श्री प्रभाशंकर उपाध्याय
(ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाशंकर उपाध्याय जी का हार्दिक स्वागत है। आप व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। हम श्री प्रभाशंकर उपाध्याय जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के साथ अपनी रचनाओं को साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार किया। आप कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी विशिष्ट साहित्यिक सेवाओं पर राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार घोषित।)
संक्षिप्त परिचय
जन्म – 01.09.1954
जन्म स्थान – गंगापुर सिटी (राज0)
शिक्षा – एम.ए. (हिन्दी), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि।
व्यवसाय – स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर से सेवानिवृत अधिकारी।
कृतियां/रचनाएं – चार कृतियां- ’नाश्ता मंत्री का, गरीब के घर’, ‘काग के भाग बड़े‘, ‘बेहतरीन व्यंग्य’ तथा ’यादों के दरीचे’। साथ ही भारत की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पांच सौ रचनाएं प्रकाशित एवं प्रसारित। कुछेक रचनाओं का पंजाबी एवं कन्नड़ भाषा अनुवाद और प्रकाशन। व्यंग्य कथा- ‘कहां गया स्कूल?’ एवं हास्य कथा-‘भैंस साहब की‘ का बीसवीं सदी की चर्चित हास्य-व्यंग्य रचनाओं में चयन, ‘आह! दराज, वाह! दराज’ का राजस्थान के उच्च माध्यमिक शिक्षा पाठ्यक्रम में शुमार। राजस्थान के लघु कथाकार में लघु व्यंग्य कथाओं का संकलन।
पुरस्कार/ सम्मान – कादम्बिनी व्यंग्य-कथा प्रतियोगिता, जवाहर कला केन्द्र, पर्यावरण विभाग राजस्थान सरकार, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर, अखिल भारतीय साहित्य परिषद तथा राजस्थान लोक कला मण्डल द्वारा पुरस्कृत/सम्मानित। राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार घोषित।
☆ व्यंग्य – फूल हंसी भीग गयी, धार धार पानी में ☆
किबला मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने अद्भुत बात लिखी है कि इंसान को हैवाने जरीफ़ याने प्रबुद्ध जानवर कहा गया है और यह हैवानों के साथ बहुत बड़ी ज्यादती है। ओशो ने कहा था कि जानवर इसलिए नहीं हंसते क्योंकि वे ऊबते नहीं हैं। मुश्ताक साहब का कथन है कि इंसान एक मात्र अकेला ऐसा जानवर है जो मुसीबत पड़ने से पहले ही मायूस हो जाता है। मगर हास्य उसका एक मात्र ऐसा आलम्बन है जो उसे किसी भी मुसीबत से पार कर देता लेता है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में बहुत पहले हास्य के आठ प्रकार बता दिए थे। उनमें मुक्त हास्य, मंद हास्य एवं मौन हास्य प्रमुख हैं। अट्टहास, ठिठोली, ठट्ठा तथा ठहाका को मुक्त हास्य, मुस्कान को मंद हास्य और अंतर्हास को मौन हास्य कहा गया है। हास्य-कला का एक और वर्गीकरण है, ’अपहास’। यह निकृष्ट श्रेणी का हास्य है। उपहास, खिल्ली, खीस तथा कटाक्ष आदि अपहसित हास्य हैं। घोड़े की माफिक हिनहिनाना और लकड़बग्घी हंसी इसी श्रेणी के हास्य हैं। मुक्त हास्य इंसान को ईश्वर की नेमत है। कवि लिखता है, ‘हंसना रवि की प्रथम किरण सा, कानन के नवजात हिरण सा‘। सच, शिशु की भोली किलकारी सभी को सम्मोहित करती है। इंद्रजीत कौशिक ने बालक की खिलखिलाहट को ईश्वरतुल्य बताते हुए लिखा है- ‘संग खुदा भी मुस्कराया, जब एक बच्चे को हंसाया।’ यह मालूम नहीं कि निर्मल हंसी और निश्छल मुस्कान ईश्वर तक पहुंचती है या नहीं किन्तु यह दिल तक जरूर पहुंचती है। मुस्कान के बारे में इतना तक कहा गया है कि यह आपके चेहरे का वह झरोखा है, जो कहता है कि आप अपने घर पर हैं। महबूबा की उन्मुक्त हंसी पर अग्निवेश शुक्ल लिखते हैं- ’’जब्ज है दीवारों में तेरी हंसी और खुशबू से भरा है मेरा घर।’’ इसी मिज़ाज पर वीरेंद्र्र मिश्र ने लिखा है- ‘‘फूल हंसी भीग गयी, धार धार पानी में।’’ आंग्ल भाषा में कथन है कि हैप्पीनेस इज नॉट ए डेस्टीनेशन। इट्स ए मैथड ऑॅफ लाइफ। यानी मस्त होकर हंसो, फिर मस्त रहो। ‘तमक-तमक हांसी मसक’ यानी मनभावक, मतवाली और मस्तानी हंसी एक चिकित्सा है। ‘लाफ्टथैरपी’ के कद्रदान कहते हैं कि हंसने से ‘बक्सीनेटर‘, ‘आर्बीक्यूलेरिस,’ ’रायजोरिस’ तथा ’डिप्रेशरलेबी’ जैसी मुख्य मांस पेशियों समेत दो सौ चालीस मांसपेशियां सक्रिय होकर सकारात्मक प्रभाव पैदा करती हैं और जब, हंसी बुक्काफाड़ हो तो समझो कि मांसपेशियों की तो शामत आ जाती है। ऐसे ही हंसोड़ थे, रामरिख मनहर। मेरे महल्ले में भी उसी नस्ल के एक शायर रहते हैं। जनाब, गज़ब के ठहाकेबाज हैं। अस्सी पड़ाव लांघ चुके हैं लेकिन अब भी उनकी हंसी अनेक घरों को लांघती हुई मेरे घर में बेतकल्लुफ प्रवेश करती है। एक दिन मैंने उनसे दो सौ चालीस मांसपेशियों की सक्रियता का उल्लेख कर दिया। दूसरे दिन खां साहेब छड़ी ठकठकाते घर आ गए और बोले, ‘‘जिन दांतों से हंसते थे खिल खिल, अब वही रूलाते हैं हिलहिल।’’ बताओ कि वह कौन सी नामाकूल पेशी है?, जिसने हमारे दांतों में ऐसा भूचाल ला दिया कि कल हमने बुक्का क्या फाड़ा कि रात भर कराहते रहे और अभी अभी डॉक्टर को दिखाकर लौटे हैं। कमबख्त ने पर्चा भर कर दवाइयां लिख दी हैं।’’
मैंने कहा, ‘‘म्यां! यह मांसपेशी का कुसूर नहीं बल्कि आप बरसों से जर्दा-किवाम की गिलौरियों का जो जुर्म इन पर ढाते रहे हो, यह उसी का नतीजा है।’’ यह सुनकर बरखुदार लाहौलविलाकुव्वत बोलते हुए निकल लिए।
कुछ महानुभावों ने हास्य की इंद्रिय को इंसान की छठी इंद्रिय कहा है। कदाचित, इसी वजह से तमाम बदहालियों और बीमारियों के बावजूद देश की जनता हंसे-मुस्कराए जा रही है। भय, भूख, बेरोजगारी, अराजकता और अनाचार के बाद भी हम सदियों से हंस रहे हैं, खिलखिला रहे हैं। भ्रष्टाचार और कुव्यवस्थाओं के खिलाफ आक्रोश जताने की जगह खीसें निपोर रहे हैं। गाहे-बगाहे, क्रोध प्रदर्शन हो भी जाता है तो उनमें भी हंसते- मुस्कराते मुखड़े नजर आ जाते हैं। हैरत है कि दारूण प्रकरणों तथा अंतिम संस्कारों जैसे अवसरों पर भी लोग चहक लेते हैं। कवि रघुवीर सहाय भी कदाचित इस अवस्था को अनुभूत करते हुए लिख गए- ’’लोकतंत्र का अंतिम क्षण है, कहकर आप हंसे। निर्धन जनता का शोषण है, कहकर आप हंसे। चारों ओर है बड़ी लाचारी, कहकर आप हंसे। सबके सब हैं भ्रष्टाचारी, कहकर आप हंसे।‘‘ चुनंाचे, आलम यह है कि आवाम ही नहीं बल्कि देश के दिग्गज राजनीतिबाज भी बात-बेबात मुस्करा रहे हैं। ताज्जुब तो तब होता है जब चुनावों में मुंह की खाने के बाद भी शीर्ष नेता हंस-विहंस कर आत्मचिंतन की आवश्यकता जाहिर करते हैं। फिर नतीजा चाहे, ढाक के तीन पात निकले। गंभीर विषयों पर आयोजित नौकरशाहों की बैठकें अमूमन चाय-नाश्ते के चटखारे के साथ समाप्त हो जाती हैं। नतीजा वही ढाक के तीन…। टी.वी. स्क्रीन पर दिख रही चख..चख का नतीजा भी ढाक के तीन पात ही होता है। फिर वे चाहे लोकसभायी हों या न्यूज चैनल्स पर आमंत्रित माननीयों की। हम भी उस कुत्ता लड़ाई का पूर्णता से लुत्फ ले ही लेते हैं।
चुनांचे, अब वक्त आ गया है, जब बचे-खुचे लोग भी हंसने-मुस्कराने की इस पुनीत राष्ट्रीय धारा में शरीक हों और अपना स्वास्थ्य दुरूस्त रखें। इसके लिए किसी लॉफिंग-क्लब से जुड़ने लॉफ्टर शो आदि देखने की जरूरत नहीं। सिर्फ, सतर्कता से अपने आवास, दफ्तर, प्रतिष्ठान के आसपास के मौजूं का अवलोकन करें, बस इसी ताका-झांकी में आपको अनेक भी हास्य प्रसंग मिल जाएगा। इस मामले में थोड़ा सा मार्गनिर्देशन हम किये देते हैं- जब लोग गुलाब जामुन को रसगुल्ला। बाघ, चीता, तेंदुआ को शेर। किसी कंपनी की कार को मारूति। किसी भी मोटर साइकिल को हीरो होंडा। वनस्पति घी को डालडा और लेमीनेट को सनमाइका कह कर पुकारें; तो आप यकीनन खिलखिला सकते हैं। आपके उपालंभ पर दूधिया कहे कि सा‘ब! मेरा दूध तो एकदम शुद्ध और पेवर है। आपका पड़ौसी बोले कि मैं तो रोज सुबह उठकर, डेली घूमता हूं। अधिकारी पूछे कि इन आंकड़ों का कुल टोटल क्या है? चिकित्सक नसीहत दे कि रोजाना फल-फ्रूट खाया करो अथवा अतिथि आपके चाय के प्रस्ताव पर नाक-भौं सिकोड़े और कहे कि टी तो मैं सिर्फ बेड-टी पर ही लेता हूं। गर्ज यह कि आप ऐसे प्रसंगों पर अपनी एक अद्द मुस्कराहट न्यौछावर कर सकते हैं। एक महिला अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाते हुए बोली- डॉक्टर साहब! देखिए तो इसके बाथरूम में सूजन आ गई है। उसकी उस बाथरूमी-संज्ञा पर चिकित्सक की इच्छा लहालौंट होने को अवश्य हुई होगी? किसी कस्बाई नेता का अभिनंदन है और प्रशंसा के बड़े-बड़े पुल बांधे जा रहे हैं कि इनके नेतृत्व से देश ही नहीं वरन विश्व को बड़ी बड़ी आशाएं हैं। तबादलित, जिला स्तर के अधिकारी के विदाई समारोह में भाषण झाड़े जा रहे हों कि इनकी कार्यकुशलता का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है अथवा सूदखोर सेठ को दानवीर कर्ण या भामाशाह की उपाधि से विभूषित किया जा रहा हो या धुर देहात में ग्रामीणों के मध्य कृषि संबंधी जानकारी अंग्रेजी में दी जा रही हो, किसी स्थानीय समाचार-पत्र का लोकार्पण या संगठन का अभ्युदय हो और उसे राष्ट्रीय स्तर के संबोधन दिए जा रहे हों तो ऐसे मौकों पर सिवा ठहाका लगाने के आप कर ही क्या सकते हैं?
चलिए, चलते चलते दिविक रमेश की ये पंक्तियां स्मरण करके ही हंस लें-
‘‘कुछ नालायक विचार भी प्यारे तो बहुत होते हैं। आते ही उनके हंसने लगती हैं, हमारी उदासियां।’’
© प्रभाशंकर उपाध्याय
193, महाराणा प्रताप कॉलोनी, सवाईमाधोपुर (राज.) पिन- 322001
सम्पर्क-9414045857









practice of nyasa. Realizing the need of the times as scientific rendition of the ancient system of yoga, he founded the International Yoga Fellowship in 1956 and the Bihar School of Yoga in 1963 and authored over 80 major texts on yoga, tantra and spirituality.
thousands of laughter clubs all over the world where laughter is initiated as an exercise in a group but with eye contact and childlike playfulness, it soon turns into real and contagious laughter. It’s called Laughter Yoga because it combines laughter exercises with yoga breathing. This brings more oxygen to the body and the brain which makes one feel more energetic and healthy.






