हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६० ☆ अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६० ☆ अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार 

वृक्ष को प्रत्यक्ष देव मानते हुए भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, प्रकृति से जोड़कर अपने सभी पर्व मनाता है। चाहे, होली, नवरात्रि, दशहरा, सावन, कजरी आदि।

नदियों, पहाड़ों, पौधों सभी को जीवंत स्वरूप मानते हुए उन्हें पूजा जाता है। भाव -भक्ति, आस्था, विश्वास हमें पर्यावरण से जोड़ता है।

दशहरे में सोनपत्ता – (कचनार के पत्ते को)

दशहरे (विजयादशमी) पर सोन पत्ते का आदान-प्रदान, सोना बांटने का प्रतीक, यह सुख, वैभव, धन, सौभाग्य और मित्रता को दृढ़ करता है। मान्यता है कि ये पत्ते अक्षय धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

पर्यावरण की चेतना- इससे प्रकृति और पर्यावरण के मध्य समन्वय बनता है। इस दिन नीलकंठ के दर्शन, शिव पूजा जिसमें शमी के पत्ते को भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। यह पेड़ रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी हरा-भरा रहता है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है। इसे दशहरे पर पूजा कर संरक्षण की परंपरा है, जिससे लोग पेड़ों को बचाते हैं।

सोना के रूप में पत्तों का आदान-प्रदान प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता को दर्शाता है। असली धन प्रकृति ही है। प्रकृति संग उत्सव मनाने से जीवन में उमंग आती है। दशहरा बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। रावण दहन करके हर बार यही संदेश दिया जाता है कि बुराई को मिलकर इसी तरह दहन करना चाहिए। साथ ही हमें ये जनचेतना फैलाना चाहिए कि प्रदूषण, अंधाधुंध वृक्षों को काटना रोकना होगा।

आइए हम संकल्प लें कि दशहरे को पूरे धूमधाम के साथ प्रकृति संरक्षण की ओर अग्रसर होंगे।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९९ ⇒ पैसे का पेड़ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैसे का पेड़।)

?अभी अभी # ७९९ ⇒ आलेख – पैसे का पेड़ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

|•MONEY PLANT•|

क्या पैसा भी उगाया जा सकता है, इस प्रश्न पर जब पुरुषार्थ और भाग्य में बहस होने लगी तो एक मनी प्लांट बीच बचाव और समझौते के लिए आ गया। पुरुषार्थ का कहना था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते और भाग्य का तर्क था कि घर में अगर मनी प्लांट की एक बेल लगा ली जाए तो घर में पैसा ही पैसा आने लगता है।

मैं पुरुषार्थ में विश्वास रखता हूं, भाग्य में नहीं। मैने अपने 2BHK फ्लैट में आजादी के अमृत महोत्सव एवं अपने ७५ वर्षों के पुरुषार्थ स्वरूप गमलों में कुछ पौधे लगाए, जिनमें एक मनी प्लांट भी शामिल था। अच्छी मिट्टी, हवा पानी के बावजूद बाकी पौधे तो पनप नहीं पाए लेकिन मनी प्लांट तो अमर बेल की तरह फलता फैलता पूरी तरह गैलरी में छा गया। मिलने जुलने वाले मेरी शिकायत पर ध्यान नहीं देते और ना ही बेचारे अन्य मुरझाए पौधे उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर पाते। वे तो बस एक ही बात कहते हैं। आपके यहां मनी प्लांट अच्छा फैल रहा है। सुना है, पैसा ही पैसा आता है, जिनके घर मनी प्लांट होता है। ।

और मेरा ध्यान अचानक अखबार की खबरों की उन सुर्खियों पर चला जाता है, जहां कुछ विशिष्ट लोगों के घर से नोटों की फसल बरामद की जाती है। मनी, प्लांट मेरे यहां हो, और पैसा उनके यहां से बरामद हो। बताइए, किसका पुरुषार्थ और किसका भाग्य।

किशोर कुमार का पुरानी फिल्म मुसाफिर(1957) का एक बड़ा प्यारा गीत है, मुन्ना बड़ा प्यारा, जिसके अंतरे के बोल कुछ इस तरह हैं ;

क्यों न रोटियों का

पेड़ हम लगा लें !

आम तोड़ें, रोटी तोड़ें,

रोटी आम खा लें .. ;

बच्चा तो खैर अबोध होता है, फिर भी उसकी ख्वाहिश रोटी से आगे नहीं बढ़ पाती। बड़ा होकर वह भी समझ जाता है रोटियों के पेड़ नहीं लगा करते और हम पढ़े लिखे घरों में मनी प्लांट लगाकर खुश हैं जिनमें न कोई फूल है ना फल और ना ही खुशबू और ना ही कभी हमारे यहां छापा पड़ा और ना ही अखबार में हमारे मनी प्लांट की तस्वीर छपी। आखिर इंसान ऐसा कौन सा मनी घर में प्लांट करता है कि छापे में दो हजार की चिप वाली नोटों की गड्डियों का पहाड़ निकल आता है।

सुना है जिन आलीशान बंगलों के लंबे चौड़े बगीचे में कैप्टस गार्डन लगाया जाता है, वहीं उनकी अलमारियों, तिजोरियों और शयन कक्षों में पाप की कमाई के बीज पनप रहे होते हैं। असली मनी तो वहां प्लांट किया गया होता है। इससे तो अच्छा होता वहां रोटियां रखी होती। कम से कम छापे में बरामद रोटियां गरीबों में तो बांट दी जाती।।

इन छापों से जो कथित काली कमाई बरामद होती है, वह कोई खैरात नहीं और ना ही बेचारे गरीबों की मेहनत के पसीने की खरी कमाई, जो मुफ्त में ही बांट दी जाए। उसकी भी कानूनी प्रक्रिया होती है, जो बड़ी पेचीदा होती है। कोर्ट में केस सालों चला करते हैं। जनता सब भूल जाती है।

मेरे आज तक के पुरुषार्थ का फल बस यही हरा भरा मनी प्लांट है जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं। मनी प्लांट में वह खुशबू कहां, जो इनकम टैक्स और ED वालों को अपनी ओर आकर्षित करे। मेहनत के पसीने से सींचा गया मनी प्लांट भले ही पैसा ना उगाए, दो वक्त की रोटी और चैन की नींद तो मयस्सर करा ही देता है।

मनी प्लांट पैसा नहीं उगाता, लेकिन सबसे बड़ा धन, संतोष धन, तो वह देता ही है और शायद इसीलिए उसे मनी प्लांट कहा जाता है।।

आज तक किसी अखबार में नहीं पढ़ा कि किसी वरिष्ठ नागरिक के घर से डेढ़ सौ मनी प्लांट बरामद हुए, जो नोटों से लदे हुए थे। पैसे पेड़ पर नहीं उगते और ना ही आम की तरह रोटियां किसी पेड़ की डालियों पर नज़र आती ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “बुजुर्गों के प्रति सम्मान, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का दिवस” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७५ ☆

?  आलेख – बुजुर्गों के प्रति सम्मान, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का दिवस ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(1 अक्टूबर वरिष्ठ नागरिक दिवस पर विशेष)

पहली अक्टूबर का दिन पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन समाज की उस अनमोल धरोहर को समर्पित है, जिनके अनुभव और मार्गदर्शन के बिना हमारा वर्तमान और भविष्य अधूरा है अर्थात हमारे वरिष्ठ नागरिक। संयुक्त राष्ट्र द्वारा सन् 1991 में इस दिवस की शुरुआत का प्रमुख उद्देश्य बुजुर्गों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार, उपेक्षा और उनकी चुनौतियों के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाना था। प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाने वाला यह दिवस हमें याद दिलाता है कि वृद्धावस्था में गरिमामय जीवन हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।

इस वर्ष के थीम का भाव है.. निर्णय में बुजुर्गों का समावेश

आज हमारे वरिष्ठजन अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, जैसे कि जोड़ों का दर्द, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और इनके उपचार का भारी खर्च,  चिंता का विषय है। सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा की भावना और बढ़ती महंगाई उनके जीवन को और कठिन बना देती है। इन सबसे बढ़कर, आधुनिक जीवनशैली में बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में पलायन और जीवनसाथी के निधन के बाद का अकेलापन सबसे गहरी पीड़ा का कारण बन गया है। इसके अलावा, डिजिटल युग में तेजी से बढ़ रही तकनीकी खाई भी उनके लिए दैनिक कार्यों को चुनौतीपूर्ण बना देती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।

परिवार के सदस्यों का बुजुर्गों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनना और उनके अनुभवों का सम्मान करना, उन्हें भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।

वरिष्ठ नागरिक क्लब, सामुदायिक केंद्र, योग शिविर, और हॉबी कक्षाएं ऐसे मंच हैं जहां वे अपने साथियों के साथ जुड़ सकते हैं। यह सामाजिक अलगाव को तोड़ने में अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकता है।

प्रधानमंत्री वय वंदना योजना, अटल पेंशन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उनका लाभ उठाना बुजुर्गों की आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को कम करेगा।

एक रोचक पहलू बाजार की मानसिकता में आया बदलाव है। आजकल, चाय, दूध, बिस्कुट, दवाओं जैसे उत्पादों के विज्ञापनों में बुजुर्गों की छवि का बढ़ता उपयोग देखा जा सकता है। यह परिवर्तन इस ओर इशारा करता है कि विपणन जगत अब बुजुर्गों को विश्वसनीयता, पारंपरिक मूल्यों और ईमानदारी का प्रतीक मानने लगा है। उदाहरण के लिए, ‘फैमिलिंक’ जैसे उत्पाद, जो एक डिजिटल फोटो फ्रेम है, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को ध्यान में रखकर बनाया गया है ताकि वे आसानी से अपने परिवार की तस्वीरें देख सकें। यह दर्शाता है कि अब उत्पाद डिजाइनिंग में भी बुजुर्गों की विशिष्ट आवश्यकताओं पर विचार किया जाने लगा है।

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला दिन है। यह दिन हमें यह विचार करने का अवसर देता है कि क्या हम अपने समाज के बुजुर्ग सदस्यों को वह सम्मान, सुरक्षा और स्नेह दे पा रहे हैं जिसके वह हकदार हैं। एक जिम्मेदार नागरिक और समाज के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि हम उनके जीवन के अंतिम पड़ाव को समृद्ध, सुरक्षित और खुशहाल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करें। आखिरकार, उन्होंने ही वह नींव रखी है, जिस पर हमारा वर्तमान और भविष्य टिका है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९८ ⇒ भैंस के आगे बीन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भैंस के आगे बीन।)

?अभी अभी # ७९८ ⇒ आलेख – भैंस के आगे बीन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बीन एक वाद्य यंत्र है कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि अगर दुधारू पशुओं को संगीत सुनाया जाए, तो वे अधिक दूध देते हैं। फिर भी विशेषज्ञ हमें भैंस के आगे बीन बजाने से रोकते हैं, कहते हैं, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा। भैंस तो दूध देने से रही, कहीं बीन की धुन सुन कोई नागिन प्रकट ना हो जाए, क्योंकि कल्याणजी आनंद जी के बाद बीन पर केवल नागिन का ही तो कॉपीराइट हैं। वैसे भी मन डोले, मेरा तन डोले, पर भैंस का नागिन डांस, एक हास्यास्पद कल्पना ही हो सकती है, कोई रियलिटी शो नहीं।

भैंस के बारे में हमारे कई पूर्वाग्रह हैं। अगर कबीर ढाई आखर प्रेम का पढ़ने वाले को पंडित मानते हैं, तो हम निरक्षर के बारे में यह घोषणा कर देते हैं, कि उसके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है। एक छोटा सा अक्षर जिसका कभी क्षरण नहीं होता, उसकी तुलना किसी विशालकाय भैंस से करना, क्या अक्षर का अपमान नहीं। बेचारी भैंस का क्या वह तो वैसे ही बदनाम है। उसके आगे आप चाहे बीन बजाओ अथवा राग भैरवी गाओ।।

मैंने केवल बचपन में मां का दूध पीया है, उसके बाद आज तारीख तक मेरा पालन पोषण भैंस के दूध पर ही हुआ है, फिर चाहे वह बंदी के दूधवाले का पानी मिला दूध हो अथवा अमूल और सांची का फैट युक्त गोल्डब्रांड भैंस का दूध। मुझे दूध पर भी भरोसा है, और अपनी अक्ल पर भी। लेकिन जब किसी को यह कहते सुनता हूं कि अक्ल बड़ी या भैंस, तो मुझे तो भैंस ही बड़ी लगती है, क्योंकि उसी के दूध से मुझमें बुद्धि और प्रज्ञा का विकास हुआ है। मैं अपना अपमान सह सकता हूं, लेकिन भैंस का नहीं।

आखिर भैंस के प्रति इतना दुराग्रह क्यों। द्वापर युग में गोवर्धन धारी भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, गोकुल, नंदगांव और वृंदावन की कुंज गलियों में गोप गोपियों सहित रास रचाया, छोटी छोटी गैया और छोटे से गोपाल को कौन भूल सकता है। बालकृष्ण की बंसी की तान पर क्या गऊ और क्या ग्वाल, सब दौड़ पड़ते थे, लेकिन बस बेचारी भैंस का ही कहीं वर्णन देखने/सुनने में नहीं आया।।

गाय तो वैसे भी हमारी माता है, लेकिन भैंस को तो मौसी का दर्जा भी नहीं मिल पाया। धन्यभाग बिल्ली के, जो वह शेर की मौसी तो कहलाती है। आज भी रसोई में पहली रोटी गाय की ही होती है, भैंस की नहीं। कितना आदर सम्मान गाय को, उसके लिए गोशाला, और भैंस के लिए तबेला। पूर्वजों के निमित्त गऊ ग्रास और भैंस को सिर्फ घास।

कोई स्वर्गवासी, कोई परलोकवासी तो कोई गोलोकवासी और बेबस, बेचारी भैंस लेती रहती उबासी।

भैंस पर किसी को कोई यकीन नहीं, भरोसा नहीं। लो गई भैंस पानी में और जब भी भरोसा किया, भरोसे की भैंस ने हमेशा पाड़ा ही जना।

मैं अच्छी तरह से जानता हूं, भैंस की तारीफ में कितने भी कसीदे काढ़ लूं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ना। लगता है मेरी बुद्धि ही घास चरने गई थी, जो मैं भैंस का गुणगान कर बैठा। किसी ने सच ही कहा है, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९७ ⇒ सपने अपने अपने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपने अपने अपने।)

?अभी अभी # ७९७ ⇒ आलेख – सपने अपने अपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सपने तो सपने, कब हुए अपने ! यह भी क्या बात हुई ? अपने ही सपने, अपने नहीं होंगे, तो किसके होंगे। अमीर आदमी के तो सभी सपने सच हो जाते हैं, उसकी आँखों की नींद गायब हो जाती है। अब सपने आएँ भी तो कैसे, और अगर आ भी गए तो वापस ग़रीबी के आने से तो रहे।

ग़रीब का सपनों पर जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे, कम से कम, सपने देखने से तो कोई नहीं रोक सकता। उसकी हालत तो यह है कि अगर वह आँखें खोल, जीवन की कड़वी सच्चाई से रूबरू होना चाहे, तो सियासत उसे फिर सपने दिखाना शुरू कर देती है। बहुत देख लिए उसने, खुली आँखों से, समाजवाद और गरीबी हटाओ के सपने। अब अच्छे दिनों के सपने देखने के लिए उसके पास वक्त नहीं।।

जिनका यथार्थ कड़वा होता है, वे मीठे सपनों से ही काम चला लेते हैं। जो व्यावहारिक, सकारात्मक सोच और पुरुषार्थी लोग होते हैं, वे सपने देखने में नहीं, सपनों को सच करने में यक़ीन रखते हैं। फिर चाहे वह ओलिंपिक में गोल्ड मेडल का सपना हो, या कौन बनेगा करोड़पति की हॉट सीट पर अमित जी से हाथ मिलाने का।

सपने देखना आपका, (सं)वैधानिक अधिकार है। आप जैसे चाहें सपने देखें, अच्छे-बुरे, शालीन -अशालीन, अहिंसावादी-आतंकवादी, कोई आपको नहीं रोक सकता। यह आपका निजी और अंदर का मामला है। लक्स अंडरवियर से सभी अधिक अंदरूनी।।

फिल्मों को सपनों से बहुत प्रेम है। बहारों के सपने, शहर और सपना तो ठीक, बेचारी स्वप्नसुंदरी पर भी फ़िल्म बना डाली, ड्रीमगर्ल ! आम आदमी को सिर्फ़ चार आने में सच्चाई से सपनों के संसार में ले जाने का दायित्व हमारी फिल्में पिछले कई सालों से बखूबी निभाती चली आ रही है। अब तो अपनी हथेलियों में, जहाँ कभी कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मूले सरस्वती का वास था, वहाँ आज एक स्मार्ट फ़ोन सभी सपनों को साकार कर रहा है। अब लोग सपने नहीं देखते, हर चीज़ लाइव देखते हैं, अपने घरों में, बैडरूम में, ड्रॉइंग रूम में, कभी अकेले में, तो कभी सपरिवार।

आप इसे आधी हक़ीक़त और आधा फसाना भी कह सकते हैं। हम खुश हैं, जो मिला उसमें भी, जी न मिला उसमें भी। सपने देखना हम नहीं छोड़ेंगे। अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ – आलेख – महाआरती ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय आलेख महाआरती ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ ☆

🌻आलेख🌻 🪔महाआरती 🪔

समय के साथ सब बदल जाता है। नही बदलता तो सिर्फ बड़े – छोटे, अमीरी – गरीबी, छल-छलावा, ऊँच- नीच, जात – पात।

मान सम्मान तो पलक झपकते ही बदल जाते हैं। ऊँचे भव्य पंडाल में महाआरती का आयोजन।

यदि कोई समान्य आमजन का पंडाल बना जिसमें मध्यमवर्गीय परिवार है। वो महाआरती के विशेष आयोजन को करने अपने से बड़ों को बुलाते हैं, परन्तु वही महाआरती जब कुछ उच्च वर्ग और अमीर पंडाल है तो  मध्यमवर्गीय को आरती दूर से देखने को मिलता है, परन्तु उतारा करके ग्रह दोष शांत कर भंडारा खिलाते उन्हें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को पंक्तियां बनवा देते हैं। और सभी लाईन लगकर भंडारा लेते भी है क्योंकि उन्हें वह बड़े आदमियों का प्रसाद वितरण लगता है।

माँ के आँचल में क्या अमीर क्या गरीब? पर हाय रे माया जीवन को सार्थक बनाने के लिए महाआरती करने के लिए पैसा और हैसियत दोनों का होना कितना जरुरी है।

जगजननी आज भी मोहनी रुप धारण करने का समय आ गया है। जहाँ पर पाप, बड़े अमीर, हैसियत, और बड़े रुदबे रुपी दानव से बचाकर संस्कार, सादगी, सहजता भावों को अमर करना होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४९ – देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४९ ☆ देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

नब्बे के दशक तक ” छाता बनवा लो” जैसे शब्द कान में सुनाई दिया करते थे। अब तो ये शब्द सुने हुए एक लंबा अंतराल हो चुका हैं। पहले पैदल चलते हुए कांधे पर बड़े से झोले में अपनी पूरी दुकान को समेट कर द्वार द्वार से कारीगर अपनी सेवाएं देते थे।

आश्चर्य तो तब होता था, भरी बरसात में ये लोग स्वयं छाता वहन नहीं कर पाते थे। हमारे यहां गरीबी का ये अलाम है, दूध विक्रेता स्वयं दूध नहीं पी पाता हैं।

बाद के वर्षों में ये छाता सुधारक पुरानी साइकिल से गली कूचे पहुंच कर सेवा देने लगे थे। समय ने करवट ली, लोगों का रहन सहन, सुविधा जनक हुआ, लोग छत वाली कार में घूमने लगें। छाते का उपयोग ही कम हो गया, बाइक और स्कूटर वाले भी छाते का उपयोग कर पाने में असहज हैं। गरीब लोग तो प्रिपोपलाइन के पुराने बोरे से वर्षा ऋतु में काम चला लेते हैं।

हमने तो बचपन से लेकर आजतक भी काले रंग का जेब्रा ब्रांड का छाता ही उपयोग किया हैं। दुनिया तो अब रंगीन छातों की हो चुकी हैं। हमारे पिताश्री वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छाते को धूप में अच्छे से सुखाकर और उसके अंदर लगी हुई धातु की डांडियों पर तेल लगाने के बाद ही रखते थे, ताकि उस में जंग आदि ना लगे। अब तो हर वर्ष नया खरीदने का रिवाज़ बन चुका हैं।

मुम्बई जैसे शहर जहां वर्षा तो अधिक होती ही है, लोग पैदल भी खूब चलते है, छाते अभी भी अपनी उपयोगिता प्रमाणित करते हैं। वहां इसकी मरम्मत का कार्य अधिकतर मोची ही कर लेते हैं।

चीन देश से सस्ते और घटिया छातों ने इन कारीगरों की रोजी रोटी छीन ली हैं। “उपयोग और फेंको ” पद्धति ने कुटीर उद्योगों की रीढ़ की हड्डी तो तोड़ी ही है, साथ ही साथ रिपेयर जैसे छोटे काम करने वाली क़ौम का प्रायः खात्मा ही कर दिया हैं।

ये कारीगर भी सीजनल कार्य की कर पाते थे। जून के अंत से सितंबर माह की समाप्ति तक ही इनकी आवश्यकता रहती हैं। अब सितंबर माह भी समाप्त हो रहा है, हम भी अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९६ ⇒ दिल की नज़र से ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिल की नज़र से।)

?अभी अभी # ७९६  ⇒ आलेख – दिल की नज़र से ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिल तो हम सबका एक ही है, लेकिन अफसाने हजार !

आँखें तो सिर्फ दो ही हैं, लेकिन ये नज़र कहां नहीं जाती। आपने सुना नहीं, जाइए आप कहां जाएंगे, ये नजर लौट के फिर आएगी। आँखों का काम देखना है, और दिल का काम धड़कना। आँखों में जब नींद भर जाती हैं, वे देखना बंद कर देती हैं, और इंसान बंद आंखों से ही सपने देखना शुरू कर देता है, लेकिन बेचारे दिल को, चैन कहां आराम कहां, उसे तो हर पल, धक धक, धड़कना ही है।

ऐसा क्या है इस दिल में, और इन आँखों में, कि जब मरीज किसी डॉक्टर के पास जाता है, तो वह पहले कलाई थाम लेता है और बाद में उसके यंत्र से दिल की धड़कन भी जांच परख लेता है। और उसके बाद नंबर आता है, आंखों का। आंखों में नींद और ख्वाब के अलावा भी बहुत कुछ होता है। बुखार में आँखें जल सकती हैं, आँखों में कंजक्टिवाइटिस भी हो सकता है। शुभ शुभ बोलें। ।

दिल जिसे चाहता है, उसे अपनी आंखों में बसा लेता है, और फिर शिकायत करता है, मेरी आंखों में बस गया कोई रे, हाय मैं क्या करूं। अक्सर दिल के टूटने की शिकायत आती है, और दिल के घायल होने की भी। जब कोई नजरों के तीर कस कस कर मारेगा, तो दिल को घायल तो होना ही है।

ईश्वर ने हमारा हृदय बड़ा विशाल बनाया है शायद इसीलिए कुछ लोग दरियादिल होते हैं। आप दिल में चाहें तो एक मूरत बिठा लें, और अगर यह दिल पसीज जाए तो दुनिया के सभी दुख दर्द इसमें समा जाएं। ।

हमारी आंखों ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेलीं ! बसो मेरे नयनन में नंदलाल ! मोहिनी मूरत, सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल। किसी को आंखों में बसाने के लिए पहले आंखों को बंद करना होता है। बाहरी नजर तो खैर कमाल करती ही है, एक अंतर्दृष्टि भी होती है, जो नेत्रहीन, लेकिन प्रज्ञाचक्षु भक्त सूरदास के पास मौजूद थी। कितना विशाल है हमारी अंतर्दृष्टि का संसार।

लेकिन इस जगत के नजारे भी कम आकर्षक नहीं ! नजरों ने प्यार भेजा, दिल ने सलाम भेजा और नौबत यहां तक आ गई कि ;

मुझे दिल में बंद कर दो

दरिया में फेंक दो चाबी।

यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया। लेकिन यह तो कुछ भी नहीं, और देखिए ;

आँखों से जो उतरी है दिल में

तस्वीर है एक अन्जाने की।

खुद ढूंढ रही है शमा जिसे

क्या बात है उस परवाने की। ।

जरूर आँखों और दिल के बीच कोई हॉटलाइन है।

ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कोई चीज आपको पसंद आए, और उसके लिए आपका मन ना ललचाए। ये दिल का शब्द भंडार भी कम नहीं। जी, कहें, जिया कहें अथवा जिगर कहें। आपने सुना नहीं, नजर के सामने, जिगर के पास।

नज़ारे हम आँखों से देखते हैं, और खुश यह दिल होता है। गौर फरमाइए ;

समा है सुहाना, सुहाना

नशे में जहां है।

किसी को किसी की

खबर ही कहां है।

………..

नजर बोलती है

दिल बेजुबां है। ।

आजकल हम दिल की बात किसी को नहीं कहते। आप भी शायद हमसे असहमत हों, लेकिन नजर वो, जो दुश्मन पे भी मेहरबां हो। जिन आंखों में दर्द नहीं, दिल में रहम नहीं, तो हम क्यों बातें करें रहमत की, इंसानियत की।

शैलेंद्र ने सच ही कहा है ;

दिल की नजर से

नजरों के दिल से

ये बात क्या है

ये राज़ क्या है

कोई हमें बता दे। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ४४ – भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत / The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत / The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories ।) 

☆  दस्तावेज़ # ४४ – भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(लोगों से बातचीत, AI पर रिसर्च के आधार पर और अपनी पूर्व में संग्रहित जानकारी को मिलजुला कर एक दस्तावेज़)

भारतीय आयुध निर्माणी, जिसका इतिहास 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है, देश की सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा रही है। कभी अंग्रेजों के शासन में शुरू हुए ये कारखाने बाद में भारत की सबसे बड़ी रक्षा उत्पादन इकाइयाँ बन गईं।

कोलकाता में मुख्यालय रखने वाला ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) 41 फैक्ट्रियों और लगभग 80,000 कर्मचारियों का समूह था, जो हथियारों, गोला-बारूद, और सैनिकों के उपकरण बनाता था।

परंपरा और चुनौतियाँ

200 वर्षों की गौरवशाली परंपरा के बीच, कई समस्याएं सामने आईं। उत्पादन में देरी, गुणवत्ता की शिकायतें, और प्रबंधन का हठधर्मी रवैया – ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की कमजोरियां थीं।

सरकारी नियमों की वजह से तेजी से बदलते वैश्विक रक्षा बाजार में तालमेल बिठाने में कठिनाई होती थी। कर्मचारियों की मेहनत के बावजूद, सुधार की जरूरत बढ़ती गई।

निगमीकरण से क्या बदला?

सरकार ने यह निर्णय लिया कि OFB को खत्म करके इसकी फैक्ट्रियों को 7 नए, स्वतंत्र, लेकिन पूरी तरह से सरकारी स्वामित्व वाले, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) में बदला जाएगा।

यह निगमीकरण है, ना कि निजीकरण। इसका मतलब है कि ये नई कंपनियां सरकार की ही होंगी, लेकिन प्रबंधन अधिक पेशेवर, कुशल, और बाज़ार उन्मुख होगा।

इन 7 DPSUs के नाम हैं:

  • म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड, बख्तरबंद वाहन निगम लिमिटेड,
  • एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड,
  • ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड,
  • यंत्र इंडिया लिमिटेड,
  • इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड, ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड।

भ्रांतियों का समाधान

कई बार यह गलतफहमी फैलती रही है कि इन नई कंपनियों का संचालन निजी कॉर्पोरेट्स जैसे अदाणी समूह द्वारा किया जा रहा है, जो सच नहीं है।

सभी DPSUs पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में हैं और उनका संचालन सरकार द्वारा नियुक्त बोर्ड करता है।

कोलकाता में नियुक्त डीजीओएफ का कार्यालय भी अब बंद हो चुका है।

आगे का रास्ता

यह निगमीकरण हमारी रक्षा उत्पादन व्यवस्था को और मजबूत करेगा। उत्पादन में सुधार, गुणवत्ता में सुधार, और नई तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। कर्मचारियों के हितों की रक्षा की गई है और उन्हें आधुनिक औद्योगिक माहौल में नए कौशल सीखने का मौका मिलेगा।

यह बदलाव केवल एक नयी शुरुआत है, जिसमें हमारे आयुध निर्माणी के शौर्य को बनाए रखते हुए, उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा है। हर कर्मचारी की मेहनत, समर्पण, और परंपरा से जुड़ाव, इस परिवर्तन की सफलता की कुंजी है।

🔸

 – जगत सिंह बिष्ट

🍀The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories 🍀

India’s ordnance factories stand as a proud symbol of the nation’s defense manufacturing heritage, tracing back over 200 years to the early 1800s.

The journey began under British colonial rule when the first gunpowder factory was established in 1787 at Ishapore near Kolkata, starting production in 1791. The Gun Carriage Agency at Cossipore (now Kolkata), which began production in 1802, remains the oldest ordnance factory still operational today.

These factories have supported India’s armed forces through multiple wars— from the 1947 independence battle to the Kargil conflict in 1999 — serving as the “arsenal of the nation.”

Over two centuries, the Ordnance Factory Board (OFB), headquartered in Kolkata, expanded to include 41 factories that manufactured a wide range of weapons, ammunition, vehicles, and equipment, employing over 80,000 workers.

The factories prided themselves on a glorious legacy of steadfast support to the defense forces, technological contribution to India’s industrial rise, and pioneering roles in setting up research and industrial institutions across the country.

🌱Challenges Behind the Legacy

However, this illustrious history was also marked by deep-rooted challenges. Despite the vast workforce and legacy, productivity remained low; factories were often criticised for delayed deliveries, substandard product quality, and operational inefficiencies.

The OFB operated under rigid government structures that limited autonomy and innovation, making modernization a slow process. Many workers dedicated decades to their craft, yet the system struggled to keep pace with evolving defense demands and global defense manufacturing standards.

🌱The Corporate Reform:

♦️Corporatisation, Not Privatisation

Recognising the urgent need for reform, the Government of India, after extensive deliberation and consultations, initiated a landmark decision in 2021: the dissolution of the Ordnance Factory Board and the corporatisation of its factories into seven new Defence Public Sector Undertakings (DPSUs).

It is important to note that this was a corporatisation and not a privatisation. The new DPSUs remain 100% government-owned and controlled, operating with greater autonomy, professional management, and commercial agility.

The seven DPSUs are:

✅Munitions India Limited

✅Armoured Vehicles Nigam Limited

✅Advanced Weapons and Equipment India Limited

✅Troop Comforts Limited

✅Yantra India Limited

✅India Optel Limited

✅Gliders India Limited

This transition was designed to create entities that are more efficient, accountable, and competitive while preserving the legacy and welfare of the workers.

Salaries, pensions, and employment terms were protected during the transition, easing initial apprehensions among employees.

♦️Dispelling Misconceptions

Despite official clarifications, rumours have persisted that the DPSUs are being handed over to private corporates like Adani for management. This is a false narrative.

The seven DPSUs are fully owned by the government and managed by government-appointed boards. No private company controls or manages these defense units.

The former Directorate General of Ordnance Factories in Kolkata was closed along with the OFB, and the centralized command structure replaced by autonomous DPSUs, each with its own board, but under the Ministry of Defence and Department of Defence Production’s oversight.

🌷The Road Ahead: Vision and Optimism

The corporatisation has already shown positive signs with increased financial discipline, improved productivity, and a rise in exports. Efforts are underway to modernize infrastructure, enhance quality standards, and actively pursue technological collaborations.

The government’s vision is to transform these DPSUs into world-class defense manufacturers, supporting India’s goal of becoming self-reliant in defense production while preserving the industrial heritage and workforce welfare.

For workers and staff, the journey might feel like entering a new era of challenges and opportunities. The hope is that this corporate model will allow their valuable skills and dedication to shine, with better resources, management, and future prospects.

🔸

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९५ ⇒ परछाई ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परछाई।)

?अभी अभी # ७९५  ⇒ आलेख – परछाई ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुझसे लंबी होती मेरी परछाई! हम बड़े होते हैं, बढ़ते हैं। बढ़ने की एक उम्र होती है। जिसको जितना बढ़ना होता है, बढ़ ही जाता है। किसी की उम्र तो बढ़ती रहती है, लेकिन बढ़ना रुक जाता है। और फलस्वरूप कोई नाटा तो कोई लंबा कहलाता है। बोलचाल की भाषा में इसे कद कहते हैं।

सुबह की धूप को खिलती धूप कहा जाता है, क्योंकि सुबह ताज़गी का पर्याय है! चाहे डाली पर लगा फूल हो, या कोई फूल सा चेहरा, अगर वह सुबह नहीं खिला, तो क्या खिला! यही तो वह समय है, जब क़ुदरत भी मुस्कुराती है।।

खिलना ही विकसित होना है, खिलखिलाना ही पल्लवित होना है। सुबह की खिलती धूप में सैर के लिए टहलते वक्त, अचानक मेरी नज़र अपने साये पर पड़ गई! वह मुझसे दो कदम आगे चल रहा था, और उसका कद मुझसे कई गुना बड़ा था।

मुसीबत में साया भी साथ नहीं देता! लेकिन हर सुबह मेरे लिए ज़िन्दगी की एक नई सुबह होती है। सुबह जब कोई फिक्र साथ नहीं होती, तो साया भी अपने से बड़ा नज़र आता है। वह मुझसे दो कदम आगे ही चलता है।।

दोपहर को जब सूरज सर पर चढ़ता नज़र आता है, साया छोटा होता चला जाता है। उधर सूरज आसमान पर, इधर साया ग़ायब, खुद में पूरी तरह से समाया हुआ। जब मुसीबत सर पर आई, सबसे पहले साये ने साथ छोड़ा।

फिर ज़िन्दगी की शाम भी होती है। वह सूरज जो कभी सर पर था, क्षितिज में शनैः शनैः अस्ताचल की ओर प्रस्थान करने लगता है। अब उसमें वह आग नहीं। साये फिर लंबे होने लगते हैं। गोद में आये बच्चे की तरह साया भी ज़मीन पर उतर, पहले कुछ कदम साथ चलता है, फिर पिछड़ जाता है। अतीत की परछाइयाँ हम से लंबी ज़रूर होती हैं, लेकिन हमसे पिछड़ती जाती हैं। हम आगे और हमारा, हम से लंबा अतीत, हमारा पीछा करते हुए। अतीत का साया हमसे कितना भी लंबा हो, पिछड़ ही जाता है।।

हम जीवन की सुबह में आगे देखते हैं, और जीवन की शाम में पीछे मुड़ -मुड़ कर। जब तक सूरज की रोशनी है, साया कभी हमारे आगे, कभी हमारे अंदर और कभी हमारे पीछे है। बचपन के आगे सुनहरे भविष्य का लंबा साया है। जवानी संघर्ष-काल है! साया आपके कंधे से कंधा मिला रहा है, इसलिए नज़र नहीं आ रहा। शाम ढलते ही आप आगे हैं, आपकी उपलब्धियाँ आपके पीछे। कद में आपसे कई गुना बड़ी।

आप यथार्थ हैं! आपका अपना कद ही आपकी परछाई है। जो समय के साथ घटता-बढ़ता रहता है। चाहें लालबहादुर शास्त्री हो, या सुनील गावस्कर, इनका कद छोटा होते हुए भी, इनकी ऊँचाई से कई गुना ऊँचा है। इनकी उपलब्धियां, इनके गुण ही इनकी वास्तविक ऊँचाई है। बिग भी का तो कद भी ऊँचा है, लेकिन उसने भी कई बार अपने साये को घटते-बढ़ते देखा है। कोई व्यक्ति केवल कद से ही महान नहीं होता। कर्म ही उसे महान बनाते हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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