श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “बने रहो पगला”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२७ ☆
☆ व्यंग्य – बने रहो पगला ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
“वह पागल है!” जैसे ही उसने कहा. मैं बोला, “भाई! इतना समझदार आदमी पागल कैसे हैं?” तब मेरे उसे मित्र ने मुझे ही पूछ लिया, “भाई! पागल किसे कहते हैं?”
मैं उसकी और यह प्रश्न समझ नहीं पाया. इसलिए मैंने पूछ लिया, “तू ही बता दे. पागल किसे कहते हैं?”
वह हंसा. तब मैंने जवाब दिया, “जो अपना काम ढंग से ना करें, वही पागल है.”
यह अचानक मेरे मुंह से निकल गया था.
“यह तो बहुत अच्छी परिभाषा है. तभी हम व्यवहार में कह देते हैं. क्या तुझ से यह भी काम ठीक से नहीं होता है. क्या तू पागल है?”
इस तरह एक सामान्य व्यक्ति को पागल कहना पागल की तौहीन है. इसका आशय तो यह है कि आप पागल को पागल नहीं कह रहे हैं, एक सामान्य व्यक्ति को पागल कह रहे हैं जो बहुत ही समझदार हैं. तब पागल को क्या कहेंगे?
मेरे लिए बहुत ही गहन प्रश्न था. जिसका चिंतन मैं मन ही मन करता रहा. मगर पागल की परिभाषा मेरे समझ से परे थी. इसी उधेड़बुन में मैं बैठा था कि तभी वरिष्ठ कार्यालय से एक ‘अर्जेंट डॉक’ आ गई. क्योंकि मैं काम में व्यस्त था इसलिए एक सहकर्मी से कहा, “भाई साहब! यह डाक बना दीजिए. बहुत ही अर्जेंट है. अभी पहुंचाना है.”
बड़े साहब ने मेरा समर्थन किया. तब वह सहकर्मी बोला, “आप प्रारूप बना दीजिए. मैं डाक भर दूंगा.” यह सुनकर मैं एक बार झलाया. कैसा पागल है? साला! मैं इसे डाक बनाने की कह रहा हूं. और यह मुझे ही प्रारूप बनाने की कह रहा है. मगर साहब के आदेश देने पर मैंने उसे प्रारूप बना दिया.
उसने प्रारूप में जानकारी भरी. दो और तीन की जोड़ छह लिख दी. फिर मेरे सामने आकर बोला, “अरे भाई! गलती हो गई.” फिर दो-तीन साथ बोलते हुए छह को काटकर सात कर दिए.
उसकी यह हरकत देखकर मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ गया. मैंने कहा, “अरे भाई! यह क्या करते हो? दो और तीन पांच होते हैं.” मेरा यह जवाब सुनते उसने कहा, “अरे भाई! माफ करना. जल्दी में था. अभी दो और तीन पांच कर देता हूं.” और उसने वापस छह को काटकर पांच कर दिया.
पांच उसने इतनी बार काटा था कि वह नजर ही नहीं आ रहा था. वह छह, सात है या पांच है. इसी तरह उसने दूसरे कॉलम में भी बहुत कांटपिट की थी. यानी पूरा प्रारूप खराब कर दिया था.
यह देखकर वास्तव में मुझ में पागलपन का दौरा पड़ गया. मैं मन ही मन भड़क पड़ा, “साला! पागल! फोकट की तनख्वाह लेता है. एक अक्षर ठीक से लिखना नहीं आता. कामचोर कहानी का.”
मगर मैं प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोला. उससे कहा, “साहब के पास ले जाकर साइन करा दीजिए. तब उसने तपाक से जवाब दिया, “साहब के पास तो आप ही जाइए,” कहते हुए उसने कागज वहीं पटक दिया.
आखिर कागज साहब के पास मुझे ले जाना पड़ा. फिर वही हुआ जिसका मुझे अंदेशा था. साहब ने मुझे कागज दिखाते हुए कहा, “यह क्या है? यह कागज अधिकारी को भेजूंगा तो मुझे पागल समझेंगे. इसे दोबारा बनाओ.”
तब मेरे इस सहकर्मी ने कहा, “आप प्रारूप बना दीजिए. इस बार में अच्छी तरह भर दूंगा. मैंने दोबारा प्रारूप बनाकर उसे दिया. फिर उसने वही गलती दोहरा दीं. तब मजबूर होकर तीसरी बार मैंने प्रारूप बनाकर स्वयं ही भर दिया. मैं नहीं चाहता था कि चौथी बार मुझे प्रारूप बनाना पड़े.
इसके बाद मैंने सहकर्मी को कभी काम करने को नहीं कहा. क्योंकि मुझे पता था एक बार उससे काम कराया तो दोबारा मुझे ही करना पड़ेगा. इसलिए स्वयं ही काम करने में अपनी भलाई थी. ताकि एक बार में वह काम हो जाए.
मगर, वह वास्तव में वह पागल था या मुझे पागल बना रहा था. वह मुझे जल्दी ही पता चल गया. उसकी एक बस चलती थी. जिसमें वह सुबह शाम पैसे कलेक्ट किया करता था. उसी बस से मुझे एक बार गांव जाने पड़ा.
मैं बस में पीछे बैठा था. सहकर्मी कंडक्टर से एक सीट पर हिसाब लिख रहा था. तब उसकी गणित देखकर मैं दंग रह गया. यहां पर वह रूपए पैसे का हिसाब बिल्कुल एक्यूरेट लिख रहा था. चाहे जितना भी बड़ा अमाउंट हो, उससे वह गलत नहीं हो रहा था.”
यह देखकर मुझे बहुत ताजुब हुआ. वास्तव में वह पागल नहीं था. वह मुझे पागल बना रहा था. ताकि मैं पागल बनकर उसका और मेरा काम करता रहूं. तभी मुझे मालूम हुआ कि यह मंत्र कितना अच्छा है~ बने रहो पगला, काम करेगा अगला.
अब मुझे समझ आया था कि पागल बनने के कितने फायदे हैं. एक तो आपको काम नहीं करना पड़ता. दूसरा, एक ही काम को बार-बार करने से आप व्यस्त दिखते हो. लोगों को लगता है कि आप बहुत काम करते हो. आपके पास समय नहीं है. यदि आपसे काम करवाना है तो फुर्सत में मिलना पड़ेगा.
दूसरा, कोई व्यक्ति बेवजह आपके पास नहीं आता है. जिसको भी काम होगा वह आपको चाय की कैंटीन में ले जाएगा. साहब जी चाय पीकर आते हैं. आप बहुत काम कर रहे हो. इसलिए थोड़ा थक गए होंगे. थोड़ा आराम कर लीजिए.
तीसरा, काम करते हुए साहब भी आपको डिस्टर्ब करना पसंद नहीं करते हैं. वे सोचते हैं कि यह व्यक्ति तो काम करता रहता है. किसी दूसरे व्यक्ति को काम देना चाहिए. इसलिए उल्टा सीधा लिखने का, यह तीसरा सबसे बड़ा फायदा है.
चौथा फायदा मेरे मित्र ने बताया था. उसने कहा था, “यदि आपको सभी के बीच बहुत ही मेहनती और वर्कर बना रहना है तो आपको एक मंत्र अपनाना होगा.”
तब मैंने तपाक से पूछा, “आप भी बता दीजिए.”
तब उसने कहा कि वह मंत्र है कि काम की फिक्र करो. काम का जिक्र करो. बार-बार जोर-जोर से कहो. मगर काम मत करो.
यह फायदा सुनकर मेरे मुंह से निकल गया, “वाह मित्र! बहुत ही बेहतरीन नुस्खा बताया है. शायद मैं अमल में ला सकूं. इसकी कोशिश करूंगा.” मैंने यह अपनाने की कोशिश भी की. पर मेरा पागल मन इसे अपने को तैयार नहीं हुआ. वह कहने लगा तू इतना भी पागल नहीं है कि पागल बनने का ढोंग कर सके.
मगर, जब धीरे-धीरे मैंने अपने आसपास निगाहें दौड़ना शुरू किया तब मालूम हुआ कि इतने कामगारों की बीच में ही अकेला पागल हूं. जो अपना काम पूरे पागलपन से करता हूं. वे सब समझदार व बुद्धिमान लोग, मुझे हिकारत की नजर से देखते हैं.
मेरे एक तीसरे मित्र को देखा. वह अपने आसपास फाइलों का ढेर लगा लेता है. बीच में अपना कागज निकाल कर अपना निजी काम करता है. जब भी कोई साहब आए, झट से फाइल में लिखना शुरू कर देता है. तब अपना कागज नीचे दबा देता है.
मैं कई दिनों से उसे देख रहा था. तब मुझे लगा कि वास्तव में इस जैसा समझदार कोई नहीं है. तब मुझे एक नई परिभाषा सूझ गई. जो दूसरे को पागल बना दे वह सबसे बड़ा समझदार है. इस परिभाषा के मद्देनजर मैं ही दूसरों को सबसे बड़ा पागल दिखाई दे रहा था.
मैं अभी यही सोच रहा था कि उसे सहकर्मी के पास एक व्यक्ति आकर सामने बैठ गया. उसने झट से उसकी तरफ देखा. वह कुछ बोलना चाहता था कि सहकर्मी ने रोक दिया. अभी एक मिनट रुक जाइए. मुझे बहुत अर्जेंट काम है. उसके बाद में आपका काम सुनता हूं.
यह इशारा कर के वह फाइल में अपना काम करने लगा. सामने वाला आधे घंटे तक उसके सामने बैठा रहा. उसके बाद मजबूरन में उसे कहना पड़ा, “साहब! मेरी सुन लीजिए मुझे बहुत जरूरी काम है. दुकान छोड़कर आया हूं.”
“ठीक है. बताइए,” कहकर सहकर्मी मित्र ने उसकी बात सुनी. और हां~ हूं करते हुए फाइल को देखता रहा. जिससे लगे कि वह सबसे व्यस्ततम सहकर्मी है. उसे सांस लेने तक की फुर्सत नहीं है.
यह देखकर संक्षिप्त में उसे मित्र ने कुछ बात कही और मेरे सहकर्मी को एक लिफाफा पकड़ कर चल दिया. यह देखकर मुझे लगा कि वास्तव में लिफाफा कमाना हो और अपने को व्यस्त दिखाना जरूरी हैं. नहीं तो इस पागलपन से बढ़कर कोई दूसरा चारा नहीं.
तब मैं ने भी सोचा कि मैं भी इस मंत्र को अपनाने की कोशिश करूं. बने रहो पगला, काम करेगा अगला. मगर, जब इसमें कामयाब नहीं हुआ तो मैं दूसरे मंत्र को अपनाने की कोशिश की. काम की फिक्र करो, काम का जिक्र करो, उसकी खूब चर्चा करो, पर काम ना करो. मगर मैं उसमें अभी तक कामयाब नहीं हुआ हूं. लगता है कभी ना कभी तो कामयाब होऊंगा.
यदि आप भी चाहे तो इसका उपयोग करके अपना जीवन सफल बना सकते हैं.
© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
20/07/2024
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