(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८७ ☆ देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆
उपरोक्त चित्र वर्षा ऋतु में होने वाली वर्षा से ठंडे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रभावित करता हुआ बता रहा हैं।अब समय बदल चुका हैं।हम सब तो प्रकृति के विरुद्ध शंखनाद बजा चुके हैं। सर्दी के मौसम में रजाई में बैठ कर हीटर की गर्मी के पूरे मज़े लेने के लिए आइसक्रीम खाना आम बात हो चुकी है।
छाता खरीद कर अब लोग आइसक्रीम खाते हैं, इससे छाता विक्रेता भी खुश रहता है, और आइसक्रीम विक्रेता भी खुश। हम सब ने प्रकृति को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
कोल्ड ड्रिंक आदि ठंडे पेय का अब कभी भी ऑफ सीज़न नहीं होता है। ठंड में विवाह के समय मुफ्त के गर्म गुलाब जामुन के साथ वनिला आइसक्रीम की जुगलबंदी कुछ दशकों से लोक प्रिय हो चुकी हैं। गर्म खाद्य पदार्थ के बाद चिल्ड पानी पीना हो या ठंडी बियर के बाद गरमा गर्म मुर्गा हलक से नीचे करने में हमारा स्वास्थ्य भी खराब नहीं होता है।
हमारा शरीर भी विचार करता होगा, हमें क्या जो करेगा वो ही ना भरेगा। रोग होने पर मौसम और हवा पर दोषारोपण कर हम पाक साफ बन जाते हैं।
साठ के दशक यानि हमारे बचपन की बाते यदि आज के किसी जेन ज़ी से करो तो उल्टा जवाब मिलता है, “यू ओल्डीज़” हमेशा आदि मानव की तरह क्यों बिहेव करते हैं?
हमारी दादी तो गर्म भोजन करने के पश्चात तुरंत ठंडे जल से हाथ तक धोने के लिए मना करती थी। किसी भी मौसम में बाहर से घर प्रवेश के दस मिनट के बाद ही साधारण जल तक ग्रहण करने दिया जाता था। कारण पूछने पर परिवार के बड़े, बाहर और घर के टेम्प्रेचर के अंतर को शरीर को एडजेस्ट करने का कूलिंग पीरियड बता कर घर के छोटे बच्चों की जिज्ञासा को वैज्ञानिक तथ्य से शांत कर दिया करते थे। आज की युवा पीढ़ी तो गूगल की दलीलों से बुजर्गों की खिल्ली उड़ा देते हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अट्टहास…“।)
अभी अभी # १०६८ ⇒ आलेख – अट्टहास श्री प्रदीप शर्मा
(HEE HAW )
हँसने के कई तरीके होते हैं। जब हँसी छूटती है, तब वह भीड़ की तरह दिशाहीन होती है। कहीं मंद मंद हँसी, तो कहीं हँसी के फव्वारे। कभी कभी तो भरे हुए बादलों की तरह हँसी फूट पड़ती है। आखिर हँसी में ऐसा क्या है, कि जब यह वेग में होती है, तो रोके नहीं रुकती।
हमारे अंदर गम और खुशी के गोदाम हैं, आप चाहें तो उन्हें गोडाउन भी कह सकते हैं। गोदाम अक्सर भरते रहते हैं, और खाली होते रहते हैं। आजकल इन्हें कोल्ड स्टोरेज भी कहा जाने लगा है। जब चीजों के दाम बढ़ते हैं, तब गोदाम भरे रहते हैं, और जब चीज़ों के दाम घटने लगते हैं, तो गोदाम खाली होते चले जाते हैं। गोदाम का भरना और खाली होना, वस्तुओं के दाम बढ़ने और घटने, से जुड़ा रहता है। दाम के अप और डाउन होने, अर्थात् घटने बढ़ने से गोडाउन की सेहत पर असर पड़ता है।।
हँसना सेहत के लिए अच्छा है। सेहत सुधारने के लिए आजकल लोग हेल्थ क्लब की तरह लाफ्टर क्लब भी जाने लग गए हैं। रोना तो इंसान जन्मजात लेकर आया है, लेकिन वह बड़ा होकर हँसना भूल गया है। हँसने की कोचिंग क्लास है लाफिंग क्लब, जहां हँसना सिखाया जाता है।
गम के गोदाम अक्सर भरे हुए ही रहते हैं और खुशी के खाली, क्योंकि गम के खरीददार कम होते हैं, और खुशी तो इंसान हर कीमत पर खरीदने को तैयार होता है। पहले खुशी खरीदने के लिए ढेर सारा पैसा लेकर बाजार जाना पड़ता था, आजकल खुशी भी ऑनलाइन पेमेंट पर अमेजान और फ्लिपकार्ट पर चढ़कर घर चली आती है। गम पर डिस्काउंट बढ़ता जा रहा है, पर कोई खरीद नहीं रहा। खुशी, लोग खुशी खुशी अपने घर ले जा रहे हैं।।
हँसना, खुशी जाहिर करने का पारंपरिक तरीका है। यूं तो हँसी के कई भेद हैं, लेकिन प्रमुख भेद पुरुष और स्त्री की हँसी का है। महिलाएँ, हँसती नहीं, खिलखिलाती हैं। लगता है, कहीं घंटियाँ बज रही हों।
चूड़ी की खनक और पायल की झंकार उनकी हँसी में शामिल होती है, क्योंकि ईश्वर ने उनके गले में सुर और स्वर दिया है।
पुरुष का स्वर खुरदुरा होता है क्योंकि रिश्ते में वे किसी के बाप लगते हैं। जितनी मोटी आवाज़, उतनी ही मर्दानी आवाज़ और ऊपर से हँसी के ठहाके। हा, हा, हि ही और हु हू की पूरी बारहखड़ी हं, ह:, ह : ह :। बिना कुछ कहे, कहकहे ही कहकहे के ऐसे फव्वारे छूटते हैं, कि लोग भीग जाने के अंदेशे से, चार कदम दूर ही खड़े रहते हैं।।
एक और धांसू हँसी होती है, जिसे अट्टहास कहते हैं। अट्टहास शब्द से ही ऐसा प्रतीत होता है, मानो अचानक कोई चट्टान की हँसी फूट पड़ी हो। हमारे धार्मिक सीरियल में अक्सर राक्षसों को हँसते हुए दिखाया जाता है। वह हँसी थमने का नाम ही नहीं लेती। हर एक दो डायलॉग के बाद फिर वही हँसी का टेप। आप इस हँसी को अट्टहास का परिहास भी कह सकते हैं, क्योंकि इस हँसी पर किसी को हँसी नहीं आती।
कभी कभी हँसते हँसते भी, आँखों में आँसू निकल आते हैं तो कभी रोते रोते भी हँसी निकल आती है। हँसना, रोना सहजता की निशानी है। किसी बात पर हँसना, किसी घटना पर हँसना अथवा परिस्थिति पर हँसना बुरा नहीं लेकिन किसी पर हँसना मना है। जो झरने की तरह फूटे, वह हँसी। फिर चाहे वह ठहाका हो, कहकहा हो, या फिर अट्टहास। लेकिन इस बात का जरूर रखें खयाल, कोई बीमार, दुखी, लाचार ना हो आसपास।।
खुशियों में शामिल हों, लोगों को अपनी खुशी में शामिल करें। गम के गोदाम खाली पड़े रहें, खुशियों को कैद ना करें, आज़ाद करें। सुना है खुशी बांटने से बढ़ती है और हँसी की फुहार भी तो रंगबिरंगी होली की फुहार ही होती है। जिस चेहरे पर हंसी ना,
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४८ ☆ दो किनारे…
लोग प्राय: कहते हैं कि हमारा / उनका / फलां का प्रेम नदी के दो किनारो की तरह है, जो साथ बहता तो है, समानांतर चलता तो है पर आपस में कभी मिल नहीं पाता। ध्यान देना, नदी के दो किनारे आपस में जुड़े होते हैं अपनी लहरों, अपने प्रवाह, अपने भीतर के बहाव अर्थात जलराशि के माध्यम से। कभी देखा तुमने कि एक किनारा पूर्व की ओर बढ़ रहा हो और दूसरा पश्चिम की ओर। वे आजीवन साथ चलते हैं, जलराशि उन्हें जोड़े रखती है, अंतर्भूत भावनाओं की तरह। दो तटों के बीच एक अनदेखा सेतु बना रहता है। एक किनारे यदि थपेड़े बढ़ते हैं तो दूसरा किनारा उसे संतुलित करने का प्रयास करता है। दूसरी ओर थपेड़े बढ़ते हैं तो पहला संतुलन की भूमिका में आ जाता है। आशंका, संभावना सबको मिलकर थाम लेते हैं दोनों किनारे।
भीतर तूफान के थपेड़े,
बाहर सैलानियों के फेरे,
आशंका-संभावना में
समन्वय साधे रखता है,
कितने अंतर्विरोधों को
हर तट थामे रखता है..!
इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि सच्चा प्रेम यही है। सच्चा प्रेम एक दूसरे का साथ निभाने में, एक दूसरे के प्रति मोहित रहने में, साथ चलने में है। कुछ हद तक विरह में है। ऐसा इसलिए कि मिलन के बाद होता है विकर्षण पर विरह में बना रहता है सदैव परस्पर आकर्षण।
ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि का वरदान दिया है। विचार करना कि दोनों किनारे यदि मिलकर एक हो जाएँ तो एक पतली-सी जलधारा तो होंगे पर नदी नहीं हो सकते। नदी का पाट किनारों के विस्तार का पाठ है।नदी किनारे बस्तियाँ बसती हैं, नदी किनारे सभ्यताएँ पनपती हैं। नदी में मछलियों का वास है, नदी में छोटे-बड़े जीव जंतुओं का अधिवास है। नदी जल का स्रोत है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। कल्पना कीजिएगा, नदियाँ नहीं होतीं तो मनुष्य का जीवन कैसा होता? कल्पना को पीछे छोड़ता यथार्थ तो यह है कि नदी या जलस्रोत के अभाव में जीवन संभव भी नहीं होता।
और जीवन क्या है? दर्शन कहता है, जीवन अद्वैत का जागरण है। अद्वैत जीवन में प्रेम को जगाता है। और प्रेम का अर्थ केवल मिलन नहीं होता। यूँ मिलन किसे कहते हो तुम? पार्थिव मिलन ही यदि मिलन की परिभाषा होती तो फिर विरह का अस्तित्व कैसे होता? विरह में भी सूक्ष्म का मिलन तो समाहित है ही न! स्मरण रखना, प्रेम बहुआयामी होता है, एकांगी नहीं।
नदी के दो किनारे प्रेम के शाश्वत प्रतीक हैं। सच्चा प्रेम वही है जिसमें साथ चलें, समानांतर चलें, एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें। सृष्टि को कुछ दे सकें, जगत से जो पाया, उसका कुछ अंश लौटा सकें। जगत में प्रेम-संजीवनी बनकर बह सको, बिना किसी अपेक्षा के निरंतर चल सको तो जीवन कल-कल बहती सार्थकता में परिवर्तित हो जाता है। जीवन के किनारे रह जाना है या किनारा बनकर पाट का पाठ पढ़ना और पढ़ाना है, इसका निर्णय तुम्हें स्वयं करना है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उंगलियों का अंक गणित…“।)
अभी अभी # १०६७ ⇒ आलेख – उंगलियों का अंक गणित श्री प्रदीप शर्मा
हम आज न तो हाथों की चंद लकीरों का जिक्र करेंगे और न ही आसन, प्राणायाम से जुड़ी मुद्राओं का, हमारे दोनों हाथों की दस उंगलियों का सीधा सादा गणित है यह, जिसका न तो सामुद्रिक शास्त्र से कुछ लेना देना है, और न ही हस्त रेखा और ज्योतिष अथवा एक्यूप्रेशर से।
जिन उंगलियों पर आज नारियां पुरुषों को नचा रही हैं, कभी उन उंगलियों पर बचपन में हमने गिनती सीखी है, जोड़ना घटाना सीखा है। कहने को हमारी उंगलियां पांच हैं, लेकिन हर उंगली के बीच तीन आड़ी लकीरें हैं, और दाहिने अंगूठे के बीच चार। वैसे जरूरी नहीं, आपके हाथ में भी ऐसा ही हो। जोड़ने वाले इसे किसी भी विज्ञान से जोड़ें, हम तो मुट्ठी बांधते हैं और खोलते हैं, जहां जहां से उंगलियां मुड़ती हैं, वहां लकीरें स्वाभाविक रूप से ही बन जाती हैं।।
हमने इन उंगलियों पर दिन रात गिने हैं, सप्ताह के दिन गिने हैं, इंतजार के दिन गिने हैं और बैंक की नौकरी में इन्हीं उंगलियों से नोट भी गिने है। इन्हीं उंगलियों को हमने कभी कैसियो और हारमोनियम पर नचाया है तो इन्हीं उंगलियों से हमने घंटों टाइपराइटर पर थीसिस भी टाइप की है। हमारे जीवन में हमने कभी किसी पर अनावश्यक उंगली नहीं उठाई और न ही किसी ने कभी हमें उंगली दिखाई।
हमारा अंकों और अक्षरों का ज्ञान पट्टी पेम अर्थात् स्लेट से ही तो शुरू होता था। गिनती के लिए एक लकड़ी अथवा प्लास्टिक का बोर्ड आता था, जिसके अंदर दस पतले तारों के बीच कुछ लकड़ी अथवा प्लास्टिक के मोटे, गोल गोल दाने झूलते रहते थे। हर खाने में दस दाने होते थे। आप उनको हाथ से चलाकर गिन सकते थे। गिनती सीखने का यह बोर्ड एक खिलौना था बच्चों के लिए। फिसलपट्टी की तरह दाने फिसल रहे हैं, एक, दो, तीन, चार और इस तरह गिनती भी सीखी जा रही है, एक से सौ तक। मोतियों की माला की तरह ही तो था यह टेबल बोर्ड।।
स्लेट पट्टी और ऐसे खिलौने छूट गए लेकिन उंगलियों पर गिनने की कला आज भी जारी है। सभी चीजें उंगलियों पर ही तो याद की जाती हैं, आटा, दाल, शकर, माचिस, तेल और बच्चों की मैगी भी खत्म हो गई। क्या क्या याद रखें।
घर के सदस्यों और रिश्तेदारों की लिस्ट तो हम पहले उंगलियों पर ही बनाते थे। तीस तक की संख्या तो उंगलियों के बीच आसानी से समा जाती थी। जब कोई बड़े अंकों वाली संख्या पढ़ने में आती थी, तो उंगलियों पर गिनना पड़ता था, इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, बाप रे, यह तो पच्चीस लाख है।।
हमने बहुत कुछ याद किया है इन उंगलियों पर। हनुमान चालीसा हो अथवा दोहा चौपाई। दादी जी को हमने इन्हीं उंगलियों से माला जपते देखा है। हमने इन्हीं उंगलियों पर अगर समय को नापा है तो पैदल चलते समय, दूरी को भी नापा है। चलते वक्त हम अपने ही कदम उंगलियों पर गिनते जाते हैं। इन उंगलियों पर हमने हजारों तक गिनना सीख लिया है। कितने कदम चलने पर एक किलोमीटर होता है, हमें अच्छी तरह ज्ञात है। आजकल यह काम भी महंगी महंगी घड़ियां कर रही हैं।
कभी जो अपना हाथ जगन्नाथ था, उसके बीच आज एड्रॉयड, डेस्कटॉप और पीसी आ गया है। उंगलियों के साथ आंखें भी व्यस्त हो गई हैं। जो उंगलियां कभी आजाद थी, आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की गुलामी कर रही है। इंसान वर्कोल्हिक और बच्चे भी आपस में ऑनलाइन हो गए हैं। इतना होमवर्क और कितने कंप्यूटर गेम्स, क्या करे बेचारे। आंखों पर चश्मा तो चढ़ना ही है।।
हम किसी पर उंगली नहीं उठा रहे, बस आज भी अपनी उंगलियों का कमाल देखते हैं। इसी उंगली पर किसी ने गोवर्धन पर्वत धारण किया था और समय आने पर सुदर्शन चक्र भी चलाया था। एकलव्य ने गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा भेंट किया था, फिर भी वह अर्जुन जैसा ही धनुर्धर था।
हम भी अगर चाहें तो हमारी पांचों उंगलियां घी में हो सकती हैं, बस अपने सर को कढ़ाई से बचा लीजिए। अनावश्यक कहीं उंगली मत कीजिए, अपनी उंगलियों का सदुपयोग कीजिए। किसी कंप्यूटर से कम नहीं आपकी दसों उंगलियां।।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर छह अंकों की यह शृंखला-
संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (६)
आत्मषटकम् के छठे और अंतिम श्लोक में आदिगुरु शंकराचार्य महाराज आत्मपरिचय को पराकाष्ठा पर ले जाते हैं।
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मैं किसी भिन्नता के बिना, किसी रूप अथवा आकार के बिना, हर वस्तु के अंतर्निहित आधार के रूप में हर स्थान पर उपस्थित हूँ। सभी इंद्रियों की पृष्ठभूमि में मैं ही हूँ। न मैं किसी वस्तु से जुड़ा हूँ, न किसी से मुक्त हूँ। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।
विचार करें, विवेचन करें तो इन चार पंक्तियों में अनेक विलक्षण आयाम दृष्टिगोचर होते हैं। आत्मरूप स्वयं को समस्त संदेहों से परे घोषित करता है। आत्मरूप एक जैसा और एक समान है। वह निश्चल है, हर स्थिति में अविचल है।
आत्मरूप निराकार है अर्थात जिसका कोई आकार नहीं है। सिक्के का दूसरा पहलू है कि आत्मरूप किसी भी आकार में ढल सकता है। आत्मरूप सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित है, सर्वव्यापी है। आत्मरूप में न मुक्ति है, न ही बंधन। वह सदा समता में स्थित है। आत्मरूप किसी वस्तु से जुड़ा नहीं है, साथ ही किसी वस्तु से परे भी नहीं है। वह कहीं नहीं है पर वह है तभी सबकुछ यहीं है।
वस्तुतः मनुष्य स्वयं के आत्मरूप को नहीं जानता और परमात्म को ढूँढ़ने का प्रयास करता है। जगत की इकाई है आत्म। इकाई के बिना दहाई का अस्तित्व नहीं हो सकता। अतः जगत के नियंता से परिचय करने से पूर्व स्वयं से परिचय करना आवश्यक और अनिवार्य है।
मार्ग पर जाते एक साधु ने अपनी परछाई से खेलता बालक देखा। बालक हिलता तो उसकी परछाई हिलती। बालक दौड़ता तो परछाई दौड़ती। बालक उठता-बैठता, जैसा करता स्वाभाविक था कि परछाई की प्रतिक्रिया भी वैसी होती। बालक को आनंद तो आया पर अब वह परछाई को प्राप्त करना का प्रयास करने लगा। वह बार-बार परछाई को पकड़ने का प्रयास करता पर परछाई पकड़ में नहीं आती। हताश बालक रोने लगा। फिर एकाएक जाने क्या हुआ कि बालक ने अपना हाथ अपने सिर पर रख दिया। परछाई का सिर पकड़ में आ गया। बालक तो हँसने लगा पर साधु महाराज रोने लगे।
जाकर बालक के चरणों में अपना माथा टेक दिया। कहा, “गुरुवर, आज तक मैं परमात्म को बाहर खोजता रहा पर आज आत्मरूप का दर्शन करा अपने मुझे मार्ग दिखा दिया।”
आत्मषटकम् मनुष्य को संभ्रम के पार ले जाता है, भीतर के अपरंपार से मिलाता है। अपने प्रकाश का, अपनी ज्योति की साक्षी में दर्शन कराता है।
इसी दर्शन द्वारा आत्मषटकम् से निर्वाणषटकम् की यात्रा पूरी होती है। निर्वाण का अर्थ है, शून्य, निश्चल, शांत, समापन। हरेक स्थान पर स्वयं को पाना पर स्वयं कहीं न होना। मृत्यु तो हरेक की होती है, निर्वाण बिरले ही पाते हैं।
षटकम् के शब्दों को पढ़ना सरल है। इसके शाब्दिक अर्थ को जानना तुलनात्मक रूप से कठिन। भावार्थ को जानना इससे आगे की यात्रा है, मीमांसा कर पाने का साहस उससे आगे की कठिन सीढ़ी है पर इन सब से बहुत आगे है आत्मषट्कम् को निर्वाणषटकम् के रूप में अपना लेना। अपना निर्वाण प्राप्त कर लेना। यदि निर्वाण तक पहुँच गए तो शेष जीवन में अशेष क्या रह जाएगा? ब्रह्मांड के अशेष तक पहुँचने का एक ही माध्यम है, दृष्टि में शिव को उतारना, सृष्टि में शिव को निहारना और कह उठना, शिवोऽहम्…!
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मौसा जी और फूफा जी…“।)
अभी अभी # १०६६ ⇒ आलेख – मौसा जी और फूफा जी श्री प्रदीप शर्मा
रिश्ते में हम आपके फूफा लगते हैं ! मैं नहीं जानता ये बेचारे मौसा जी और फूफा जी इतने बदनाम क्यों है। हर बारात में ये प्राणी किसी असंतुष्ट व्यक्ति की तरह व्यवहार क्यूं करते हैं। कहा गया है न, बद अच्छा, बदनाम बुरा। मैने अच्छे मौसा और उनसे भी अच्छे फूफा देखे हैं, लेकिन कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। छोड़ो बेकार की बातें, तुम रूठ ना जाओ बहना।
मैं आज तक यह समझ नहीं पाया, रिश्ते बन जाते हैं, अथवा बनाए जाते हैं।
बात आपके पैदा होने से शुरू होती है। आप पैदा होते हैं, अथवा पैदा किए जाते हैं। मुझे संस्कृत नहीं आती, इसलिए मैं किसी के चरित्र अथवा भाग्य पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, लेकिन मुझे लगता है, यह पुरुषार्थ और भाग्य का मिला जुला खेल है।।
आप अगर एक बार पैदा हो गए, तो पैकेज में माता पिता के साथ कुछ रिश्ते तो ईश्वर छप्पर फाड़कर दे ही देता है और कुछ रिश्ते आप अपने पुरुषार्थ और भाग्य के बल पर बना ही लेते हैं। भाई बहन, नाना नानी, दादा दादी, ताऊ ताई जी और चाचा चाची तो इनबिल्ट होते ही हैं, मौसा मौसी और फूफा फूफी का भी स्पेशल पैकेज होता है। फूफी को आप सुविधा के लिए बुआ कह सकते हैं, लेकिन फूफा जी टस से मस नहीं हो सकते।
मासी तो हम सभी जानते हैं, मां सी ही होती है लेकिन मौसा जी की कोई गारंटी
नहीं होती। लोग तो बिल्ली को भी शेर की मौसी कहते हैं, लेकिन मौसा जी कहीं नजर नहीं आते। रंगा बिल्ला जितनी भी इज्जत नहीं बिल्ली मौसी के पति महोदय की।।
अंग्रेजी में एक कहावत है, मैं चाहूं तो इस बहाने अंग्रेजी झाड़ सकता हूं, लेकिन उसे हिंदी में बयां कर मैं अपना बड़प्पन भी तो प्रदर्शित कर सकता हूं।
कुछ लोग महान होते हैं, और कुछ लोगों पर महानता थौंपी जाती है। मैं मौसा जी तो बहुत पहले से ही था, अभी कुछ दिन पहले किसी रिश्तेदार बच्ची ने मुझे फूफा जी का खिताब भी दे ही दिया। अब मैं भी सोफा कम बेड की तरह मौसा कम फूफा बन गया हूं।
अपने इस रिश्ते के अनुरूप मैं भी बहुत कोशिश करता हूं विवाह के अवसरों पर असंतुष्ट रहने की, सदैव मुंह फुलाने की, रूठ जाने की और भोजन नहीं खाने की। लेकिन अनुभव की कमी और पत्नी के असहयोग के कारण न तो कहीं मेरी दाल गली और न ही कहीं मैं ढंग से रायता ही फैला पाया।।
जब दुनिया के मौसाओं और फूफाओं को देखता हूं तो मुझे बड़ी ग्लानि होती है और हीनता का अहसास होता है। गजब का स्टैमिना होता है इन लोगों का। कभी लिफाफे में नेग के पचास रूपये देखकर बिखर जाना। क्या भिखारी समझ रखा है हमें। और अगर किसी मनचले ने छेड़ दिया, तो क्या हजार रुपए की औकात है आपकी ! बस, फिर तो बात हजार पर जाकर ही बन पाती है। सुंदरकांड के बीच यह एक और नया कांड ! बेचारी बुआ जी कैसे झेल लेती हैं ऐसे इंसान को।
मुझे डर है कहीं बढ़ती शिक्षा, समझदारी और परिपक्वता के चलते मौसाओं और फूफाओं की यह रूठने मनाने की विरासत समय के साथ लुप्त ना हो जाए। महिला संगीत की तरह ये भी मंगल प्रसंग के अभिन्न अंग हैं। भावी मौसाओं और फूफाओं को अब यह उत्तरदायित्व उसी जिम्मेदारी के साथ वहन करना होगा।
भले ही मुंह पर नहीं बोलते होंगे, लेकिन पीठ पीछे तो हमारे भी गुणगान होते ही होंगे। वैसे हम इतने खूसट हैं नहीं, जितने दिखाई देते हैं। आग्रह के कच्चे और मनुहार के पक्के होने के कारण हमारे मौसापने और फूफापने का कुछ पता ही नहीं चलता। समय के साथ अच्छी सेवाओं का आश्वासन तो फिर भी दिया ही जा सकता है। समझदार को इशारा काफी है।।
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान।)
☆ आलेख – जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
एक ही समयावधि में पैदा हुए और लगभग एक साथ बड़े हुए लोगों का समूह जनरेशन ( पीढ़ी ) कहा जाता है। आमतौर पर पन्द्रह से पच्चीस साल के अंतराल में पैदा हुए लोग एक पीढ़ी माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने बचपन, स्कूल, तकनीक और सामाजिक बदलाव एक साथ देखे होते हैं। इनकी आदतें, भाषा, फैशन, सोचने का ढंग अक्सर मिलता-जुलता होता है। परिवार के स्तर पर पीढ़ी का स्तेमाल- दादा- दादी की पीढ़ी, माता-पिता की पीढ़ी, बच्चों की पीढ़ी के रूप में किया जाता है। समय और जन्म समय के आधार पर जनरेशन ( पीढ़ी ) के प्रमुख प्रकार बेबी बूमर्स, जनरेशन एक्स और मिलेनियल्स हैं। प्रत्येक पीढ़ी को एक खास समय सीमा और ऐतिहासिक माहौल से पहचाना जाता है, उदाहरणार्थ– साइलेंट जनरेशन ( 1928- 1945 ), बेबी बूमर्स ( 1946- 1964 ), जनरेशन एक्स ( 1965- 1980 ), मिलेनियल्स ( 1981-1996), जनरेशन जी ( 1997-2012 ), जनरेशन बीटा ( 2025- 2039 ) आदि।
जेन जी से तात्पर्य जनरेशन जैड है। ये उन लोगों की पीढ़ी है, जो 1997 से 2012 ई० के बीच पैदा हुए हैं। बेबी बूमर्स, जेन एक्स, मिलेनियल्स के बाद अल्फावेट में जैड आया, इसीलिए इसे जनरेशन जैड कहा गया, इसे जूमर्स भी बोलते हैं तथा जेन एल्फा से तात्पर्य ये वो लोग हैं जो लगभग 2010 से 2026 ई० के बीच पैदा हुए। ये पीढ़ी जन्म से ही इन्टरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों से परिचित रही है, इसलिए इसे डिजिटल नेटिव भी कहा जाता है। जेन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके पास ज्ञान के अनगिनत स्रोत उपलब्ध हैं किन्तु उसी के अनुपात में वह मानसिक दबाव, अकेलेपन,तुलना, भविष्य की अनिश्चितता और पहचान के संकट से जूझ रही है। बाह्य रूप से आत्मविश्वासी दिखाई देने वाली पीढ़ी अंदर से चिंता, अवसाद, तनाव, डिजिटल लत जैसी मानसिक समस्याओं का सामना कर रही है। सामाजिक अलगाव से आभासी दुनिया में तो ये सक्रिय दिखाई देते हैं किन्तु वास्तविक जीवन में अकेलापन अनुभव करते हैं।
आज अधिकांश युवा अपने जीवन की तुलना दूसरों की उपलब्धियों से करने लगे हैं। इन्स्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक पर दिखाई देने वाला जीवन वास्तविक चित्र नहीं होता, उसका सम्पादित स्वरूप होता है फिर भी युवा उसी को आदर्श मान लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनका आत्मविश्वास घटता है, स्वयं को असफल समझने लगते हैं, हीन भावना विकसित होने लगती है। डिजिटल एडिक्शन से इनको नींद कम आती है, सामाजिक सम्बन्ध कमजोर होते हैं। जेन जी ऐसे समय में शिक्षा प्राप्त कर रही है, जहाँ प्रतियोगिताएँ अत्यन्त तीव्र हैं। अधिक अंक, बेहतर काॅलेज, श्रेष्ठ नौकरी, विदेशी शिक्षा की दौड़ मानसिक दबाव उत्पन्न करती है। कैरियर की अनिश्चितता के कारण युवा लगातार सोचते रहते हैं कि कौन-सा कौशल सीखें? भविष्य में रोजगार मिलेगा या नहीं? माता-पिता व्यस्त हैं, बच्चे मोबाइल पर हैं, भोजन अलग-अलग समय पर होने से भावनात्मक संवाद कमजोर हो रहा है।
सोशल मीडिया जेन जी के जीवन का मुख्य अंग बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी शिक्षा, रोजगार और रचनात्मकता के क्षेत्र में नयी सम्भावनाएँ खोलीं हैं। कई युवा यह सोचकर चिंतित रहते हैं कि भविष्य में मशीनें कहीं उनके कार्य का स्थान न ले लें, इसलिए आवश्यक है कि युवाओं में सृजनात्मक आलोचनात्मक चिंतन तथा मानवीय संवेदनाओं का विकास किया जाए। विद्यालय- महाविद्यालय स्तर पर नियमित मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाएँ। परिवार युवा के मानसिक स्वास्थ्य का सबसे मजबूत आधार होता है। जेन जी को भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की भी आवश्यकता होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की बातें धैर्यपूर्वक सुनें, उनकी तुलना अन्य बच्चों से न करें, केवल अंक के आधार पर उनका मूल्यांकन न करें। भोजन, भ्रमण और पारिवारिक गतिविधियों के लिए नियमित समय निकालें। डिजिटल क्रांति के बाद अशोभनीय या आयु अनुपयुक्त यौन सामग्री अत्यन्त सरल बना दी गई है, जो उनकी आयु और मानसिक परिपक्वता के अनुकूल नहीं होता। कई बार जिज्ञासा, साथियों का प्रभाव आदि के कारण बच्चे ऐसी सामग्री के सम्पर्क में आ जाते हैं। इस चुनौती का समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं अपितु संवाद में निहित है। माता-पिता को बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण सम्बन्ध विकसित करके उन्हें आत्मसंयम से समृद्घ करना होगा। शिक्षा, सरकार, परिवार व समाज सभी की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे इस दिशा में सकारात्मक वातावरण तैयार करें।
भारत में जेन जी दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या है। ये वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी हैं, अत: भारतीय संस्कृति के अनुरूप इनको मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलन पर बल देना ही होगा। योग, प्राणायाम, ध्यान, नियमित दिनचर्या, सत्संग, संगीत और प्रकृति के निकट ले जाना होगा, जो तनाव कम करने तथा भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। परिवार संवेदनशील बनें, विद्यालय सहयोगी हों, समाज कलंकमुक्त दृष्टिकोण अपनाए और सरकार मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराए तो जेन जी की अपार क्षमता राष्ट्र निर्माण में प्रभावी योगदान दे सकती है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर छह अंकों की यह शृंखला-
संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (५)
आत्मषटकम् पर मनन-चिंतन की प्रक्रिया में आज पाँचवें श्लोक पर विचार करेंगे। अपने परिचय के क्रम में अगला आयाम आदिगुरु शंकराचार्य कुछ यूँ रखते हैं,
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बंधुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।
इसका शाब्दिक अर्थ है कि न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है। न मेरा कोई पिता है, न कोई माता है, न ही मेरा जन्म हुआ है। न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु है और न ही कोई शिष्य। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।
मृत्यु के संदर्भ में देखें तो शंकराचार्य जी महाराज के कथन से स्पष्ट है कि देह छूटना आशंका नहीं होना चाहिए। यों भी यात्रा में पड़ाव आशंका नहीं हो सकता। यात्रा तो परमात्मा के अंश की है, यात्रा आत्मा की है। यात्रा के सनातन और यात्री के शाश्वत होने का प्रसंग आए और योगेश्वर उवाच, स्मृति में न आए, यह संभव ही नहीं। भगवान गीतोपदेश में कहते हैं,
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
आत्मा का किसी भी काल में न जन्म होता है और न ही मृत्यु। यह पूर्व न होकर, पुनः न रहनेवाला भी नहीं है। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।
मैं मृत्यु नहीं हूँ, अत: स्वाभाविक है कि जन्म भी नहीं हूँ। जो कभी जन्मा ही नहीं, वह मरेगा कैसे? जो कभी मरा ही नहीं, वह जन्मेगा कैसे?..ओशो की समाधि पर लिखा है, ‘नेवर बॉर्न, नेवर डाइड, ऑनली विज़िटेड दिस प्लानेट अर्थ बिटविन….’ उन्होंने न कभी जन्म लिया, न उनकी कभी मृत्यु हुई। वे केवल फलां तिथि से फलां तिथि तक सौरग्रह धरती पर रहे।’
विचार करें तो बस यही अवस्था न्यूनाधिक हर जीवात्मा की है। स्पष्ट है कि केवल जन्म और मृत्यु तक सीमित रखकर जीवन नहीं देखा जा सकता।
पिता न होना अर्थात किसीके जन्म का कारक न बनना और माता न होना अर्थात किसीको जन्म देने का कारण न होना। जन्म से मृत्यु तक जीवात्मा द्वारा देह धारण करने का कारण और कारक परमात्मा ही हैं। प्राप्त देह, यात्रा की निमित्त मात्र है।
न मार्ग का दर्शन, न मार्ग का अनुसरण.., न गुरु होना, न शिष्य होना। बंधु, मित्र न होना, रक्त का या परिचय का सम्बंध न होना। जगत के सम्बंधों तक सीमित नहीं है अस्तित्व। माता, पिता, गुरु, शिष्य, बंधु, मित्र इहलोक के नश्वर सम्बंध हैं जबकि जीवात्मा ईश्वर का आंशिक अवतरण है।
जातिभेद का उल्लेख करते हुए आदिगुरु स्पष्ट करते हैं कि मैं न कुलविशेष तक सीमित हूँ, न ही वंशविशेष हूँ। ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ …जाति का एक अर्थ उत्पत्ति भी है। जीवात्मा उत्पत्ति और विनाश से परे है।
जीवात्मा अपरिमेय संभावना है जिसे देह और मर्त्यलोक की आशंका तक सीमित कर हम अपने अस्तित्व को भूल रहे हैं। अपनी एक रचना स्मरण आ रही है,
संभावना क्षीण थी, आशंका घोर,
बायीं ओर से उठाकर
आशंका के सारे शून्य,
धर दिये संभावना के दाहिनी ओर..,
गणना की संभावना खो गई,
संभावना अपरिमेय हो गई..!
मनुष्य अपने अस्तित्व की अपरिमेय संभावनाओं को पढ़ने लगे तो कह उठेगा,..’मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ,…शिवोऽहम्।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ आलेख ☆ ~ वाकई लेखक होना गौरव की बात है ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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आज बड़ी तेज बरसात हो रही थी। ऑफिस पहुंचने में विलंब तो हो ही रहा था, लेकिन किया ही क्या जा सकता था। बेटे ने कार स्टार्ट की और यह कहते हुए कि – “पापा, बरसात तेज हो रही है मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आता हूँ। आप कार चला कर जा सकते हो लेकिन उम्र के लिहाज से और जब इतनी बरसात हो रही हो, सड़कें पानी से लबालब भरी हों, तो आपको कार से जाना उचित नहीं है।”
मेट्रो रेल ही सिर्फ ऐसा साधन है जिससे आप, भीषण बारिश, भारी जाम के बावजूद भी निश्चित समय में लखनऊ के एक छोर एयरपोर्ट से इंदिरानगर के मुंशी पुलिया तक आप जा सकते हैं।
“पापा, यदि बिलम्ब हो रहा तो आप मेट्रो से ही चले जाइये, समय से पहुंचने की गारंटी मेट्रो के सिवाय कोई दूसरा नहीं देगा। आप बिना किसी तनाव के अपने ऑफिस समय से पहुंच सकेंगे।”
मुझे उसका सुझाव बिल्कुल अच्छा लगा। अपने आगामी उपन्यास के कुछ पंक्तियों को मन में संजोये मै कार में बैठा और टीपी नगर मेट्रो स्टेशन पहुँच गया। लेखक अपने मन के अंदर आए भाव को एक झटके में कलम से कागज़ पर उतार देना चाहता है, ऐसा एक लेखक की फितरत होती है। मन में आयी पंक्तियां कहीं विस्मृति न हो जाए, मैं मेट्रो में बैठने के साथ ही फोन के स्क्रीन की ओर मुँह करके बकबकाना शुरू कर दिया। मैं धारा प्रवाह बोल रहा था, मोबाइल के नोटपैड पर मेरे अगले भोजपुरी उपन्यास का कथानक बड़ी ही मस्ती के साथ अपना स्थान बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे। मैं अपनी धुन में इतना मगन था कि मैं बायें -दाएँ कुछ भी नही देख रहा था कि लोग क्या सोचते होंगे या मेरा उपहास कर रहे होंगे।
इस आलेख के बीच में लेखन और उसके लेखन के विषय में एक बात कहता चलूँ, नहीं तो यह बात भूल जाएगी –
“कभी-कभी तो लेखकों को यह कहते सुनता हूँ। भाई मैं नही लिखता हूँ, वह जो ऊपर वाला है वह लिखवाता है। यह ऊपर से ही उतरता है। मुझे इस विषय में बहुत ज्यादा नहीं कहना क्योंकि सच में होता तो वही है जो ऊपर वाला चाहता है। लेकिन यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति सी लगती है। दरअसल जब लेखक की दृष्टि किसी एक चीज पर म एकाग्र भाव के साथ पड़ती है, और उस विषय में दिल और दिमाग़ दोनों एक साथ समन्वय स्थापित करते हैं, तब मन के भीतर उस विषय पर एक कहानी, कविता और उपन्यास रचने के लिए भाव प्रकट हो उठते हैं। शब्दों की तेज बौछार शुरू हो जाती है जो वाणी और कलम के माध्यम से, वर्षो पहले सिर्फ कागज़ पर और अब कागज या कंप्यूटर मोबाइल के स्क्रीन पर छपने लगते है। यानि ये शब्द भाव ऊपर से न उतरकर, मन के अंदर से निकलतें है। लेखक समय, परिस्थिति अपने इर्द-गिर्द के वातावरण- जैसे दिल तक पहुंची गहरी चोट, खुशी से उछल कर बाहर निकल आने वाले दिल, क्या दिन थे वे, होगा क्या आगे, कहीं गम -कहीं खुशी, ब्रह्मांड में चमकते तारे, पहाड़ों से निकलती नदियां, झुरमुट में छुप कर बैठे हुए जीव, गांव की मिट्टी की भीनी भीनी सुगंध, शहर की चमक दमक, ब्रह्म एक है, चौरासी कोटि देव हैं, हमहुँ लिखिबे, हमहुँ लिखव, हमउ लिखेंगे, हमाऊँ भी लिखियै, आम्ही सुद्धा लिहू”, अमारो लिखबो, हर चीज से कथानक ढूढ़ निकालता है। फिर तैयार होती है, एक लघु कथा, एक नाटक, एक उपन्यास, एक संस्मरण, एक यात्रा वृतांत, एक पत्र, कुछ व्यंग, कुछ हास्य एक गद्य एक पद्य की क्षणिका, कुछ छंद, कुछ दोहे, कुछ सवैईया, कुछ मुक्तक, कुछ गजल कुछ सजल, कुछ छंद मुक्त कुछ छंद बद्ध, कुछ अगेय, कुछ गेय, कविताएं।”
बात कहां से शुरू हुई कहां चली गयी, मैं तो इस धारा प्रवाह लेखन में भूल ही गया। आइये पुनः वही से शुरु करें, जहाँ छोड़ा था – अब आगे क्या घटित हुआ।
दरअसल मेरे मोबाइल में देसी हिंदी गूगल टाइपिंग का एक ऐप है, जो मेरी आवाज को पहचान कर हिंदी टाइप करता है। उसके साथ मेरी दोस्ती का आलम यह है, मुझे टाइपिंग में लिखने में त्रुटि हो जाएगी लेकिन मेरे बोलने और उसके लिखने में बिल्कुल ही त्रुटि नहीं होती है। लेखन का नशा ऐसा कि शर्म भी बेशर्म हो जाती है।
अब भीड़ भरी मेट्रो में कौन इस संवाद को सुन रहा था, यह कौन नहीं सुन रहा था, इससे मुझको कुछ भी लेना देना नहीं था। हालांकि मैं इतना भी तेज नहीं बोल रहा था कि किसी को दिक्कत हो, मुझे तो लगता है कि शायद मेरे बगल के व्यक्ति को छोड़कर कोई सुन ही नहीं पा रहा था। बस सुन रहा था मेरे होठों से सटा हुआ मेरा प्यारा मोबाइल। अपना तो हर हाल में दिल में आए भाव को मोबाइल पर उतारने का नशा रहता है। मैं वही काम कर रहा था। अचानक एक बुजुर्ग से दिखने वाले लेकिन दिव्य व्यक्तित्व और आभामंडल वाले शालीन, शिष्ट- भद्र व्यक्ति मेट्रो में हमारे सीट के सामने आए हैं। स्थानाभाव के कारण वे आगे बढ़ जाना चाहते थे। मेट्रो में आस-पास कोई जगह नहीं थी। अचानक मुझे और मेरे बगल में बैठी हुई एक बिटिया दोनों के मन में एक साथ यह भाव आया कि अभी तो इतनी जगह रिक्त ही है कि यदि हम लोग थोड़ा-थोड़ा खिसक जाए तो एक व्यक्ति के बैठने के लिए पर्याप्त जगह हो जाएगी। सच में हम दोनों ने ऐसा ही किया।
वे भद्र व्यक्ति जो मुझसे करीब 4-5 साल उम्र में बड़े ही थे, आगे निकलने ही वाले थे कि हमने टोका –
“भाई साहब! ठहरिये, आइये आप भी बैठ लीजिए।” इतना कुछ सोचने और अपनी बात को कहने के बीच ट्रेन खुली। इसी बीच भाई साहब का संतुलन बिगड़ा लेकिन मैंने उन्हें अपने हाथों से पकड़ा और वे हमारे बगल में बैठ गए। यह बताना उचित होगा कि यह सब काम मैंने अपने लेखन को विराम देकर किया था।
खैर फिर मैं भूल गया कि मुझे कौन देख रहा है मैं धीरे-धीरे बोलकर लिखना शुरू किया। मुझे शायद मेरे पड़ोसी से अधिक कोई नहीं सुन समझ रहा था कि मैं उपन्यास लिख रहा हूँ या किसी से बात कर रहा हूँ।
मैंने लिखना बंद किया तब तक बगल वाले उसे भद्र व्यक्ति ने मुझसे कहा-
“सर ! आप राइटर है क्या?” उन्होंने मुझसे यह कह कर कहा मेरा सिर गर्व से ऊपर उठा दिया। वाह, मुझे राइटर बोल रहे हैं। आप बताएंगे कि आप कैसे इसे लिखते हैं? कौन सा ऐप यूज करते हैं?
मैंने उन्हें विधिवत सब कुछ समझा दिया, इतना ही नहीं उनके मोबाइल में इस ऐप को डाउनलोड और एक्टिव भी कर दिया।
जीवन के चौथे पड़ाव पर लेखन शक्ति, स्मरण शक्ति, चलने फिरने में सब कुछ में दिक्कत आती है। ऐसे में यह ऐप काफी कारगर है। ईश्वर से कामना करता हूं कि सब शक्ति कमजोर हो जाए लेखन शक्ति और स्मरण शक्ति बनी रहे।
हम दोनों के बीच आपसी परिचय हुआ, बातचीत हुई, मुझे पता चला कि मेरे बगल में बैठे हुए अग्रज पुलिस डिपार्टमेंट के बड़े सीनियर अफसर रह चुके थे और अभी हाल में दो-तीन साल पूर्व सेवानिवृत हुए थे। लेखक के रूप में उनके मन में मेरे प्रति बहुत सारा सम्मान का भरा प्रतीत हो रहा था। बात की बात में उन्होंने कहा कि मेरे एक सीनियर डीआईजी साहब थे, उन्होंने भी कई किताबें लिखी है। मैं भी मन ही मन कहा, चलो मैंने भी लगभग एक दर्जन पूरे कर लिए।
खैर तब तक अगला मेट्रो स्टेशन हजरतगंज आ गया हम दोनों ने एक दूसरे का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और वे हजरतगंज मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुझे भी अगले मेट्रो स्टेशन केडी सिंह बाबू स्टेडियम पर उतरना था। लेकिन मेरे बगल में बैठे दूसरे सज्जन की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी उन्होंने बड़े ही आदर से कहा, भाई साहब आप लेखक है ?
मैं भी शरमाते और सकुचाते हुए कहा –
“जी.. हाँ थोड़ा बहुत जरूर लिख लेता हुँ। नहीं भाई साहब आप जिस तरह से बोलकर लिख रहे थे वाकई कहानी मेरे दिल तक पहुँच रही थी।” मैं तो बिल्कुल भाव विभोर हो गया था। आप अच्छा लिखते हैं। मुझे अपने उपन्यास लेखन के बीच ही श्रोता और पाठक दोनों मिल चुका था। मै बहुत ख़ुश था।
भाई साहब आप रहते कहाँ हैं?.. मैने उन्हें बताया, तो वे भी बोल पड़े,
“जी, मैं भी इधर रायबरेली रोड पर ही रहता हूँ।” वे सज्जन किसी गवर्नमेंट जॉब में तो नहीं थे, लेकिन किसी कारपोरेट सेक्टर के पदाधिकारी थे, जैसा उन्होंने मुझे अपना परिचय दिया।
अब मेरा मेट्रो स्टेशन आ चुका था। मैंने अपना पिट्ठू बैग अपने पीठ पर लादा और मन में यह सोचता हुआ बाहर निकला कि वाकई लेखक होना गौरव की बात है।
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆
कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
26 जनवरी 2001 जब सम्पूर्ण भारत अपना राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस मना रहा था तभी सुबह के 8.46 मिनट पर कच्छ की भूमी में कंपन हुआl कंपन भी सामान्य नहीं अपितु अति भयंकरl जिसे देश ने सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा का नाम दे दियाl देखते ही देखते यहाँ के घर मलबों में परिवर्तित हो गयेl मलबों में लाखों लोग दब गयेl जहाँ कुछ बच्चों ने अपने माता -पिता को खो दिया वहीं कुछ पालकों ने अपनी आखों के सामने अपने लाड़लो को काल के मुँह में समाते देखाl देखते ही देखते लोग बेघर हो गयेl इतनी संख्या में मृत जन थे कि जलाने के लिये लकड़ियाँ भी कम पड़ गई थींl
जैसे ही ये समाचार सामने आया तब भारत की सरकारी, प्राइवेट, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जैसे संगठन एकजुट होकर मदद करने हेतु सामने आये l इन सभी ने निशुल्क स्वास्थ्य शिविर, भोजन, कपड़े और रहने हेतु टेंट देने शुरु कियेl
आश्चर्य ये था कि यहां के भुंगे मकानों को कुछ भी नहीं हुआl क्यूंकि ये भुंगे गोलाकार होते हैं जिससे भूकंप का इसके किसी एक कोने की दीवार पर दबाव नहीं पड़ताl हवा का दबाव इन्हें क्षति नहीं पहुँचाताl इनमे लगी ईटे मिट्टी, गोबर और घास फूस से बनी होती हैं l छत शंकु आकार की लकड़ी के खम्भों से बनी होती है तो हल्की हो जाती है जिससे भीतों पर वजन नहीं पड़ताl
इस भूकंप ने कच्छ को झिंझोड़कर कर रख दियाl पर ये अद्भुत शक्ति के लोग कहाँ हार मानने वाले थेl इन सभी ने पुनः मिलकर कच्छ के नवीनीकरण की शपथ ग्रहण लीl आज खावड़ा में सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा हाइब्रिड रीयूजेबल एनर्जी पार्क बनाया जा रहा हैl
इसी समय भारत सरकार ने तुरंत ही मुंद्रा पोर्ट को भारतीय रेल से जोड़ना शुरु कर दिया l सरकार ने यहां उद्योगों में करों में भारी छूट दे दीl इस पोर्ट को कार्गो हेतु पुरी तरह ऑटोमेटीक किया जिससे कम समय में ज्यादा सामान उतरने और चढ़ने लगा l देश की बड़ी कंपनियों ने यहां थर्मल पॉवर प्लांट लगाये जिससे विद्युत उत्पत्ति बढ़ गईl देखते ही देखते यह पोर्ट देश के कंटेंनर का करीब करीब 60% व्यापार देखने लगाl पोर्ट के विकास होने से लेबर से लेकर इंजीनियर को हर तरह का रोजगार मिलाl
वहीं कंडला पोर्ट जिसे हम दीनदयाल नाम से भी जानते है, ये पोर्ट हमारे देश के साथ एशिया का सबसे बड़ा सरकारी पोर्ट बन गयाl यह पोर्ट भी देश के सभी राज्यों से जुडा हुआ हैl ये पोर्ट मुख्य रूप से देश की बड़ी रिफाइनरी को कच्चा तेल सप्लाई करता हैl यह लिक्विड कार्गो पोर्ट की तरह काम करता हैl
आज ये दोनों पोर्ट फोर ट्रैक सड़क से जुड़ गये हैं l
दुनिया का कोई एसा देश नहीं जहाँ कच्छीयों ने अपना अधिपत्य न जमाया हो l ये कच्छी अति परिश्रमी, कभी ना हार मानने वाले, किसी भी परिस्थिति में कामयाबी पाने वाले होते हैंl