हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ देश-विदेश में लहराता हिंदी का परचम… ☆ डॉ प्रेरणा उबाळे ☆

डॉ प्रेरणा उबाळे

☆ आलेख – देश-विदेश में लहराता हिंदी का परचम…  ☆  डॉ प्रेरणा उबाळे ☆

☆

भाषा के सिवा हमारा कोई अस्तित्व नहीं हैl भाषा के बिना हमारा कोई और सहारा भी नहीं हैl आज भारतवर्ष के उज्ज्वल और महान भविष्य का निर्माण हमारी भाषाएँ ही कर रही हैंl सैकड़ो वर्षों से निर्मित, परिष्कृत होकर जनमानस में रची-बसी हिंदी आज मन-मस्तिष्क ही नहीं बल्कि उससे उपजे अनेक क्षेत्रों तक अपने पाँव जमा चुकी है। नदी के प्रवाह में जिस प्रकार कंकड़-पत्थर आकर जल को उछलकर अधिक बहने को उत्साहित करते हैं वैसे ही हिंदी भाषा की आरंभ से अब तक की यात्रा में अनगिनत समस्याएँ, बाधाएँ आने के बावजूद भी वर्तमान समय में वह विश्व के अनेक देशों तक प्रवाहित होकर अपना परचम लहरा रही है ।

भारतीय जनमानस ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया हैl सन 1949 में हिंदी को राजभाषा अर्थात ऑफिशयल लैंग्वेज के रूप में स्थान दिया गया हैl इसके अनुसार भारतीय संविधान के द्वारा सरकारी कामकाज, प्रशासन, संसद और विधान-मंडलों तथा न्यायिक कार्यकलापों के लिए स्वीकृत भाषा हिंदी हैl पहले भले ही राजकीय अथवा प्रशासन के स्तर पर कभी संस्कृत, कभी फारसी और बाद में अंग्रेजी का प्रचलन रहा । परंतु समूचे राष्ट्र के जनसमुदाय के आपसी संपर्क, संवाद-संचार, विचार-विमर्श, सांस्कृतिक एकता और जीवन व्यवहार का माध्यम हिंदी रही है । अर्थात भारत में सर्वाधिक बोली, समझी, पढ़ी- पढ़ाई जाने वाली भाषा हिंदी ही है । आज भारत की सभी पाठशालाओं, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा का अध्ययन-अध्यापन हो रहा हैl न केवल भारत में बल्कि भारत के बाहर भी 40 से अधिक देशों में हिंदी भाषा अध्ययन-अध्यापन के स्तर पर प्रमुख भाषा के रूप में अपना अस्तित्व निर्माण कर चुकी है ।

व्यापक रूप में देखा जाए तो हिंदी भाषा का अध्ययन करने वाले, हिंदी भाषा जानने-समझने वाले और हिंदी भाषा पर अधिकार रखने वाले व्यक्तियों के लिए रोजगार के बड़ी संख्या अवसर उपलब्ध हुए हैं । जैसे – अध्ययन-अध्यापन, अनुवाद, साहित्य लेखन; राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुवादक, दुभाषिये का काम, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में और बाजार सर्वेक्षण के लिए, बीपीओ और कॉल सेंटर में विदेशी भाषा का अंतरण; पर्यटन उद्योग व होटल प्रबंधन, भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी विकास मिशन, फिल्म क्षेत्र, टी. वी. क्षेत्र, पत्रकारिता, अंशकालिक पत्रकारिता, साहित्यिक अनुवाद, विज्ञापन, जनसंपर्क एजन्सियाँ, फीचर लेखन, बधाई कार्ड लेखन, पोर्टल, वेब पत्रिकाओं के लिए लेखन और अनुवाद; सीडैक – हिंदी सोफ्टवेयर निर्माण, केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी अनुवादक, सरकारी कार्यालाओं और बैंक में राजभाषा अधिकारी, विभिन्न कार्यालयों में सहायक प्रबंधक एवं प्रबंधक, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में संपादक, उपसंपादक, प्रूफ-रीडर, रिपोर्ट, विदेशों में हिंदी पढ़ने हेतु अध्यापक, रेडिओ जोकी, मंचसंचालक, गीतकार, हिंदी प्रकाशनों में विभिन्न कार्यों के लिए हिंदी का कार्य, फिल्म डबिंग, प्रतियोगी परीक्षाएँ, संवाद- लेखक, फ्री- लान्सिंग, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन, न्यायिक सेवा, रेल प्रशासन में हिंदी प्रबंधक और अनुवादक, विदेश मंत्रालय, खेल क्षेत्र में समालोचन, साहित्यिक वेबसाइट – निर्माण, साहित्याशिल्पी, अच्छी खबर, हैप्पी हिंदी जैसे ब्लॉग -लेखन में हिंदी से संबंधित कार्य इत्यादि….

….. इन तमाम क्षेत्रों में हिंदी विषय में अध्ययन- अध्यापन और विभिन्न प्रकार के कार्यों से अनेक लोग रोजगार निर्माण कर रहे हैंl हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी की लोकप्रियता और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय महत्व के साथ-साथ हिंदी भाषा के जरिये सभी क्षेत्रों में रोजगारों के अवसरों में प्रचंड वृद्धि हुई है । केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों में हिंदी भाषा में काम किया जाता हैl इसलिए केंद्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों, इकाइयों में हिंदी अधिकारी, हिंदी अनुवादक, हिंदी सहायक, राजभाषा प्रबंधक के पदों की बड़ी संख्या है । अध्यापन के परंपरागत क्षेत्र के अलावा टी.वी. और रेडियो चैनलों की कुछ वर्षों में वृद्धि होने के कारण परंपरागत पत्रिकाओं, समाचारपत्रों के अतिरिक्त अनेक नए क्षेत्र भी कई गुना रोजगार उपलब्ध करा दे रहे हैं । हिंदी मीडिया के क्षेत्र में संपादक, संवाददाता, रिपोर्टर, रेडियो जॉकी तथा मंच संचालक आदि की बहुत आवश्यकता होती हैl सिनेमा, रेडियो, टी.वी. के क्षेत्र में पटकथा लेखक, संवाद लेखक, गीतकार के रूप में अवसर उपलब्ध हैl सृजनात्मक हिंदी लेखन का क्षेत्र भी आज व्यापक बना हुआ है । अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के होने के बावजूद भी बढ़ती तकनीकी जरूरत के कारण हिंदी की लोकप्रियता और आवश्यकता अधिक बढ़ रही हैl माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी भी हिंदी की साक्षात्कारकर्ता को देखकर हिंदी में ऑपरेटिंग सिस्टम शुरू कर चुकी हैंl अब ए.आई. अर्थात कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में तो अनगिनत अवसर हिंदी भाषा से निर्माण हो रहे हैं ।

भारत में दर्जनों भाषाएँ मौजूद हैं परंतु उनमें शिक्षा, कला, साहित्य, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, विधि, वाणिज्य, व्यवसाय, जनसंचार माध्यम आदि के प्रमुख भाषा हिंदी बन गई हैl आज यह सबकी रोजी-रोटी की भाषा बन चुकी हैl वर्तमान समय में हिंदी का अपना क्षेत्रीय संदर्भ अपनी अस्मिता के साथ जीवंत तो है ही, अपितु भाषा की मिठास सभी को अधिक आकृष्ट कर रही हैl इसी कारण राष्ट्रीय स्तर पर आम बोलचाल की भाषा के रूप में उसने भारत की अन्य भाषाओं को पीछे छोड़ दिया है और संपर्क भाषा के रूप में प्रथम स्थान अर्जित कर लिया हैl राजभाषा के रूप में उसके माध्यम से बड़ी सफलता से कार्य-व्यवहार हो रहे हैंl जनमानस ने हिंदी को अपनत्व की भावना से अघोषित राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान किया है । परिणामस्वरुप क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संदर्भों को पार करते हुए हिंदी भाषा विश्व के कई देशों में व्यापक रूप में व्यवहृत हो रही है । प्रमुखत: मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, गयाना बांग्लादेश श्रीलंका मलेशिया कंबोडिया नेपाल अमेरिका इंग्लैंड सोवियत संघ फ्रांस जापान चेकोस्लोवाकिया हॉलैंड रशिया जापान पश्चिम जर्मनी आदि देशों में हिंदी का प्रयोग हो रहा हैl विश्व के 40 से अधिक देशों के 270 से अधिक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है । अकेले अमेरिका के 67 और चीन के 20 विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा पढ़ी- पढ़ाई जाती हैl स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि हिंदी का क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अत्यंत व्यापक हो रहा हैl अमरीका की कुछ पाठशालाओं ने फ्रेंच, स्पेनिश, जर्मन के साथ एक विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाना आरंभ किया है । हिंदी को बड़ी शिद्दत से यहाँ अपनाया गया है और वैश्विक रूप में हिंदी का विकास निश्चित रूप से बहुआयामी कहा जा सकता है ।

हिंदी को वैश्विक संदर्भ प्रदान करने में विश्वभर में व्याप्त तीन करोड़ से अधिक प्रवासी भारतीयों ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया हैl उन्होंने हिंदी के माध्यम से विभिन्न भाषाओं के साथ सांस्कृतिक समाज स्थापित किया है और हिंदी विश्व के सभी महाद्वीप को राष्ट्र और जिनकी संख्या 140 से भी अधिक है; वहाँ किसी-न-किसी रूप में वह प्रयुक्त हो रही हैl वर्तमान समय में विश्व की तीन सबसे बड़ी भाषाओं में से एक भाषा हिंदी विराट फलक पर सम्मानित हुई है । चीन की मंदारिन भाषा के बाद हिंदी दूसरे नंबर की भाषा बन गई है । इन सभी देशों में हिंदी की स्वीकार्यता बड़े उल्लास के साथ हुई है ।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक कार्यों के लिए  हिंदी के अनुप्रयोग हमारे विशेषज्ञों तथा राजनेताओं ने भी हिंदी में भाषण देकर उसकी उपयोगिता को सिद्ध किया है । भारतीयता की पहचान को दृढ़ बनानेवाली भाषा के रूप में उन्होंने इसे सिद्ध कर दिखायाl अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस प्रकार हिंदी का प्रयोग निश्चित रूप से सराहनीय है और इससे सबका प्रतिनिधित्व करने वाली हमारी हिंदी भाषा एकमात्र है यह दिखाई देता है । भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद में भी विदेश में स्थापित भारतीय विश्वविद्यालयों की केंद्रीय भूमिका में हिंदी का ही प्रयोग हमें अधिकांश रूप में दिखाई देता है ।

भारत के बाहर लगभग 44 देशों में अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, व्यावसायिक संबंध स्थापित करने हेतु भारतीय अध्ययन पीठों की स्थापना की गई है । इसके माध्यम से विदेशी लोगों में केवल हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा के माध्यम से भारत का इतिहास, सभ्यता, संस्कृति का भी प्रसार हो रहा हैl  हिंदी  भाषा अब विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर हैl विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन होना यह एक शैक्षिक और साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सेतु का कार्य हैl इसके माध्यम से अपने आप सांस्कृतिक परिवेश में सक्रियता अधिक बढ़ रही है । हिंदी फिल्मों, गीतों, संवादों ने विश्व स्तर पर पहले ही लोकप्रियता हासिल की हैl हिंदी फिल्म जगत और अभिनेताओं ने  हमेशा ही विश्वमन को अपने साथ जोड़ लिया है । प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, कबीर, तुलसीदास जैसे हिंदी  रचनाकारों की रचनाएं विदेश में पढ़ने वाले अनेक लोग मौजूद हैं तथा इन साहित्यकारों को विशेष रूप से पढ़ने के लिए अध्ययन पीठों का निर्माण किया हुआ हमें दिखाई देता हैl महात्मा गांधी, डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर अध्ययन केंद्र, महात्मा बुद्ध अध्ययन केंद्र, प्रवासी भारतीय साहित्य केंद्र आदि के माध्यम से भारतीय महापुरुषों के जीवन, व्यक्तित्व, विचारों को हिंदी भाषा में पढाया जा रहा हैl  इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि विश्व भाषा की गरिमा हिंदी भाषा में मौजूद है और विश्व के अनेक महत्वपूर्ण पक्षों से संदर्भित यह भाषा है ।

भाषाओं के संदर्भ में आज भले ही कितने विवाद निर्माण करने का प्रयत्न समाज के विघातक पक्षों के द्वारा हो रहा है परंतु ऐसी स्थिति में वैचारिक दृष्टि से व्यापक होने की अब आवश्यकता महसूस होती हैl उसकी स्वीकार्यता यदि जनसामान्यों के द्वारा हो रही है तो विवाद निश्चय ही निष्फल हैl भाषा हमारे अपने समाज का अस्तित्व बनाए रखती है, देश का प्रतिनिधित्व करती है, विश्व स्तर पर हमारी पहचान बनाती है और आज यह खुले मन से स्वीकार करना होगा कि संपूर्ण भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा अगर कोई है तो वह हिंदी हैl निर्विवाद रूप में यह जल्द ही विश्व भाषा का स्थान ग्रहण कर लेगीl

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© डॉ प्रेरणा उबाळे

लेखिका, अनुवादक

सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभागाध्यक्षा, मॉडर्न कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय (स्वायत्त), शिवाजीनगर,  पुणे ०५

संपर्क – 7028525378 / preranaubale2016@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – भोर भई… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – भोर भई… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

जो नींद में सपने देखते हैं, प्रायः उनकी नींद ही पूरी नहीं होती, सपने तो दूर की बात है। निन्यानवे प्रतिशत लोग अधूरी नींद का शिकार हैं।

इसके विपरीत जो जागी आँखों से स्वप्न बुनते हैं, वे न केवल स्वप्न पूरे करने का प्रयास करते हैं बल्कि दुनिया में परिवर्तन के शिल्पी भी बनते हैं।

समय साक्षी है कि एक प्रतिशत ने निन्यानवे प्रतिशत को आदिम से आदमी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९३ – देश-परदेश – मीठा ज़हर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९३ ☆ देश-परदेश – मीठा ज़हर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे जीवन में किसी सुविधा या शॉर्ट कट आरंभ में तो सरल  प्रतीत होता हैं। कुछ समय बीत जाने के पश्चात जब उस सुविधा का शुल्क लग जाता है, या शुल्क में बढ़ोतरी होती है, वो हमें अखरने लगती हैं। इंटरनेट, मोबाइल आदि के साथ भी ऐसा ही हुआ था। जियो ने आरंभ में मुफ्त सुविधा देकर, लत लगा दी थी। बैंक ने भी मुफ्त ए टी एम कार्ड दिए थे, बाद में वार्षिक शुल्क और अब तो सीमा से अधिक उपयोग पर भी जेब ढीली करनी पड़ रही हैं।

उपरोक्त कार्टून यु पी आई द्वारा प्रस्तावित शुल्क को लेकर हैं। एक दशक पूर्व बेरोजगार हुए जेब कतरे अब वापिस आस लगाए बैठे हैं, कब जनता जेब में नगद राशि लेकर बाज़ार में निकलेगी, तब वो पुराने धंधे में लौट आयेंगे। ए टी एम कार्ड आदि आने पर भी दो दशक पूर्व बहुर सारे जेब कतरे भी इस प्रोफेशन को छोड़ कर सोने की चेन खींचने आदि व्यवसाय से जुड़ गए थे।

पुलिस थानों में भी पुराने जेब  काटने वालों की फाइल्स रिकॉर्ड रूम से निकलवा ली हैं। मुखबिरों को भी उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए कहा गया हैं। शेयर बाजार के मंजे हुए खिलाड़ी ब्लेड निर्माताओं की कंपनियों में तेज़ी की संभावना लगाए हुए हैं।

यू पी आई में शुल्क लगने के कारण बैंक में कार्यरत लोग भी कुछ परेशान प्रतीत हो रहे हैं। वर्षों तक पेट्रोल पंप, मदिरा विक्रेता, जिंसों के थोक व्यवसाय से जुड़े लोग बहुत अधिक मात्रा में प्रतिदिन करेंसी नोट जमा करवाते थे। बैंकर्स का बहुत सारा समय उनको गिनने या सॉर्टिंग करने में निकल जाता था। कोविड के बाद से ऑनलाइन के कारण प्रतिदिन नगद राशि के उपयोग में बहुत अधिक गिरावट हुई थी। इस कारण बैंकर्स भी थोड़ी राहत महसूस कर रहें थे।

केंद्रीय बैंक को भी अब और अधिक नोट छापने पड़ेंगे, बैंकर्स के यहां भी नगद जमा और भुगतान का कार्य बढ़ेगा। फटे पुराने नोट बदलने के व्यवसाय आदि से जुड़े लोगों का भी अच्छे दिनों का इंतजार समाप्त हो जाएगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९९ ⇒ तारीफ और खुशामद ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तारीफ और खुशामद…“।)

?अभी अभी # १०९९  ⇒ आलेख – तारीफ और खुशामद ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

प्रेम का अगला पड़ाव प्रशंसा है ।अपनी तारीफ किसे पसंद नहीं !ढाई आखर अगर प्रेम का है तो तारीफ में तीन आखर हैं,जो शायद ही किसी को अखरते हों । प्रेम में एक बार दिखावा हो सकता है,तारीफ में नहीं । जिसमें प्रेम नहीं वह निष्ठुर और जो किसी की तारीफ नहीं करे,वह खुदगर्ज,घमंडी, आत्मकेंद्रित इंट्रोवर्ट ।

क्या गुजरती होगी उन गृह शोभाओं पर,जो घर के दस काम छोड़कर,बड़ी मेहनत,प्यार और मनोयोग से पति परमेश्वर के लिए प्याज के पकौड़े तलकर लाती है,पति महोदय चुपचाप बिना कुछ बोले,प्लेट साफ कर देते हैं,लेकिन उनके मुंह से तारीफ का तो एक शब्द भी नहीं निकलता ,अपितु कह उठते हैं,मिर्ची बहुत है,एक ग्लास पानी लाओ । क्या यह पकौड़ों पर और किसी की उम्मीद पर घड़ों पानी फेरना नहीं हुआ ।।

बच्चे भी तारीफ के बहुत भूखे होते हैं । खुश रहना उनकी फितरत रहती है । उन्हें अगर थोड़ा प्रेम, प्रोत्साहन ,प्रशंसा और हौसला मिल जाए तो बड़ा से बड़ा काम वे खुशी खुशी कर लेते हैं । बिना तारीफ और हौसले के भी क्या जवानों में कभी जोश आया है । आशा,उत्साह,उमंग और उम्मीद का ही दूसरा नाम सकारात्मकता है । कदम कदम बढ़ाए जा,खुशी के गीत गाए जा। ये जिंदगी है कौम की,तू कौम पे लुटाए जा ।

किसी के गुणों का बखान भी प्रशंसा की श्रेणी में आता है । सम्मान और प्रशंसा में चोली दामन का साथ है । प्रमाण पत्र,प्रशंसा पत्र ,पुरस्कार ,इनाम और पारितोषिक सब तारीफ के ही तो प्रकार हैं । जहां सफलता है,विजय है, अच्छा परिणाम है,वहां प्रशंसा ही प्रशंसा है ,स्तुति है,गुणगान है ।।

ईश्वर सर्व व्यापक है,सर्व शक्तिमान है । हम उसकी पूजा करते हैं,आराधना करते हैं,उनकी स्तुति और गुणगान करते हैं। स्तुति और गुणगान में भी अतिशयोक्ति अलंकार होता है ।भारत माता की जय हो अथवा अम्बे मात की । जय हे,जय हे,जय हे, और जय हो,जय हो,जय हो में पुनरावृत्ति दोष नहीं जोश कहलाता है । भक्ति भाव

में ही मंत्रों का जाप होता है,जहां एक स्तुति का ,मंत्र का 108 बार जाप किया जाता है,जिसे माला फेरना कहते हैं । हम जिसे ज्यादा स्नेह करते हैं,उसकी दिन भर माला फेरते रहते हैं । वह माला भी हो सकती है,कोई माया,ममता,शांति अथवा शकुंतला भी । एक मां के लिए उसके लाड़ले से बढ़कर कोई पूंजी नहीं होती । लाल तेरा जुग जुग जिये माता ।

जहां तारीफ काम नहीं आती,वहां खुशामद भी करनी पड़ती है । थोड़ी चिकनी,थोड़ी चुपड़ी, बातों में थोड़ी मिश्री घोलनी पड़ती है । बच्चों को खुशामद सिखलानी नहीं पड़ती । बड़ों को मतलब निकालने के लिए सीखनी पड़ती है । खुशामद से गलत काम भी आसानी से करवा लिया जाता है । आप खुशामद को हठ का परिवर्तित रूप भी कह सकते हैं,जिसमें अनुनय होता है, विनय होता है,थोड़ा मस्का,थोड़ा नवनीत होता है, थोड़ी तारीफ होती है तो थोड़ी चापलूसी भी । कितनी प्यारी होती है खुशामद ।।

बिना स्तुति, जप और प्रशंसा के तो शस्त्र और शास्त्र भी किसी काम के नहीं होते । शस्त्र और शास्त्र का भी उपयोग के पूर्व, विधिपूर्वक पूजन किया जाता है । अच्छे उद्देश्य से,सर्व जन हिताय और सर्व जन सुखाय की गई प्रशंसा,तारीफ अथवा स्तुति सार्थक होती है । केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए की गई प्रशंसा अथवा स्तुति से आसुरी शक्तियां ही प्रसन्न होती हैं ।

सभी अच्छे कार्य तारीफ , प्रशंसा और खुशामद से ही संपन्न होते हैं । शिव जी के धनुष का संधान भी स्तुति के बाद ही संभव हो पाया था । आइए हम भी विश्व के मंगल के लिए स्तुति करें,आराधना करें,विनायक वंदना करें ;

जय जय हे गणेश !

काटो हमारे कलेश

आए शरण तुम्हारी

बलिहारी हो ।

जय जय गणपति

विजय हमारी हो ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९९ ⇒ खाली दिमाग☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खाली दिमाग…“।)

?अभी अभी # १०९९  ⇒ आलेख – खाली दिमाग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिमाग हो या घर, इन्हें ख़ाली रखना भी ख़तरे से खाली नहीं ! खाली घरों में छिपकली, चमगादड़ ही नहीं, भूत प्रेत भी निवास करने लगते हैं। आहट जैसे सीरियल हों अथवा रामसे ब्रदर्स की फिल्में, जहां भी कोई खाली हवेली देखी, रात के अंधेरे में, कंबल ओढ़े, एक हाथ में लाठी और एक हाथ में लालटेन लिए एक बूढ़ा चौकीदार, दरवाज़े के चरमराने और पार्श्व संगीत की चीख चिल्लाहट के बीच, बाहर आ खड़ा होता है। गुमनाम है कोई, और कहीं दीप जले कहीं दिल जैसे गीतों से भी भला कोई कहीं डरता है आजकल।

लेकिन हम घर की नहीं, दिमाग की बात कर रहे हैं ! कुछ लोगों के पास या तो ख़ाली दिमाग होता है या फिर उसमें गोबर अथवा भूसा भरा होता है। जहां यह पूरी तरह ख़ाली होता है, ऐसा कहा जाता है कि वहां शैतान अपना घर कर लेता है। अतः घर हो या दिमाग़, इन्हें कभी खाली ना रखें। दिमाग में क्या भरना, वह हम बाद में सोचेंगे, पहले तो यह भी ध्यान रखें कि घर भी किसी शरीफ इंसान को ही देना। आजकल शैतान भी दिमाग से निकलकर ऐसे घरों में वास करने लग गए हैं। कहीं कहीं तो कोर्ट कचहरी के बावजूद भी खाली नहीं करते और मकान मालिक यह कहता पाया जाता है, मेरे मकान पर एक शैतान ने कब्ज़ा कर लिया है। ।

जो ब्रेन सर्जन हैं, उन्हें दिमाग की अधिक जानकारी होगी, लेकिन ऐसा माना गया है कि अधिक सोचने, मानसिक तनाव और अवसाद के कारण ही सभी मनोरोग होते हैं। दिमाग में तनाव का कारण ही अधिक सोच विचार है, संकल्प विकल्प है। दिमाग शांत हो, कम सोचे विचारे, ध्यान धारणा करे, तो तनाव कम होता है। सांस के साथ साथ अनावश्यक विचारों को भी बाहर फेंकने से मन की शांति मिलती है। कचरा सूखा हो या गीला, उसे घर से बाहर फेंकना ही समझदारी है।

चिंतक, विचारक, लेखक और विद्वान एक पल भी बिना सोचे नहीं रह सकते। उठते बैठते, सोते जागते उनके विचारों का प्रवाह समुद्र की लहरों की तरह सदा तरंगित रहता है। उनके लेखकीय पात्र उनके मानस पटल पर पहरा दिए बैठे रहते हैं। मजाल है, दिमाग खाली हो, और कोई शैतान प्रवेश कर जाए। ।

गधे के पास दिमाग होता है कि नहीं, इस पर आज तक किसी विद्वान ने शोध नहीं किया। हमारा ख़ाली दिमाग तो यह कहता है कि गधे के पास दिमाग होता ही नहीं। ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी। ना शैतान ना सरस्वती। कुछ लेना न देना मगन रहना।

हम इंसान हैं। जानवरों की तरह घास नहीं खाते, स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन ग्रहण करते हैं। ईश्वर ने हमें सोचने और समझने की शक्ति दी है। जिस तरह हम ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर फेंकते हैं, अच्छे विचारों का स्वागत कीजिए। जो विचार अन्यथा हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाइए। ।

जहां सात्विक विचार हैं, वहां शैतान का प्रवेश निषेध है। तामसी विचार ही शैतान हैं जिनकी जड़ में राग, द्वेष, अहंकार, प्रतिशोध और महत्वाकांक्षा जैसे असुर पलते रहते हैं। मन को शांत रहने दे, सुशांत ना बनने दें, संत भले ही बनें, कभी राष्ट्र संत ना बनें। यह घर तेरा मेरा है, खाला का घर नाहिं ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५३ – दरवाज़े ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५३ ☆

☆ दरवाज़े… ?☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

एक समय था जब लोगों के घरों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते थे। समय के साथ विचार बदले, स्थितियाँ बदलीं और अब अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद रहने लगे हैं।

सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़ा बंद रखना समकालीन आवश्यकता हो सकता है। तथापि स्थूल का प्रभाव, सूक्ष्म पर भी होता है।

एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक धनी व्यक्ति एक महात्मा के पास आया। धनी का महल आलीशान था। उसके मन में इच्छा हुई कि अपना महल महात्मा को दिखाए। बहुत ना-नुकर के बाद महात्मा उसका महल देखने के लिए राजी हो गए। धनी ने जब अपना महल महात्मा को दिखाया तो वे हँस पड़े। धनी आश्चर्यचकित हुआ। फिर तनिक नाराज़गी के साथ बोला, ” महात्मन! यह दुनिया का सबसे सुरक्षित महल है।” महात्मा ने पूछा, “कैसे?” धनी बोला,” मैंने इसके सारे दरवाज़े चुनवा दिये हैं। इसमें केवल एक ही दरवाज़ा रखा है जिसके चलते शत्रु का भीतर प्रवेश करना असंभव-सा हो चला है।” इस बार महात्मा ठहाका लगाकर हँसे। फिर बोले, ” यह एक दरवाज़ा भी क्यों छोड़ दिया? यदि इसे भी बंद कर दो तो शत्रु का तुम तक पहुँचना असंभव-सा नहीं अपितु असंभव ही होगा।”  धनी ने महात्मा के ज्ञान के कई प्रसंग लोगों से सुने थे। उसे लगा, सारे प्रसंग झूठे हैं। महात्मा तो सामान्य बात भी समझ नहीं पाते। सो चिढ़कर बोला, “महात्मन, यदि यह एकमात्र दरवाज़ा भी बंद कर दिया तब तो मेरे प्राण जाना निश्चित है। ऐसी सूरत में यह महल, महल न रहकर कब्र में बदल जाएगा।”  इस बार  गंभीर स्वर में महात्मा बोले, ” जब तुझे बात का भान है कि एक दरवाज़ा बंद करने से तेरी मृत्यु हो जाएगी तो इतने सारे दरवाज़े बंद करके कितनी बार मर चुका है तू?”

ध्यान देनेवाली बात है कि  दरवाज़े सर्वदा बंद रखने के लिए होते तो बनाये ही क्यों जाते? उनके स्थान पर भी दीवारें ही खड़ी की जातीं।

दरवाज़े बार-बार खुलते रहने चाहिएँ, ताज़ा हवा का झोंका भीतर आते रहना चाहिए। खुले दरवाज़ों से नयापन और ताज़गी भीतर आते रहते हैं, प्रफुल्लता बनी रहती है।

…अंतिम बात,  घर के हों या मन के, यह सूत्र दोनों प्रकार के दरवाज़ों पर लागू होता है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९८ ⇒ जानवर और इंसान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जानवर और इंसान…“।)

?अभी अभी # १०९८ ⇒ आलेख – जानवर और इंसान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इंसान की जानवर से तुलना इंसान का अपमान है! जिस मनुष्य योनि के लिए देवता भी तरसते हों, उसकी तुलना एक जानवर से कैसे की जा सकती है। चौरासी लाख योनियों के फेरे के बाद ही जीव का मनुष्य के रूप में जन्म होता है।

इंसान मुँह से खाना खाता है, जानवर भी मुँह से ही खाता है। लेकिन दोनों के खाने में अंतर है। इंसान कायदे से अपने दोनों हाथों का उपयोग करता है, कभी चम्मच तो कभी फॉर्क, यानी काँटे का उपयोग करता है। वहीं जानवर कहीं भी सीधा जाकर मुँह मार देता है। इंसान को जानवर से तमीज़ सीखने की ज़रूरत नहीं।।

इतना ही नहीं, अधिकतर जानवर या तो माँसाहारी होते हैं, या फिर केवल घास-फूस से ही पेट भर लेते हैं। यह इंसान ही है जो पहले अपने इष्ट को छप्पन पकवानों का भोग लगा, प्रसन्न करता है, बाद में स्वादिष्ट व्यंजनों से अपनी क्षुधा शांत करता है। भोजन को पकाना, और उसे मिर्च-मसालों से सुरुचिपूर्ण, चटपटा बनाना कोई जानवर क्या जाने।

जानवर बेशर्म है, कपड़े नहीं पहनता, स्कूल नहीं जाता, पढ़-लिखकर एक बड़ा जानवर नहीं बन पाता, क्योंकि भगवान ने बुद्धि सिर्फ इंसान को ही दी है, जानवर को नहीं। जानवर को हमेशा जानवर ही रहना है और इंसान को तो भगवान बनना है।।

यही इंसान जब शैतान बन जाता है, संसार में अनाचार, अत्याचार करता है, तो मज़बूर होकर ईश्वर को इस धरती पर जन्म लेना पड़ता है। इंसान ने कई बार जानवर बनने की कोशिश की, लेकिन जानवर हमेशा अपनी हद में रहा। न तो वह देखादेखी मेंइंसान बना, और ना ही हैवान। अपनी हद में रहना ही इंसानियत है, यह जानवर एक जानता है, इंसान नहीं।

कितनी बार सुनने में आता है, यह आदमी इंसान नहीं जानवर है! बड़ा आश्चर्य होता है सुनकर। कभी किसी जानवर ने जंगल में कई घोटाला नहीं किया, रिश्वत नहीं खाई। किसी गीदड़ की हिम्मत नहीं हुई कि जंगल के राजा के सिंहासन पर कब्ज़ा कर ले। जंगल को जंगल बनाये रखने के लिए कई प्रोजेक्ट टाइगर इंसान अमल में लाता है, लेकिन इंसान को केवल इंसान बनाए रखने का उसके पास कोई प्रोजेक्ट नहीं है।।

जंगल और जानवर स्वावलंबी है, तब तक जब तक इंसान वहाँ पाँव नहीं रखता! इंसान के वहाँ पाँव रखते ही, जंगल और जानवर दोनों खतरे में आ जाते हैं। लेकिन बदनाम एक जंगली जानवर ही है, इंसान नहीं। कब तक हम एक इंसान को जानवर कहकर, जानवर को बदनाम करते रहेंगे।

थक- हारकर, मज़बूरी में कभी-कभी हमारे मुख से सत्य निकल ही आता है। इससे तो जानवर ही अच्छा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अस्सी का वो दौर ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆🌷अस्सी का वो दौर🌷

आजकल सोशल मीडिया के पन्नों पर अस्सी और नब्बे के दशक की तस्वीरें 📷 बनाने का जैसे बाढ़ सा आया है। फिल्टर और एआई के इस दौर में जब पुरानी धुंधली यादें नए रंगों में सामने आती हैं, तो सीने में एक मीठा सा दर्द और होठों पर अनचाही मुस्कान तैर जाती है। टेलीविजन का वो पुराना बक्सा, антенना की जुगाड़बाजी और गलियों में गूंजती साइकिल की घंटियाँ—सब कुछ आँखों के आगे किसी घूमते बायोस्कोप सा आ जाता है। यह तकनीक का करिश्मा हमें खींचकर सीधे हमारे गाँव-गिराव की उन कच्ची गलियों और पक्के रिश्तों वाले बचपन में ले जाता है।

गाँव की चौपाल से सिनेमाई परदे तक, अपने-अपने नायक

गाँव की उस सोंधी धूप और छांव में हर घर की अपनी एक कहानी थी। घर की बड़ी-बुजुर्ग या मौसी जब आँगन में बैठती थीं, तो कभी मीना कुमारी के दर्द को जीती थीं, तो कभी साधना के उस खास, दिलकश काजल की नकल करने की कोशिश करती थीं। आस-पास की सयानी होती लड़कियाँ माधुरी दीक्षित की मुस्कान पर जान छिड़कती थीं। सबका अपना रंग था, अपनी शैली थी।

पर मेरी दास्तान इन सबसे जरा हटकर, थोड़ी बागी और बड़ी मज़ेदार थी। मैं उन दिनों किरण बेदी की दीवानगी की हद तक असर में थी। उनके खाकी लिबास, निडर तेवर और दबंग अंदाज ने ऐसा जादू किया कि पूरे स्कूल लाइफ में मेरे बाल कभी लंबे हुए ही नहीं! हमेशा बड़े भैया—यानी हमारे संजय भैया—के कपड़ों पर मेरी तिरछी निगाह रहती थी। उनकी टी-शर्ट पहनने के लिए घर में जो महाभारत मचती, उसकी याद आज भी हँसा देती है। तंग आकर भैया आखिर में बाजार से मेरे लिए लेडीज टी-शर्ट ले आते, पर भला वो मुझे कहाँ रास आती! मेरी नजर तो हमेशा उनकी उस जींस वाली कॉटन जैकेट पर होती थी। जैसे ही मैं उसे पहनती, भैया झुंझलाकर तान मारते— “हट पगली, ये आमिर खान की है!”—सच कहें तो उस वक्त मेरा भैया किसी चलते-फिरते आमिर खान का कॉपीराइट लग1ता था।

सोंधेपन की महक और वो अतरंगी शौक

उस दौर की आबोहवा में एक अजीब सी ठंडक और अपनापन था। गाँव की पगडंडियों से लेकर चौपाल तक, हर इंसान का पहनावा और तेवर बिना कहे बता देता था कि उसका दिल किस पर आया है। कोई कपिल देव के घुंघराले बालों और ऑलराउंडर अंदाज़ का दीवाना था, तो कोई संजय दत्त के उस रफ-टफ हेयर स्टाइल पर फिदा था।

और हमारे पतिदेव? वो तो जनाब सबसे एक कदम आगे थे! उन्हें अपनी मूँछें बिल्कुल अनिल कपूर जैसी घनी और उठी हुई रखनी थीं। सिर पर बाल अजय देवगन वाले और मुँह पर अनिल कपूर जैसी रोबीली मूँछें—

‘इन दोनों का ऐसा खतरनाक कॉम्बिनेशन था ‘

क्या वक्त के साथ वो सोंधापन लौट पाएगा?

आज तकनीक ने हमें वो दौर और वो तस्वीरें तो लौटा दी हैं। हम पुरानी यादों की इस नदी में डुबकी लगाकर खुद को तरोताज़ा भी महसूस कर रहे हैं। मगर दिल के किसी कोने में एक सवाल कसकता है— तस्वीरें और तकनीक तो लौट आई हैं, पर क्या वो मिट्टी की सोंधी खुशबू और वो निश्छल भावनाएँ भी लौट पाएँगी?

आज तो हर पल नया ट्रेंड बदल जाता है, सब कुछ तेज और डिजिटल हो गया है। तब साधन कम थे, पर दिलों में अपनापन बहुत था। आज तस्वीरें मोबाइल की स्क्रीन पर हैं, पर वो बचपन की गली, वो पेड़ों की छांव, और वो एक दूसरे के लिए धड़कता अपनापन… कहीं पीछे छूट गया है।

☆

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ हिंदी अपनाइए, न शरमाइए ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ आलेख  ☆ हिंदी अपनाइए, न शरमाइए ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆ 

(१४ सितम्बर – हिंदी दिवस पर विशेष)

१४ सितम्बर  हिंदी दिवस है। सब तरफ कुछ दिन पहले से ही हिंदी की याद सताने लग जाती है हरबार, हर साल। यह मेरा सौभाग्य रहा कि मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जो हिंदी प्रेमी था और मेरे ननिहाल इससे भी बढ़कर आर्य समाज से जुड़े थे। आर्य समाज और हिंदी का नाता सब जानते हैं कि कितना मजबूत जोड़ है बिल्कुल फेविकोल जैसा। इस तरह अहिंदी भाषी प्रांत पंजाब से होते हुए भी मैं हिंदी के ज्यादा करीब आया और आता चला गया। जहां तक कि मेरी सारी शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई। और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि जिस हिंदी की एम ए करते मुझे मेरे ही बी एड के प्राध्यापक ने डराया कि इसमें रोज़गार नहीं है, नौकरी नहीं है मेरा सौभाग्य कि उसी हिंदी ने मुझे एक दिन भी बेरोजगार न रहने दिया। आज भी आपके सामने सम्मान पूर्वक हिंदी के चलते ही खड़ा हूं। इस तरह हिंदी न केवल रोज़गार बल्कि साहित्य, मनोरंजन और राजनीति की भाषा है।

यह बात भी सभी जानते हैं कि हिंदी दिवस क्यों चौदह सितम्बर को मनाया जाता है -ठीक इसी दिन सन् 1949 में हमारे देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान मिला था। इसीलिए हर वर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है और अब तो हिंदी पखवाड़ा ही मनाया जाने लगा है यानी आज से हिंदी दिवस शुरू होकर तीस सितम्बर तक चलता रहेगा और मनाया जाता रहेगा। पर दुख की बात है कि आम तौर पर हिंदी पखवाड़े के साथ श्राद्ध पक्ष भी आ जाता है तो कहीं हम इसे सिर्फ श्रद्धा के रूप में ही तो नहीं मनाते? या इसे अपनाने के लिए मनाते हैं?

अब बात करते हैं कि स्वतंत्रता पूर्व हिंदी को किसने प्रोत्साहित किया? हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद जी ने। संयोग देखिए कि दोनों महानुभाव गुजरात से संबंध रखते थे। जहां महात्मा गांधी ने नवजीवन समाचार पत्र शुरू करवाया और हिंदी के सुधार के लिए अनेक प्रयत्न किये। वहीं आर्य समाज की ओर से स्वामी दयानंद के प्रयास भी कम नहीं रहे। उनका ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में ही है और आज भी प्रतिवर्ष लाखों प्रतियां लोगों तक पहुंचती हैं। इसी प्रकार महात्मा गांधी की आत्मकथा- सत्य के प्रयोग भी देश विदेश में लोकप्रिय है और हर वर्ष इसकी भी न जाने कितनी प्रतियां बिकती हैं। मैं खुद इसकी प्रति महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम से खरीद कर लाया था जब अहमदाबाद में एक लेखक शिविर लगाने गया था। वैसे एक और सुखद संयोग भी है कि इन दिनों देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात से हैं लेकिन वे भी हिंदी के प्रचारक हैं। हिंदी का इस देश में कितना महत्त्व है यह आप इस बयान से समझिये जो हमारे पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने दिया। उन्होंने कहा कि मैं राष्ट्रपति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री बनना चाहता था लेकिन हिंदी भाषी न होना मेरी सबसे बड़ी रुकावट बन गया। ममता बनर्जी भी हिंदी को ज्यादा नहीं बोल पातीं।

स्वतंत्रता पूर्व लाला लाजपत राय,  मदन मोहन मालवीय, जवाहर लाल नेहरु  लोकमान्य तिलक, भगत सिंह, अशफाक, सुखदेव, आदि क्रांतिकारियों व नेताओं ने हिंदी को ही स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। इस तरह हिंदी स्वतंत्रता आंदोलन की आधारभूमि बनी रही। भगत सिंह की अनेक पुस्तकें हिंदी में हैं। उनका परिवार भी आर्य समाज से जुड़ा था।

माखन लाल चतुर्वेदी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद और सबसे बढ़कर भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि ने हिंदी को जनमानस तक पहुंचाने में सब कुछ अर्पण कर दिया। भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने तो लेखक मंडली बनाई और घर का सारा पैसा हिंदी के प्रचार प्रसार में लगा दिया। नये समय में नरेंद्र कोहली के उपन्यासों ने भी काफी पाठक बनाये। हास्य कवियों काका हाथरसी और सुरेंद्र शर्मा आदि ने भी हिंदी को जन जन तक पहुंचाया।

अब आइए स्वतंत्रता के बाद हिंदी की स्थिति पर जब इसे राजभाषा घोषित कर दिया गया तब लगा कि अब हिंदी के दिन फिरेंगे लेकिन हुआ इसके विपरीत। हिंदी जन भावना और देश के स्वाभिमान व बलिदान देने वालों की भाषा न रही बल्कि इसकी जगह ले ली अंग्रेजी ने क्योंकि मैकाले महाशय यह षड्यंत्र रच गये थे कि रोज़गार अंग्रेजी पढ़ने पर ही मिलेगा और इस तरह अंग्रेज़ी ने हमारी हिंदी को दबाने का काम शुरू किया। हमारे अंग्रेजी स्कूलों की संख्या बढ़ती गयी और हिंदी माध्यम के स्कूलों की संख्या घटती चली गयी। इनकी संख्या घटने से साफ है कि हिंदी का प्रयोग भी कम होता गया। अब नयी पीढ़ी अंग्रेजीमय पीढ़ी है। अंग्रेजी बोलना शान की प्रतीक है। रोज़गार मिले या न मिले लेकिन अंग्रेजी आनी चाहिए। हाय, हैलो बोलना आना चाहिए। गरीब से गरीब परिवार हिंदी स्कूल में अपने बच्चों को न पढ़ा कर अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने के इच्छुक हैं।  इस पीढ़ी के चलते ही हिंदी साहित्य के पाठक कम होने लगे हैं जिस पीढ़ी को हिंदी भी नहीं आती या कामचलाऊ हिंदी आती है तो वह पीढ़ी हिंदी साहित्य के प्रति उत्सुक कैसे होगी? हिंदी की पुस्तकों के नाम चाहे न आएं लेकिन हैरी पाॅटर का नाम आता है। स्पाइडर-मैन का काॅमिक्स पता है लेकिन शक्तिमान  या चाचा चौधरी का नहीं। 

हिंदी की सबसे बड़ी कमी यह बताई और गिनाई जाती है कि इससे रोज़गार  नहीं मिलता और न ही विज्ञान सीखा जा सकता है। क्या कल्पना चावला हिंदी पढ़कर ही अंतरिक्ष तक नहीं पहुंची थी? पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम बच्चों के बीच हिंदी बोलते थे। जहां तक रोज़गार की बात है तो हिंदी पत्रकारिता एक बड़ा रोज़गार देने वाली साबित हुई है। आज हिंदी के अखबार अंग्रेजी अखबारों से प्रसार संख्या में आगे निकल गये हैं और विश्वसनीय भी बन गये हैं। इनके चलते बड़ी संख्या में रोज़गार मिलने लगा है। दूरदर्शन, आकाशवाणी और मीडिया चैनल भी हिंदी के चलते ही लोकप्रिय होते हैं। यही क्यों हिंदी फिल्मों ने भी रोज़गार के द्वार खोले हैं। दक्षिण भारतीय अभिनेता अभिनेत्रियां भी हिंदी बोलने सीख कर करोड़ों करोड़ों रुपये कमाते हैं।  फिर कौन कहता है कि हिंदी मे रोज़गार नहीं? बड़ी बड़ी विदेशी कम्पनियों को हिंदी अपनानी पड़ रही है ताकि उनकी कम्पनी की जानकारी आम जनता तक पहुंच सके।

आप यह जानकर हैरान होंगे कि हिंदी सीखने के लिए एक समय चंद्रकांता संतति की सीरीज ने लोगों को मजबूर कर दिया था। ऐसे साहित्य की आज भी जरूरत है। फिल्मों में तो दूसरी भाषाओं मे रिमेक बनने लगे हैं।

आज फिर हिंदी दिवस है। आइए हिंदी आपनाइए, बिल्कुल न शरमाइए  । हिंदी हमारी है और हम हिंदी के। हिंदी के बिना हम अधूरे।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९७ ⇒ रोबोट चौराहा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रोबोट चौराहा…“।)

?अभी अभी # १०९७ ⇒ आलेख – रोबोट चौराहा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मालिक ने बनाया इंसां को, इंसान रोबोट बना बैठा! एक तरफ हमारी गृहिणियों पर काम का इतना बोझ है कि समझ में नहीं आता, वे इंसान हैं या मशीन ? वहीं दूसरी ओर इंसान ने मशीन पर भी इतनी ज़िम्मेदारी डाल दी है कि सड़क का ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए एक रोबोट को सड़क पर उतार दिया।

1957 की फ़िल्म नया दौर याद कीजिये! दिलीपकुमार और साथी हाथ। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। वहाँ सिर्फ आदमी था, मशीन नहीं थी। फ़िल्म उपकार तक देश में हल चलते रहे, रहट की आवाज़ में मनोजकुमार जवान भी बना और किसान भी। और फिल्में सोना उगलती रही।।

फिर सन् 1971 में प्रमोद चक्रवर्ती ने धर्मेंद्र और हेमा को लेकर एक फ़िल्म बनाई नया ज़माना। मजदूरों के शोषण और मशीनीकरण ने कम्युनिस्टों की कमर तोड़ दी। साहिर कहते रहे, दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं और मजदूरों की बस्ती पर बुलडोज़र चल ही गया। आज के सांसद, सनी की सांसद माता हेमा, और धरम पाजी की इस फ़िल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिये।

पुराने जमाने में गणित के सारे सवाल कुछ इस तरह के होते थे। चार मज़दूर एक गड्ढे को तीन रोज में खोदते हैं, तो एक मज़दूर कितने दिन में खोदेगा। इसे कहते हैं, खोद खोदकर सवाल पूछना। एक जेसीबी आ गई, और सारी खुदाई निकल गई।।

मुझे याद है, हमारे शहर में जेलरोड पर पहली बार ट्रैफिक वाली तीन बत्ती, यानी रोटरी लगी थी। चौराहे पर दर्शकों का ट्रैफिक जाम लग गया था। हरी, पीली, लाल बत्ती, ठहरिए, देखिये और चलिये! STOP, LOOK, PROCEED.

बाद में जब आदत पड़ गई, तीनों बत्तियों को बत्ती देकर निकलने लग गए। जिसका काम उसी को साधे। ट्रैफिक के सिपाही के चालान से ही ट्रैफिक कंट्रोल होता है, ट्रैफिक सिग्नल से नहीं।।

रोबोट और इंसान की अक्सर तुलना होती है। इंदौर के हाइकोर्ट तिराहे पर एक अकेला ट्रैफिक जवान रंजीत सिंह इतनी फुर्ती और मुस्तैदी से ट्रैफिक कंट्रोल करता था कि लगता था, यह इंसान नहीं रोबोट है। इसे बेस्ट ट्रैफिक कंट्रोल के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

ट्रैफिक तो कंट्रोल हो गया, लेकिन यह सिपाही खुद को कंट्रोल नहीं कर पाया। आजकल इसके सितारे भी गर्दिश में हैं।

वहीं दूसरी ओर शहर के रिंग रोड का एक व्यस्ततम चौराहा एक रोबोट के भरोसे ही छोड़ दिया गया है। इंदौर के इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों द्वारा निर्मित इस रोबोट में रंजीत सिंह जितनी फुर्ती भले ही न हो, लेकिन यह कभी चाय पीने अथवा पान खाने के बहाने अपनी जगह नहीं छोड़ता। गीता के निष्काम कर्मयोगी की तरह, ट्रैफिक की चिंता किये बगैर ट्रैफिक कंट्रोल किया करता है।।

लोग समझ गए हैं, रोबोट कुछ नहीं समझता! उसके पास न सीटी है, न ही कोई डंडा। जहाँ रोबोट खड़ा होता है, वहाँ चालान भी नहीं बनता। जहाँ रोबोट है, वहाँ सीसीटीवी कैमरा भी नहीं।

जो कायदे कानून वाले हैं, वे रोबोट को सम्मान देते हैं, शेष को रोबोट सम्मान देता है।

कभी कभी तो लगता है, यह रोबोट नहीं, किसी महापुरुष की मूर्ति है। लोग इसे देख रूकते नहीं, एक नज़र से निहारते हुए निकल जाते हैं, क्योंकि यह अक्सर निष्क्रिय रहता है। अगर प्रशासन रोबोट की ड्यूटी का समय लिख दे, तो शायद बात बने।।

ऐसे रोबोट के लिए तो बस इतना ही कहा जा सकता है, रोबोट अपना काम कर रहा है, और चौराहे पर जाम लगा है। एक पवित्र स्थल है रोबोट चौराहा! लोग उसे निहारते हुए, सम्मान देते हुए, बेधड़क, निःसंकोच, बेझिझक, बेधड़क, बेशर्मी से आते जाते रहते हैं, और ट्रैफिक के नये नियमों पर छींटाकशी किया करते हैं। वह रोबोट है, मोदी नहीं, कुछ नहीं करता, सब चुपचाप सहता रहता है।

हमें रोबोट नहीं, इंसान चाहिए, डंडा चाहिए, पर सख्ती नहीं, चालान चाहिए पर ज़बरदस्ती नहीं, दुनिया तो सुधरे, पर हम नहीं, क्योंकि हम किसी से कम नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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