हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 15 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 15 ??

लोकपरंपराओं, लोकविधाओं- गीत, नृत्य, नाट्य, आदि का जन्मदाता कोई एक नहीं है। प्रेरणास्रोत भी एक नहीं है। इनका स्रोत, जन्मदाता, शिक्षक, प्रशिक्षक, सब लोक ही है। गरबा हो, भंगड़ा हो,  बिहू हो या होरी, लोक खुद इसे गढ़ता है, खुद इसे परिष्कृत करता है। यहाँ जो है, समूह का है। जैसे ॠषि परंपरा में सुभाषित किसने कहे, किसने लिखे का कोई रेकॉर्ड नहीं है, उसी तरह लोकोक्तियों, सीखें किसी एक की नहीं हैं। परंपरा की चर्चा अतीतजीवी होना नहीं होता। सनद रहे कि अतीत के बिना वर्तमान नहीं जन्मता और भविष्य तो कोरी कल्पना ही है। जो समुदाय अपने अतीत से, वह भी ऐसे गौरवशाली अतीत से अपरिचित रखा जाये. उसके आगे का प्रवसन सुकर कैसे होगा? विदेशी शक्तियों ने अपने एजेंडा के अनुकूल हमारे अतीत को असभ्य और ग्लानि भरा बताया। लज्जित करने वाला विरोधाभास यह है कि निरक्षरों का ‘समूह’, प्राय: पढ़े-लिखों तक आते-आतेे ‘गिरोह’ में बदल जाता है। गिरोह निहित स्वार्थ के अंतर्गत कृत्रिम एकता का नारा उछालकर उसकी आँच में अपनी रोटी सेंकता है जबकि समूह एकात्मता को आत्मसात कर, उसे जीता हुआ एक साथ भूखा सो जाता है।

लोक का जीवन सरल, सहज और अनौपचारिक है। यहाँ छिपा हुआ कुछ भी नहीं है। यहाँ घरों के दरवाज़े सदा खुले रहते हैं। महाराष्ट्र के शिर्डी के पास शनैश्वर के प्रसिद्ध धाम शनि शिंगणापुर में लोगों के घर में सदियों से दरवाज़े नहीं रखने की लोकपरंपरा है। कैमरे के फ्लैश में चमकने के कुछ शौकीन ‘चोरी करो’(!) आंदोलन के लिए वहाँ पहुँचे भी थे। लोक के विश्वास से कुछ सार्थक घट रहा हो तो उस पर ‘अंधविश्वास’ का ठप्पा लगाकर विष बोने की आवश्यकता नहीं। खुले दरवाज़ों की संस्कृति में पास-पड़ोस में, मोहल्ले में रहने वाले सभी मामा, काका, मामी, बुआ हैं। इनमें से कोई भी किसीके भी बच्चे को अधिकार से डाँट सकता है, अन्यथा मानने का कोई प्रश्न ही नहीं। इन आत्मीय संबोधनों का परिणाम यह कि सम्बंधितों के बीच  अपनेपन का रिश्ता विकसित होता है। गाँव के ही संरक्षक हो जाने से अनैतिक कर्मों और दुराचार की आशंका कम हो जाती है। विशेषकर बढ़ते यौन अपराधों के आँकड़ों पर काम करने वाले संबोधन द्वारा उत्पन्न होने वाले नेह और दायित्व का भी अध्ययन करें तो तो यह उनके शोध और समाज दोनों के लिए हितकर होगा।

क्रमशः…

© संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆☆ लघुकथा – अपने लिए ☆☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका) ☆

श्री विजय कुमार

 

(आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक श्री विजय कुमार जी  की एक विचारणीय लघुकथा  अपने लिए)

☆ लघुकथा – अपने लिए ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका) ☆

किसी बड़ी कारपोरेट कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों की तरह वर्दीनुमा कपड़े पहने कुछ सुंदर नौजवान युवक-युवतियों ने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किया और एक-एक कर अपनी कंपनी की तरफ से दिए गए उत्पाद सभी को दिखाने लगे। सभी को कंपनी-संचालक द्वारा एक बंधे-बंधाये प्रबंधन कोर्स की तरह प्रशिक्षित किया गया था और वह एक रट्टू तोते की तरह बोलकर अपने उत्पादों की अच्छाइयां और उनके अनूठे उपयोगों के बारे में बता रहे थे। साथ ही, एक के साथ एक मुफ्त या एक के दाम में दो का भी प्रलोभन दे रहे थे, जैसा कि ग्राहकों को लुभाने, या सरल शब्दों में कहें तो फंसाने का एक कारगर उपाय होता है। कुछ साथी कर्मचारी इस अंत में दिए गए मारक जाल में आ गए थे, और अपनी आवश्यकताओं या पसंद के अनुसार कुछ ना कुछ खरीद रहे थे। किसी-किसी ने वर्तमान की बेरोजगारी को ध्यान में रखते हुए भी उन नवयुवक और नवयुवतियों के प्रति अपना नैतिक कर्तव्य निभाते हुए कुछ उत्पाद लिए, तो एक-दो का उनके प्रति आकर्षण भी कारण रहा होगा।

अब जब वह मेरे सामने खड़े रटे-रटाए वाक्य बोलने को हुए तो मैंने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया, “एक बात बताओ, तुम्हें इस काम के कितने पैसे मिलते हैं?” वह एक-दूसरे को देखने लगे। मैंने कहा, “छोड़ो, जितने भी मिलते होंगे, पर इतने नहीं कि जिन्हें तुम्हारी दिनभर की दौड़-धूप के अनुसार संतोषजनक या ज्यादा कहा जा सके, क्यों?”

वह चुपचाप खड़े थे जिससे मुझे यह अंदाजा हो गया था कि मैं काफी हद तक सही हूं।

मैंने फिर कहा, “यह तो तुम लोग भी जानते हो कि यह सारे प्रोडक्ट, जो तुम लोग बेच रहे हो, वह उत्तम गुणवत्ता वाले या नामी कंपनियों के नहीं हैं। इनमें बहुत मार्जिन होता है। तुम लोगों को थोड़ा सा लाभ देकर ज्यादातर लाभ कंपनी या एजेंसी के पास चला जाता है, जबकि तुम इन्हें बेचने के लिए अपना पूरा पसीना बहा देते हो। तो क्यों नहीं तुम लोग अपना स्वयं का कोई काम शुरू करके उसमें अपना श्रम और शक्ति लगाते। कम से कम किसी मुकाम तक तो पहुंचोगे, और तुम्हें तुम्हारी मेहनत का पूरा फल भी मिलेगा। तुम्हें किसी के अधीन रहकर नहीं, बल्कि आजादी से काम करने को मिलेगा और तुम दूसरों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करोगे, अपने लिए…।”

***

©  श्री विजय कुमार

सह-संपादक ‘शुभ तारिका’ (मासिक पत्रिका)

संपर्क – # 103-सी, अशोक नगर, नज़दीक शिव मंदिर, अम्बाला छावनी- 133001 (हरियाणा)
ई मेल- urmi.klm@gmail.com मोबाइल : 9813130512

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 3 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका – भाग – 3 ??

एकता शब्द व्यक्तिगत रूप से मुझे अँग्रेजी के ‘यूनिटी’ के अनुवाद से अधिक कुछ नहीं लगता। अनेक बार राजनीतिक दल, गठबंधन की विवशता के चलते अपनी एकता की घोषणा करते हैं। इस एकता का छिपा एजेंडा हर मतदाता जानता है। हाउसिंग सोसायटी के चुनाव हों या विभिन्न देशों के बीच समझौते, राग एकता अलापा जाता है।

लोक, एकता के नारों और सेमिनारों में नहीं उलझता। वह शब्दों को समझने और समझाने, जानने और पहचानने, बरगलाने और उकसावे से कोसों दूर खड़ा रहता है पर लोक शब्दों को जीता है। जो शब्दों को जीता है, समय साक्षी है कि उसीने मानवता का मन जीता है। यही कारण है कि ‘एकता’ शब्द की मीमांसा और अर्थ में न पड़ते हुए लोक उसकी आत्मा में प्रवेश करता है।  इस यात्रा में एकता झंडी-सी टँगी रह जाती है और लोक ‘एकात्मता’ का मंदिर बन जाता है। वह एकात्म होकर कार्य करता है। एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हुए भी ‘एकता’ बहुत छोटा शब्द है ‘एकात्मता’ के आगे। अत: इन पंक्तियों के लेखक ने शीर्षक में एकात्मता का प्रयोग किया है। कहा भी गया है,

‘प्रकृति पंचभूतानि ग्रहा लोका: स्वरास्तथा/ दिश: कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मंगलम्।’

एकात्मता के दर्शन से लोक का विशेषकर ग्राम्य जीवन ओतप्रोत है। आज तो संचार और परिवहन के अनेक साधन हैं।  लगभग पाँच दशक पहले तक भी राजस्थान के मरुस्थली भागों में एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए ऊँट या ऊँटगाड़ी (स्थानीय भाषा में इसे लड्ढा कहा जाता था) ही साधन थे। समाज की आर्थिक दशा देखते हुए उन दिनों ये साधन भी एक तरह से लक्जरी थे और समाज के बेहद छोटे वर्ग की जद में थे। आम आदमी कड़ी धूप में सिर पर टोपी लगाये पैदल चलता था। यह आम आदमी दो-चार गाँव तक पैदल ही यात्रा कर लेता था। रास्ते के गाँव में जो कुएँ पड़ते वहाँ बाल्टी और लेजु (रस्सी) पड़ी रहती। सार्वजनिक प्याऊ के गिलास या शौचालय के मग को चेन से बांध कर रखने की आज जैसी स्थिति नहीं थी। कुएँ पर महिला या पुरुष भर रहा होता तो पथिक को सप्रेम पानी पिलाया जाता। उन दिनों कन्यादान में पूरे गाँव द्वारा अंशदान देने की परंपरा थी। अत: सामाजिक चलन के कारण पानी पीने से पहले पथिक पता करता कि इस गाँव में उसके गाँव की कोई कन्या तो नहीं ब्याही है। मान लीजिये कि पथिक ब्राह्मण है तो उसे पता होता था कि उसके गाँव के किस ब्राह्मण परिवार की कन्या इस गाँव में ब्याही है। इसी क्रम में वह अपने गाँव का हवाला देकर पता करता कि उसके गाँव की कोई वैश्य, क्षत्रिय या हरिजन कन्या तो इस गाँव  में नहीं ब्याही। जातियों और विशेषकर धर्मों में ‘डिफॉल्ट’ वैमनस्य देखनेवालों को पता हो कि पथिक यह भी तहकीकात करता कि किसी ‘खाँजी’ (मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए तत्कालीन संबोधन) की बेटी का ससुराल तो इस गाँव में नहीं है। यदि दूसरे धर्म की कोई बेटी, उसके गाँव की कोई भी बेटी, इस गाँव में ब्याही होती तो वहाँ का पानी न पीते हुए 44-45 डिग्री तापमान की आग उगलती रेत पर प्यासा पथिक आगे की यात्रा शुरू कर देता। ऐसा नहीं कि इस प्रथा का पालन जाति विशेष के लोग ही करते। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, हरिजन, खाँजी, सभी करते। एक आत्मा, एकात्म, एकात्मता के इस भाव का व्यास, कागज़ों की परिधि में नहीं समा सकता।

क्रमशः…

© संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ #125 – विजय साहित्य – आला आला कवी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # 125 – विजय साहित्य ?

☆ आला आला कवी…!  कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

 (अतिशयोक्ती अलंकार)

आला आला कवी

वाचू लागला वही

चार तासांनी म्हणे

ही होती फक्त सही….!

 

कविता त्याची नाजूक

खसखशी पेक्षाही छोटी

मुंगी सुद्धा त्यांच्यापुढे

शंभर पट मोठी…!

 

आला आला कवी

किती त्याचे पुरस्कार

रद्दिवाला म्हणे

घेतो हप्त्यात चार..!

 

आला आला कवी

चला म्हणे घरी

दाखवतो तुम्हाला

स्वर्गातली परी…!

 

आला आला कवी

पिळतोय मिशा

शब्दांच्या कोट्यांनी

भरलाय खिसा…!

 

आला आला कवी

खांद्याला झोळी

शब्दांच्या भाकरीत

पुरणाची पोळी…!

 

आला आला कवी

चोरावर मोर

जोरदार घेई टाळ्या

कोल्हाट्याचं पोर…!

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आँखें ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – आँखें ??

आँखें

देखती हैं वर्तमान,

बुनती हैं भविष्य,

जीती हैं अतीत,

त्रिकाल होती हैं आँखें…!

 

© संजय भारद्वाज

श्रीविजयादशमी 2019, अपराह्न 4.27 बजे।

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अक्षय… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – अक्षय…✍️ ??

मैं पहचानता हूँ

तुम्हारी पदचाप,

जानता हूँ

तुम्हारा अहंकार,

झपटने, गड़पने

का तुम्हारा स्वभाव भी,

बस याद दिला दूँ,

जितनी बार गड़पा तुमने,

नया जीवन लेकर लौटा हूँ मैं,

तुम्हें चिरंजीव होना मुबारक

पर मेरा अक्षय होना

नहीं ठुकरा सकते तुम..!

🌹 अक्षयतृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹

© संजय भारद्वाज

12.11 बजे, 22.10.2020

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संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 30 – सजल – सौगंध खाई निभाने की खूब मगर… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है दोहाश्रित सजल “सौगंध खाई निभाने की खूब मगर… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 30 – सजल – सौगंध खाई निभाने की खूब मगर… 

समांत -आने

पदांत -लगे हैं

मात्रा भार -२२

 

दोस्त देखकर आँखें चुराने लगे हैं ।

मित्रता की तराजू झुकाने लगे हैं।।

 

सौगंध खाई निभाने की खूब मगर,

सीढ़ियांँ जब चढ़ीं तो गिराने लगे हैं।

 

खाए कभी सुदामा ने छिपाकर चने,

गरीब को चुभे दंश रुलाने लगे हैं।

 

कन्हैया सा दोस्त,अब मिलेगा कहाँ,

प्रतीकों में बनकर लुभाने लगे हैं।

 

भूल जाने की आदत सदियों से रही ,

आज फिर नेक सपने सुहाने लगे हैं ।

 

स्वार्थ की बेड़ियों में बँथे हैं सभी,

खोटे-सिक्कों को सब भुनाने लगे हैं।

 

तस्वीरें बदली हैं इस तरह देखिए,

चासनी लगा बातें, सुनाने लगे हैं ।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ कोसी- सतलज एक्सप्रेस -भाग-1 – डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधुरी ☆ अनुवाद – सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

? जीवनरंग ❤️

☆ कोसी- सतलज एक्सप्रेस -भाग-1 (भावानुवाद) – डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधुरी ☆ सौ. गौरी सुभाष गाडेकर ☆

सव्वा लाख क्यूसेक पाणी!म्हणजे किती कोणास ठाऊक! पुराच्या काळात रोज एवढं पाणी कोसी नदीतून वाहत असतं. एरव्ही मात्र, सप्टेंबर महिन्यात फक्त पाच लाख क्यूसेक एवढंच वाहतं. आणि ऑक्टोबरात किंवा अश्विनात नऊ लाख क्यूसेक.

काही दिवसांपूर्वी निरूपद्रवी असलेल्या ह्या सापाचं दोन दिवसांपूर्वी अजस्र, क्रूर, सगळं गिळंकृत करणाऱ्या ऍनाकोंडात रूपांतर झालं.

आणि आता कोसी थोडी मवाळ झाली आहे .दोन्ही किनाऱ्यांवरून दुथडी भरून भरधाव वेगाने वाहणारं पाणी थोडं निवळलंय. आता कोसी नदी डौलात  वाहत आहे.

पानार, लोहनद्रा, महानदी आणि बकरा या तिच्या सर्व उपनद्यांचा पूर्वी नारिंगी असणारा रंग आता गढूळ झाला आहे .हरणाची शिकार करून ते अख्खेच्या अख्खे गिळल्यावर अजगर जसा सुस्तावतो, अगदी तशीच कोसीही अगदी शांत, एखाद्या मुलासारखी सालस झाली आहे. दिवसेंदिवस पाण्याची पातळी खाली खाली जात आहे. रोज, प्रत्येक प्रहराला लोक त्यांच्या कोसीमातेची प्रार्थना करत आहेत, ‘हे कोसीदेवी, आमच्यावर कृपा कर. पुरामुळे झालेल्या या प्रलयापासून आम्हाला वाचव!’

हॅरिसनगंज स्टेशनच्या फलाटावरची गर्दी आज ओसरल्यासारखी वाटतेय. काही लोक आपल्या घरी परतले आहेत. जे जाऊ शकले नाहीत, ते मागेच थांबले आहेत.बहुधा त्यांची घरं राहिलेली नाहीत किंवा त्यांच्या झोपड्या अर्ध्याअधिक चिखलात बुडालेल्या आहेत.नाहीतर एखादं मेलेलं, कुजलेलं जनावर -कुत्रा किंवा म्हैस – तिथे पडलं आहे आणि त्याची एवढी दुर्गंधी आजूबाजूला पसरली आहे, की अंगणातसुद्धा पाय ठेवणं मुश्किल झालं आहे. काहीजण आपल्या म्हाताऱ्या आई-वडिलांना किंवा मुलांना मागे सोडून पुन्हा फलाटावर आले आहेत. पुराने पाण्याबरोबर आणलेली एवढी रेती त्यांच्या शेतात पसरली आहे की ते आता तिथे कसलंच पीक काढू शकत नाहीत. काही लोक तर मजुरी -रोजगारीच्या आशेने गुजरात वा पंजाबसारख्या लांबच्या प्रांतात चालले आहेत.

रेल्वेमंत्री याच मतदारसंघातून निवडून आलेले आहेत. त्यांनी जाहीर केलं आहे की सहरसा, अररिया, कटिहार, सुपौल, पूर्णिया आणि मधेपुरा वगैरे ठिकाणाहून लोक विनातिकीट प्रवास करू शकतील. त्यामुळे हॅरिसनगंज स्टेशनजवळचे रेल्वे मार्ग दुरुस्त केले आहेत व त्यावरून गाड्या पुन्हा धावू लागल्या आहेत. लोक गाडीत चढले, तर कोणीही त्यांची तिकिटं तपासायला येणार नाहीत. आणि त्यामुळे तिकडे लोकांची एकच गर्दी झाली आहे. गाडी आतून तर भरलीच आहे, शिवाय टपावरही लोक बसले आहेत. प्रत्येक गाडीत तुफान गर्दी आहे. स्पष्टच सांगायचं, तर माणसं भरून ओतत आहेत.

एका सुक्या खडखडीत हातपंपासमोर बिरोजा विडी ओढत बसलाय. दोन दिवस अन्नाशिवायच गेले. आज दुपारी बहुधा डाळभात वाटतील. नशीब चांगलं असेल, तर एखादा कांदाही मिळेल प्रत्येकाला. तो आता फलाटावर फिरत आहे. ओळखीच्या प्रत्येक माणसाला विचारून याविषयी माहिती काढायचा प्रयत्न करत आहे. आणि जर ही माहिती खरी असेल, तर त्याला बांधावर जाऊन त्याच्या मुलीला -जनकदुलारीला -इकडे घेऊन यायचं आहे. त्याचे मुलगे मुरली आणि माधो दोघेही इथेच आहेत, फलाटावर खेळत आहेत. आणि त्याची बायको कालव्याच्या बांधाजवळ, जनकदुलारीबरोबर त्याची वाट पाहत आहे. सगळ्यात धाकटा छोटू तिच्या मांडीवर झोपला आहे.

क्रमश: ….

 मूळ इंग्रजी कथा – ‘कोसी- सतलज एक्सप्रेस’ मूळ लेखक – डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधुरी 

अनुवाद : सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

संपर्क –  1/602, कैरव, जी. ई. लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगाव (पश्चिम), मुंबई 400104.

फोन नं. 9820206306

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ १९ मार्च – संपादकीय – सौ. गौरी गाडेकर ☆ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सौ. गौरी गाडेकर

? ई -अभिव्यक्ती -संवाद ☆  १९ मार्च -संपादकीय – सौ. गौरी गाडेकर -ई – अभिव्यक्ती (मराठी) ?

विनायक लक्ष्मण छत्रे

विनायक लक्ष्मण ऊर्फ केरूनाना छत्रे (16 मे 1825 – 19 मार्च 1884) हे प्राचीन भारतीय तसेच आधुनिक गणित व खगोलशास्त्र यांचे अभ्यासक होते. विष्णुशास्त्री चिपळूणकर, लो. टिळक, गो. ग. आगरकर ह्यांचे ते गुरू होते.

त्यांचा जन्म अलिबागमधील नागाव येथे झाला. पण बालपणीच आई -वडील गेल्याने ते शिक्षणासाठी मुंबईला चुलत्यांकडे आले. त्यांच्यामुळेच असामान्य बुद्धिमत्तेच्या केरूनानांना वाचनाची गोडी व कोणत्याही प्रश्नाकडे वस्तूनिष्ठ दृष्टीने पाहण्याची सवय लागली. एल्फिन्स्टन इन्स्टिटयूटमध्ये आचार्य बाळशास्त्री जांभेकर व प्रा. आर्लिबार या व्यासंगी गुरूंकडून मिळालेल्या मूलभूत ज्ञानामुळे गणित, खगोल व पदार्थविज्ञानासारख्या कठीण शास्त्रांत त्यांना गती प्राप्त झाली. प्रगल्भ ग्रंथांचे परिशीलन करून केरूनानांनी या विषयातले प्रगत ज्ञान मिळवले.

आर्लिबर यांनी आपल्या वेधशाळेत अवघ्या सोळा वर्षांच्या केरूनानांना दरमहा 50 रु. पगारावर नेमले. तेथे दहा वर्षे केरुनानांनी जागरूकपणे हवामानशास्त्राचे शिक्षण घेतले. त्यानंतर पुणे महाविद्यालयात व अभियांत्रिकी महाविद्यालयात ते गणित व सृष्टीशास्त्र शिकवत होते. ते हंगामी प्राचार्यही होते.

केरुनानानी शालेय पातळीवर गणित व पदार्थविज्ञानावर सुबोध व मनोरंजक भाषेत क्रमिक पुस्तके लिहिली.

त्यांनी मराठीत समर्पक, सुटसुटीत व अर्थवाही शब्द योजले. उदा. केषाकर्षण, भरतीची समा वगैरे. ‘कालसाधनांची कोष्टके ‘ व ‘ग्रहसाधनांची कोष्टके’, ‘कुभ्रम निर्णय’ इत्यादी ग्रंथ त्यांनी लिहिले.

केरुनानांनी ‘ज्ञानप्रसारक सभे’पुढे हवा, भरती -ओहोटी, कालज्ञान वगैरे विषयांवर निबंध वाचले.’हवे’वर तर एकूण 17 निबंध आहेत.’पृथ्वीवर पडणारा पाऊस व सूर्यावरील डाग’ या विषयावरही एक निबंध होता.

केरुनानांना शास्त्रीय संगीत व नाटकांचीही आवड होती.

ते दिवंगत झाल्यावर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ने त्यांना ‘जर प्रो. छत्रे यांना युरोपात पद्धतशीर शिक्षण मिळाले असते, तर ते एक युगप्रवर्तक शास्त्रज्ञ म्हणून गाजले असते, ‘ अशी श्रद्धांजली वाहिली.

 

जनार्दन बाळाजी मोडक

जनार्दन बाळाजी मोडक (३१ डिसेंबर १८४५ – १९ मार्च १८९२ ) हे मराठी आणि संस्कृत काव्याचे चिकित्सक व संग्राहक होते. पुणे येथे बी.ए.च्या वर्गात असतानाच ते मेजर थॉमस कॅन्डी यांच्या हाताखाली भाषांतरकार म्हणून नोकरीला लागले. नंतर मोडक ठाणे शहरातील एका शाळेत शिक्षक झाले. महाराष्ट्र सारस्वतकार विनायक लक्ष्मण भावे यांच्यावर मोडकांचा मोठा प्रभाव होता.

‘विविधज्ञानविस्तार’मध्ये त्यांनी ज्योतिष, गणिताविषयी अनेक लेख लिहिले. त्यात भास्कराचार्यांच्या ‘लीलावती’चे भाषांतर, संस्कृत कवींची चरित्रे, संस्कृत काव्यातील सौंदर्य व पुस्तकपरीक्षण यांचाही समावेश होता. याखेरीज त्यांचे मराठी काव्यासंबंधीचे लेख ‘निबंधमाला’, ‘निबंधचंद्रिका’, ‘शालापत्रक’, ‘अरुणोदय’, ‘इंदुप्रकाश’ आदी मासिकांतून प्रसिद्ध झाले.’काव्येतिहाससंग्रह’ व ‘काव्यसंग्रह’ या मासिकांच्या संपादनाची जबाबदारीही त्यांनी उत्तमपणे पार पाडली. याशिवाय त्यांनी ‘जगाच्या इतिहासाचे सामान्य निरूपण’, ‘भास्कराचार्य व तत्कृत ज्योतिष ‘, ‘वेदांग ज्योतिषाचे मराठी भाषांतर ‘ ही पुस्तकेही लिहिली.
या प्रकांड पंडिताचे निधन ठाण्यात वयाच्या अवघ्या सत्तेचाळीसाव्या वर्षी झाले.

केरूनाना छत्रे व जनार्दन बाळाजी मोडक या दोन पंडितांना त्यांच्या स्मृतिदिनी आदरपूर्वक श्रद्धांजली. 🙏🏻🙏🏻

सौ. गौरी गाडेकर

ई–अभिव्यक्ती संपादक मंडळ

मराठी विभाग

संदर्भ :साहित्य साधना कऱ्हाड, शताब्दी दैनंदिनी. विकिपीडिया

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 100 ☆ बुंदेलखंड की कहानियाँ # 11 – …लरका रोबैं न्यारे खौं ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

श्री अरुण डनायक जी ने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर कई कहानियों की रचना की हैं। इन कहानियों में आप बुंदेलखंड की कहावतें और लोकोक्तियों की झलक ही नहीं अपितु, वहां के रहन-सहन से भी रूबरू हो सकेंगे। आप प्रत्येक सप्ताह बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ बुंदेलखंड की कहानियाँ आत्मसात कर सकेंगे।)

बुंदेलखंड कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है। यहां के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय कृषि कार्य ही रहा है। यह कृषि वर्षा आधारित रही है। पथरीली जमीन, सिंचाई के न्यूनतम साधन, फसल की बुवाई से लेकर उसके पकनें तक प्रकृति की मेहरबानी का आश्रय ऊबड़ खाबड़ वन प्रांतर, जंगली जानवरों व पशु-पक्षियों से फसल को बचाना बहुत मेहनत के काम रहे हैं। और इन्ही कठिनाइयों से उपजी बुन्देली कहावतें और लोकोक्तियाँ। भले चाहे कृषि के मशीनीकरण और रासायनिक खाद के प्रचुर प्रयोग ने कृषि के सदियों पुराने स्वरूप में कुछ बदलाव किए हैं पर आज भी अनुभव-जन्य बुन्देली कृषि कहावतें उपयोगी हैं और कृषकों को खेती किसानी करते रहने की प्रेरणा देती रहती हैं। तो ऐसी ही कुछ कृषि आधारित कहावतों और लोकोक्तियों का एक सुंदर गुलदस्ता है यह कहानी, आप भी आनंद लीजिए।

☆ कथा-कहानी # 100 – बुंदेलखंड की कहानियाँ – 11 – …लरका रोबैं न्यारे खौं ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

अथ श्री पाण्डे कथा (1)

पांडे रोबैं रोटी खौं, पांडेन रोबैं धोती खौं, लरका रोबैं न्यारे खौं।

शाब्दिक अर्थ :- विपन्नता की स्थिति में खान पान और रहन सहन पूरा अस्त व्यस्त हो जाता है।

कोपरा नदी के किनारे बसे खेजरा गाँव में सजीवन पाँडे अपनी पत्नी रुकमणी व पुत्र भोला के साथ शिव  मंदिर के बाड़े में छोटी सी कुटिया बनाकर रहते थे। सजीवन पाँडे बड़े भुनसारे उठते, झाड़े जाते, नित्य क्रिया से फुरसत हो कोपरा नदी में 5-6 डुबकी लगा स्नान करते। स्नान के पूर्व अपनी  धोती को धोकर सुखाने के लिए बगराना न भूलते। ऐसा नहीं था की सजीवन पाँडे के पास इकलौती धोती थी, उनके पास धोती, कुर्ता और गमछा एक और सेट था, जिसे वे बड़ा संभालकर रखते और जब कभी कोई बड़ा जजमान उन्हे कथा पूजन में बुलाता तो इन कपड़ों को पहन माथे पर बड़ा सा त्रिपुंड टीका लगाकर, काँख में पोथी पत्रा दबाकर बड़े ठाट से जजमानी करने जाते। जजमानी में जाते वक्त उनकी इच्छा होती की जजमान दान दक्षिणा में एक सदरी दे दे तो उनका कपड़ों का सेट पोरा हो जाय। लोधी पटेलों और काछियों की इस गरीब बसाहट में उनकी इच्छा न तो भगवान ही सुनते और न ही जजमान। यदाकदा सजीवन पाँडे अपने साथ पंडिताइन व एकलौते पुत्र भोला को भी ले जाते। पंडिताइन तो अपने बक्से में  से बड़ी सहेज कर रखी गई साफ सुथरी साड़ी निकाल कर पहन लेती।  पंडिताइन के जीवन में यही अवसर होता जब वे नारी श्रंगार का संपूर्ण सुख भोगती, साड़ी को पेटीकोट पोलका के साथ पहनती और माथे पर टिकली बिंदी पैरों में महावर लगाती। इस पूरे श्रंगार से पंडिताइन का गोरा मुख चमक उठता और सजीवन पाँडे भी उनके रूप की प्रशंसा कर उठते पर यह कहते हुये कि भोला की अम्मा तुम्हें कोई सुख न दे पाया उनकी आँखे गीली हो जाती गला रूँध जाता। ऐसे में पंडिताइन ही सजीवन पाँडे को ढाढ़स बँधाती और कहती भोला के दद्दा चिंता ना करों हमारे दिन भी बहुरेंगे, शंकर भगवान कृपा करेंगे, आखिर बारा बरस में घूरे के दिन भी फिरत हैंगे। अम्मा दद्दा तो साज सँवर जाते पर  भोला  के भाग में चड्डी बनियान ही थी उस दिन सुबह सबरे से अम्मा भोला के कपड़े उतार बड़े जतन से धोती और सूखा देती तब तक  भोला नंग धड़ंग रहते और घर से बाहर न निकलते। उगारे भोला कुटिया के एक कोने में बैठे बिसुरते रहते। जाने के ठीक पहले उन्हे भी नहला धुलाकर चड्डी बनियान में सुसज्जित कर दिया जाता। कुलमिलाकर शिवालय के शंकरजी की पिंडी की सेवा व आसपास के गाँवों की जजमानी से सजीवन पाँडे की घर ग्रहस्ती चल रही थी या कहें कि घिसट रही थी  और उन पर यह कहावत कि “पाँडे रोबैं रोटी खौं, पाँडेन रोबैं धोती खौं, लरका रोबैं न्यारे खौं” (विपन्नता की स्थिति में खान पान और रहन सहन पूरा अस्त व्यस्त हो जाता है) तो फिट ही बैठती।

समय चक्र चलता रहा, भोला पाँडे इन्ही विपन्न परिस्थितियों में, अपने बाप सजीवन पाँडे की पंडिताई में सहायता करते हुये, हिन्दी व संस्कृत का अल्प ज्ञान ले, किशोर हो चले। गाँव में कोई स्कूल न था और हटा अथवा दमोह जहाँ पढ़ाने लिखाने की अच्छी व्यवस्था थी वहाँ भोला को भेज पाने की न तो सजीवन पांडे की आर्थिक हैसियत थी और न ही कोई जजमान या रिश्तेदार का घर जहाँ भोला को रख अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाया जा सके। उनकी उम्र कोई 14-15 वर्ष रही होगी कि सजीवन पाँडे को पुत्र के ब्याह की चिंता होने लगी। घर में तो भारी विपन्नता थी अत: पंडिताइन ने भोला का ब्याह तय करने में पति को सलाह देते हुये कहा कि भोला के दद्दा लरका को ब्याव ऐसी जागा करिओ जो कुलीन घर के होयं और खात पियत मैं अपनी बरोबरी के होयं। हमाइ बऊ कैत हती कै “सुत ऐसे घर ब्याहिए, जो समता में होय। खान पान बेहार में मिलता –जुलता होय।।“ सजीवन पाँडे को पत्नी की सलाह भा गई और साथ ही उन्हे  पास ही के गाँव इमलिया  के एक उच्च कुल के गरीब  ब्राह्मण व अपने बाल सखा राम मिलन तिवारी की याद आई। फिर क्या था बजाय संदेसन खेती करने के सजीवन पांडे अपने मित्र से मिलने इमलिया चले गए और उनकी कन्या से अपने पुत्र के विवाह की चर्चा  घुमा फिरा कर छेड  घर वापस आ गये। राम मिलन तिवारी  अपने बाल सखा का मंतव्य न समझ सके पर उनकी धर्मपत्नी जो ओट में बैठी दोनों मित्रों की बात सुन रही थी सब समझ गई। सजीवन पाँडे के वापस जाते ही उसने राम मिलन तिवारी से उनके मित्र के घर आने का कारण बताया और पुत्री के विवाह की चर्चा आगे बढ़ाने ज़ोर डाला। दोनों मित्र एक बार फिर मिले और भोला पाण्डेय का ब्याह तय कर दिया। राम मिलन तिवारी  बड़े कुलीन ब्राह्मण थे अत: उनके घर लक्ष्मी कभी कभार ही आती, लेकिन गाँव के लोगों ने इमलिया के इस सुदामा पर बड़ी कृपा करी और लड़की का ब्याह भोला पाँडे से करवाने पूरी सहायता करी। लोधी पटेलों ने  अन्न चुन्न दे दिया तो काछी सब्जी भाजी लेता आया। बजाजी ने दो चार जोड़ी  कपड़ा लत्ता की व्यवस्था कर दी तो कचेर ने टिकली बिंदी चूड़ी और श्रंगार का समान दे दिया। गाँव भर के युवा बारात के सेवा टहल के लिए आगे आए। राम मिलन तिवारी मौड़ी के ब्याह में कुछ खास दहेज न दे पाये बस किसी तरह नेंग- दस्तूर पूरे कर दिये। सजीवन पाँडे भी यारी दोस्ती के फेर में पड़ गए और पंडिताइन के लाख समझाने- बुझाने पर भी अपने मित्र से कुछ माँग न सके। ब्याह की भावरें पड़ी, बारातियों ने पंगत में पूरी, सुहारी, आलू की रसीली सब्जी में डुबो डुबोकर खाये और पचमेर की जगह केवल लड्डू बर्फी का आनंद लिया। सब्जी में आलू के टुकड़े ढूंढने से मिलते पर बारातियों ने उफ्फ न करी, हाँ । पत्तल की भोजन सामग्री खतम होती कि उसके पहले ही दोनों में गौरस परस दिया गया फिर क्या था बारात में आए पंडित रिश्तेदारों और खेजरा के अन्य ग्रामीणों  ने चार चार पूरी मींजकर गौरस में डाली और 5 मिनिट में ही उसे सफाचट कर गए। पंगत को भोजन का आनंद लेते देख राम मिलन तिवारी  बड़े प्रसन्न हुये और हुलफुलाहट में पूछ बैठे और कुछ महराज। उनका इतना कहना था कि पंगत में से आवाज आई दो-दो पूरी शक्कर के साथ और हो जाती तो सोने में सुहागा हो जाता। चिंतित राम सजीवन कुछ कहते  या पंगत में बिलोरा होता उसके पहले ही इमलिया के घिनहा बनिया बोल पड़े जो आज्ञा महराज और धीरे से बाहर निकल अपनी दुकान से एक बोरी शक्कर उठा लाये। फिर क्या था इधर पंगत शक्कर  के साथ दो दो  पूरी और उदरस्त कर रही थी कि चुन्नु नाई ने यह बोलते हुये पंगत समाप्त करने की सोची “समदी माँगे दान दायजौ, लरका माँगै जोय.सबै बाराती जो चहें अच्छी पंगत होय॥“ उधर राम मिलन आखों मे कृतज्ञता का भाव लिए घिनहा बनिया की ओर ताक रहे थे और मन  ही मन सोच रहे थे कि लड़की को अच्छा वर मिला तो लड़के को सुंदर कन्या मिली बराती भी गाँव वालों के सहयोग से अच्छी पंगत पा गए बस समधी ही दान दहेज से वंचित रह गए। पर उनके बस में दान दहेज देना न था। घर की विपन्नता में दो जून की रोटी का जुगाड़ हो जाता यही बहुत था। वे बारबार बांदकपुर के भोले शंकर जागेशवरनाथ और हटा की चंडी माता का सुमरन कर रहे थे कि सजीवन पाण्डेय उनके पास विदा लेने आ पहुँचे। अश्रुपूरित आखों से राममिलन तिवारी ने अपने बाल सखा की ओर देखा और फिर नए समधी और दामाद भोला पांडे  को साष्टांग दंडवत कर प्रणाम किया। रुँधे गले से उनके मुख से बस इतना ही निकला कि महराज हमाई स्थिति से आप परचित हो कोनौ कमी रै गई होय और अनुआ होय  तो क्षिमा करियों। इतना कह वे अपनी गरीबी के  दुर्भाग्य पर फूट फूट कर रो पड़े। सजीवन पांडे ने समधी को गले लगाया और दुरागमन की बात आगे कभी करने की कह विदा ली।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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