हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४७ ⇒ भागने/भगाने की कला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भागने/भगाने की कला।)

?अभी अभी # १०४७ ⇒ आलेख – भागने/भगाने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम यहाँ उड़नसिख मिल्खा अथवा उड़नपरी पी टी उषा की बात नहीं कर रहे, जो भागने में देश का नाम रोशन कर चुके हैं, हम उस भागने/भगाने का जिक्र कर रहे हैं, जिसे समाज अच्छी निगाह से नहीं देखता।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं, जब हमें भागकर सिटी बस, अथवा ट्रेन पकड़नी पड़ती है। कुछ लोग तो स्कूटर पर भी भागते-भागते ऑफिस पहुँचते हैं। आखिर जीवन में दौड़-भाग तो लगी ही रहती है।।

एक समय था, जब कुछ बच्चे बचपन में बिना बताए घर छोड़कर भाग जाते थे ! माँ बाप बेचारे परेशान। अखबारों में इश्तहार देते थे। गुमशुदा की तलाश। बेटा गौरव ! तुम जहाँ कहीं भी हो घर चले आओ। दादीजी ने चार रोज से खाना नहीं खाया है। तुम्हारी माँ का रो-रोकर बुरा हाल है। पैसे की ज़रूरत हो तो बताना। लाने वाले, या पता बताने वाले को उचित ईनाम दिया जाएगा।

वह ज़माना था, जब एक खोया हुआ, या भागा हुआ बच्चा भी सुरक्षित वापस घर आ जाता था। आजकल छोटे बच्चों तक का अपहरण फिरौती वसूलने के लिए किया जाता है। क्या ज़माना आ गया है।।

जितनी छूट आज लड़कियों को है, उतनी हमारे जमाने में नहीं थी। लड़कियों के लिए अलग कन्या विद्यालय और महा-विद्यालय भी था। लड़की सीधी स्कूल जाती थी, और सीधी घर आती थी।

उसकी सहेलियाँ होती थी, बॉय फ्रेंड नहीं। आग लगे इन कॉलेज गर्ल, लव इन शिमला, और लव इन टोकियो जैसी फिल्मों को, जिन्होंने लड़कियों को सिनेमाघर का रास्ता दिखा दिया। एक लड़की भीगी-भागी सी।

फिर भी लड़कियों की हिम्मत नहीं होती थी कि लड़कों की तरह घर से भाग जाए। उनकी दौड़ नानी या मामा के घर तक की ही होती थी और भाई चौवीस घंटे यमदूत की तरह आगे पीछे। बड़ी मुश्किल से कुछ ही लड़कियां किसी लड़के के साथ घर से भाग सकती थी। उन्हें लोग अच्छी लड़की नहीं समझते थे।

फिर समय ने करवट ली। विद्यालय कान्वेंट हो गए, को-एजुकेशन अर्थात सह -शिक्षा प्रारंभ हो गई। स्कूलों में निबंध और वाद-विवाद के लिए एक नया विषय मिल गया। आज के आधुनिक दौर में क्या सह-शिक्षा जरूरी है ? पक्ष हो या विपक्ष, न जाने क्यों, लड़कियाँ ही प्रथम आती थी।।

अब समय बदल गया है। नर्सरी से पीजी तक लड़के-लड़कियां साथ-साथ उठते-बैठते, पढ़ते-लिखते हैं। एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं। अब उन्हें सड़क अथवा कॉलेज की किसी लड़की को देख सीटी मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पांडुबा, पोरगी फसली रे फसली जैसे घटिया गानों का ज़माना गया। चाहे माँ रूठे या बाबा, मैंने तेरी बाँह पकड़ ली, जैसा अब कुछ नहीं है। अब लड़के-लड़की घर छोड़कर भागते नहीं, माता-पिता की सहमति से अपना घर बसाते हैं। बच्चे भी समझदार हैं और माता-पिता भी।

आज की पीढ़ी के सामने वैसे ही कई चुनौतियाँ हैं। उनके जीवन में वैसे भी स्थिरता कहाँ ! उन्हें तो भागते ही रहना है, पहले उच्च-शिक्षा के लिए तो बाद में एक अच्छी नौकरी के लिए। उन्हें भी एक ऐसे जीवन साथी को तलाश है जो जीवन की इस भागम-भाग में उनका साथ दे। उन्हें भागकर शादी करने की फुर्सत ही कहाँ है ! माता-पिता थक जाते हैं कहकर, अपनी पसंद का लड़का, अथवा लड़की ही बता दो, ताकि हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो सकें, और आज की पीढ़ी है कि उसे भागने की तो छोड़िए, घड़ी दो घड़ी, प्यार करने की फुर्सत ही नहीं।।

भागने/भगाने की आदर्श स्थिति भी होती है। शास्त्रों में इसे गंधर्व विवाह कहा गया है ! रुक्मी की बहन रुक्मिणी मंदिर जाने के बहाने श्रीकृष्ण से मिलने नहीं गई, वे तो माँ भवानी से आशीर्वाद लेने गई थी कि उन्हें श्रीकृष्ण ही पत्नी के रूप में वरण करे। और यहाँ तो काजी भी राजी थे।

केवल रुक्मी इस भ्रम में था कि कृष्ण उसकी बहन को भगाकर ले जा रहा है। मर्ज़ी से जाने और भागने में ज़मीन आसमान का अंतर है।

जहाँ प्रेम हो, वहाँ विवाह हो !

हमारी भारतीय नारियाँ तो इतनी समर्पित हैं, कि जहाँ विवाह होता है, वहीं प्रेम कर लेती हैं। बदले में उन्हें क्या मिलता है, यह या तो वे जानें, या फिर रब ही जानें। अगर आप सगाई ही को शादी मान लें तो जगजीत-चित्रा एक आदर्श उदाहरण हैं, जो साथ साथ मिलकर यह घोषणा करते हैं –

सबसे ऊँची, प्रेम सगाई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३० ☆ हॉउ से हू तक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख हॉउ से हू तक। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे भावें ना दुनिया के रंग / स्वर- विकास यशकीर्ति, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३० ☆

☆ हॉउ से हू तक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘दौलत भी क्या चीज़ है, जब आती है तो इंसान खुद को भूल जाता है, जब जाती है तो ज़माना उसे भूल जाता है।’ धन-दौलत, पैसा व पद-प्रतिष्ठा का नशा अक्सर सिर चढ़कर बोलता है, क्योंकि इन्हें प्राप्त करने के पश्चात् इंसान अपनी सुधबुध खो बैठता है … स्वयं को भूल जाता है। तात्पर्य यह है कि धन-सम्पदा पाने के पश्चात् इंसान अहं के नशे में चूर रहता है और उसे अपने अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। उस स्थिति में उसे कोई भी अपना नज़र नहीं आता…सब पराए अथवा दुश्मन नज़र आते हैं। वह दौलत के नशे के साथ-साथ शराब व ड्रग्स का आदी हो जाता है। सो! उसे समय, स्थान व परिस्थिति का लेशमात्र भी ध्यान तक नहीं रहता और संबंध व सरोकारों का उसके जीवन में अस्तित्व अथवा महत्व नहीं रहता। इस स्थिति में वह अहंनिष्ठ मानव अपनों अर्थात् परिवार व बच्चों से दूर…बहुत…दूर चला जाता है और वह अपने सम्मुख  किसी के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता। वह मर्यादा की सभी सीमाओं को लाँघ जाता है और रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पाँव रख कर आगे बढ़ता चला जाता है और उसकी यह दौड़ उसे कहीं भी रुकने नहीं देती।

धन-दौलत का आकर्षण न तो कभी धूमिल पड़ता है; न ही कभी समाप्त होता है। वह तो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ता चला जाता है। यह प्रसिद्ध कहावत है…’पैसा ही पैसे को खींचता है।’ दूसरे शब्दों में इंसान की पैसे  की हवस कभी समाप्त नहीं होती…सो! उसे उचित-अनुचित में भेद नज़र आने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। धन कमाने का नशा उस पर इस क़दर हावी होता है कि वह राह में आने वाले  आगंतुकों-विरोधियों को कीड़े-मकोड़ों की भांति रौंदता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। इस मन:स्थिति में वह पाप-पुण्य के भेद को नकार; अपनी सोच व निर्णय को सदैव उचित ठहराता है।

इस दुनिया के लोग भी धनवान अथवा दौलतमंद  इंसान को सलाम करते हैं अर्थात् करने को बाध्य होते हैं…  और यह उनकी नियति होती है। परंतु दौलत के खो जाने के पश्चात् ज़माना उसे भूल जाता है, क्योंकि  यह तो ज़माने का चलन है। परंतु इंसान माया के भ्रम में सांसारिक आकर्षणों व दुनिया-वी चकाचौंध में इस क़दर खो जाता है कि उसे अपने आत्मज भी अपने नज़र नहीं आते; दुश्मन प्रतीत होते हैं। एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब वह उन अपनों के बीच लौट जाना चाहता है, तो वे भी उसे नकार देते हैं। अब उनके पास उस अहंनिष्ठ इंसान के लिए समय का अभाव होता है। यह सृष्टि का नियम है कि जैसा आप इस संसार में करते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। यह तो हुई आत्मजों अर्थात् अपने बच्चों की बात, जिन्हें अच्छी परवरिश व सुख- सुविधाएं प्रदान करने के लिए वह दिन-रात परिश्रम करता रहा; ठीक-ग़लत काम करता रहा…परंतु उन्हें समय व स्नेह नहीं दे पाया, जिसकी उन्हें दरक़ार थी; जो उनकी प्राथमिक आवश्यकता थी।

‘फिर ग़ैरों से क्या शिक़वा कीजिए… दौलत के समाप्त होते ही अपने ही नहीं, ज़माने अर्थात् दुनिया भर के लोग भी उसे भुला देते हैं, क्योंकि वे संबंध स्वार्थ के थे;  स्नेह सौहार्द के नहीं।’ मैं तो संबंधों को रिवाल्विंग चेयर की भांति मानती हूं। आपने मुंह दूसरी ओर घुमाया; अवसरवादी बाशिंदों के तेवर भी बदल गए, क्योंकि आजकल संबंध सत्ता व धन-संपदा से जुड़े होते हैं… सब कुर्सी को सलाम करते हैं। जब तक आप उस पर आसीन हैं, सब ठीक चलता है; आपको झूठा मान-सम्मान मिलता है, क्योंकि लोग आपसे हर उचित-अनुचित कार्य की अपेक्षा रखते हैं। वैसे भी समय पर तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है… सो! इंसान की तो बात ही अलग है।

लक्ष्मी का तो स्वभाव ही चंचल है, वह एक स्थान पर ठहरती ही कहाँ है। जब तक वह मानव के पास रहती है, सब उससे पूछते हैं ‘हॉउ आर यू’ और लक्ष्मी के स्थान परिवर्तन करने के पश्चात् लोग कहते हैं ‘हू आर यू।’ इस प्रकार लोगों के तेवर पल-भर में बदल जाते हैं। ‘हॉउ’ में स्वीकार्यता है—अस्तित्व-बोध की और आपकी सलामती का भाव है, जो यह दर्शाता है कि वे लोग आपकी चिंता करते हैं…विवशता-पूर्वक या मन की गहराइयों से… यह और बात है। परंतु ‘हॉउ’ को ‘हू’ में बदलने में पल-भर का समय भी नहीं लगता। ‘हू’ अस्वीकार्यता बोध…आपके अस्तित्व से बे-खबर अर्थात् ‘कौन हैं आप?’ ‘कैसे से कौन’ प्रतीक है स्वार्थपरता का; आपके प्रति निरपेक्षता के भाव का; अस्तित्वहीनता का तथा यह प्रतीक है मानव के संकीर्ण भाव का, क्योंकि उगते सूर्य को सब सलाम करते हैं और डूबते सूर्य को निहारना भी लोग अपशकुन मानते हैं। आजकल तो वे बिना काम अर्थात् स्वार्थ के ‘नमस्ते’अथवा ‘दुआ सलाम’ भी नहीं करते।

इस स्थिति में चिन्ता तथा तनाव का होना अवश्यंभावी है। वह मानव को अवसाद की स्थिति में धकेल देता है; जिससे मानव लाख चाहने पर भी उबर नहीं पाता। वह अतीत की स्मृतियों में अवगाहन कर संतोष का अनुभव करता है। उसके सम्मुख प्रायश्चित करने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प होता ही नहीं। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है, तो दु:ख उसके धैर्य की…दोनों स्थितियों अथवा परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले व्यक्ति का जीवन सफल कहलाता है। यह भी अकाट्य सत्य है कि सुख में व्यक्ति फूला नहीं समाता; उस के कदम धरा पर नहीं पड़ते…वह अहंवादी हो जाता है और दु:ख के समय वह हैरान-परेशान होकर अपना धैर्य खो बैठता है। वह अपनी नाकामी अथवा असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ता है। इस उधेड़बुन में वह सोच नहीं पाता कि यह संसार दु:खालय है और सुख बिजली की कौंध की मानिंद जीवन में दस्तक देता है…परंतु बावरा मन उसे स्थायी समझ कर अपनी बपौती स्वीकार बैठता है और उसके जाने के पश्चात् वह शोकाकुल हो जाता है।

सुख-दु:ख का चोली दामन का साथ है। एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा आता है। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारों का रहना असंभव है; उसी प्रकार दोनों का एक छत्र-छाया में रहना भी असंभव है। परंतु सुख-दु:ख को साक्षी भाव से देखना अथवा सम रहना आवश्यक है। दोनों अतिथि हैं–जो आया है, उसका लौटना भी निश्चित है। इसलिए न किसी के आने की खुशी, न किसी के जाने का ग़म-शोक मनाना चाहिए। हर स्थिति में सम रहने का भाव सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। इसलिए सुख में अहं को शत्रु समझना आवश्यक है और दु:ख में अथवा दूसरे कार्य में धैर्य का दामन छोड़ना स्वयं को मुसीबत में डालने के समान है। जीवन में कभी भी किसी को छोटा समझ कर किसी की उपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि आवश्यकता के समय पर हर व्यक्ति व वस्तु का अपना महत्व होता है। सूई का काम तलवार नहीं कर सकती। मिट्टी, जिसे आप पाँव तले रौंदते हैं; उसका एक कण भी आँख में पड़ने पर इंसान की जान पर बन आती है। सो! जीवन में किसी तुच्छ वस्तु व व्यक्ति की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए… उसे स्वयं से अर्थात् उसकी प्रतिभा को ग़लती से भी कम नहीं आँकना चाहिए।

पैसे से सुख-सुविधाएं तो खरीदी जा सकती हैं, परंतु मानसिक शांति नहीं। इसलिए दौलत का अभिमान कभी मत कीजिए। पैसा तो हाथ का मैल है; एक स्थान पर कभी नहीं ठहरता। परमात्मा की कृपा से पलक-झपकते ही रंक राजा बन सकता है; पंगु पर्वत लाँघ सकता है और अंधा देखने लग जाता है। इस जन्म में इंसान को जो कुछ भी मिलता है; उसके पूर्वजन्म के कर्मों का फल होता है…फिर अहं कैसा? गरीब व्यक्ति अपने कृतकर्मों का फल भोगता है…फिर उसकी उपेक्षा व अपमान क्यों? इसलिए मानव को हर स्थिति में सामंजस्य बनाए रखना चाहिए…यही सफलता का मूल है। समन्वय, सामंजस्यता का जनक है, उपादान है; जो जीवन में समरसता लाता है। यह कैवल्य अर्थात् अलौकिक आनंद की स्थिति है, जिसमें ‘हॉउ आर यू’ और ‘हू आर यू’ का वैषम्य भाव समाप्त हो जाता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १।)

☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆

? – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

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आगे बढ़ते हैंl आज बताती हूँ कि कैसे कच्छ राज्य की स्थापना हुई?

कच्छ सिंध प्रान्त का प्रशासनिक हिस्सा हुआ करता थाl पर जब अरबों ने इसी सिंध प्रान्त के राजा दाहिर के राउर किले पर आक्रमण किया तब वहाँ जबरदस्त युद्ध हुआl उस समय राजा की सेना में ब्राम्हण, राजपूत और जाट भी शामिल थेl जिसमे राजा दाहिर वीरगति को प्राप्त हुएl उनकी रानी लाड़ी ने बचे हुए सैनिको को एकत्रित कर किले के दरवाजे को अंदर से बन्द कर शत्रु का सामना कियाl पर जब शत्रु किले की दीवार तोड़ने लगा तब असहाय रानी ने जोहर का फैसला लियाl तब उनके साथ वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं ने जोहर कियाl परन्तु दुर्भाग्यवश राजा की दो बेटियों को अरबों ने बंदी बनाकर खलीफ़ा को तोहफ़े में भेज दियाl और हिन्दू आबादी पर जरिया कर लगा दियाl इन सभी के चलते सम्मा राजपूत, ब्राम्हण परिवार के साथ कुछ जाट परिवारों ने सिंध छोडकर कच्छ में अपना ठिकाना बनाने का निश्चय कियाl उस समय कच्छ में वाघेला और काठी जातियाँ राज्य करती थींl इन राजपूतों ने यहाँ के शासकों को पराजित कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना शुरू कियाl

एक बार फिर से सिंध ने कच्छ पर आक्रमण कियाl तब कच्छ के झारा पहाड़ियों पर घमासान युद्ध हुआ जिसमे सिंध को मुँह की खानी पड़ी परन्तु हजारों की मात्रा में हिन्दू जडेजाओं ने अपने प्राणो की आहुतियाँ भी दींl

कुछ दिनों में ये सभी राजपूत आपस में लड़ने झगड़ने लगेl जिसे देख इसी वंश के एक प्रतापी राजा राव खेंगरजी जी ने सभी को समझा बुझा कर एकत्रित किया और कच्छ राज्य की स्थापना कीl

इस तरह राव खेंगरजी प्रथम कच्छ पर शासन करने वाले जडेजा राजपूत वंश के प्रथम आधिकारिक संस्थापक भी कहलाएl राव साहब ने कच्छ के क्षेत्रफल, सुचारु अर्थव्यवस्था और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख अपने प्रान्त को बारह रियासतों में बाँट दियाl भुज को राजधानी घोषित कर दियाl ये रियासतें निम्न हैंl

1- अबडासा – ये कच्छ के महाबलशाली जागीरदारों का गढ़ थाl यहाँ के राजपूत भुज महाराजा के वंश घराने से थेl ये क्षेत्र इतना बडा था कि इसकी अपनी चार जागीरें थींl

2-अंजार – ये क्षेत्र सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध को जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक मार्ग पर बसा था और इसी वजह से ये कच्छ की समृद्ध रियासत थीl आज भी यह संतों की भूमि कहलाती हैl यह क्षेत्र अपने पारंपरिक धातु बर्तनों के साथ अजरख और ब्लॉक प्रिंट हेतु प्रसिद्द हैl

2- बाणी या बन्नी – यहाँ सिंधु नदी की सहायक नदियों के साथ आई उपजाऊ मिट्टी ने इस क्षेत्र को एशिया के सबसे बड़े घास के मैदान में परिवर्तित कर दियाl यहाँ मिट्टी के गोल घर बनाये जाते है जिसे भुंगा कहते हैंl ये घर भूकंप और तूफानो से रक्षा करते हैंl यहाँ की मुतवा और हलेपोत्रा कढ़ाई विश्व भर में प्रसिद्द हैl

4- भुवड चौवीसी – यह क्षेत्र भुवड गाँव के पास के चौबीस गावों के समूह से बना थाl यहाँ के कारीगर पत्थरों पर नक्काशी कर उनमें प्राण फूंक देते थेl

5- गराडो – यह क्षेत्र शांत और रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण थाl इसे आज नखत्राना और लखपत कहा जाता हैl यह क्षेत्र बाहरी घुसपैठ को रोकने हेतु चौकी का काम करता थाl यह पहाडियों से घिरा हुआ थाl इसी क्षेत्र में कच्छ की कुलदेवी माँ आशापुरा निवास करतीं हैंl सबसे ज्यादा ओस गिरने से इस क्षेत्र को माकपट भी कहा जाता है

6- हालार चौवीसी – इस क्षेत्र की चौबीस जागीरों में किसान वर्ग रहता था जिसने कडी मेहनत कर अपने क्षेत्र को सबसे उपजाऊ बनायाl अच्छी फ़सल ने इसे समृद्धि बनाया और अपने राजा को सबसे ज्यादा राजस्व दियाl

7- कंठ – यह क्षेत्र ऊंचाई पर होने से राजधानी भुज का ढाल कहलायाl कंठ की पहाड़ियों में जडेजा राजा अपनी सेना के साथ मिलकर गोरिल्ला नीति अपनाकर शत्रु पर हमला बोल देते थेl

8- काँठो – मांडवी और मुंद्रा तटीय शहरों ने इसे कच्छ को समृद्ध, आर्थिक दृष्टि मजबूत और व्यापारिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दियाl यह राजा की आय का मुख्य स्रोत थाl इसी क्षेत्र के सागर खेडू अपनी वीरता हेतु मशहूर थेl आज भी यहाँ के कारीगर समुद्री जहाज बनाते हैंl यहाँ खजूर, चीकू और नारियल की पैदावार होती हैl

9- खड़ीर – कच्छ के सफ़ेद रन के दलदल के बीच का यह क्षेत्र द्वीप थाl मानसून में चारों तरफ पानी भरने पर इसका सम्पर्क टूट जाता थाl इस क्षेत्र को अभेद सुरक्षा चक्र भी कहा जाता थाl धोलावीरा इसी क्षेत्र में हैl और आज सरकार ने इसे रोड टू हेवन नमक सड़क से जोड़ दिया हैl

10- मोथाडा – भुज और अबडासा के बेच का यह क्षेत्र बाजरा और ज्वार की पैदावार करता थाl

11- प्रांथल – आज यह रापर और भाचाऊ का क्षेत्र हैl व्यापारिक मार्ग होने से यहाँ राजा ने विशेष चौकीयाँ बनवाई थींl

12- प्रवर – रण के पास का यह क्षेत्र जिसकी जमीन में नमक की मात्रा अत्यधिक होने से यहाँ की भूमि बंजर बन गईl यहाँ लखपथ का किला थाl इस किले पर राजपूत सेना प्रति प्रहर पहरा देती थीl पहले यहाँ बंदरगाह था जहाँ सिंध और गुजरात के व्यापारी व्यापार करने आया जाया करते थेl नारायण सरोवर आज भी यहाँ का मुख्य पर्यटल स्थल हैl

—- क्रमशः

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४६ ⇒ दिव्य मौन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिव्य मौन ।)

?अभी अभी # १०४६ ⇒ आलेख – दिव्य मौन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमें भव्य की आदत है, दिव्य की नहीं। भव्य का पड़ोसी आलीशान है।

हमें चमक और जगमगाहट आकृष्ट करती है, मोमबत्ती का प्रकाश नहीं। जो मज़ा हंसते गाते, गुनगुनाते जिंदगी गुजारने में है, वह एकाकी जीवन बिताने में कहां।

किसी की चुप्पी हमें काटने को दौड़ती है, विशेषकर उस व्यक्ति की, जो हमेशा बोलता चालता रहता है, महफिलों को रोशन करते रहता है। दो अंतरंग मित्र अगर बहुत देर से चुपचाप बैठे हों, तो अनायास ही एक कह उठता है, कुछ तो बोलो, कुछ तो बात करो।

कक्षा में छात्र से मास्टर जी द्वारा कोई प्रश्न पूछे जाने पर जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मास्टर जी यही कहते नजर आते हैं, कुछ जवाब क्यों नहीं देते, क्या सांप सूंघ गया है।।

बिना बोले रहने की हमें आदत नहीं। ईश्वर ने जबान बोलने को दी है, दो प्रेम के मीठे शब्द बोलने अथवा किसी के हाल चाल पूछने में क्या हमारी जबान घिस जाती है। लानत है ऐसे लोगों पर, जो हर पूछे सवाल का जवाब सिर्फ हां ना में ही देते हैं। इतनी कंजूसी भी किस काम की ! अंदर स्टॉक भरा हो, और जबान पर ताला लगा रखा हो।

किसी से नाराज होने पर हम उससे बात नहीं करते। जा, तोसे नहीं बोलूं कन्हैया, राह चलत, पकड़ी मोरी बैंया। लेकिन यह रूठना मनाना मौन का हिस्सा नहीं होता। जब नाराजी खत्म होती है, तो शिकायतों का अम्बार लग जाता है। कसम, वायदों और माफी के बाद ही मामला सुलझता है।।

मौन एक चित्त की अवस्था है। यह एक प्रकार की साधना भी है। दुख एवं अवसाद के क्षणों में भी हमें किसी से बात करने का मन नहीं होता। कुछ लोग, जब गुस्से में भरे हुए होते हैं तो एकाएक बोलचाल बंद कर देते हैं।

हमारे परिवारों में फूफाजी बहुत बदनाम हैं, बात बात पर गुस्सा करने, बात नहीं करने, और मुंह फुलाने में।

उनको मनाना एक असंतुष्ट नेता को मनाने से भी मुश्किल काम होता है। बहुत भाव खाते हैं अक्सर ये फूफा लोग।

गुस्से के अलावा व्रत के रूप में भी लोग मौन धारण करते हैं। इसे मौन व्रत भी कहते हैं। यह मन और जिव्हा पर संयम के लिए किया जाता है। साधारण लोगों के लिए आसान नहीं होता यह मौन व्रत। चौबीस घंटे फोन पर बात करने वालों के फोन की जब घंटी बजती है, तो एक तरह से उनकी घंटी बज जाती है। जब कभी कभी लगातार घंटी बजती रहती है तो वे आवेश में आकर, फोन उठाकर साफ साफ बोल ही देते हैं, हेलो, देखिए मेरा मौन व्रत चल रहा है। आगे से मुझे फोन ना करें।।

जो अधिक व्यस्त और गणमान्य होते हैं, उनका जब इशारों से काम नहीं चलता तो एक स्लेट अथवा काग़ज़ कलम का सहारा लेना पड़ता है। लोग उनके मौन के कई अर्थ लगा लेते हैं। सरकारें खतरे में पड़ जाती हैं। घर में कोहराम मच जाता है। मौन में भी संवाद कितना जरूरी होता है, यह एक मौन धारण करने वाला ही जान सकता हैं।

आइए, अब दिव्य मौन में चलें ! यहां कोई शब्द नहीं होता, कोई विचार नहीं होता, कोई संकेत अथवा किसी तरह की प्रकट अथवा अप्रकट अभिव्यक्ति नहीं होती। यह केवल बाहरी नहीं, अंतस का भी मौन होता है। अक्सर होता यह है कि हम तो मौन धारण कर लेते हैं, लेकिन हमारा मन तो मुक्त है, वह तो आपसे सतत वार्तालाप करता ही रहता है और मन ही मन आप उसको जवाब भी देते ही रहते हो।।

दिव्य मौन, मन से भी पार जाने की अवस्था है। यहां ना कोई बोलने वाला होता है और ना कोई सुनने वाला। शायद कबीर की इसी आध्यात्मिक अनुभूति को पंडित कुमार गंधर्व ने इस तरह प्रकट किया है ;

सुनता है गुरु ज्ञानी, गुरु ज्ञानी

गगन में आवाज हो रही झीनी झीनी झीनी झीनी

पहिले आए आए पहिले पाए

नाद बिंदु से पीछे जमया पानी पानी हो जी ….

सुनता है गुरु ज्ञानी

कबीर हो अथवा कोई भी दिव्य सत्पुरुष, सभी आध्यात्मिक उपलब्धियां और उपदेश दिव्य मौन में ही प्रकट होते हैं। अंतर्चेतना ही अंतर्गुरु है, बाहरी गुरु तो निमित्त मात्र है। दिव्य मौन का उपदेश ही एक साधक को गुरु पूर्णिमा का उपदेश है।

आइए मन के पार चलें इस गुरु पूर्णिमा पर, बस हम आप और दिव्य मौन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥
© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९४ ☆ श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९४ ☆

श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

वर्षा की बूंदे सुखद, जीवन का आधार ।

हरियाली फैली रहे,  सुंदर रूप निखार ।।

*

बागों में झूले पड़े,   बारिश हो घनघोर ।

चंचल मन पर न चले, कभी किसी का जोर।।

श्रावण की पहली आहट के साथ ही लगता है मानो प्रकृति ने धरा के माथे पर हरियाली का तिलक सजा दिया हो। वर्षा की बूँदें केवल धरती की प्यास ही नहीं बुझातीं, वे मनुष्य के भीतर सोई संवेदनाओं को भी सींच देती हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में श्रावण केवल एक मास नहीं, बल्कि प्रकृति और आत्मा के पुनर्मिलन का पर्व माना गया है।

हमारे ऋषियों ने ऋतुचक्र के साथ जीवनचक्र को इस प्रकार जोड़ा कि उपासना भी हो, अनुशासन भी और पर्यावरण का संरक्षण भी। देवशयनी एकादशी से लेकर गुरु पूर्णिमा और हरियाली अमावस्या तक प्रत्येक अवसर हमें यही स्मरण कराता है कि सृष्टि से हमारा संबंध उपभोग का नहीं, आत्मीयता का है। वृक्ष केवल छाया नहीं देते, नदियाँ केवल जल नहीं बहातीं और वर्षा केवल मौसम नहीं बदलती—ये सब जीवन के मौन गुरु हैं।

आज जब विकास की दौड़ में हरियाली सिमटती जा रही है, तब श्रावण हमें ठहरकर यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम प्रकृति से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना उसके उपहारों से?

यदि प्रत्येक व्यक्ति इस मास में केवल एक पौधे को अपना आत्मीय मान ले, जल और हरियाली के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ले, तो यह धरती फिर से मुस्करा उठेगी। श्रावण का सच्चा उत्सव मंदिरों की घंटियों से आगे बढ़कर तब पूर्ण होगा, जब हमारे मन, हमारे आँगन और हमारी धरती—तीनों फिर से हरे-भरे हो उठेंगे।

सपनों को मिलने लगा, एक नया आकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४५ ⇒ सब्र का बांध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सब्र का बांध।)

?अभी अभी # १०४५ ⇒ आलेख – सब्र का बांध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब सब्र का बांध टूटता है तो आंखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। नैना सावन भादो हो जाते हैं, बिन बादल बरसात हो जाती है।

सभी जानते हैं, बांध नदियों पर बनाया जाता है। भाखड़ा नांगल, टिहरी, चंबल, गांधी सागर और सरदार सरोवर, सब बांध ही तो हैं। नदियों के पानी को रोककर बिजली बनाई जाती है। एक समय में पूरे मध्यप्रदेश को चंबल से बिजली मिलती थी और राजस्थान को पानी। बाद में नर्मदा के सरदार सरोवर से मध्यप्रदेश तो पानी पानी हो गया और बिजली गुजरात चली गई। साथ ही गंगा जमुनी संस्कृति की जगह नर्मदा – साबरमती संस्कृति ने जन्म ले लिया और पूरे गुजरात में नर्मदा के पानी से नहरों का जाल बिछ गया। यही अंतर है कल के नेहरू और आज की विकास की नहरों में।।

बांध की एक सीमा होती है। जब बरसात और पहाड़ों का पानी नदियों में सैलाब बन फूट पड़ता है तो बांध के गेट खोलने पड़ते हैं। खतरों के निशान पर नजर रखनी पड़ती है। थोड़ी भी लापरवाही हुई और चारों ओर जल प्रलय। बारिश में जब यशवंत सागर के सभी साइफन खुल जाते हैं, तो नजारा देखते ही बनता है।

बस कुछ ऐसी ही स्थिति होती है, सब्र के बांध की ! कभी गुस्सा फूट पड़ता है तो कभी दुख का पहाड़। गुस्सा तो खैर तबाही ही मचाता है, इसलिए गुस्से को तो कंट्रोल ही करना चाहिए लेकिन अगर गम के आंसू हैं, तो उन्हें रोको मत, बहने दो ;

या दिल की सुनो दुनिया वालों

या मुझको अभी चुप रहने दो।

मैं गम को खुशी कैसे कह दूं

जो कहते हैं, उनको कहने दो।।

ये आंसू मेरे दिल की ज़ुबान है ! अभी कल ही हमारे परिवार के बेहद करीबी, मित्र और शुभचिंतक का आकस्मिक स्वर्गवास हो गया। साठ साल का साथ, 60 घंटों में टूट गया। लॉक डाउन में जो जहां है, वहीं सब्र किए बैठा है। मर्द को तो दर्द नहीं होता। औरतों का दिल तो रोता है जी। मेरी दोनों बहनें जो आने से मजबूर थी, फोन पर ही फट पड़ी। आंखों से टप टप आंसू। अगर पास भी होती तो मैं क्या कर लेता। पहले हाथों को सनेटाइज करता, शायद फिर उसके आंसू पोंछता। शायद गले तो फिर भी नहीं लगा पाता। अच्छा हुआ, कोरोना ने दूरी बनाई रखी।।

मुझे याद नहीं, मैं कब फूट फूट कर रोया। महिलाओं में भगवान ने करुणा के साइफन लगा रखे हैं, उधर दुख का पहाड़ टूटा, इधर सब्र का बांध टूटा और आंसुओं के सैलाब में सब कुछ जलमग्न।

कितना कुछ बह जाता है इन आंसुओं के साथ। इन्हें बहने देना चाहिए, रोकना नहीं चाहिए। जब कभी सदमे से ये आंसू सूख जाते हैं, तो मानसिक आघात अधिक घातक हो जाता है। ऐसे में आंसू जबरदस्ती लाए जाते हैं। जो लिखा था, आंसुओं के संग बह गया। रोना ज़रूरी है।

ये कोरोना हमें किसी के आंसू नहीं पोंछने देगा। कैसी शवयात्रा और कैसी शोक बैठक ! बस किसी को रोने को मजबूर ना करें, और अगर खुद को मज़बूरी में रोना पड़े, तो दर्जन भर नैपकिन साथ रखें। अब कोई आपके आंसू भी नहीं पोंछ सकता। रोने से जी हल्का होता है। सब्र का बांध टूटने दें। मुझे अच्छी तरह से रोने दें। बहुत दिन हो गए आंसू बहाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४४ ⇒ अपराध-बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपराध-बोध।)

?अभी अभी # १०४४ ⇒ आलेख – अपराध-बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अपराधियों को अपराध-बोध नहीं होता और जो निर्दोष होते हैं, वे अपराध-बोध के तले दबे रहते हैं। अपराध बोध, अपराध करने से अधिक घातक होता है।

अक्सर अवसाद और आत्महत्या की जड़ में यही अपराध-बोध होता है।

अपराध क्या है, यह कानून तय करता है। इंसान नैतिकता और अनैतिकता के चक्र में उलझा रहता है। जिसमेंलोग क्या कहेंगे” वाला भाव मुख्य रूप से हावी रहता है।।

सिगरेट पीना, शराब पीना अथवा झूठ बोलना कोई इतना बड़ा अपराध तो नहीं ! इन्हें अधिक से अधिक आप बुरी आदत अथवा लत कह सकते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये तीनों ही आदतें आदमी में आत्म-विश्वास बढ़ाती हैं। एक तो गलत काम और उससे आत्म-विश्वास, विश्वास नहीं होता।

पान वाले की दुकान पर, घर में, सार्वजनिक स्थान में, कभी छुपकर, कभी खुले आम, जिस आत्म-विश्वास से लोग सिगरेट का धुआँ छोड़ते हैं, वह देखते ही बनता है। कोई भी बुरी आदत आसानी से नहीं छूटती। जिनकी इच्छा-शक्ति प्रबल होती है, वे बुरी आदतों से बाज आते हैं, कुछ इसे एक मानवीय कमज़ोरी मान, भरे मन से ही सही, आदतों के समक्ष आत्म-समर्पण कर देते हैं।।

अच्छी-बुरी आदत अपराध नहीं ! अपराध-बोध सकारात्मक भी हो सकता है, और नकारात्मक भी।

सकारात्मक अपराध-बोध में विवेक मन पर अंकुश लगाए बैठा रहता है, और छोटी से छोटी भूल होने पर भी, मन को आगाह किया करता है। जो आत्म-विश्लेषण करते रहते हैं, वे अपने अपराधों /भूलों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर लेते हैं।

इससे उनके मन का बोझ भी हल्का हो जाता है। ईसाइयों के confession, जैनियों का पर्युषण के वक्त जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा, और गाँधीजी के सत्य के प्रयोग इसी श्रेणी में आते हैं। प्रायश्चित अपराध-बोध से मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

नकारात्मक अपराध-बोध की श्रेणी में ऐसी छोटी-मोटी भूलें होती हैं, जिन्हें व्यक्ति बड़ा मान बैठता है, और अंदर ही अंदर घुटते रहकर अवसाद की स्थिति निर्मित कर लेता है। यह स्थिति इतनी घातक होती है कि इसमें चित्त में अंधकार व्याप्त हो जाता है, और आत्महत्या के अलावा उसे कोई दूसरी राह नज़र नहीं आती। स्वाभिमानी, सच्चरित्र लोगों पर जब झूठे इल्ज़ाम या केस लगाए जाते हैं, तो उन्हें अपने स्वाभिमान को बचाने का कोई अन्य रास्ता दिखाई नहीं देता और वे आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाते हैं।।

आसाराम और राम-रहीम में कितना अपराध-बोध है, और वे किस हद तक अपराधी हैं, यह ईश्वर जाने, लेकिन जब भैय्यू महाराज जैसे कथित संत पारिवारिक समस्याओं के लिए स्वयं को ज़िम्मेदार मानते हुए स्वयं को गोली मारकर समाप्त कर लेते हैं, तो अपराध-बोध की सकारात्मकता, नकारात्मकता में बदल जाती है। इसका मतलब यह भी कतई नहीं कि आसाराम का सकारात्मकता से कुछ लेना-देना है। कुछ अपराधियों में अपराध-बोध होता ही नहीं।

इस तरह वे अपने आपको एक सच्चा अपराधी ही सिद्ध कर रहे होते हैं।

अपराध बुरा है, लेकिन अपराध-बोध उससे भी बुरा है। अपराध से बचें, और अपराध-बोध से भी ! छोटी-मोटी गलतियों को कबूलें, बड़ी गलतियों से तौबा करें। अनजाने में, अथवा आवेश में हुए अपराध के लिए प्रायश्चित करें। अपराध और अपराधी को संरक्षण देना जुर्म है और पाप भी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४३ ⇒ || अभंग || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – || अभंग || ।)

?अभी अभी # १०४३⇒ आलेख – || अभंग || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो भजे हरि को सदा, वो ही परम पद पाएगा। हरि हजार हाथ वाला ही नहीं, हजार नाम वाला भी है। राम तेरे कितने नाम, विष्णु सहस्रनाम ! भक्त विभक्त भले ही नहीं होता हो, लेकिन अपने इष्ट के भक्ति भाव में अनुरक्त रहता है। वह जो भजता है, वह भजन हो जाता है।

भारत देश संतों की पावन भूमि है। संगत, संतन की कर ले। अयोध्या के मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों, या फिर मथुरा, गोकुल, वृन्दावन के श्याम, सूर, तुलसी, और मीरा ही नहीं, गुजरात के नरसिंह भगत और महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, और समर्थ रामदास ने भी अपने भजनों से जन मानस को भक्ति रस में आंदोलित और आनंदित किया।।

कृष्ण भक्ति के कई आयाम हैं। वे ठाकुर जी भी हैं और मथुराधीश और द्वारकाधीश भी। वे ही राधाकृष्ण हैं और वे ही नाथद्वारा के श्रीनाथ जी भी। उनकी लीला अपरम्पार है। जगन्नाथ पुरी में अगर वे दाऊ बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं तो पंढरपुर में उनके साथ रुक्मिणी जी हैं। वृन्दावन के ही कृष्ण कन्हैया पंढरपुर में विट्ठल बन जाते हैं। यहां उनके साथ राधा रानी नहीं देवी रुक्मिणी विराजमान हैं।

जिस तरह अष्टछाप के संतों ने और रसखान और मीराबाई ने कृष्ण भक्ति में पदों की रचना की, उसी प्रकार महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, नामदेव और जनाबाई ने पंढरपुर के विठोबा की भक्ति में लीन हो, मराठी में अभंग की रचना की। वैष्णव संप्रदाय की तरह महाराष्ट्र में भी वारकरी संप्रदाय है जो अपने विट्ठल के दर्शनार्थ अपने अपने स्थानों से जय श्री हरि विट्ठल का जयघोष और पांडुरंग के अभंगों का कीर्तन करते हुए पैदल ही पंढरपुर की ओर प्रस्थान करते हैं।।

संत ज्ञानेश्वर महाराज ने ही वारकरी संप्रदाय की नींव डाली। वारकरी का अर्थ होता है, परिक्रमा करना। देवशयनी एकादशी को यहां लाखों भक्त विठोबा रुक्मिणी मंदिर की नाचते गाते परिक्रमा और पूजा अर्चना करते हैं। मीराबाई के पदों की ही तरह विठ्ठलाच्या गवळणी महाराष्ट्र के घर घर में गाई जाती है।

आप कोई भाषा जानें यह जरूरी नहीं, बस पंडित भीमसेन जोशी का अभंग माझे माहेर पंढरी एक बार सुन लें।

विसरू नको रे आई बापा ला और धरिला पंढरी चा चोर जैसे कई अभंग आपकी भक्ति भाव की चेतना को भंग नहीं होने देंगे।।

चैतन्य महाप्रभु की यह कीर्तन विधा ही आज महाराष्ट्र में अभंग और वारकरी संप्रदाय के रूप में फल फूल रही है।

आइए पंढरपुर चलें.. !!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४४ – स्थितप्रज्ञ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४४ स्थितप्रज्ञ… ?

एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर हमारी सोसायटी के पास ही रहा करते थे। सज्जन व्यक्ति थे।अकस्मात मृत्यु हो गई। एक दिन लगभग उसी जगह एक रिक्शा खड़ा देखा तो वे सज्जन याद आए। विचार उठा कि आदमी के जाने के बाद कोई उसे कितने दिन याद रखता है? चिता को अग्नि देने के बाद परिजनों के पास थोड़ी देर  रुकने का समय भी नहीं होता। 

एक घटना स्मरण हो आई। एक करीबी परिचित परिवार में शोक प्रसंग था। अंतिम संस्कार के समय, मैं श्मशान में उपस्थित था। सारी प्रक्रिया चल रही थी। लकड़ियाँ लगाई जा रही थीं। साथ के दाहकुंड में कुछ युवा एक अधेड़ की देह लेकर आए थे। उन्होंने नाममात्र लकड़ियाँ लेकर अधिकांश उपलों का उपयोग किया। श्मशान का कर्मचारी समझाता रह गया, पर केवल उपलों के उपयोग से से देह के शीघ्र फुँक जाने का गणित समझा कर अग्नि देने के तुरंत बाद  वे सब चलते बने।

हमें सारी तैयारी में समय लगा। दाह दिया गया। तभी साथ वाले कुंड पर दृष्टि गई तो जो दृश्य दिखा, उससे भीतर तक मन हिल गया। मानो वीभत्स और विदारक एक साथ सामने हों। उस देह का एक पाँव अधजली अवस्था में लगभग पचास अंश में ऊपर की ओर उठ गया था। अधिकांश उपलों के जल जाने के कारण देह के कुछ अन्य भाग भी दिखाई दे रहे थे।

श्मशान के कर्मचारी से सम्पर्क करने पर उसने बताया कि हर दिन ऐसे एक-दो मामले तो होते ही हैं, जिनमें परिजन तुरंत चले जाते हैं। बाद में फोन करने पर भी नहीं आते। अंतत:  मृत देह का समुचित संस्कार श्मशान के कर्मचारी ही करते हैं।

लोकमान्यता है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। अपनी कविता ‘स्थितप्रज्ञ’ याद हो आई-

💥 स्थितप्रज्ञ 💥 

शव को / जलाते हैं / दफनाते हैं,

शोक, विलाप / रुदन, प्रलाप,

अस्थियाँ, माँस, / लकड़ियाँ, बाँस,

बंद मुट्‌ठी लिए / आदमी का आना,

मुट्‌ठी भर होकर / आदमी का जाना,

सब देखते हैं /सब समझते हैं,

निष्ठा से / अपना काम करते हैं,

श्मशान के ये कर्मचारी

परायों की भीड़ में /अपनों से लगते हैं,

घर लौटकर /रोज़ाना की सारी भूमिकाएँ

आनंद से निभाते हैं / विवाह, उत्सव

पर्व, त्यौहार /सभी मनाते हैं

खाते हैं, पीते हैं / नाचते हैं, गाते हैं,

स्थितप्रज्ञता को भगवान,

मोक्षद्वार घोषित करते हैं,

संभवत: / ऐसे ही लोगों को,

स्थितप्रज्ञ कहते हैं..!

 विश्वास हो गया कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। इस स्थितप्रज्ञता को प्रणाम !

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख  – पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई।)

☆ आलेख – पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

लोकगायन लोककला की आवाज़ है। यदि लोककला दीवारों पर दृष्टिगोचर होती है तो लोकगायन हवा में तैरता है और सीधे दिल में उतरता है। भारत के उत्तर प्रदेश,बिहार का विरहा, राजस्थान का मांड, बंगाल का बाउल, पूर्वी भारत का सोहर, बारहमासा और छत्तीसगढ का पंडवानी आदि प्रमुख लोकगायन के अन्तर्गत आते हैं। छत्तीसगढ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में विकसित पंडवानी मूलत: महाभारत की कथाओं का लोकगायन है। इसमें कलाकार तंबूरा हाथ में लेकर कथा का गायन करता है और पात्रों के संवादों, युद्ध प्रसंगों तथा भावनात्मक घटनाओं का अभिनय भी करता चलता है। वेदमती और कपालिक पंडवानी गायन की दो प्रमुख शैलियाँ होती हैं। वेदमती शैली में कलाकार शान्त भाव से बैठकर प्रस्तुति करता है तथा कपालिक शैली में खड़े होकर अभिनय, संवाद, नाटकीयता के साथ ऊर्जावान प्रस्तुति की जाती है। लोकगायिका तीजनबाई ने पंडवानी की इसी कपालिक शैली को अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ प्रदान की थीं। आपका जन्म 08 अगस्त 1956 ई० को छत्तीसगढ के दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम हुनुकलाल पारथी और माता का नाम सुखवती देवी था। बचपन में आपको नाना ब्रजलाल पारथी से महाभारत की कहानियाँ सुनने का शौक पैदा हुआ और वे शीघ्र ही पंडवानी ( पाण्डव कथा ) की मुरीद हो गईं। तेरह वर्ष की उम्र में आपने पहली बार सार्वजनिक रूप से पंडवानी में प्रस्तुति दी, जिसकी दर्शकों ने सराहना तो की किन्तु समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया। विरोधस्वरूप आपको सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा लेकिन आपने हार नहीं मानी।

तीजनबाई की सोच थी कि यदि कला ईश्वर का वरदान है तो उसे समाज के डर से छोड़ा नहीं जा सकता। इसी आत्मविश्वास को लेकर आपने कम आयु में ही छोटे-छोटे गाँवों में प्रस्तुतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी गायकी में बुलंद और प्रभावशाली स्वर, महाभारत के पात्रों का जीवंत अभिनय, सहज संवाद शैली, लोकभाषा का प्रभावी प्रयोग, भावानुकूल मुख मुद्राएँ, श्रोताओं से सीधा संवाद, तंबूरा का अभिनयात्मक प्रयोग आदि प्रमुख विशेषताएँ थीं। आप तंबूरा को कभी अर्जुन का गाण्डीव, कभी भीम की गदा, कभी दुर्योधन की तलवार तो कभी रथ का प्रतीक बना दिया करतीं थीं। आपकी कला में सहजता, मौलिकता, लोकजीवन की आत्मीयता, अभिनय की प्रखरता, गायन की अद्भुत शक्ति, कथावाचन की विलक्षण क्षमता दृष्टिगोचर होती थी। महाभारत के धार्मिक आख्यानों को आप मानव जीवन के संघर्ष, न्याय-अन्याय, धर्म, साहस, कर्तव्य और नैतिक मूल्यों की कथा के रूप में व्याख्यायित किया करतीं थीं। उनकी प्रस्तुति में भीम केवल बल का प्रतीक न होकर अन्याय प्रतिरोध का स्वर, अर्जुन केवल योद्धा नहीं, कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य का प्रतीक, द्रोपदी नारी सम्मान और स्वाभिमान की प्रतिनिधि, कृष्ण नीति,विवेक और धर्म के मार्गदर्शक के रूप में उभरते हैं। इस प्रकार मनोरंजन के साथ-साथ पंडवानी में जीवन दर्शन भी प्रस्तुत किया। अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के कारण ही तीजनबाई की ख्याति राज्य की सीमाओं से बाहर भी पहुँचने लगी। उनकी इस कला को पहचान दिलाने में अनेक सांस्कृतिक संस्थानों, संस्थाओं एवं विद्वानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शनै: शनै: राष्ट्रीय नाट्य समारोहों, संगीत महोत्सवों, लोककला उत्सवों, विश्वविद्यालयों में आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बनने लगीं और एक दिन ऐसा आया जब आपने यूरोप, एशिया, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, रूस आदि के सांस्कृतिक समारोहों में प्रदर्शन करके यह प्रमाणित कर दिया कि लोककला भाषाओं की सीमा से परे होती है।

तीजनबाई को कला साधना के लिए 1988 ई०में पद्मश्री, 1995ई०में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 ई० में पद्मभूषण, 2018 ई० में फुकुओका प्राइज, 2019 ई० में पद्मविभूषण आदि अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। छत्तीसगढी लोकभाषा को वैश्विक पहचान दिलाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज अनेक लोग पंडवानी पर शोधकार्य कर रहे हैं, नई पीढ़ी में लोकगायकी के प्रति रुचि उत्पन्न हो रही है, पंडवानी राष्ट्रीय संस्थानों तक पहुँच रही है, युवा कलाकारों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, सांस्कृतिक आयोजनों में लोककला को प्रतिष्ठा मिल रही है। इसका एक बड़ा कारण आपकी प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ रहीं हैं। आपका जीवन भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। आपने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा सामाजिक बंधनों से बड़ी होती है। यदि महिलाएँ आत्मविश्वास और परिश्रम के साथ आगे बढ़ें तो वह विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सकतीं हैं। लोककला, संघर्ष और साधना का पर्याय ‘ तीजनबाई ‘ आज हमारे मध्य नहीं हैं। यह महान कलाकारा 05 जुलाई 2026 ई० को रायपुर के एम्स अस्पताल में सत्तर वर्ष की आयु में हम सबको अलविदा कह गईं हैं लेकिन भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में  सशक्त संवाहिका, इस परम्परा की संरक्षिका के रूप में आप हमेशा ही अजर-अमर रहेंगी।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

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