हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७६ ⇒ जलकुकड़ी/जल मुर्गी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जलकुकड़ी/जल मुर्गी ।)

?अभी अभी # ९७६ ⇒ आलेख – जलकुकड़ी/जल मुर्गी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारा बचपन गोकुल की कुंज गलियों में नहीं, शहर के गली मोहल्लों में गुजरा !

पनघट ना होते हुए भी गुलैल से निशाना साधकर मटकी की जगह, फलदार वृक्षों से आम, इमली तोड़ना हमारे बाएं हाथ का खेल था। लड़ने झगड़ने और छेड़छाड़ के लिए हमें कभी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।

लड़ने की यही विशेषता बड़े होकर चुनाव लड़ने में हमारे बहुत काम आई।

आज पक्की दोस्ती, तो कल बोलचाल बन्द। तू चुगलखोर तो तू जलकुक्कड़। कट्टी तो कट्टी, साबुन की बट्टी। ला मेरे पैसे, जा अपने घर। लेकिन आज अगर वही कोई बचपन का दोस्त मिल जाए, तो ये लगता है, कि जहां, मिल गया।।

हम आज भी आपस में एक दूसरे को देखकर कभी खुश होते हैं, तो कभी जल भुन जाते हैं। महिलाओं की किटी पार्टियों की खबरें उड़ती उड़ती आखिर हम तक भी पहुंच ही जाती है। मत पूछो, मिसेज डॉली के बारे में, वह तो बड़ी जल कुकड़ी है। बहुत दिनों बाद जब यह शब्द सुना, तो शब्दकोश याद आया। अरे, यह तो एक पक्षी है, White brested Hen, यानी जल मुर्गी।

अगर मछली जल की रानी है, तो हमारी मुर्गी भी तो महारानी है। अगर मुर्गे को (cock) कॉक कहते हैं तो मुर्गी को Hen कहते हैं। अंग्रेजी के अक्षर ज्ञान में हमने पढ़ा है। The Cock is crowing.

मुर्गा ही बांग देता है, मुर्गी तो बस, पक पक, किया करती है। बड़ी विचित्र है यह अंग्रेजी भाषा। अगर cock के आगे pea लग जाए तो वह peacock, यानी मोर हो जाता है। Crow से याद आया, कौए को भी crow ही कहते हैं, लेकिन वह बांग नहीं देता, सिर्फ कांव कांव किया करता है।।

कुछ लोग गाय पालते हैं तो कुछ कुत्ता ही पाल लेते हैं। गोशाला और अश्व शाला तो ठीक, कुत्ते के लिए तो उसके मालिक का घर ही उसकी पाठशाला है। पालन पोषण पुण्य का काम है। लेकिन पापी पेट के लिए इंसान को मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन भी करना पड़ता है। गाय को चारा और मछलियों को चारे में जमीन आसमान का ना सही, जल और थल का अंतर तो है ही। इस पर हम ज्यादा नहीं लिखेंगे क्योंकि जीव: जीवस्य भोजनं और वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति।

बड़ा अजीब है, यह जल शब्द भी। इसी जल से ही तो जीवन है। गर्मी में जहां यह शीतल जल अमृत है, वहीं जब सीने में जलन होती है तो आंखों में तूफान सा आ जाता है। जलते हैं जिसके लिए, तेरी आंखों के दिये।।

यही जल कहीं आग है, तो कहीं पानी है। जो आग दिल में जली हुई है, वही तो मंजिल की रोशनी है। लेकिन जब यही आग, यही जलन ईर्ष्या, द्वेष और नफरत की होती है तो जिंदगी में तूफान आ जाता है। किसी की खुशी से, उन्नति से, सफलता से जलना, अच्छी बात नहीं है। जल कुकड़ी बनें तो जल मुर्गी की तरह। और अगर आप जलकुक्कड़ हैं, तो भले ही आप पर घड़ों ठंडा पानी डाल दिया जाए, आप एक जल मुर्गी नहीं बन सकते।

अगर जलाएं तो अपना दिल नहीं, दिल का दीया जलाएं, जिससे आपका घर भी रोशन हो, और रोशन हो ये जहान, जिसमें हम रहते हैं यहां।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७५ ⇒ पनघट और जमघट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पनघट और जमघट।)

?अभी अभी # ९७५ ⇒ आलेख – पनघट और जमघट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ यादें भी बड़ी नटखट होती हैं। कहाँ गाँव की गोरी, घूंघट, पीपल की छांव और पनघट और कहां, शहर के हर चौराहे पर भीड़भाड़, धक्का मुक्की और जमघट ! पनघट पर सखियों में कोई भेदभाव नहीं होता, कोई रंगभेद की नीति भी नहीं होती, फिर भी जहां पनघट है, वहां सब गोरी, गोरी ही होती है, और काला मात्र एक घनश्याम। और जहां काले गोरे, वृद्ध युवा, बेकार, कामकाजी और आम जरूरतमंद इंसानों का जमघट हो, वहां, अप्रैल मई की गर्मी ही गर्मी, परेशानी और पसीना ही पसीना।

यमुना के तट पर अथवा किसी पनघट पर कभी गोरी मटकी लेकर पानी भरने जाती होगी, हमने तो सरकारी नल और ट्यूब वेल पर स्त्री, पुरुष और बच्चों को, हंडा, बाल्टी और मटके लिए, कतार लगाते देखा है। अब आप इसे पनघट कहें अथवा जमघट। पानी के लिए ही हर घट है, और हर घट में जल से ही जिंदगानी है।।

सुबह की सैर सबके नसीब में नहीं होती। कैसे कैसे नजारे देखने को मिलते हैं, मॉर्निंग वॉक के बहाने। स्मार्ट सिटी बनता, मेट्रो सुविधा के लिए आतुर, स्वच्छता का छक्का लगा चुका, मेरे शहर का एक व्यस्ततम चौराहा ! जब नेताओं के नामों की सूची समाप्त हो जाती है तो चहुंमुखी विकास के लिए मुंह फैलाते शहर में आगरा बॉम्बे रोड से काम नहीं चलता। रिंग रोड और बायपास तक बात पहुंच जाती है। जहां जगमगाती स्ट्रीट लाइट और सौंदर्यीकरण के साथ साथ सड़क को डिवाइडर से बांटा जाकर दोनों ओर सर्विस रोड से भी आवागमन जारी रहता है।

आप अपनी सुरक्षा के लिए खुली सड़क पर नहीं, सर्विस रोड पर ही अपना सीना ताने निकल पड़ते हैं। इस बार जूता जापानी नहीं, बाटा, एडिडास अथवा स्वदेशी भी हो सकता है।

अगर आप आत्म निर्भर हैं तो पांच छ: हजार का जूता भी पहन सकते हैं। पतलून भी इंग्लिस्तानी नहीं, देसी जीन्स की हो सकती है।।

घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, मैं उस चौराहे पर पहुंच जाता हूं जहां मेरा वास्ता पनघट और जमघट से एक साथ पड़ने वाला है। चौराहे के पास ही, नगर निगम का एक चलित झोनल कार्यालय है, जहां स्वच्छता के लिए मुस्तैद वाहन और सफाई कर्मचारी सड़क पर गंभीर वार्तालाप करते देखे जा सकते हैं। पास ही पानी के टैंकर भरने के लिए भी नलों की व्यवस्था है जिस कारण बिना गोरी के पनघट सा दृश्य उपस्थित हो जाता है। टैंकर को आप कौन सा घट कहेंगे।

जहां भी भीड़ होगी, जमघट होगा, पनघट होगा, यातायात तो बाधित होगा ही। वहीं खाली स्थान को और उपयोगी बनाने के लिए दिहाड़ी श्रमिकों के लिए अस्थायी शेड का निर्माण भी किया गया है। रोजाना रोजगार की तलाश में वहां सुबह सुबह इन्हें इंतजार करते देखा जा सकता है। जहां इतना सब कुछ हो, वहां चाय और गुटका नहीं हो, यह हो नहीं सकता। बस आप मान लीजिए, राहगीरों के आवागमन के लिए बना यह सर्विस रोड इन सेवाभावी महानुभावों की उपस्थिति के कारण, सुबह सवेरे ही, ट्रैफिक जाम का दृश्य उपस्थित कर देता है।।

एक बड़ी सी कार, कहीं से आकर रुकती है। भवन निर्माण के लिए श्रमिकों की आवश्यकता है। छंटनी और भाव ताव सड़क पर ही तय हो जाता है। एक झुंड जाता है, दूसरा झुंड उसकी जगह ले लेता है। किसका नसीब खुलेगा, इंतजार ही एकमात्र विकल्प है।

कोरोना के कहर के कारण पिछले कुछ समय से समय की गति रुक सी गई थी।

यह जमघट यूं ही नहीं है। बहुत पीड़ा है, बड़ा अभाव है, तुम नहीं समझोगे रमेश बाबू ! बच्चों के स्कूल के वाहन भी अब इन्हीं सड़कों पर दौड़ेंगे। आज का अमर पनघट से भले ही बच जाए, जमघट से नहीं बच सकता। बहुत हुआ ऑनलाइन, अब अमर, तेरी बस आ गई, इस्कूल चल ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१८ ☆ रिश्ते नहीं रिसते… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

 

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख रिश्ते नहीं रिसते। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१८ ☆

☆ रिश्ते नहीं रिसते… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

इक्कीसवीं सदी में संबंध व रिश्तों की परिभाषा बदल गई है। कोई संबंध पावन रहा नहीं; न ही रही है उसकी अहमियत व मर्यादा। रिश्ते आजकल दरक़ रहे हैं– उस इमारत की भांति, जो खंडहर के रूप में खड़ी तो दिखाई पड़ती है, परंतु उसके गिरने का अंदेशा सदा बना रहता है। यही दशा है आज के संबंधों की। संबंध अर्थात् सम+बंध, समान रूप से बंधा हुआ अर्थात् दोनों पक्ष के लोग उसकी महत्ता को समान रूप से समझें व स्वीकारें। परंतु आजकल तो संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। वैसे तो कोई ‘हेलो-हाय’ करना भी पसंद नहीं करता। इसमें दोष हमारी सोच व तीव्रता से जन्मती-पनपती आकांक्षाओं का है; जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जा रही हैं और मानव उनकी पूर्ति हेतु जी-जान से स्वयं अपने जीवन को खपा देता है। उस स्थिति में न उसे दिन की परवाह रहती है; न ही रात की। वह तो प्रतिस्पर्द्धा के चलते; दूसरे को पछाड़ आगे बढ़ने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाता है। इस परिस्थिति में वह रिश्ते-नातों को भुला कर दोस्ती को दाँव पर लगा, निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहता है और अपने आत्मजों व प्रियजनों से बहुत दूर निकल जाता है…सांसारिक चकाचौंध में वह सबको भुला बैठता है। उसे दिखायी पड़ता है–केवल-मात्र अपना स्वार्थ-सिक्त लक्ष्य; जो पुच्छल तारे की भांति उसके विनाश का कारण बनता है। उस स्थिति में उसके पास पीछे मुड़कर देखने का समय भी नहीं होता।

‘रिश्तों की माला जब टूटती है, तो दोबारा जोड़ने से छोटी हो जाती है, क्योंकि कुछ जज़्बात के मोती बिखर जाते हैं।’ यह कथन कोटिश: सत्य है–इसलिए उन्हें बहुत प्यार व सावधानी से सहेजने व संजोने की दरक़ार है। ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।’ सो! रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं; किसी भी पल दरक़ जाते हैं और रिश्तों में आयी दरार कहीं खाई न बन जाए; उसका ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है। एक फिल्म की ये पंक्तियां, ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ व ‘ताल्लुक बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा’ इन्हीं भावों को परिपुष्ट करती हैं। हृदय में संशय, संदेह, अविश्वास के भावों के अति-विषाक्त हो जाने से पूर्व अजनबी बन जाना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, ताकि संबंधों को पुन: स्थापित करने की संभावना बनी रहे। इसी संदर्भ में मनोमस्तिष्क में दस्तक दे रही हैं वे पंक्तियां, ‘दुश्मनी इतनी करो कि पुन: दोस्त बनने की संभावना शेष बनी रहे।’ सो! संभावना जीवन में अपना अहम् दायित्व निभाती है और वह सदैव बनी रहनी चाहिए। रहीम जी का दोहा ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चट्काय/ जोरै से पुनि न जुरै, जुरै गांठ परि जाइ’ भी यही संदेश देता है… जैसे धागे के टूटने पर वह दोबारा नहीं जुड़ पाता; उसमें गांठ पड़ना अवश्यंभावी है। उसी प्रकार रिश्तों में भी शक़, आशंका, संशय व ग़लतफ़हमी ऐसी दरारें उत्पन्न कर देते हैं, जिन्हें पाटना अत्यंत दुष्कर होता है।

परंतु आजकल माधुर्यपूर्ण रिश्ते तो गुज़रे ज़माने की बात हो गए हैं। संबंध-सरोकार शेष बचे ही नहीं। हर रिश्ते में अजनबीपन का अहसास व्याप्त है। रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या भाई-भाई का हो; पिता-पुत्र का हो या मां बेटी का– सब एकांत की त्रासदी झेल रहे हैं; यहां तक कि बच्चे भी अकेलेपन से जूझ रहे हैं। पति-पत्नी में स्नेह, प्रेम, त्याग व समर्पण के अभाव होने का ख़ामियाज़ा सबसे अधिक बच्चे भुगत रहे हैं तथा उनके हृदय में अनगिनत प्रश्न ग़ाहे-बेग़ाहे कुनमुनाते हैं और वे अपने माता-पिता को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जिसे सुनकर वे स्तब्ध रह जाते हैं। ‘यदि उनके पास उनके पालन-पोषण करने का समय ही नहीं था, तो उन्होंने उन्हें जन्म ही क्यों दिया?’

अक्सर माता-पिता बच्चों को खिलौने व सुख-सुविधाएं प्रदान कर अपने दायित्वों की इति-श्री समझ लेते हैं; परंतु बच्चों को उनकी दरक़ार नहीं होती, बल्कि उन्हें तो माता-पिता के प्यार-दुलार व सान्निध्य-साहचर्य की आवश्यकता होती है; जिसके अभाव में उन मासूमों के हृदय में आक्रोश की स्थिति पनपने लगती है– जिसका परिणाम हमें बच्चों के नशे के आदी होने व अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त होने के रूप में दिखने को मिलता है। इस स्थिति में उनका सर्वांगीण विकास कैसे संभव हो सकता है? मोबाइल, टी•वी• व मीडिया से उनका जुड़ाव व सर्वाधिक प्रतिभागिता सर्वत्र झलकती है; जो उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है, जिसके परिणाम-स्वरूप वे मानसिक रोगी बन जाते हैं।

आजकल अहंनिष्ठता के कारण माता-पिता में अलगाव की स्थिति पनप रही है, जिसके कारण सिंगल-पेरेंट का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। सो! बच्चों को माता का स्नेह-दुलार व पिता का सुरक्षा-दायरा नसीब नहीं हो पाता और वे कुंठा-ग्रस्त हो जाते हैं। उनके जीवन से आस्था व विश्वास के भाव नदारद हो जाते हैं और जीवन के प्रति उनका नज़रिया अथवा दृष्टिकोण सदैव नकारात्मक रहता है। सब्र, संतोष, करुणा, सहानुभूति, त्याग व  सहनशीलता से उनका दूर का नाता भी नहीं रहता। वे उसके श्रेय-प्रेय व शुभ-अशुभ पक्षों की ओर ग़ौर नहीं फ़रमाते; न ही निर्णय लेने व उसे कार्यान्वित करने में समय लगाते हैं; जिसका परिणाम हमें उनके प्रतिदिन फ़िरौती, अपहरण, लूटपाट, दुष्कर्म आदि के हादसों में लिप्त होने के रूप में दिखाई पड़ता है।

आज की युवा-पीढ़ी चार्वाक दर्शन से प्रभावित है तथा हर क्षण का तुरंत उपभोग कर लेना चाहती है। वे अगले पल अर्थात् कल व भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करते। सो! युवावस्था में पदार्पण करने से पूर्व ही वे मासूम बच्चियों की अस्मत लूटने, एकतरफ़ा प्यार में तेज़ाब फेंकने व सरेआम गोलियां चलाने से गुरेज़ नहीं करते। दुष्कर्म करने के पश्चात् पीड़िता की दर्दनाक हत्या कर देना भी आजकल सामान्य सी घटना स्वीकारी जाती है, क्योंकि वे अपनी सुरक्षा-हेतु कोई भी सबूत छोड़ना नहीं चाहते। उस स्थिति में बहन, बेटी व मां के संबंध की सार्थकता उनकी दृष्टि में कहाँ महत्व रखती है? पहले पत्नी को छोड़कर हर महिला को मां, बहन, बेटी के रूप में मान्यता प्रदान की जाती थी और उनके आत्म-सम्मान पर आंच आने की स्थिति में वे अपने प्राणों की बाज़ी तक लगा देने को तत्पर रहते थे। परंतु आजकल तो दुधमुंही मासूम बच्चियां भी अपने माता-पिता के आंचल तले महफूज़ नहीं हैं… गिद्ध नज़रें हर-पल उनके चारों ओर मंडराती दिखाई पड़ती हैं।

चलिए! प्रकाश डालते हैं– पति-पत्नी के विवाहेतर संबंधों पर–पति-पत्नी और वो अर्थात् पर-स्त्री-गमन आज के समाज का फैशन हो गया है। ‘लिव-इन’ व ‘मी-टू’ के दुष्परिणाम तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष हैं, जिसके कारण परिवार टूट रहे हैं। वैसे पैसा भी रिश्तों में दरार उत्पन्न करने में अहम् भूमिका अदा करता है। भाई-भाई, भाई-बहन, पिता-पुत्र, मां-बेटी व गुरू-शिष्य के पावन संबंध भी दाँव पर लगे रहते हैं। अक्सर वे एक-दूसरे की जान लेने पर सदैव आमादा रहते हैं। संतान द्वारा माता-पिता की हत्या के किस्से सामान्य हो गये हैं। पहले संयुक्त परिवार-प्रथा का प्रचलन था। एक कमाता था, दस खाते थे। परंतु आजकल हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने में व्यस्त है, परंतु स्थिति सर्वथा भिन्न है। परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं और संवादहीनता के कारण पनप रही संवेदनशून्यता की स्थिति के परिणाम-स्वरूप रिश्तों में ग्रहण लग गया है– माता-पिता को वृद्धाश्रमों में शरण लेनी पड़ रही है। वे कमरे के बंद दरवाज़ों व शून्य छत की ओर ताकते; उन आत्मजों की प्रतीक्षा में रत रहते हैं; जिनके लौटने की संभावना नगण्य होती है। अक्सर बच्चों के विदेश-गमन के पश्चात् वे जीवन में अकेले जूझते व संघर्ष करते रहते हैं; जिसका परिणाम दस माह पश्चात् एक फ्लैट में किसी महिला व पुरुष का कंकाल प्राप्त होना है। यह आधुनिक समाज के सभी वर्ग के लोगों को कटघरे में खड़ा कर प्रश्न करता है– ‘क्या बच्चों का माता-पिता के प्रति कोई दायित्व नहीं है?’

वैसे इस अप्रत्याशित व भयावह स्थिति के लिए अपराधी केवल बच्चे नहीं, उनके माता-पिता भी हैं, जो उनके विदेश में होने पर फ़ख्र महसूस करते हैं। परंतु जब बच्चे वहाँ से लौट कर नहीं आते, तो उनकी जान पर बन आती है। सो! मैं अमुक घटना पर आपकी तवज्जो चाहूंगी; जिसे सुनकर आपके पाँव तले से ज़मीन खिसक जाएगी। चंद दिन पहले पिता ने अपने बेटे को उसकी मां की गंभीर बीमारी के बारे में सूचित करते हुए कहा कि वह उसे बहुत याद करती है। एक बार आकर वह उसे मिल जाए। परंतु वह नहीं आया। इतना ही नहीं– उसका अपने भाई से यह आग्रह करना कि भविष्य में मां के निधन पर वह चला जाए और पिता के निधन पर वह चला जाए। क्या यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं है?

आजकल तो लहू का रंग लाल ही नहीं रहा; श्वेत हो गया है। संवेदना-सरोवर सूख चुके हैं। अब उनमें कोई हलचल नहीं रही। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा हैं। जब आप बात करना बंद कर देते हैं; अमूल्य संबंध खोने लगते हैं। उन्हें जीवित रखने के लिए आवश्यकता है– विवाद से बचने की और संबंधों को शाश्वत बनाए रखने की…जिसकी शर्त है, झुकना; सहन करना व प्रसन्नता से ख़ुद पराजय स्वीकार कर दूसरों को विजयी बनाने की बलवती इच्छा होना। सच्चे संबंध जीवन की वास्तविक पूंजी व धरोहर होते हैं, जो विषम परिस्थितियों में भी सहायक सिद्ध होते हैं। इनसे निबाह करने के लिए मानव को अहम् का त्याग करना अनिवार्य होता है, अन्यथा उसी के बोझ से वे टूट जाते हैं। ‘तूफ़ान में कश्तियों का बचना तो संभव है, परंतु अहं से हस्तियों का डूबना अनिवार्य है, निश्चित है।’

सो! आजकल सब संबंध दिखावे के हैं, जो मात्र छलावा हैं। वास्तव में हर शख्स भीतर से अकेला है। यही है जिंदगी की कशमकश; जिस से जूझता हुआ इंसान आवागमन के चक्र से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता, बल्कि उसे आजीवन सुनामी की आशंका बनी रहती है। वह हर पल इसी आशंका में जीता है कि वे रिश्ते किसी पल भी दरक़ सकते हैं, क्योंकि अविश्वास, संदेह व शंका रूपी दीमक उसे खोखला कर चुकी होती है और वे संबंध नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु फिर भी एक आशा, एक उम्मीद अवश्य बनी रहती है।

आइए! पारस्परिक मनोमालिन्य को त्याग सहज रूप से जीवन जीएं व अहं का त्याग कर मंगल-कामना करें कि वे ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठ सकें। संसार में जो सत्य है; वह सुंदर व कल्याणकारी है। सो! सत्य को सदैव संजोकर रखना व विषम परिस्थितियों में सम बने रहना श्रेयस्कर है।। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि वह पल-भर में सब रिश्तों में सेंध लगाकर उन्हें नष्ट कर देता है। सो! दूसरों की भावनाओं का सदैव सम्मान करें व उनसे वैसा व्यवहार करें, जिसकी अपेक्षा हम उनसे करते हैं। पहले लोग भावुक होते थे; भावना में बहकर रिश्ते निभाते थे। फिर लोग प्रैक्टिकल हुए और भावना का जीवन में कोई स्थान नहीं रहा; रिश्तों से फायदा उठाने लगे। अब वे प्रोफेशनल हो गए हैं और वही रिश्ते निभाने लगे हैं; जिनसे अपने स्वार्थ साधे जा सकें।

‘रिश्ते नम्रता से निभाए जा सकते हैं; छल-कपट से तो केवल महाभारत रची जा सकती है।’ इसलिए बुरा मत मानिए–अगर लोग आपको ज़रूरत के समय याद करते हैं, बल्कि गर्व कीजिए, क्योंकि मोमबत्ती की याद तभी आती है, जब अंधेरा होता है। सो! रिश्तों की गहराई को अनुभव कीजिए-समझिए। सहृदय बनिए और स्नेह-सौहार्द बनाए रखिए। रिश्तों में प्रतिदान की अपेक्षा मत रखिए; केवल देना सीखिए अर्थात् समर्पण व त्याग की महत्ता व अहमियत स्वीकारिए, ताकि रिश्ते स्वस्थ बने रहें और उनमें ताज़गी बरक़रार रहे। रिश्ते रिसते न रहें, बल्कि रिश्तों का अहसास बना रहे और वे जीवन को आंदोलित करते रहें; जिससे जीवन-बगिया महकती रहे; लहलहाती रहे। वहां चिर-वसंत का वास हो और मलय वायु के झोंके सभी दिशाओं को आलोड़ित व अलौकिक आनंद से सराबोर करते रहें–यही अनमोल रिश्तों की सार्थकता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७४ ⇒ किताब और कैलेंडर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताब और कैलेंडर।)

?अभी अभी # ९७४ ⇒ आलेख – किताब और कैलेंडर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किताबें रोज छपती हैं, कैलेंडर हर वर्ष छपते हैं। किताब में क्या छपेगा, इसका निर्णय लेखक करता है, कैलेंडर में क्या छपेगा, इसका निर्णय समय करता है, इसीलिए किताब को कृति और कैलेंडर को काल निर्णय भी कहा जाता है। एक लेखक को लोग कम जानते हैं, लाला रामस्वरूप को कौन नहीं जानता।

मैं समय हूं। मेरे समय में किताब को पुस्तक कहा जाता था और टीचर को शिक्षक। टेक्स्ट बुक, पाठ्य पुस्तक कहलाती थी और lesson पाठ कहलाता था। सर और टीचर को अध्यापक और गुरु जी कहा जाता था और अटेंडेंस को हाजरी। जब क्लास में नहीं, कक्षा में हाजरी भरी जाती थी, तब छात्र यस सर अथवा प्रेजेंट सर नहीं, उपस्थित महोदय कहा करते थे।।

कैलेंडर की तरह हर वर्ष पाठ्य पुस्तकें भी बदली जाती थी। उधर कैलेंडर का साल बदलता, इधर हमारी कक्षा भी बदलती और पाठ्य पुस्तक भी।

किताबें पढ़कर और पढ़ लिखकर ही व्यक्ति पहले ज्ञान अर्जित करता है और फिर बाद में किसी किताब की रचना करता है। एक किताब की तुलना में एक कैलेंडर छापना अधिक आसान है। इसीलिए जो अधिक पढ़ लिख जाते हैं वे किताबें ही छापना पसंद करते हैं, कैलेंडर नहीं।।

हम भारतकुमार मनोजकुमार का उपकार नहीं भूलेंगे, जिसने कैलेंडर को एक नया अर्थ दिया और वह भी एक, इकतारे के साथ। हर साल कैलेंडर छाप दिया, और उसके बाद ? इकतारा बोले, सुन सुन, क्या कहे ये तुझसे, सुन सुन, सुन सुन सुन।

सृजन, सृजन होता है, चाहे फिर वह किसी कैलेंडर का हो, अथवा किसी पुस्तक का। उत्सव तो बनता है, कहीं सृजन की मेहनत कुछ महीनों की है, तो कहीं कई वर्षों की। प्यार के खत की तरह, किसी पुस्तक के सृजन में, किसी बालक के जन्म में, वक्त तो लगता है।।

जिन्हें गुरु नहीं मिलता, वे निगुरे कहलाते हैं, जिनकी संतान नहीं होती, वे निःसंतान कहलाते हैं लेकिन जो लेखक किसी पुस्तक का सृजन नहीं कर पाए, उसे आप क्या कहेंगे।

आप कैलेंडर छापें, ना छापें, एक पुस्तक अवश्य छापें, आप पर मां सरस्वती की कृपा हो।

जो खुशी एक मां को अपने बालक के जन्म पर होती है, वही खुशी किसी लेखक को अपनी पहली रचना प्रकाशित होने पर होती है। खुशी तो बनती है, एक विमोचन तो बनता है।।

हर साल कैलेंडर छपते हैं, लाखों करोड़ों किताबें छपती हैं, लेकिन समय का विधान देखिए, जब देश दुनिया की जनसंख्या बढ़ती है, तो हमें जनसंख्या नियंत्रण का खयाल आता है। लेकिन इसमें गलत कुछ भी नहीं।

जो गलत है, वह गलत है।

खूब किताबें छापो, खूब कैलेंडर छापो, खूब पैसा कमाओ, लेकिन जब कमाने वाले हाथों से खाने वाले हाथ बढ़ जाते हैं, तो गरीबी में आटा गीला हो ही जाता है। बच्चे दो ही अच्छे, लेकिन हां, मगर हों भी अच्छे।।

एक लेखक को भी अपनी रचना से उतना ही प्रेम होता है जितना मां बाप को अपनी औलाद से। पुत्र मोह तो महाराज दशरथ को भी था और महाराज धृतराष्ट्र को भी। कहां एक के चार और कहां एक के सौ। आजकल हमारे लेखक भी तेंदुलकर और विराट कोहली की तरह अपनी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या, रनों की तरह बढ़ा रहे हैं। कोई रन मशीन है तो कोई बुक मशीन। हाल ही में कुछ लेखक अपनी प्रकाशित पुस्तकों का अर्द्ध शतक तो मार ही चुके हैं। कुछ नर्वस नाइंटीज़ में अटके हैं, उनकी मां शारदे सेंचुरी पूरी करे।

आप कैलेंडर चाहे मोहन मीकिंस का लें, अथवा किंगफिशर का, एक लाइफ टाइम पंचांग से ही काम चला लें, हर साल नया कैलेंडर भी खरीदें, लेकिन कृपया खुद कैलेंडर ना छापें। अगर छापने का इतना ही शौक है, तो अपनी किताबें छापें, कोई बैन नहीं, कोई नियंत्रण नहीं।

और हां जो छाप रहे हैं, उनसे जलें नहीं। विमोचन तो पुस्तक के जन्म का अवसर होता है, उस पर बच्चा और जच्चा को आशीर्वाद दें, अनावश्यक कुढ़कर अपशुकन तो ना करें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८५ ☆ माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८५ ☆

माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भारत की आत्मा यदि किसी एक धारा में बहती हुई महसूस की जाए, तो वह है माँ गंगा। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातनी लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है।

तीर्थ अनेकों आपके, भक्त तारतीं आप।

संगम की महिमा अमिट, हर लें सब संताप।।

सच में, गंगा केवल जल नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। भारत के अनगिनत तीर्थ, घाट और नगर इसी पवित्र धारा के किनारे बसे हैं, जहाँ आज भी लोग अपने दुःखों का विसर्जन कर शांति का अनुभव करते हैं।

माँ गंगा का भौतिक उद्गम गौमुख (गंगोत्री ग्लेशियर) से माना जाता है। यहाँ से निकलने वाली धारा “भागीरथी” कहलाती है, जो आगे चलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है और तभी “गंगा” नाम धारण करती है।

यहाँ एक अद्भुत समन्वय दिखता है—आध्यात्मिक कथा कहती है कि राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं, जबकि विज्ञान बताता है कि यह हिमनदों के पिघलने से बनी एक विशाल नदी तंत्र है। जीवन को सींचती हुई यात्रा…

उद्गम गौमुख आपका, गंगोत्री हरिद्वार।

वाराणसी प्रयाग माँ, कल-कल जल रसधार।।

गंगा हरिद्वार से मैदानों में प्रवेश करती है, जहाँ इसका स्वरूप और भी विशाल और जीवनदायिनी हो जाता है।

फिर प्रयागराज में यमुना और अदृश्य सरस्वती के साथ त्रिवेणी संगम बनाती है—यह स्थान आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आगे वाराणसी जैसे प्राचीन नगर में गंगा मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों का गहरा संबंध इस नदी से जुड़ता है।

गंगा की धारा अनेक शहरों और संस्कृतियों को जोड़ती हुई आगे बढ़ती है…

कोलकता, कानपुर, गाजी, पटना धाम।

जीवनदायनि मातु हैं, सदा बहें अविराम।।

कानपुर, पटना और कोलकाता जैसे बड़े नगरों से गुजरते हुए अंततः गंगा, गंगा सागर में समुद्र से मिल जाती हैं।

यह मिलन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक है—जीवन की यात्रा का अंतिम समर्पण।

क्यों विशेष है गंगा जल?

आधुनिक विज्ञान भी गंगा की विशेषताओं को स्वीकार करता है। शोध बताते हैं कि गंगा जल में स्वयं शुद्धिकरण (self-purification) की अद्भुत क्षमता होती है, जिसका कारण उसमें पाए जाने वाले विशेष जीवाणु और खनिज हैं।

यही कारण है कि गंगा जल लंबे समय तक खराब नहीं होता—यह बात आज के युवाओं को विज्ञान के माध्यम से जोड़ती है।आज की युवा पीढ़ी के लिए गंगा केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का आह्वान है।

गंगा हमें सिखाती है—

निरंतर बहते रहना

सबको जोड़ना

और स्वयं को समर्पित करना

यदि हम गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाए रखें, तो यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनी रहेगी।

देवनदी मंदाकिनी, विष्णुपगी ध्रुवनन्द।

सुरसरिता माँ जाह्नवी, देतीं परमानन्द।।

माँ गंगा सच में “जाह्नवी”, “सुरसरिता” और “देवनदी” हैं—जो केवल शरीर ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र करती हैं।

माँ गंगा की यह यात्रा—गौमुख से गंगा सागर तक—हमें जीवन का गूढ़ संदेश देती है:

“बहते रहो, जोड़ते रहो, और अंततः समर्पण में ही पूर्णता है।”

यही गंगा है—आस्था भी, विज्ञान भी, और जीवन का सार भी।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४११ ☆ साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४११ ☆

?  आलेख – साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।

साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा, तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के ‘प्राण’ को अपनी कल्पना में जिया है।

सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है, व्यावसायिकता से किंचित परे है, वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय, निर्देशन, संपादन, लोकेशन, फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत, गायन वगैरह  ढेर सारे लोग नहीं होते ।

जब प्रसाद जी लिखते हैं”तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन”तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है।  फिल्मी धुनों में  ऐसे गीत ‘शब्दनाद’ और गांभीर्य को खो देते है, जो मूल कृति की आत्मा थी।

फिल्मकार की कोशिश उसे ‘लोकप्रिय’ और ‘दृश्य-योग्य’ बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।

दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’ से लेकर अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’, आर.के. नारायण की ‘गाइड’ और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित ‘साँवरिया’ जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। ‘तीसरी कसम’ में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम ‘देवदास’ या ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।

फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके ‘उद्देश्य’ और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।

अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का  सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो ‘शब्दनाद’ हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है।

जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७३ ⇒ चुगली पुलिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुगली पुलिया।)

?अभी अभी # ९७३ ⇒ आलेख – चुगली पुलिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ताल तो भोपाल का, बाकी सब तलैया है। आजकल बड़े बड़े फ्लाई ओवर बन रहे हैं, जब संसाधनों की कमी थी, नदियों पर पुल बनाए जाते थे और छोटे छोटे नालों पर बरसात के मौसम में आने जाने के लिए छोटा पुल बनाया जाता था।

हमारे शहर में आज भी कृष्णपुरा पुल है जो कभी सबसे बड़ा पुल कहलाता था। रामबाग और कृष्णापुरे के बीच, आज भी एक पुल है, जिसे बीच वाला पुल कहते थे। घर से स्कूल हम इसी पुल से जाते थे। दिन में तो ठीक, रात में इस पुल से गुजरने में डर लगता था। जब यह पुल बना होगा, किसी ने पुल की फर्शी पर ॐ लिख रखा था। चलते वक्त हमें ध्यान रखना पड़ता था, कहीं इस पर पांव न पड़ जाए। पुल के खत्म होने के पहले, एक पिलर से सटा हुआ, कुछ कटा हुआ, एक शब्द लिखा था कग्। रोज पुल पार करते वक्त ध्यान इसी पर रहता था, ॐ आ गया, अब कग् आएगा।।

पुल को अंग्रेजी में ब्रिज कहते है। मेरे शहर में मेरे देखते देखते, कितने ब्रिज बन गए। मुझे अच्छी तरह याद है, आज तिलक पथ पर कहां लोखंडे ब्रिज है, वहां कभी एक छोटी सी पुलिया थी। इस पार से उस पार जाने के लिए खतरों के खिलाड़ी की तरह, संभल संभल उतरे पारा वाला मामला था। हम बच्चे लोगों का तो कई बार पांव भी फिसल जाता था। पानी ज़्यादा नहीं होता था। एक तो mud स्नान और बाद में घर पर पहले तबीयत से पूजा, तत्पश्चात ठंडे पानी से स्नान।।

सारे पुल ब्रिज हुए अब ! ब्रिज तो हावड़ा का, बाकी सब culvert यानी पुलिया है। आज हमारे शहर में नदी तो एक ही है, जिसका सौंदर्यीकरण चल रहा है, लेकिन पुलियाओं की कोई कमी नहीं। बरसाती पानी के निकास के लिए नालों पर पुलिया बनाई जाती थी। नाले तो बंद हो जाते थी, पुलिया मशहूर हो जाती थी।

आज शहर में जगह जगह कई पुलियाएं हैं। किसी को तीन पुलिया कहते हैं, तो किसी को गमला पुलिया। सुबह की सैर पर जाने वाले स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए, ये पुलियाएं सुस्ताने के काम आती हैं। सुबह की सैर अकेले नहीं की जाती। चार पांच लोगों का ग्रुप हो, तो समय भी कट जाता है, और थकान भी महसूस नहीं होती। राजनीति, शेयर मार्केट, फिल्म और अफवाहों के अलावा और भी कई मसले होते हैं, जिन पर इन पुलियाओं पर विस्तृत चर्चा होती है।

कुछ पुलियाएं जो मंदिर के करीब स्थित हैं, शाम की आरती के बाद मोहल्ले की महिलाओं के लिए सुरक्षित होती हैं। वहां सड़क के दोनों ओर, आमने सामने एक एक पुलिया है जिसका नाम किसी ने निंदा पुलिया और चुगली पुलिया रख दिया है। निंदा और चुगली में भी अंतर होता है। निंदा तो किसी की भी की जा सकती है, लेकिन चुगली तो अपनों की ही हो सकती है।।

ऐसा माना जाता है कि निंदा खुले आम की जाती है लेकिन चुगली किसी से छुपाकर की जाती है। ‌मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो, यह चुगली नहीं तो और क्या है।।

‌सास को बहू की निन्दा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए वह खुले आम निंदा पुलिया पर किसी भी बहू की निन्दा कर सकती है। बचपन में हम निंदा नहीं समझते थे, केवल चुगली से ही काम चला लिया करते थे। किसी के कान भरना क्या चुगली करना नहीं।

‌अगर पुलिया न होती, तो हम अपने दिल की बात कहां करते। दीवारों के भी कान होते हैं, पुलिया के कान, मुंह, आंख कुछ नहीं होते। आज तक किसी पुलिया ने इधर की बात इधर नहीं की। न कुछ लिया, न कुछ दिया। बस जो उस पर बैठा, उसको थोड़ा आराम दिया। उसे अपने मन की बात कहने का मौका दिया। कितनों ने पुलिया पर बैठकर अपनी फिक्र धुएं में उड़ाई है, कितने थके हुए राहगीरों ने यहां बैठकर राहत की सांस पाई है। क्या आपको कभी किसी पुलिया की याद आई है।।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७२ ⇒ कलम के पहलवान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कलम के पहलवान।)

?अभी अभी # ९७२ ⇒ आलेख – कलम के पहलवान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कलम के धनी तो बहुत हुए हैं, कलम के सिपाहियों ने भी कई वैचारिक जंग जीती हैं, आज हम कलम के पहलवानों की चर्चा करेंगे। जैसा कि सर्वविदित है, मौसिकी हो या पहलवानी, उस्ताद से गंडा बंधवाने की प्रथा है। रियाज और वर्जिश की दरकार तो है ही।

बिन गुरु ज्ञान कहां से आए ! घिस घिस कर शालिग्राम की तरह, कलम घिस घिसकर ही कोई कलम का पहलवान बन सकता है। योग गुरु, संगीत के आचार्य और अखाड़े के उस्ताद की तरह एक कलम के पहलवान को भी अपने कलम गुरु की चिलम भरनी पड़ती है। कलम का गुरु द्रोणाचार्य की तरह नहीं होता। वह जिस शिष्य पर मेहरबान हो जाता है, उससे वह कलम पकड़ने वाली कोई उंगली गुरु दक्षिणा में नहीं मांगता, अपितु अपनी कलम ही उसे प्रसाद स्वरूप ईनाम में दे देता है।।

पूत के पांव पालने में, और कलम का सिर पहले दवात में होता था। दवात की स्याही में डुबो डुबोकर कलम कागज पर अक्षर बनाती थी। गुरुकुल का ज्ञान kores की स्याही की एक टिकिया से शुरू होता था। कागज़ के अखाड़े में कलम ने भी कोई कम घास नहीं छीली। कई बार कागज़ छलनी हुआ तो कई बार कलम क्षतिग्रस्त हुई। वह कलम का बाल्यकाल था। सरकंडे और पार्कर पेन का संधि काल था वह। होल्डर और स्याही की दवात की दास्तान है यह।

जिस तरह बंदर के हाथ में उस्तरा नहीं दिया जाता, किसी काला अक्षर भैंस बराबर वाले के हाथ में कलम नहीं पकड़ा दी जाती थी। मिट्टी से पैदा हुए हो, पहले मिट्टी का सम्मान करना सीखो। पट्टी तब कागद का काम करती थी और पेम, पट्टी पर ढाई आखर प्रेम का लिखना सीख जाती थी। आज भी जो विद्या, अध्यापन कक्ष के श्याम पट के दायरे में, खड़ू निर्मित चाक से प्राप्त होती है, वह किसी गुरुकुल के ज्ञान से कम नहीं। दुनिया के सभी गणित के सवाल इसी ब्लैक बोर्ड पर हल हुए हैं। हर बार एक नया सवाल हल किया जाता है और बाद में उसे पोंछ दिया जाता है।

ज्ञान की स्लेट कोरी की कोरी ही रह जाती है। गुत्थी इसी तरह सुलझती, उलझती जाती है।

मेरा जीवन कोरा कागज़, कोरा ही रह गया। जब कलम कागज़ पर चलती है, तो जगह कम पड़ जाती है। कागज़ भी मानो कलम से कहता प्रतीत होता है, रंग दे, रंग दे, रंग दे, मुझे तू रंग दे। कलम के पहलवान पीठ झुकाकर ज्ञानपीठ के लिए सृजन रत रहते हैं। कलम वही जो कलमकार को पुरस्कार ही नहीं, कार भी उपलब्ध करवाए। महा मंडलेश्वर की उपाधि ना सही विद्या वाचस्पति, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार और पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित होना तो बनता है।।

कलम का सदगुरु एक कलम के पहलवान को ज्ञानवान, बुद्धिमान और शक्तिमान बनाता है। जितने आचार्य, पंडित, और डॉक्टर साहित्य में पैदा हुए हैं, उतने अन्य किसी बौद्धिक क्षेत्र में नहीं हुए। आलोचक, समालोचक, समीक्षक यहां के शंकराचार्य हैं। साहित्य के सभी पीठ इनका सम्मान करते हैं। अगर आप एक सच्चे कलम के पहलवान हैं तो इन्हें कभी पीठ ना दिखाएं। इन्हें अपनी पीठ पर बिठाएं।

एक अप्रैल का ज्ञान भंग की तरंग में नहीं प्रस्फुटित होता। उसके लिए जन्मजात प्रतिभा संपन्न होना भी जरूरी होता है। अगर आपमें वह प्रतिभा नहीं है तो कलम के साथ पहलवानी ना करें, हवा आने दें। बेहतर है किसी साहित्य के उस्ताद अथवा विद्यालंकार से गंडा बंधवा ही लें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७१ ⇒ अपनापन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपनापन।)

?अभी अभी # ९७१ ⇒ आलेख – अपनापन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्रेम में अगर ढाई अक्षर होते हैं, तो अपनापन में पाँच ! यानी ढाई से दो गुना। प्रेम को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन अपनेपन को परिभाषित करना इतना आसान नहीं।

फेसबुक पर अपने बारे में लिखने का मौका कम ही आता है ! परिचय को रिश्ते में बदलने में वक्त तो लगता है। केवल विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित रिश्ते में अपनेपन का अहसास होना ही फेसबुक की खूबी है।।

कल 1 अप्रैल था ! कई लोग 1 अप्रैल को पैदा होते हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ ! जब छोटे थे, तो जन्मदिन सिर्फ माँ को याद रहता था। माँ हलवे से मुँह मीठा करती थी। पिताजी कुछ न कुछ लेकर ज़रूर घर आते थे। कभी कोई खिलौना, कभी नये कपड़े, तो कभी सायकल।

समय के साथ जन्मदिन का स्वरूप बदलता चला गया। जन्मदिन, स्कूल, दफ़्तर और परिचितों की सीमाएं पार करता हुआ फेसबुक तक पहुँच गया। कल फेसबुक पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया।।

पहली बार अपनेपन का अहसास हुआ ! अपरिचय से परिचय का रिश्ता जब इतना मजबूत होने लगता है, तो सब अपने लगने लगते हैं। रोज सुबह ” अभी अभी ” से अपनों की पहचान हुई। अपनों को नापने का कोई मापदंड नहीं होता। आश्चर्य हुआ, खुशी भी हुई। इतनों में अपनेपन का अहसास हुआ।

शब्द भाव प्रकट करते हैं। भाव दो शब्दों में भी प्रकट किए जा सकते हैं, और 200 में भी ! मेरे लिए भाव अधिक महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं तो मौन से भी अपनेपन की अभिव्यक्ति होती है। प्रकट रूप से व्यक्त हर शब्द का मैं सम्मान करता हूँ, उसके पीछे छुपे गहन अर्थ को समझना सबके बस की बात नहीं, अतः कभी कभी व्यक्ति के भाव को पूरा सम्मान भी नहीं मिल पाता।

जाने अनजाने हुई इस भूल के लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।।

अभी अभी का यह सिलसिला आपके प्यार और आशीर्वाद का ही फल है। मेरे जीवन भर की उपलब्धि केवल यह अभी अभी ही है। जन्मदिन के अवसर पर आप सबने मुझे अपनेपन का अहसास कराया। कुछ का मैं धन्यवाद कर पाया, कुछ का नहीं। सभी के द्वारा व्यक्त भावों, उद्गार और जन्मदिन पर प्रेषित शुभकामनाओं हेतु मैं सबका पुनः आभार प्रकट करता हूँ।

आपके इस अपनेपन के कारण मुझे कभी अपनी उम्र का अहसास नहीं हुआ। ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर जरिया मुझे नज़र नहीं आया। मित्रों, हितैषियों और शुभचिन्तकों की इतनी बड़ी तादाद है कि मैं उनका व्यक्तितगत रूप से आभार नहीं प्रकट कर सकता।

अंत में जगजीतसिंह के शब्दों में केवल इतना ही कहूँगा –

तुमको देखा तो ये ख़याल आया

ज़िंदगी धूप, तुम घना साया।।

आभार, शुक्रिया, धन्यवाद। बारम्बार ….

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३१ – आदिम से आदिम तक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३१ आदिम से आदिम तक… ?

मनुष्य जंगल में रहता था। शिकार के लिए संघर्ष होता था। स्वाभाविक है कि शस्त्र के रूप में पत्थर और लकड़ी का प्रयोग होता होगा।  मनुष्य ने विकास की राह पर कदम बढ़ाए। आदिम से आधुनिक होने की सतत यात्रा की।

इस यात्रा में मनुष्य ने बस्तियाँ बसाई। बस्तियों से गाँव, गाँव से नगर बने। नागरी सभ्यता का उदय हुआ। अकेला-दुकेला रहने वाला मनुष्य समूह में बसने लगा, समाज बना। तथापि संसाधनों के केंद्रीकरण के चलते संग्रह की वृत्ति जन्मी, लालच पनपा। इसने न केवल संघर्ष को बढ़ाया, अपितु द्वंद्व के नए आयाम भी खोले। मनुष्यजीवन के केंद्र में पैसा आता गया। धन संपदा, संसाधनों पर अधिकार जमाए रखने की वृत्ति बढ़ती गई, समर तीव्र होता गया।

संघर्ष की परिधि बढ़ी तो पत्थर, डंडे से आगे बढ़कर मनुष्य ने तलवारें विकसित की। फिर तो एक दूसरे को मारने- काटने के लिए विनाश का खून मुँह लग गया। गोली-गोले ढाले जाने लगे, मनुष्य द्वारा मनुष्य पर दागे जाने लगे। दो लोगों की सिर फुटव्वल में एक की अधिक हानि होती थी, अब हानि सामूहिक होने लगी। शत्रु का संहार, भीषण  नरसंहार में बदलने लगा।

विज्ञान का विकास और विस्तार हुआ। आदमी का आदिम और निखरा। अब ‘मास डिस्ट्रक्शन’ या बड़ी संख्या में मनुष्य को एक साथ मौत के घाट उतार देने के साधन तैयार हुए।

मनुष्य- मनुष्य में होने वाला संघर्ष, दो समूहों में होने वाले युद्ध से होते हुए विभिन्न राष्ट्रों के आपसी  संग्राम तक आ पहुँचा।

फिर उन्नीसवीं सदी आई । बड़ी संख्या में विश्व के राष्ट्र एक दूसरे से उलझे। यह प्रथम विश्वयुद्ध था। इस विश्वयुद्ध ने डेढ़ करोड़ से अधिक लोगों की बलि ली।

दो दशक बीतते-बीतते, विनाश के अजगर ने फिर अपना मुँह खोला। द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। येन केन प्रकारेण विजय प्राप्त करना ही इसका अंतिम ध्येय था। इस बार मनुष्य पर परमाणु बम का परीक्षण किया गया। इस विनाश के साक्ष्य के रूप में पूरे शहर में जलकर खाक हुए और कुछ अधजले पेड़ बचे रहे, बाकी पूरा शहर मर गया।

आदमी के भीतर का आदमी मरता रहा, आज भी मर रहा है। कहा गया कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। संसार की महाशक्तियों को लगा कि पहले तेल पर तो आधिपत्य जमा लें, फिर पानी पर सोचा जाएगा।

अस्त्र-शस्त्र अब इतने संहारक हो चले कि एक रात में एक पूरी सभ्यता को नष्ट करने की चेतावनी दी जाने लगी। आदमी के विकराल आदिम को देखते हुए इस चेतावनी के सच सिद्ध होने की आशंका सदा बनी रहती है। आदमी की विडंबना और विसंगति देखिए कि किसी की आशंका, किसी के लिए संभावना भी होती है।

आदमी ने अपनी सूझबूझ से जंगल से महानगर तक यात्रा की। ज़मीन को अपने कब्जे में लिया, अंतरिक्ष को घातक हथियारों से पाट दिया समुद्र के गर्भ में विनाश बो दिया। बाहर से आधुनिक होने की यात्रा में भीतर का आदिम निखरता रहा।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लकड़ियों से लड़ा जाएगा। सभ्यता नष्ट करने का आसुरी उन्माद यह स्थिति ला भी सकता है कि हमारी कथित सभ्य प्रजाति ही नष्ट हो जाए।  जब हथियारों के उपयोग से प्रजाति नष्ट हो जाएगी तो नये हथियार ढालने वाले भी नष्ट हो जाएँगे। साधनहीन बचे- खुचे लोग जंगलों में रहने लगेंगे। इसके बाद आगे जब कभी संघर्ष होगा तो फिर वही पत्थर, वही लकड़ियाँ साधन बनेंगे।

आदिम से आदिम की इस यात्रा के असंख्य आयाम हैं। इन आयामों पर हर विचारवान को अपने-अपने ढंग से चिंतन करना चाहिए। इस चिंतन से कोई समाधान निकल कर आ सके तो मनुष्य जाति पर बड़ा उपकार होगा।

© संजय भारद्वाज 

प्रातः 7:31 बजे, 11 अप्रैल 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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