतन है, भाव समाधि है। विचार प्रवाह और भाव प्रवाह ऐसी नौकाएं हैं जो हमें संसार रूपी सागर की सैर कराती है। जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१३ – गीता सुगीता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१२ ☆ गीता सुगीता… ?

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।

अर्थात धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?

यह प्रश्न धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा था। यही प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम श्लोक भी है।

18 अध्यायों में विभक्त श्रीमद्भगवद्गीता 700 श्लोकों के माध्यम से जीवन के विभिन्न आयामों का दिव्य मार्गदर्शन है। यह मार्गदर्शन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञानकर्म-संन्यास योग, कर्म-संन्यास योग, आत्मसंयम योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अक्षरब्रह्म योग, राजविद्याराजगुह्य योग, विभूति योग, विश्वरूपदर्शन योग, भक्ति योग, क्षेत्रक्षेत्रज्ञ विभाग योग, गुणत्रयविभाग योग, पुरुषोत्तम योग, दैवासुरसंपद्विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग, मोक्षसंन्यास योग द्वारा अभिव्यक्त हुआ है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी को गीता का ज्ञान दिया था। गीता जयंती इसी ज्ञानपुंज के प्रस्फुटन का दिन है। इस प्रस्फुटन की कुछ बानगियाँ देखिए-

1) यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचराम्।।

अर्थात, हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों का जो बीज है, वह मैं ही हूँ। मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है।

इस श्लोक से स्पष्ट है कि हर जीव, परमात्मा का अंश है।

2) यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।

अर्थात जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।

3) न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।

अर्थात न ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा ये सारे राजा नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।

इसे समझने के लिए मृत्यु का उदाहरण लें। मृत्यु अर्थात देह से चेतन तत्व का विलुप्त होना। आँखों दिखता सत्य है कि किसी एक पार्थिव के विलुप्त होने पर एक अथवा एकाधिक निकटवर्ती उसका प्रतिबिम्ब -सा बन जाता है।

विज्ञान इसे डीएनए का प्रभाव जानता है, अध्यात्म इसे अमरता का सिद्धांत मानता है। अमरता है, सो स्वाभाविक है कि अनादि है, अनंत है।

4) या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

सब प्राणियोंके लिए जो रात्रि के समान है, उसमें स्थितप्रज्ञ संयमी जागता है और जिन विषयों में सब प्राणी जाग्रत होते हैं, वह मुनिके लिए रात्रि के समान है ।

इसके लिए मुनि शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मुनि अर्थात मनन करनेवाला, मननशील। मननशील कोई भी हो सकता है। साधु-संत से लेकर साधारण गृहस्थ तक।

मनन से ही विवेक उत्पन्न होता है। दिवस एवं रात्रि की अवस्था में भेद देख पाने का नाम है विवेक। विवेक से जीवन में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। फिर चेतना तो साक्षात ईश्वर है। ..और यह किसी संजय का नहीं स्वयं योगेश्वर का उवाच है। इसकी प्रतीति देखिए-

5) वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना हूँ।

जिसने भीतर की चेतना को जगा लिया, वह शाश्वत जागृति के पथ पर चल पड़ा। जाग्रत व्यक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का अनुयायी होता है।

6) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थात कर्म करने मात्र का तुम्हारा अधिकार है, तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

मनुष्य को सतत निष्काम कर्मरत रहने की प्रेरणा देनेवाला यह श्लोक जीवन का स्वर्णिम सूत्र है। सदियों से इस सूत्र ने असंख्य लोगों के जीवन को दिव्यपथ का अनुगामी किया है।

श्रीमद्भगवद्गीता के ईश्वर उवाच का शब्द-शब्द जीवन के पथिक के लिए दीपस्तंभ है। इसकी महत्ता का वर्णन करते हुए भगवान वेदव्यास कहते हैं,

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहै:।

या स्वंय पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता ।।

(महा. भीष्म 43/1)

श्रीमद्भगवद्गीता का ही भली प्रकार से श्रवण, कीर्तन, पठन, पाठन, मनन एवं धारण करना चाहिए क्योंकि यह साक्षात पद्मनाभ भगवान के  मुख कमल से निकली है।

गीता जयंती के अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता के नियमित पठन का संकल्प लें। अक्षरों के माध्यम से अक्षरब्रह्य को जानें, सृष्टि के प्रति स्थितप्रज्ञ दृष्टि उत्पन्न करें। शुभं अस्तु।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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