(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिमटा संड्सी…“।)
अभी अभी # १०८१ ⇒ आलेख – चिमटा संड्सी श्री प्रदीप शर्मा
चिमटा और संड्सी का पूरा जीवन, किसी आदर्श गृहिणी की तरह चौके चूल्हे में ही गुजर जाता है। इन्हें भले ही पर्दे में नहीं रखा जाता हो, लेकिन इन्हें कभी रसोईघर छोड़ने की अनुमति नहीं मिलती। बैठक में तो इनकी परछाई भी प्रवेश नहीं कर सकती। इन्हें अक्सर आग से खेलना पड़ता है।
इनका रसोईघर में वही महत्व होता है जो पिंचिस, पेचकस(स्क्रूड्राइवर) और पाने(प्लायर) का एक मैकेनिक के लिए होता है।
रसोईघर भले ही कोई वर्कशॉप नहीं हो, लेकिन एक पाकशाला तो है ही।।
जब चिमटा छोटा होता है तो उसे चिमटी कहते हैं। अक्सर डिसेक्शन बॉक्स में और घड़ीसाजों के पास घड़ी के छोटे छोटे कलपुर्जों को पकड़ने के लिए चिमटियों का उपयोग होता है, जिसे forcep कहते हैं। बचपन में भाई बहन आपस में, और स्कूल में बच्चे एक दूसरे को च्यूंटी खोड़ते थे। यह एक ऐसी हरकत थी, जिस पर अक्सर किसी तीसरे व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता था।
नाम के अनुरूप इसमें चींटी काटने जितना ही दर्द होता था। इसकी शिकायत एक आम समस्या थी।
जहां तवा है, वहां चिमटा है। बिना चिमटे के आग पर रोटी नहीं सिकती। पापड़ भी बिना चिमटे के नहीं सिकता। कितनी बार उलटने पलटने पर पापड़ की बेदाग सिकाई होती है, यह सब कुशल गृहिणी के साथ चिमटे का भी तो कमाल है। शैतान बच्चों के लिए माता का यह प्रिय गर्म अस्त्र बन जाता था जिससे सिर्फ उन्हें डराया जाता था।।
जब चिमटा और बड़ा हो जाता है तो उसे सन्यास ग्रहण करना पड़ता है और वह बाबाओं के हाथ में चला जाता है, तवे की रोटी त्याग इसे अलख जगानी पड़ती है। अलख निरंजन।
संड्सी को कुछ लोग संडासी भी कहते हैं, जो गलत है। वे भूल जाते हैं, मराठी में संडास किसे कहते हैं। हमारी भारतीय महिलाओं का रसोईघर, पूजा घर जितना ही पवित्र और साफ सुथरा होता है। कच्चे घरों में तो रोज रसोई के साथ चूल्हे को भी लीपा जाता था। रसोईघर में जूते चप्पल निषेध थे। तपेली, भगोनी और चूल्हे पर चढ़े अन्य गर्म पात्रों को संड्सी की पकड़ ही कुशलता से उतार पाती है। अगर चूल्हे पर दूध उफन रहा हो और आसपास संड्सी नदारद हो तो घर में ही दूध की गंगा बह जाती है।
समय के साथ किचेनवेयर में भी बदलाव आने लगा है। तवे का स्थान हैंडल वाले नॉन स्टिक pan पैन ने ले लिया है। सभी बर्तनों में आजकल हैंडल लगे होते हैं। फिर भी चिमटे और संड्सी का महत्व कम नहीं हुआ है। कुशल गृहिणी है जहां, चिमटा संड्सी है वहां।।
☆ आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(भीषण त्रासदी के कारक )
☆
आसमान से उतर रहे देवताओं को देखकर धरती माँ चिल्लाई,
नहीं नही…भाई अभी इसकी जरूरत नहीं है l अभी मुझ पर उतना अत्याचार नहीं है जितना कहा जा रहा है l अभी भी मै अनेकानेक, नेक इंसानों को लोंगो की मदद करते देख रही हूँ। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है l बस पीड़ा एक बात की है कि क्या सड़क, क्या बाजार, क्या स्कूल, क्या अस्पताल सब धक्कम – रेल हो रही है,
मैं हिलती जा रही हूँ
मै बुरी तरह से काँप रही हूँ
आने वाले खतरे को भाँप रही हूँ।
कॉलोनी में गाड़ियों का रेला, रेल बनता जा रहा है। मोहल्ले की लड़ाई, किचन बर्तन से उतरकर, गाड़ियों की पार्किंग तक चली आयी है। रोडवेज की एक बस निकली नहीं कि दूसरी भर जा रही है। जहाँ देखो भीड़ ही भीड़।
राशन की लाइन में भीड़,
मॉल- वाटर पार्क में भींड,
ऑफिस दफ्तरों की भींड,
रोडवेज रेलवे स्टेशनो में भींड,
शेर सपाटा-तीर्थ यात्रा करने वालों की भीड़
टूरिस्ट हैं या तथाकथित तीर्थ यात्रियों
मै नही जानता लेकिन लगी हुई है भीड़,
भीड़ ही भीड़, भीड़ इतनी कि मैं खुद अपनी नीड ढूढ़ रही हूँ। रोज बा रोज नए-नए अस्पतालों के खुलने के बावजूद भी अस्पतालों में भीड़ ही भीड़ है। ओ.पी.डी. से ओ.टी. तक की भीड़, एक्स रे -अल्ट्रासाउंड सेंटर की भीड़, पैथोलॉजी में खून निकलवाने वालों की भीड़, अस्पताल के अगल बगल खून चूसने वाले दलालों की भीड़।
इतना ही नहीं टूरिज्म की आड़ में सभी जा रहे हैं झुंड के झुंड पहाड़ों पर। वहाँ भी अब शांति नहीं, क्योंकि ये सारे पदयात्री नहीं।
गाड़ी, घोड़ा, मोटर बग्गी सब कुछ लेकर जाना है। इन लोगों के सुख सुविधा में कोई कमी न हो, वोट बैंक बरकरार रहे इसलिए विकास की आड़ में, काटते चले जा रहे हैं पहाड़ों को। बना रहे हैं रोज एक से एक बड़ी सड़के। मेरे पहाड़ों को तोड़ने के लिए जब आती है इनकी भारी भरकम मशीने, तब शांत पहाड़ चिघाड़ उठते हैं। रोने लगती है उनकी आत्माएं। काट -काट कर गिरा देते हैं देवदार और चीड़ के वृक्षो को। ये वृक्ष जो कि जकड़े रहते हैं अपनी जड़ों से इन पहाड़ों को। पहाड़ों पर पहुंचकर बनाते हैं आलीशान होटल। पहुँच जाती है ढेर सारी गाड़ियाँ। इनके धुओं से बढ़ जाता है यहाँ का टेंपरेचर। टूट के गिर पड़ते हैं, विशाल और विशाल ग्लेशियर। टूट जाती है प्रकृति की बनाई हुई झील की दीवारें और बहता हुआ निकल पड़ता है जानलेवा शैलाब। तब होती केदारनाथ और नेपाल जैसी भीषण त्रासदी
मारी जाती है ढेर सारी मानवता। अनाथ हो जाते हैं छोटे-छोटे बच्चे, बेसहारा हो जाते हैं बुजुर्ग माँ बाप।
यह सब देखकर मैं हिल उठती हूँ। फूट फूट कर रोती हूँ। आखिर मै करूँ तो क्या करूँ, ये तो मानते नहीं है।
पर यह सब होता ही भी है इन्हीं के कारण। इन लोगों ने तो एकदम हलचल बचा कर रख दी है। क्या धरती क्या आसमान, सब जगह भीड़ बेकाबू है, इनकी मनमानी जारी है। एक दिन आसमान भी मुझे रो कर कह रहा था कि तेरे बेटों ने यहां भी गंदगी बचा कर रख दी है। ढेर सारे रॉकेट, ढेर सारे उपग्रह क्या बोलते हैं, सैटेलाइट.. मेरे स्वच्छ शांत नीले आँगन में छोड़ रखा है l मैं बिलख रही हूँ। वायुयानों की तो बात ही छोड़ो, ये लाखों फतिंगो की तरह से इधर से उधर फुदक कर रहे हैं l इन्होने मेरा जीवन हराम कर दिया है।
हे देवगण ! मैं सिर्फ अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने गोद में पालना चाहती हूँ, और पालती भी हूँ। लेकिन इनके लिए शेष कार्य तो आप लोग ही करते हो l आप में से कोई धन के देवता हो, कोई ऐश्वर्या और यश के देवता हो, कोई जल के देवता हो, कोई ऊर्जा के देवता हो, कोई बुद्धि विवेक के देवता हो तो बस इतनी दया करो इन्हें इन्हे धन -दौलत सबकुछ दो पर बुद्धि विवेक कुछ ज्यादा ही दो, कि मेरे संकट में पड़े प्राण बच सके।
है देवगण ! मेरी पीड़ा के दो बड़े मूल कारण है, जो मुझे पीड़ित कर रहे हैं, मैं इसी विषय पर सोचती रहती हूं और आपसे कहती हूँ..
आप लोग मेरे इन पुत्रों से कहो कि-
ये लोग बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण रखें।
प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करें।
अगर ये लोग आपकी बात मानकर ऐसा करते हैं तब जाकर मेरी खुशी वापस लौटेगी.
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़िंदगी…लम्हों की किताब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – इंसान मिट्टी से उपजा / स्वर- विकास यशकीर्ति, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३६ ☆
☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘लम्हों की किताब है ज़िंदगी/ सांसों व ख्यालों का हिसाब है ज़िंदगी/ कुछ ज़रूरतें पूरी, कुछ ख्वाहिशें अधूरी/ बस इन्हीं सवालों का/ जवाब है जिंदगी।’ प्रश्न उठता है–ज़िंदगी क्या है? ज़िंदगी एक सवाल है; लम्हों की किताब है; सांसों व ख्यालों का हिसाब है; कुछ अधूरी व कुछ पूरी ख्वाहिशों का सवाल है। सच ही तो है, स्वयं को पढ़ना सबसे अधिक कठिन कार्य है। जब हम ख़ुद के बारे में नहीं जानते; अनजान हैं ख़ुद से… फिर ज़िंदगी को समझना कैसे संभव है? ‘जिंदगी लम्हों की सौग़ात है/ अनबूझ पहेली है/ किसी को बहुत लगती लम्बी/ किसी को लगती सहेली है।’ ज़िंदगी सांसों का एक सिलसिला है। जब कुछ ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं, तो इंसान प्रसन्न हो जाता है; फूला नहीं समाता है– मानो उसकी ज़िंदगी में चिर-बसंत का आगमन हो जाता है और जो ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं; टीस बन जाती हैं; नासूर बन हर पल सालती हैं, तो ज़िंदगी अज़ाब बन जाती है। इस स्थिति के लिए दोषी कौन? शायद! हम…क्योंकि ख्वाहिशें हम ही मन में पालते हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। एक के बाद दूसरी प्रकट हो जाती है और ये चाहतें हमें चैन से नहीं बैठने देतीं। अक्सर हमारी जीवन-नौका भंवर में इस क़दर फंस जाती है कि हम चाह कर भी उस चक्रवात से बाहर नहीं निकल पाते। परंतु इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं, परंंतु उस ओर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं और न ही हम यह जानते हैं कि हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं और इस संसार में आने का हमारा प्रयोजन क्या है? संसार व समस्त प्राणी-जगत् नश्वर है और माया के कारण सत्य भासता है। यह सब जानते हुए भी हम आजीवन इस मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाते।
सो! आइए, खुद को पढ़ें और ज़िंदगी के मक़सद को जानें; अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और बेवजह ख्वाहिशों को मन में विकसित न होने दे। ख्वाहिशों अथवा आकांक्षाओं को ज़रूरतों-आवश्यकताओं तक सीमित कर दें, क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति तो सहज रूप में संभव है; इच्छाओं की नहीं, क्योंकि वे तो सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं और उनका अंत कभी नहीं होता। जिस दिन हम इच्छा व आवश्यकता के गणित को समझ जाएंगे; ज़िंदगी आसान हो जाएगी। आवश्यकता के बिना तो ज़िंदगी की कल्पना ही बेमानी है, असंभव है। परमात्मा ने प्रचुर मात्रा में पृथ्वी, वायु, जल आदि प्राकृतिक संसाधन जुटाए हैं… भले ही मानव के बढ़ते लालच के कारण हम उनका मूल्य चुकाने को विवश हैं। सो! इसमें दोष हमारी बढ़ती इच्छाओं का है। इसलिए इच्छाओं पर अंकुश लगाकर उन्हें सीमित कर तनाव-रहित जीवन जीना श्रेयस्कर है।
ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती और कई बार हम पहले ही घुटने टेक कर पराजय स्वीकार लेते हैं; उन्हें पूरा करने के निमित्त जी-जान से प्रयत्न भी नहीं करते और स्वयं को झोंक देते हैं– चिंता, तनाव, निराशा व अवसाद के गहन सागर में; जिसके चंगुल से बच निकलना असंभव होता है। वास्तव में ज़िंदगी साँसों का सिलसिला है। वैसे भी ‘जब तक साँस, तब तक आस’ रहती है और जिस दिन साँस थम जाती है, धरा का, सब धरा पर, धरा ही रह जाता है। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है…सो! मानव अंत में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश में विलीन हो जाता है।
‘आदमी की औक़ात/ बस! एक मुट्ठी भर राख’ यही है जीवन का शाश्वत सत्य। मृत्यु निश्चित व अवश्यंभावी है; भले ही समय व स्थान निर्धारित नहीं है। इंसान इस जहान में खाली हाथ आया था और उसे सब कुछ यहीं छोड़, खाली हाथ लौट जाना है। परंतु फिर भी वह आखिरी सांस तक इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और अपनों की चिंता में लिप्त रहता है। वह अपने आत्मजों व प्रियजनों के लिए आजीवन उचित-अनुचित कार्यों को अंजाम देता है…उनकी खुशी के लिए; जबकि पापों का फल उसे अकेले ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि ‘सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का आनंद तो सभी लेते हैं, परंतु वे पाप के प्रतिभागी नहीं होते। आइए! हम इससे निज़ात पाने की चेष्टा करें और हर पल को अंतिम पल स्वीकार कर निष्काम कर्म करें। कबीरदास जी का यह दोहा समय की सार्थकता पर प्रकाश डालता है–’ काल करे सो आज कर, आज करे सो अब/ पल में प्रलय हो जाएगी, बहुरि करेगा कब?’ जी हां! कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; केवल वर्तमान ही सत्य है। इसलिए जो भी करना है; आज ही नहीं, अभी करना बेहतर है। क़ुदरत ने तो हमें आनंद ही आनंद दिया है, दु:ख तो हमारी स्वयं की खोज है। इससे तात्पर्य है कि प्रकृति दयालु है; मां की भांति मानव की हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। परंतु मानव स्वार्थी है; उसका अनावश्यक दोहन करता है; जिसके कारण अपेक्षित संतुलन व सामाजिक-व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा उसके कार्य-व्यवहार में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का परिणाम है सुनामी, अत्यधिक वर्षा, दुर्भिक्ष, अकाल, महामारी आदि…जिनका सामना आज पूरा विश्व कर रहा है। मुझे स्मरण हो रहा हो रहा है… भगवान महावीर द्वारा निर्दिष्ट–’जियो और जीने दो’ का सिद्धांत, जो अधिकार को त्याग कर्त्तव्य-पालन व संचय की प्रवृत्ति को त्यागने का संदेश देता है। सृष्टि का नियम है कि ‘एक साँस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है।’ सो! जीवन में ज़रूरतों की पूर्ति करो; व्यर्थ की ख्वाहिशें मत पनपने दो, क्योंकि वे कभी पूरी नहीं होतीं और उनके जंजाल में फंसा मानव कभी भी मुक्त नहीं हो पाता। इसलिए सदैव अपनी चादर देख कर पांव पसारने अर्थात् संतोष से जीने की सीख दी गयी है… यही अनमोल धन है अर्थात् जो मिला है, उसी में संतोष कीजिए, क्योंकि परमात्मा वही देता है, जो हमारे लिए आवश्यक व शुभ होता है। सो! ‘सपने देखिए! मगर खुली आंख से’… और उन्हें साकार करने की भरपूर चेष्टा कीजिए; परंतु अपनी सीमाओं में रहते हुए, ताकि उससे दूसरों के अधिकारों का हनन न हो।
संसार अद्भुत स्थान है। आप दूसरे के दिल में, विचारों में, दुआओं में रहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब आप किसी के लिए अच्छा करते हैं; उसका मंगल चाहते हैं; उसके प्रति मनोमालिन्य का दूषित भाव नहीं रखते। सो! ‘सब हमारे, हम सभी के’ –इस सिद्धांत को जीवन में अपना लीजिए… यही आत्मोन्नति का सोपान है। ‘कर भला, हो भला’ तथा ‘सबका मंगल होय’ अर्थात् इस संसार में हम जैसा करते हैं; वही लौटकर हमारे पास आता है। इसीलिए कहा गया है कि ‘रूठे हुए को हंसाना; असहाय की सहायता करना; सुपात्र को दान देना’ आदि सब प्रतिदान रूप में लौट कर आता है। वक्त सदा एक-सा नहीं रहता। ‘कौन जाने, किस घड़ी, वक्त का बदले मिज़ाज’ तथा ‘कल चमन था, आज एक सह़रा हुआ/ देखते ही देखते यह क्या हुआ’– यह हक़ीक़त है। पल-भर में रंक राजा व राजा रंक बन सकता है। क़ुदरत के खेल अजब हैं; न्यारे हैं; विचित्र हैं। सुनामी के सम्मुख बड़ी-बड़ी इमारतें ढह जाती हैं और वह सब बहाकर ले जाता है। उसी प्रकार घर में आग लगने पर कुछ भी शेष नहीं बचता। कोरोना जैसी महामारी का उदाहरण आप सबके समक्ष है। आप घर की चारदीवारी में क़ैद हैं… आपके पास धन-दौलत है; आप उसे खर्च नहीं कर सकते; अपनों की खोज-खबर नहीं ले सकते। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति राजकीय संपत्ति बन जाता है। यदि बच गया, तो लौट आएगा, अन्यथा उसका दाह-संस्कार भी सरकार द्वारा किया जाएगा। हां! आपको सूचना अवश्य दे दी जाएगी।
लॉकडाउन में सब बंद है। जीवन थम-सा गया है। सब कुछ मालिक के हाथ है; उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल पाता…फिर यह भागदौड़ क्यों? अधिकाधिक धन कमाने के लिए अपनों से छल क्यों? दूसरों की भावनाओं को रौंद कर महल बनाने की इच्छा क्यों? सो! सदा प्रसन्न रहिए। ‘कुछ परेशानियों को हंस कर टाल दो, कुछ को वक्त पर टाल दो।’ समय सबसे बलवान् है; सबसे बड़ी शक्ति है; सबसे बड़ी नियामत है। जो ठीक अर्थात् आपके लिए उपयुक्त व कारग़र होगा, आपको अवश्य मिल जाएगा। चिंता मत करो। जिसे तुम अपना कहते हो; तुम्हें यहीं से मिला है और तुम्हें यहीं पर सब छोड़ कर जाना है। फिर चिंता और शोक क्यों?
रोते हुए को हंसाना सबसे बड़ी इबादत है; पूजा है; भक्ति है; जिससे प्रभु प्रसन्न होते हैं। सो! मुट्ठी खुली रखना सीखें, क्योंकि तुम्हें इस संसार से खाली हाथ लौटना है। अपने हाथों से गरीबों की मदद करें; उनके सुख में अपना सुख स्वीकारें, क्योंकि ‘क़द बढ़ा नहीं करते, एड़ियां उठाने से/ ऊंचाइयां तो मिलती है, सर को झुकाने से।’ विनम्रता मानव का सबसे बड़ा गुण है। इससे बाह्य धन-संपदा ही नहीं मिलती; आंतरिक सुख, शांति व आत्म-संतोष भी प्राप्त होता है और मानव की दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: अंत हो जाता है। वह संसार उसे अपना व खुशहाल नज़र आता है। सो! ज़िंदगी उसे दु:खालय नहीं भासती; उत्सव प्रतीत होती है, जिसमें रंजोग़म का स्थान नहीं; खुशियाँ ही खुशियाँ हैं; जो देने से, बाँटने से विद्या रूपी दान की भांति बढ़ती चली जाती हैं। इसलिए कहा जाता है–’जिसे इस जहान में आंसुओं को पीना आ गया/ समझो! उसे जीना आ गया।’ सो! जो मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ कर प्रसन्नता से स्वीकार करें, और ग़िला-शिक़वा कभी मत करें। कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; कभी आएगा नहीं…उसकी चिंता में वर्तमान को नष्ट मत करें… यही ज़िंदगी है और यही है लम्हों की सौग़ात।
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण।)
☆ आलेख – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
रक्षासूत्र रक्षा करने वाला वह धागा है,जो नकारात्मक ऊर्जा, संकटों व बुरी नज़र से बचाता है। यह मनुष्य को धर्म, सत्य और अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। वेदों में इसे रक्षाबंधन भी कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार प्रथम प्रसंग में जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी तब दानवराज बलि, महाबली की पत्नी विंध्यावली ने बली की रक्षार्थ उनके हाथ में रक्षासूत्र बाँधा था तथा दूसरे प्रसंग देवासुर संग्राम में जब इन्द्र कमज़ोर पड़ गए तो इन्द्राणी शची ने मंत्रों से अभिसिंचित करके श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को इन्द्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और उनकी विजय हुई। इस धागे को दाहिने हाथ की कलाई पर बाँधा जाता है क्योंकि दाहिना हाथ कर्म का प्रतीक है। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह केवल बहन-भाई का त्यौहार ही नहीं है अपितु गुरू अपने शिष्य को, ब्राह्मण अपने यजमानों को और पत्नी अपने पति को भी रक्षासूत्र बाँधती है। आज के समय में रक्षासूत्र एक सुरक्षा कवच है। यह सुरक्षा बाहरी संकट नहीं है। भारतीय चिंतन में रक्षा का व्यापक अर्थ धर्म, सत्य,कर्तव्य,सम्बन्ध,मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी है। इसी प्रकार ‘ सूत्र ‘ शब्द केवल धागे का नाम नहीं, वह जोड़ने,बाँधने और सम्बन्ध स्थापित करने का प्रतीक है।
भारतीय संस्कृति में संस्कार का अर्थ कर्मकांड नहीं अपितु मनुष्य के जीवन को परिष्कृत करने, उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूक बनाने की एक प्रक्रिया है। जन्म से मृत्यु तक हमारे यहाँ अनेक संस्कारों का उल्लेख मिलता है,जिनमें मंत्र, अग्नि, जल, पुष्प,अक्षत, दीप, तिलक और सूत्र का प्रयोग होता है, जो अनुष्ठान को सुन्दर बनाने के साथ अमूर्त विचारों को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। दीपक ज्ञान का, जल शुद्धता और जीवन, अग्नि पवित्रता और साक्षित्व,अक्षत पूर्णता,मंगल, तिलक शुभता व सूत्र सम्बन्ध, संकल्प और संरक्षण का प्रतीक है। रक्षासूत्र इसी संकल्प को शरीर पर एक प्रतीक के रूप में धारण कराता है। जब किसी व्यक्ति की कलाई पर सूत्र बाँधा जाता है तो वह सूत्र उसके संकल्प की याद दिला सकता है कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहूँ, सम्बन्धों का सम्मान करूँ, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलूँ और अपने परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी रहूँ। इस दृष्टि से रक्षासूत्र बाहरी बंधन नहीं, आंतरिक अनुशासन का प्रतीक है।
रक्षासूत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय सामाजिक अभिव्यक्ति रक्षाबंधन पर्व में दिखाई देता है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधना पारिवारिक संस्कृति में स्नेह, विश्वास और पारस्परिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। राखी बाँधने की परम्परा परिवार को स्मरण कराती है कि रक्त सम्बन्ध केवल जैविक सम्बन्ध नहीं हैं,उनमें भावनात्मक दायित्व भी निहित है। यूँ तो इस पर्व की छवि इससे कहीं व्यापक है। भारतीय परम्परा में रक्षा का दायित्व केवल पुरुष का नहीं माना जा सकता। माता परिवार की रक्षा करती है, पिता परिवार का पालन करके दायित्व निभाता है, बहन भाई के सुख-दुःख में साथ देती है और भाई, बहन के सम्मान और सुरक्षा का ध्यान रखता है, मित्र भी संकट में सहायता करते हैं। इसलिए आधुनिक संदर्भ में रक्षासूत्र को परस्पर संरक्षण और सहयोग का प्रतीक बनाना अधिक सार्थक होगा। भारतीय परिवार व्यवस्था का आधार भावनात्मक सम्बन्ध और परस्पर उत्तरदायित्व भी रहा है अत: रक्षासूत्र पारिवारिक चेतना का दृश्य प्रतीक भी है, जो सम्बन्धों को व्यवहार में जीवित रखने का अवसर देता है। आज संयुक्त परिवारों का आकार घट रहा है,इस स्थिति में रक्षाबंधन जैसा पर्व परिवार के सदस्यों को पुन: जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। रक्षासूत्र सामाजिक समरसता, प्रकृति संरक्षण, लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चेतना, स्त्री सम्मान के मध्य सेतु बन सकता है।
किसी भी सांस्कृतिक प्रतीक का महत्व उसके भौतिक अस्तित्व से अधिक उसके अर्थ में होता है। यदि रक्षासूत्र केवल कलाई पर बँधा धागा बनकर रह जाए तो उसकी सांस्कृतिक शक्ति सीमित हो जाती है ,यदि वह सम्बन्धों की याद दिलाए, कर्तव्य का बोध कराए, परिवार को जोड़े, सामाजिक समरसता बढ़ाए, प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा दे, स्त्री सम्मान का संदेश दे और मानवीय मूल्यों की रक्षा का संकल्प जगाए तो वह जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन जाता है एतदर्थ रक्षासूत्र भारतीय संस्कृति की उस प्रतीकात्मक परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें छोटी-सी वस्तु के भीतर व्यापक जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने की क्षमता है। धागा भौतिक रूप से कमजोर हो सकता है किन्तु जब वह विश्वास, प्रेम, संकल्प और उत्तरदायित्व से जुड़ता है तो उसका सांस्कृतिक अर्थ अत्यन्त शक्तिशाली हो जाता है। रक्षासूत्र इसी जीवंत सांस्कृतिक स्मृति का सुन्दर प्रतीक है। आज आवश्यकता है कि इस पर्व के भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को समझें और उन्हें वर्तमान जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ें!!
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – रक्षाबंधन
भाई-बहन के सम्बन्धों का उत्सव मनाने वाला रक्षाबंधन संभवत: विश्व का एकमात्र पर्व है। इस पर्व में बहन, भाई को राखी बांधती है। पुरुष भी परस्पर राखी बांधते हैं। पुरोहित द्वारा भी राखी बांधी जाती है। अनेक स्थानों पर वृक्षों को भी राखी बांधी जाती है। ‘भविष्यपुराण’ के अनुसार इंद्राणी द्वारा निर्मित रक्षा सूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथों बांधते हुए स्वस्तिवाचन किया था। रक्षासूत्र का मंत्र है-
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल:।
इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवीर महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे,(धर्म में प्रयुक्त किए गये थे) उसी से तुम्हें बांधता हूं। ( प्रतिबद्ध करता हूँ)। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। चलायमान न होने का अर्थ स्थिर अथवा अडिग रहने से है।
प्रकृति के विभिन्न घटकों, समाज के विभिन्न वर्गों को रक्षासूत्र बांधना/ उनसे बंधवाना राष्ट्रीय एकात्मता का प्रदीप्त और चैतन्य है। भारतीय समाज को खंडित भाव से खंड-खंड निहारने वाली आँखों के लिए यह अखंड भाव का अंजन है।
एक विचारप्रवाह है कि वैदिक काल से रक्षाबंधन रक्षासूत्र एवं प्रतिबद्धता का उत्सव रहा। विदेशी आक्रमणकारियों के भारत में प्रवेश के पश्चात स्थितियाँ बदलीं। आक्रांताओं से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए कन्याएँ, भाई को रक्षासूत्र बांधने लगीं। सहोदर की समृद्धि वह सुरक्षा के लिए कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाईदूज या यमद्वितीया का त्योहार भी इसी शृंखला की एक कड़ी है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मामा का घर…“।)
अभी अभी # १०७९ ⇒ आलेख – मामा का घर श्री प्रदीप शर्मा
समय बदलते देर नहीं लगती !
जो कभी नानी का घर था, समय के साथ मामा का घर हो गया। समय ने मामा को भी गाँव से शहर भेज दिया। अब जहाँ मामा, वहाँ मामा का घर।
माँ और मामा का भाई-बहन का रिश्ता रहता था। साल में केवल एक त्योहार, जो माँ और मामा को एक सूत्र में बाँधता था – राखी !
मेरी माँ, पाँच भाईयों में इकलौती बहन थी। कभी राखी पर किसी मामा के घर नहीं गई। लेकिन राखी हर साल, हर हाल में, भाइयों की कलाई तक पहुँच जाती थी।।
वह फ़ोन और मोबाइल का युग नहीं था ! लिफ़ाफ़े में ही राखी भेजी जाती थी। और साथ में जाता था, दो लाइन का पत्र, जो हर वर्ष मुझे ही लिखना पड़ता था। मैं चिढ़ता, नाराज़ होता, भाईयों को तुम्हारी चिंता नहीं, और तुम फिर भी हर साल !
दो लाइन की चिट्ठी का मजमून, अमूनन, यही रहता था। पूज्य भाई साहब !सादर प्रणाम। आप स्वस्थ होंगे। राखी भिजवा रही हूँ। बंधवा लें। भाभीजी को प्रणाम। आपकी बहिन।
आज माँ नहीं है ! पाँच मामाओं में से एक भी मौजूद नहीं है। जहाँ आज भी बहन नहीं पहुँच पाती, राखी ज़रूर पहुँच जाती है। फ़ोन पर बातचीत हो जाती है।
व्हाट्सएप्प के जरिए फोटोज की भी आवाजाही चला करती है। पीढियां बदल गईं। रिश्ते नहीं बदले !।।
आज भी नानियाँ हैं, बच्चे हैं, नानी का घर है। हां ! नानी की कहानियाँ ज़रूर बदल गई हैं ! आज की नानियाँ बच्चों को होमवर्क करवाती हैं, स्टॉप तक स्कूल छोड़ने जाती हैं। सब साथ-साथ पीवीआर में फ़िल्म देखने जाते हैं। हां, टिकट आज भी मामा ही लाते हैं।
रिश्ते हैं तो प्यार है। प्यार है तो त्योहार है। हमें आज के दिन इन प्यार के बंधनों की ही रक्षा करना है। रिश्ते जहाँ परवाह है, सम्मान है, एक दूसरे के लिए दिलों में प्यार भरा आग्रह है, स्नेहयुक्त अनुरोध है। हर घर में एक नानी-नाना हो, मामा हो, दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन हो। संस्कार हो, तो कहाँ से समाज में राग-द्वेष हो, विसंगति हो, विपरीत बुद्धि हो। हम आगे बढें, लेकिन अतीत की सुखद छाँव, वर्तमान को सहेजती, दुलारती, निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर करती रहे।
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘वृद्धावस्था ‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆
आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन रूपी रथ के चार पहिये माने जाते हैंl
1-ब्रम्हचर्य
2-ग्रहस्थ
3- वानप्रस्थ
4- सन्यास
वृद्धवस्था शरीर में होने वाला प्राकृतिक परिवर्तन हैl इस समय व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती हैl शरीर में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैंl साथ ही ऊर्जा क्षक्ति का क्षय होना शुरु हो जाता हैl
आज के समय में वानप्रस्थ की आयु 70 वर्ष हैl इस अवस्था में आते आते मानव के मन की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती हैl उसे अपनों से ही असुरक्षा, डर, संकोच के साथ निर्भरता का भाव झकझोर देता हैl वहीं वह कुछ नया करने की तमन्ना भी जगाए रखता हैl जो उसने युववस्था में नहीं किया उसे ही करने का निश्चय करता हैl
आज समाज वानप्रस्थ के पश्चात् सन्यास लेने की बात करता हैl पर क्या आज की परिस्थिति में सन्यास लेना सम्भव है?? यदि आदमी घर बार छोड़ भी दे तो क्या वह वास्तविकता में जंगल में रह पायेगा?? जंगल…… कौन सा जंगल?? प्राकृतिक घना पेड़ों से भरा जंगल ?? पर वह तो देखने में बहुत कम मिलता हैl आज तो जहाँ तक दृष्टि जाए वहाँ तक सीमेंट और कोंक्रीट के ही जंगल देखने को मिलते हैंl
आज की चकाचौध की दुनिया में वानप्रस्थ होना ही असम्भव सा है तो सन्यास तो बहुत दूर की बात हो गईl
आज वृद्धवस्था में हमें आयुनुसार स्वयं को ढालना बहुत जरूरी हो गया हैl वानप्रस्थ अर्थात मोहमाया से अलिप्त होने की शुरुवात और अपने अंतिम गंतव्य को ध्यान में रख अंतर्मुख होने की प्रक्रियाl सन्यास आश्रम हेतु आपको कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं अपितु संसार में रह कर ही यदि आपने अंतर्मुखी होने की कला सीख ली तो आप पूर्ण रूप से सन्यासी हो गएl
ये जरूर है कि आयु बढ़ने के साथ हम सुविधाओं की तरफ ज्यादा बढ़ते हैं क्यूंकि हमें जीवन व्यापन में आसानी हो जाती हैl बढ़ती आयु के साथ कई वस्तुए तो आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैंl वास्तविकता तो ये हैं कई जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक हम पूर्णतः मोहमाया का त्याग नहीं कर सकतेl अगर देखा जाए तो ये मोह ही हमको हमारे परिवार से जोड़े रखता हैl आयु के इस पड़ाव में कुछ गतिविधियां, कुछ आदतें अपने आप ही छूट जाती हैंl कुछ लोग तो आज भी 60 वर्ष की आयु के पश्चात कार्य करना बंद कर देते हैं या स्वयं को रिटायर समझकर किसी काम करने में रूचि ही नहीं रखतेl पर मेरा ऐसा मानना है कि जब तक शरीर में प्राण है काम करते ही रहना चाहिएl और अपनी रूचि भी बनाए रखना चाहिएl इससे शरीर तंदुरुस्त और मन भी प्रेरणा से भरा होगाl पर कुछ लोग आयु बढ़ने से नहीं वरन इसलिए वृद्ध हो जाते हैं क्यूंकि उनके पास जीवन जीने का कोई लक्ष्य ही नहीं होताl सादगी से जीवन व्यतीत कीजिए पर सादगी का मतलब ये नहीं कि आप जीवन से पलायन कर, कंजूस बनकर, अकर्मन्यता से या असामान्य अवस्था से जीवन व्यापन करेंl व्यस्त रहना और कर्म करना दोनों ही बातें जहाँ मानव का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं वहीं समाज में सम्मान का पात्र भी बनाते हैंl अपनी उपयोगिता कभी भी खत्म ना करेंl स्वयं को संकुचित दायरे में रखने की जगह घरपरिवार और समाज हेतु सहयोग की भावना रखेंl वृद्धावस्था में हम जीवन को वास्तविकता में अधिक सार्थक और गरिमापूर्ण बनना चाहें तो संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे व्यापक बनाना होगाl
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९८ ☆
☆रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
☆
आम नीम बरगद संग, पीपल की छाँव ।
महुआ और जामुन से, महकेगा गाँव ।।
*
टेसू के लाल फूल, चंपा सुहाय ।
गुलमोहर सेमल मन, सबका लुभाय ।।
☆
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति और जीवन-मूल्यों से जुड़ने का भी सुंदर अवसर है। जिस तरह राखी का धागा भाई-बहन के रिश्ते को प्रेम और जिम्मेदारी से बाँधता है, उसी तरह एक पौधा हमें धरती के साथ अपने रिश्ते की याद दिलाता है।
आज जब पेड़-पौधों की संख्या घट रही है और पर्यावरण अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब रक्षाबंधन को हरियाली से जोड़ना एक सार्थक पहल हो सकती है। इस वर्ष हम अपने भाई या बहन की कलाई पर राखी बाँधने के साथ एक पौधा भी लगा सकते हैं और उसे अपने रिश्ते की तरह सहेजने का संकल्प ले सकते हैं। नीम, पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला या कोई फलदार पौधा—हर पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा प्रेम-पत्र बन सकता है।
कल्पना कीजिए, जिस दिन भाई-बहन साथ मिलकर एक पौधा लगाएँ और कहें—“जैसे यह पौधा बढ़ेगा, वैसे ही हमारा स्नेह भी बढ़ता रहे”—तो रक्षाबंधन का अर्थ कितना व्यापक हो जाएगा। राखी का धागा कुछ समय बाद उतर जाएगा, लेकिन लगाया हुआ पेड़ वर्षों तक उस प्रेम की स्मृति बनकर खड़ा रहेगा।
प्रकृति भी तो हमारी बहन जैसी है—वह हमें छाया देती है, हवा देती है, फल-फूल देती है और बिना किसी अपेक्षा के हमारा जीवन सँवारती है। उसकी रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, इस रक्षाबंधन एक नई परंपरा शुरू करें—एक राखी रिश्ते के नाम और एक पौधा प्रकृति के नाम। क्योंकि जब रिश्तों में प्रेम और धरती पर हरियाली होगी, तभी जीवन सचमुच सुंदर होगा।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वेदना निग्रह रस…“।)
अभी अभी # १०७८ ⇒ आलेख – वेदना निग्रह रस श्री प्रदीप शर्मा
खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को। जहाँ महादेवी की वेदना पर प्रसाद के आँसू निकल आते हों, वहाँ बच्चन की मधुशाला किस काम की। जहाँ सूरज की रोशनी कम हो, और हरदम आसमान में काली घटा छाई रहे, ऐसे में शहनाई शोभा नहीं देती। कहीं किसी कोने में, कोई दिल का दीया अगर जला दे, तो मन को बड़ा सुकून मिलता है।
कहीं मीत ना मिला रे मन का, तो कहीं मिल के बिछड़ गई अंखियां, हाय रामा ! ऊपर वाले का खेल बड़ा निराला है। किसी की झोली में खुशियों की सौगात तो कहीं गम बेशुमार। मन करता है, अखबार में इश्तहार दे दिया जाए, गुमशुदा की तलाश ! हमारी खुशी कहीं खो गई है। उम्र नाजुक, हंसता हुआ नूरानी चेहरा, लाने वाले का शुक्रिया, मेहरबानी, मुंहमांगा इनाम।।
होठों पे आए खुशी, क्या मजाल है। दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं। छोटी सी गुड़िया हो तो उदासी ज़्यादा समय तक टिकती नहीं। बच्चों को बहलाना कितना आसान है। गुड़िया, हमसे रूठी रहोगी, कब तक ना हँसोगी, देखो जी, आई रे हँसी आई। देखो जी, आई रे हँसी आई। लेकिन बड़ों का मामला जरा टेढ़ा होता है।
गम की अंधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर, सुबह जरूर आएगी, सुबह का इंतजार कर। लेकिन जिसे सब्र नहीं, उसका क्या किया जाए। इंतजार और अभी, और अभी, और अभी। तुम्हारा इंतजार है।।
जब इंसान भीड़ में भी अकेला हो जाता है, किसी के साथ होता है, फिर भी कहीं खोया रहता है, तो वह दुनिया से नहीं, अपनों से नहीं, अपने आप से भी बहुत दूर चला जाता है। उसे न जाने क्यों ऐसा लगता है, ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं। सबमें शामिल हो मगर, सबसे जुदा लगती हो, सिर्फ हमसे ही नहीं, खुद से खफा लगती हो। शुभचिंतक कह उठते हैं, सीधा सादा, अवसाद का मामला है।
होठ पर लिए, दिल की बात हम। जागते रहेंगे और, कितनी रात हम। तुम्हारा इंतजार है। दिल बहल तो जाएगा, इस खयाल से। हाल मिल गया तुम्हारा, अपने हाल से।
रात ये करार की, बेकरार है।
तुम पुकार लो। तुम्हारा इंतजार है।।
क्या वेदना में भी रस होता है ! किसी दूसरे के दुख में दुखी होना अलग बात है और खुद को अंधेरे बंद कमरे में कैद करना अलग बात है। मुबारक और को खुशियाँ, मुझे गम से मोहब्बत है।
बहुत इच्छा होती है, ऐसे गमजदा लोगों को पकड़कर बाहर लाया जाए, उन्हें ऐसे लोगों से मिलाया जाए, जो वाकई दुःखी और लाचार हैं। कुएं में कूद जाने से बेहतर है उन लोगों को निकाला जाए जो कुएं में पड़े हुए हैं। दुख दर्द का कुआं, अवसाद का कुआं। जहाँ कोई झांकना पसंद नहीं करता ;
अंधेरे में जो बैठे हैं,
नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों !
एक रोते बच्चे को हंसाना अधिक आसान है, क्योंकि वहाँ अभी सुख दुख के संस्कार संचित ही नहीं हुए हैं। हवा के झोंको की तरह खुशी आती जाती रहती है।
प्रकृति में इंसान ज्यादा उदास नहीं रह पाता। जब एक चिड़िया चहकती है, तो उदास मन में आशा की किरण चमकती है। बारिश की बूंदें कितने आंसुओं को धो डालती है। संगीत की स्वर लहरियां एक बार अंतस में प्रवेश कर जाएं, तो अनहद नाद गूंज उठता है।।
क्या है कोई ऐसा वेदना निग्रह रस, जो महादेवी की वेदना को कम कर सके। गीता का तो पहला अध्याय ही अर्जुन विषाद योग है। हम तो यही चाहते हैं ;
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर के रिश्ते…“।)
अभी अभी # १०७७ ⇒ आलेख – दूर के रिश्ते श्री प्रदीप शर्मा
क्या दूर के ढोल की तरह, दूर के रिश्ते भी सुहाने होते हैं ! रिश्ते भी ढोल की तरह ही तो होते हैं, रिश्तों में जीवन है, मिठास है, उत्सव है, परम्परा है। ढोल, रिश्तों को जश्न और धूमधाम से मनाने का ही तो प्रतीक है।
पास के रिश्तों का उत्सव पास के ढोल से ही मनाया जाता है। रिश्ता है तो ढोल है, ढोल है तो रिश्ता है। अगर रिश्ता नहीं, तो ढोल में पोल है।
रिश्तों में दरार आई, बेटा ना रहा बेटा, भाई ना रहा भाई। कोई नई बात नहीं ! पहले कहाँ हिंदू मुस्लिम और भारत पाकिस्तान था, हम ही तो कौरव पांडव भाई भाई थे। भारत में ही महाभारत था। जब भी पास के रिश्तों में फूट पड़ी है, दूर का रिश्ता पास आया है। कोई हमें लूटने बर्बाद करने तो कोई हमारा दिल जीतने। कोई हमारे आँसू पोंछता है तो कोई पीठ में छुरा भोंकता है।।
कोई करीबी इंसान क्यूँ अचानक जिन्दगी से बहुत दूर जाता है और कोई दूर का इंसान कब करीबी बन जाता है, दिल से अधिक यह देश, काल, परिस्थिति पर निर्भर करता है। दिल को ही परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है। परिस्थितियाँ कहाँ दिल की परवाह करती हैं।
दूर पास के रिश्तों में सामंजस्य ही तो खुशहाल जिंदगी का राज है। कभी ढोल के साथ हमें भी सबकी खुशी के लिए नाचना पड़ता है। तब ढोल के साथ कानों में शहनाई की आवाज भी गूंजती है, सबके साथ पांव थिरकने लगते हैं। पास के ढोल, पास के रिश्ते बड़े सुहाने लगते हैं। ।
इंसान पहले परिवार में प्यार तलाशता है। एक हँसते खेलते परिवार में कितना अपनापन लगता है। खुशियां दीवारों, खिड़की दरवाजों में समा नहीं पाती, घर के आसपास भी बिखर जाती हैं। महक रही फुलवारी। रिश्तों की डोर प्रेम से बंधी होती है। उधार की तरह स्वार्थ और नफ़रत भी प्रेम की कैंची है। जब करीबी रिश्तों में खटास आ जाती है तो दूर के रिश्ते तलाशे जाते हैं। जो दिल के करीब होता है, वही अपना कहलाता है।
इसी बीच रिश्तों की किताब में एक पन्ना और जुड़ गया जिसे फेसबुक नाम दिया गया। दूर के लोगों में कुछ करीबी नजर आने लगे। अचानक नए नए रिश्ते दस्तक देने लगे। मित्रता का संसार इतना वृहद भी हो सकता है, कभी कल्पना नहीं की थी।।
क्या पुस्तक खोलने से रिश्ते भी खुलते हैं, दूर के रिश्ते पास आने लगते हैं, दूर के ढोल सुहाने लगने लगते हैं। जिसे आभासी संसार नाम दिया गया है, वह क्या हमारी दिनचर्या का अंग नहीं बन गया है। कुछ आभासी रिश्ते तो परिवार में घुल मिल भी गए हैं। कौन कहता है, दूर के ढोल ही सुहाने होते हैं। जब इन रिश्तों की आवाज़ करीब आती है तो ये कानों में ही नहीं, मकानों में भी घुल मिल जाते हैं।
प्रेम एक ऐसा बंधन है, अगर निःस्वार्थ हो, तो मुक्त करता है।
सहमति, असहमति से परे होती है सच्ची दोस्ती, सच्चा प्यार, सच्चा रिश्ता। शर्तों पर नहीं निभाए जाते रिश्ते ! रिश्ते कभी अनफ्रेंड नहीं किए जाते, ब्लॉक नहीं किए जाते, बस निभाए जाते हैं। जब दूर के रिश्ते फेसबुक के जरिए पास आ सकते हैं, तो करीबी रिश्ते तो पहले से ही इतने करीब हैं। फिर रिश्तों के बारे में हम क्यों गरीब हैं। रिश्ते सुहाने हैं, ढोल सुहाने हैं।।