हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १९ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४।)

☆ मंजिरी साहित्य # १९ ☆

? कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

कच्छ का रबारी समुदायl इनका काम पशुपालन होता हैl ये पुरुष रबारी, तन पर सफ़ेद केडियु और नीचे सफ़ेद सूती धोती पहनते हैं जो इनके शरीर को ठंडा रखते हैंl सर पर सफ़ेद या लाल रंग की पगड़ी जो धूप से बचाती है साथ ही विपत्ती में रस्सी भी बन जातीl कान में सोने की वेढ और गले में चांदी का कड़ा पहनते हैंl इनकी स्त्रियां कंजरी के साथ बहुत घेर वाला घाघरा जिस पर कांच के साथ का कच्छी भरत काम किया होता है वो पहनती हैंl सर सदैव काले या लाल रंग की ओढ़नी से ढका होता हैl ये अपने गले में चांदी की हंसली, कमर में कंडोरा और हाथों में हाथी दाँत के चूड़े पहने रहती हैंl

इनके पास इनके स्वयं के ऊँट, भेड़, गाय और भैंसे होती हैंl इनकी जीवन शैली घुमंती होती हैl रेगिस्तान में अपने पशुओं को ढूंढने हेतु इन्होने अपना जीपीएस बनाया कि ये रेत पर उकेरे पद चिन्हों को पढ लेते हैंl

पशुओं के तलवे का कौन सा हिस्सा रेत के अंदर गया है जिससे पशु के चलने की दिशा का अनुमान लगता हैl

इनको इस तरह पदचिन्हों को पढ़ने का बहुत अभ्यास हो गया हैl इतना कि आदमी के पैर की एड़ी और अंगूठे के रेत में धंसने से इन्हें मालूम होता था कि वह कितना भारी सामान लिये हैl रेत में धंसे क़दमों की दूरी नापकर उस व्यक्ति की लम्बाई बता देते हैंl रेत में धंसे पैरों के निशानों से पता चलता है कि आदमी जवान है या बूढाl पैरों के निशान से स्त्री, पुरुष, बच्चे का भी अनुमान लगा लेते हैंl पैरों के निशान से बता देते कि मानव है या पशु? कौन सी दिशा में कितने लोग, कितनी उम्र वाले, कितने वजन वाले और कितने वेग से गये हैंl

है ना अद्भुत भूमि सह अद्भुत लोग??

ये पगी दिन तो दिन पर रात के समय भी ये हाथ और पैरों से महसूस कर वो सारी बातें रात को भी बता देते हैंl

इनको तारों और नक्षत्रों की भी पूरी जानकारी होती हैl ध्रुव तारे की स्थिति देखकर ये चारों दिशाए बता देते हैंl नक्षत्रों को देखकर ये सही समय का भी पता बता देते हैंl

रेगिस्तान की अपनी एक अलग विशेषता होती है कि यहाँ दिन में रेत बहुत गर्म होती है और सूर्यास्त पश्चात बहुत जल्दी ठंडी भी हो जाती हैl यही कारण है कि रात में रेगिस्तान के ऊपर की हवा भारी और ठंडी होकर हाय प्रेशर बनाती है और वह कम प्रेशर वाली दिशा में बहती हैl इसीलिए अक्सर यहाँ रात को हवाएँ एक ही दिशा में चलती हैंl

ये पगी रात को सफर में निकलने से पहले थोड़ी सूखी रेत को हाथ में लेकर हवा में उड़ा देते हैंl रेत जिस दिशा में उड़ती उससे ये हवा का रुख पहचान लेते हैंl

रात के समय ये रेत में पड़े गड्ढे को छूतेl यदि अंगूठे से आगे को रेत धकेली होती तो वे समझ जाते कि मानव का पैर है या जानवर काl

आज भी यहाँ के बीएसएफ अपने देश को सावधान रखने हेतु साथ एक पगी जरूर रखते हैंl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९६ ☆ सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९६ ☆

सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

हरी हरी सी चूड़ियाँ, कजरी वाले  राग ।

बहन बेटियाँ आ गयीं, प्रकृति सजाए बाग ।।

इनके बिन लगता सदा, ये जीवन बेकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।

सावन मास आते ही धरती मानो नई दुल्हन-सी सज जाती है। चारों ओर बिछी हरियाली की चादर, बादलों की गड़गड़ाहट और बूँदों की रिमझिम—यह ऋतु केवल प्रकृति का ही नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का भी पर्व है। हिंदू पंचांग में श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय  माना गया है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान कर शिवजी नीलकंठ बने थे, और उसी विष की तपन शांत करने के लिए भक्त सावन में जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।

सोमवार का व्रत, कांवड़ियों की टोली, शिवालयों में गूँजता “ॐ नमः शिवाय” का जयघोष—यह सब मिलकर सावन को एक अलग ही रंग देते हैं। महिलाएँ हरे वस्त्र और चूड़ियाँ पहनकर, झूला झूलकर, लोकगीत गाकर इस मास का स्वागत करती हैं। हरियाली तीज इसी उल्लास की पराकाष्ठा है, जब माता पार्वती और शिवजी के पुनर्मिलन को याद कर सुहागिनें अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

सावन केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं, यह प्रकृति और परमात्मा के बीच के अटूट संबंध का प्रतीक भी है। जिस तरह वर्षा धरती को हरा-भरा कर नवजीवन देती है, उसी तरह भक्ति मन को निर्मल कर आत्मा को नवीनता प्रदान करती है। पेड़-पौधे, नदी-तालाब सब मानो शिव की जटाओं से बहती गंगा का ही विस्तार लगते हैं।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में सावन हमें ठहरने, प्रकृति को निहारने और भीतर की शांति खोजने का अवसर देता है। यही कारण है कि यह मास सदियों से कवियों, भक्तों और आम जनमानस के हृदय में समान रूप से बसा हुआ है—हरियाली, आस्था और उल्लास का त्रिवेणी संगम बनकर।

हर किसान खुशहाल हो, ऐसा होवे देश ।

आओ मिलकर हम रचें, एक सुखद परिवेश।।

वर्षा बिन होता नहीं, धरती  का शृंगार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२४ ☆ पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२४ 

?  आलेख – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा , पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

समय केवल कैलेंडर नहीं बदलता, वह मनुष्य की सोच, जीवन शैली और सामाजिक व्यवहार भी बदल देता है। इसी परिवर्तन को समझने के लिए समाजशास्त्रियों और जनसांख्यिकीय अध्येताओं ने विभिन्न आयु वर्गों को अलग अलग पीढ़ियों में एकीकृत संबोधन के रूप में वर्गीकृत किया है। इन्हें संक्षिप्त रूप में जेन एक्स, मिलेनियल, जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा जैसे नामों से जाना जाता है। ये केवल आयु का नहीं, बल्कि उस सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवेश का संकेत हैं जिसमें कोई पीढ़ी विकसित हुई।

लगभग 1965 से 1980 के बीच जन्मे लोग जेन एक्स कहलाते हैं। यह पीढ़ी परंपरागत जीवन से आधुनिक तकनीकी युग तक के संक्रमण की साक्षी रही।

1981 से 1996 के बीच जन्मे मिलेनियल या जेन वाई ने इंटरनेट, मोबाइल संचार और वैश्वीकरण को अपनाकर नई कार्य संस्कृति को आकार दिया।

1997 से 2012 के बीच जन्मी जेन जी पहली वास्तविक डिजिटल पीढ़ी मानी जाती है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इनके दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। सूचना तक त्वरित पहुंच, वैश्विक दृष्टिकोण और तकनीक के सहज उपयोग ने इस पीढ़ी की पहचान निर्मित की है।

2013 के बाद जन्मे बच्चों को जेन अल्फ़ा कहा जाता है। यह पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्मार्ट उपकरणों, आभासी दुनिया और स्वचालित प्रणालियों के बीच बड़ी हो रही है।

इसके बाद 2025 से जन्म लेने वाले बच्चों के लिए जेन बीटा शब्द प्रचलन में आ रहा है, जिनके जीवन में एआई, रोबोटिक्स और स्मार्ट परिवेश और भी गहराई से समाहित होंगे।

 

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन पीढ़ियों की समय सीमाओं में विभिन्न शोध संस्थानों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए इन्हें कठोर मानक नहीं, बल्कि सामाजिक अध्ययन के उपयोगी संकेतक मात्र माना जाता है।

 

आज जेन जी या जेन अल्फ़ा जैसे शब्द केवल फैशनेबल संबोधन नहीं हैं। ये उस युग की पहचान हैं जिसमें कोई पीढ़ी पली बढ़ी, उसने तकनीक को किस रूप में अपनाया और समाज को किस दिशा में प्रभावित किया। वस्तुतः पीढ़ियों के ये संक्षिप्त नाम बदलते समय का सामाजिक इतिहास हैं, जो मनुष्य और तकनीक के विकसित होते संबंधों की कहानी भी कहते हैं।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

☆ आलेख – संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

 संवेदना मानवीय गुण है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की भावनाओं,पीड़ा, खुशी व परिस्थितियों को समझकर उनके प्रति करुणा, सहानुभूति और सहयोग का भाव रखता है। संवेदनशील व्यक्ति केवल परिस्थिति को जानता ही नहीं, महसूस भी करता है। उसके अंदर दूसरे के नजरिए से सोच पाने की समझ होती है, दु:ख को देखकर उसके मन में करुणा का भाव उत्पन्न होता है, सहयोग के लिए आगे आता है और समाज व प्रकृति के प्रति सजग रहकर अपनी जिम्मेदारी समझता है। समाज का निर्माण भावनाओं, संवेदनाओं और परस्पर  विश्वास के आधार पर होता है। यदि संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान रह जाए और उसमें उसमें संवेदना, करुणा, सहानुभूति तथा सम्मान का अभाव हो जाए तो समाज में दूरियाँ, अविश्वास और संघर्ष बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब संवाद में मानवीय संवेदनाएँ जुड़ जातीं हैं तब वह बिखरे, विभाजित समाज को एकसूत्र में पिरोने का साधन बन जाता है। संवाद व्यक्ति को विरोधी नहीं बल्कि सहयात्री मानता है। इसमें मतभेद हो सकते हैं किन्तु मनभेद नहीं होना चाहिए। जब संवाद में सहानुभूति, धैर्य, सम्मान और करुणा का समावेश होता है तब वह संवेदनात्मक संवाद कहलाता है। सक्रिय एवं धैर्यपूर्ण श्रवण, भिन्न मतों का सम्मान, पूर्वाग्रहों से मुक्त दृष्टिकोण, भाषा में संयम व शिष्टता, समाधान केन्द्रित सोच, मानवीय गरिमा का संरक्षण, विश्वास निर्माण की प्रक्रिया आदि संवाद की प्रमुख विशेषताएँ होती हैं।

भारतीय संस्कृति में संवाद केवल सूचना का माध्यम नहीं, सत्य की खोज का साधन माना गया है। उपनिषदों में गुरू और शिष्य के बीच संवाद की परम्परा ज्ञान का आधार रही। गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के मध्य संवेदनात्मक संवाद अनुपम उदाहरण है। विषादग्रस्त अर्जुन को श्रीकृष्ण युद्धभूमि में आदेश नहीं देते अपितु उसके मनोभावों को समझकर संशयों का समाधान करते हैं। रामायण में श्रीराम निषादराज, शबरी, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान आदि से उनकी गरिमा के अनुरूप संवाद करते हैं। बौद्ध और जैन परम्परा में भी करुणा, अहिंसा और संवाद को परिवर्तन का आधार माना गया है। महात्मा गाँधी का सार्वजनिक जीवन संवाद की शक्ति पर ही आधारित था। उन्होंने विरोधियों से कभी संवाद बन्द नहीं किया। उनका कथन था कि– असहमति शत्रुता का कारण नहीं होनी चाहिए। प्रेमचंद की कहानियाँ सामाजिक विषमता को उजागर करते हुए करुणा और न्याय का संदेश देतीं हैं। कबीरदास की वाणी धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मानवीय एकता का आह्वान करती है– ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।। इसके अतिरिक्त वसुधैव कुटुम्बकम् तथा सर्वे भवन्तु सुखिन: जैसे भारतीय आदर्श संवेदनात्मक संवाद की वैश्विक भावना को अभिव्यक्त करते हैं।

समकालीन समाज आज अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है। आज लोग वैचारिक ध्रुवीकरण के आधार पर समूहों में बँटते जा रहे हैं। मतभेद को शत्रुता समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आर्थिक विषमता, शिक्षा में असंतुलन और अवसरों की असमान उपलब्धता सामाजिक दूरी का कारण बन रही है। छोटी-छोटी घटनाएँ भी बड़े सामाजिक तनाव का कारण बन जातीं हैं क्योंकि संवाद के स्थान पर अविश्वास बढ़ जाता है। सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रिया, अपमानजनक टिप्पणियाँ तनाव उत्पन्न करतीं हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन और व्यस्त जीवन-शैली ने आत्मीय संवाद के अवसर कम कर दिए हैं। इन मुश्किल हालातों में संवेदनात्मक संवाद अविश्वास को विश्वास में बदलता है, हिंसा के स्थान पर समझ विकसित करता है, समाज में सहिष्णुता बढ़ाता है, विविधता में एकता की भावना को मजबूत करता है, लोकतांत्रिक संस्कृति को सशक्त बनाता है, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव को कम करता है तथा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को गति देता है।

सारत: कह सकते हैं कि संवेदनात्मक संवाद सामाजिक स्थिरता, लोकतांत्रिक परिपक्वता, राष्ट्रीय एकता व विभाजित समाज को जोड़ने की एक सुन्दर सशक्त पहल है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है परन्तु मनभेद समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। अत: आवश्यक है कि हम अपने भीतर सहनशीलता, धैर्य और परस्पर समझ को बढ़ाएँ! किसी को सुधारने का प्रयास प्रेम और श्रद्धा से करें! केवल निंदा या उपेक्षा से कोई सुधार नहीं होता। जहाँ प्रेम और संवेदनात्मक संवाद जीवित रहता है, वहाँ विश्वास जन्म लेता है और जहाँ विश्वास होता है वहाँ समाज विभाजन से ऊपर उठकर समरसता और प्रगति की ओर अग्रसर होता है।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५८ ⇒ नाम की महिमा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नाम की महिमा।)

?अभी अभी # १०५८ ⇒ आलेख – नाम की महिमा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संज्ञा हो या सर्वनाम, हमारा नाम के बिना काम नहीं चलता। नाम में ही ईश्वर का वास है, नाम में ही भगवान भी हैं और नारायण भी, फिर भी हमें हमारे मनमंदिर के राम के दर्शन नहीं होते।

बचपन से ही मैं राम के करीब भी रहा हूं, और ईश्वर के करीब भी ! नारायण तो मेरा पक्का दोस्त था, कल के भगवान को हम आज भगवान भाई कहकर पुकारते हैं, बड़े अच्छे मिलनसार व्यक्ति हैं।।

अपने इष्ट और आराध्य को हम जिस भी नाम से स्मरण करते हैं, पुकारते हैं और भजते हैं, वे सभी तो शरीर रूप में हमारे आसपास मौजूद हैं, लेकिन इस नश्वर जीव पर माया का ऐसा पर्दा पड़ा है, कि वह सिर्फ नाम में ही नहीं, रूप और स्वरूप में भी उलझा है। मंदिर में विराजमान मर्यादा पुरुषोत्तम राम अलग है और मेरा मित्र राम अलग। दोनों की आपस में कोई तुलना नहीं हो सकती।

ईश्वर, परमेश्वर, भगवान अथवा अपने इष्ट को हम जानते, पहचानते और मानते हैं, उनकी जप, पूजा, आराधना, प्रार्थना और सेवा सुश्रुषा करने में जो भक्ति भाव और परमानंद की अनुभूति होती है, वह किसी परिचित गिरीश और जगदीश से मिलने अथवा स्मरण मात्र से संभव नहीं। कहां राजा भोज…?

आदर्श अलग होता है और वास्तविकता और हकीकत उससे बहुत अलग होती है। गरीबों, दीन हीन की सेवा ही ईश्वर की सेवा है, माता पिता के चरणों में स्वर्ग है और गौ माता की तो बस पूछिए ही मत। फिर भी मंदिर मंदिर है और गुरुद्वारा गुरुद्वारा। अयोध्या के राम ही वास्तविक राम हैं और मथुरा द्वारका के कृष्ण ही तो कृष्ण कन्हैया हैं।

क्या सिर्फ नाम लेने, स्मरण करने अथवा अपने इष्ट को भजने से ही जीव का कल्याण हो सकता है। कहने को तो कहा भी गया है, कलियुग नाम आधारा! और शायद इसीलिए किसी अपने मित्र नारायण को पुकारते पुकारते आपको भी साक्षात नारायण के दर्शन हो जाएं।।

हमारे आसपास कितने स्त्री पुरुष के ऐसे नाम मंडरा रहे हैं, जिनके नाम मात्र से ही किसी देवी देवता का स्मरण हो आता है। सीता, सरस्वती, मंगला, गायत्री और लक्ष्मी जैसे नाम पहले रखे ही जाते थे, आज भी रखे जाते हैं, बस उनकी दशा मत पूछिए, क्योंकि आज सरस्वती काम पर नहीं आने वाली, बेचारी बीमार है।

यह इंसान बहुत चतुर और चालाक है। वह एक तीर से दो शिकार करना चाहता है, रमेश, दिनेश, सुरेश, महेश, अविनाश, अरविंद और कई शैलेष उसके परिचित स्नेही, मित्र, रिश्तेदार और करीबी हैं, आम के आम और गुठलियों के दाम, यानी उनके नाम के बहाने अपने इष्ट का भी नाम लेने में आ जाएगा और पहचान के लिए उनके नाम के आगे वर्मा, सक्सेना, अवस्थी और श्रीवास्तव सुशोभित हो जाएगा।।

नाम से ही हमारी पहचान है, प्रसिद्धि है। एक राम नाम ही तो हमारे सभी बिगाड़े काम बनाता है।

कहीं खाटू श्याम तो कहीं सांवरिया सेठ, किसी के महाकाल तो किसी के ओंकार। पुणे में अगर दगड़ू सेठ के गणपति की महिमा है तो पूरे महाराष्ट्र में अष्ट विनायक विराजमान हैं। एक और मेरा परम मित्र गणेश मुझे नैनीताल बुला रहा है, तो दूसरी ओर अभिन्न हृदय नारायण जी का प्रयाग राज का आग्रहपूर्ण आमंत्रण लंबित है।

नाम में ही रस और रूप है। महाराष्ट्र के संत गोंदवलेकर महाराज ने नाम के माहात्म्य पर एक पुस्तक लिखी है, प्रवचन पारिजात, जिसमें नाम की महिमा पर उनके ३६५ प्रवचन संकलित हैं। १ जनवरी से ३१ जनवरी तक। रोज एक पृष्ठ पढ़िए, नाम में खो जाइए। राम तेरे कितने नाम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५७ ⇒ तन – बदन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तन – बदन।)

?अभी अभी # १०५७ ⇒ आलेख – तन – बदन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस काया को सत्तर वसंत हो गए लेकिन मैं आज तक तन में बदन का स्थान तय नहीं कर पाया। वनस्पति जगत में जरूर एक पेड़ के तीन भाग होते हैं, जड़, तना और फलती फूलती टहनियां। लेकिन इंसान के पास तो एड़ी से चोटी तक तन ही तन है। तन में मन है, मन में वतन है और जेब में वेतन है।।

मैंने यह भी सुना है कि अपने पांव पर खड़े होते ही कुछ लोगों के बदन में पैसे की गर्मी चढ़ जाती है तो कुछ सिने तारिकाएं बदन पे सितारे लपेट लेती हैं। आप विश्वास नहीं करेंगे एक ज़माने में तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बदन में ज्वाला जागी थी, और आजकल पश्चिम बंगाल की ममता के बदन में तो साक्षात दुर्गा माता का वास है।।

लगता तो ऐसा है मानो तन – बदन का चोली दामन का साथ है लेकिन जब मेरे दामन में खुशियां आती हैं तो चोली कहीं नजर नहीं आती। हां पूरे बदन में खुशी की एक लहर ज़रूर दौड़ जाती है, और जब कोई वामी अथवा टुकड़े टुकड़े गैंग वाला नजर आ जाता है, तो सारे तन – बदन में आग लग जाती है। आखिर ये आग कब बुझेगी।

जगदीश जी की आरती मैं रोज गाता हूं ! तन, मन, धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन इसमें भी अपना बदन चुपके से छुपा ही लेता हूं। एक भारतीय पत्नी के त्याग और समर्पण की तो बात ही मत पूछिए। लेकिन वहां भी तन, मन से आगे नहीं बढ़ा जाता। किसी के तन पर आपका अधिकार हो सकता है, चलिए मन भी आपको दिया, अब बदन तो छोड़ दो।।

अगर तन पर कपड़े धारण किए जाते हैं तो बदन पर मालिश की जाती है। तेज़ बुखार में तन की सुध नहीं रहती, पूरा बदन पहले टूटता है, फिर गर्म हो जाता है।

एक क्रोसिन पेन रिलीफ से शरीर को आराम मिलता है।

इससे यह सिद्ध हुआ कि हमारे शरीर में ही तन – बदन का वास है। जब भी दफ्तर की कुर्सी पर बैठें, ज़रा तनकर बैठें। घर पर व्यायाम से तन को व मन को स्वस्थ रखें, तथा अधिक व्यायाम के पश्चात बदन को ढीला छोड़ दें। लंबी गहरी सांस लेते रहें। सारा तनाव निकल जाएगा।।

जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे 

हसरत जयपुरी ! यकीन नहीं होता, तो देख लीजिए, तन – बदन का अध्यात्मिक दर्शन ;

तन में अग्नि, मन में चुभन

कांप उठा मोरा गोरा बदन

ओ रब्बा खैर …खैर

रब्बा खैर ही करे, तो सबकी खैर ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ एक जुझारू व्यक्तित्व “भिखारी ठाकुर” ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

(जन्म – १८ दिसंबर १८८७ – मृत्यु १० जुलाई १९७१)

☆ आलेख ☆ एक जुझारू व्यक्तित्व “भिखारी ठाकुर” ☆

जुझारू होने का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता कि आप किसी संघर्षमय परिस्थिति में घिरे हैं और लगातार जूझ रहे हैं; बल्कि जुझारू होने का असली अर्थ यह है कि 👉आपके पास जो कुछ भी सीमित संसाधन हैं, उनमें ही संतुष्ट और पर्याप्त रहकर खुद को साबित करना है… 

हमारे छपरा शहर में एक चौराहा है,“भिखारी ठाकुर के नाम से चौराहा”। बचपन में जब हम छोटे थे, तो यह नाम सुनने में थोड़ा अजीब लगता था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नाम तो आसानी से समझ में आ जाते थे, लेकिन भिखारी ठाकुरनाम का अर्थ उस उम्र में पल्ले नहीं पड़ता था। हालांकि, जैसे-जैसे उम्र बढ़ी और समझदारी विकसित हुई, वैसे-वैसे भिखारी ठाकुर की महान उपलब्धियां भी समझ आने लगीं।

तब यह अहसास हुआ कि कोई व्यक्ति… शून्य से शुरू हुआ सफर तय करके भी सफलता के शिखर तक पहुँच सकता है। आज भिखारी ठाकुर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भोजपुरी संस्कृति और जुझारू व्यक्तित्व की एक वैश्विक पहचान बन चुके हैं।

लोक के महानायक और संघर्ष की जीवंत मिसाल – शून्य से शिखर का वास्तविक अर्थ… 

जिस अभावग्रस्त और पिछड़े परिवेश में भिखारी ठाकुर ने जन्म लिया था, वहाँ से उठकर कला और साहित्य की दुनिया में ऐसा इतिहास रचना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उनके जीवन ने यह साबित कर दिया कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए महलों की नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और हौसले की जरूरत होती है।

समाज का सटीक आईना:

विदेशिया‘, ‘बेटी-वियोगऔर भाई-विरोध जैसी उनकी रचनाओं ने केवल समाज का मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज के भीतर मौजूद कुरूपताओं, पलायन के दर्द और पारिवारिक टूटन को बहुत ही बेबाकी से सबके सामने रखा। उन्होंने आम जनमानस की भाषा और उनकी पीड़ा को अपनी कला की धुरी बनाया।

छपरा की माटी का गौरव…

छपरा (सारण) की इस पावन माटी ने देश को कई रत्न दिए हैं, लेकिन भिखारी ठाकुर का स्थान सर्वोपरि है। छपरा का वह चौराहा सिर्फ एक भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि एक साधारण सा दिखने वाला इंसान भी अपनी मेहनत और जुझारूपन से इतिहास रच सकता है।

आज के दौर में प्रासंगिकता

आज के समय में जब युवा हर छोटी-बड़ी असफलता से निराश हो जाते हैं, तब भिखारी ठाकुर का जीवन और उनका संघर्ष एक मजबूत प्रकाशस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि जो संसाधन आपके पास हैं, उन्हीं का इस्तेमाल करके अपनी एक अलग लकीर खींची जाए।

भिखारी ठाकुर और उनका वह चौराहा हमें यह सिखाता है कि सफलता पद या पैसों से नहीं, बल्कि आपके द्वारा समाज को दिए गए योगदान और आपके अटूट संघर्ष से आंकी जाती है।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५६ ⇒ दर्द और हमदर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दर्द और हमदर्द।)

?अभी अभी # १०५६ ⇒ आलेख – दर्द और हमदर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जहां दर्द है, वहां कोई न कोई हमदर्द भी है ! दुख मन का हो, या दर्द तन का हो, एक आह या पुकार जब उठती है, किसी न किसी हमदर्द की याद अवश्य आती है। वह कोई अपना ही होता है, जिसका अस्तित्व या तो इस दुनिया में होता है या किसी और दुनिया में।

दो कदम चले, रास्ते के पत्थर से ठोकर जब लगी, क्यूं उसकी याद आई, जिसे हम कभी मां कहते, कभी अम्मा, कभी आई। जब दुख दर्द में कराहते, मुंह से अनायास अरे राम रे, अथवा क्यों निकलता, हे राम या या खुदा, अब तो तू ही बचा। किसी को संकट में हनुमान याद आते तो किसी को नानी। क्या नहीं ये सब उन हम दर्दों की फेहरिस्त, जो हमें याद मुंह जबानी।।

हमारे दर्द का हमदर्द कोई औरत भी हो सकती है, कोई मर्द भी हो सकता है। वह हमारे दुख दर्द को दूर तो नहीं करता, लेकिन दिल को राहत और तसल्ली अवश्य देता है, जिससे कभी यह शिकायत नहीं रह जाती, कि :

हंसने की चाह ने

कितना मुझे रुलाया है,

कोई हमदर्द नहीं,

दर्द मेरा साया है।

जी हां ! यह सच है कि आपका हम दर्द हमेशा साये की तरह आपके साथ साथ चलता है। कितना दर्द है राजा मेहंदी अली खान के इस गीत में ;

तू जहां जहां चलेगा

मेरा साया साथ होगा।

कभी मुझको याद करके,

जो बहेंगे तेरे आंसू

तो वहीं पे रोक लेंगे

उन्हें आ के मेरे आंसू

तू जिधर का रुख करेगा

मेरा साया साथ होगा।।

आखिर ये साया कौन है ! यही वो रहबर है, जो कभी दोस्त बनकर, कभी कोई रिश्ता बनकर, तो कभी कोई फरिश्ता बनकर हमारे दर्द के साथ चलता है। हम किसी का घाव ठीक नहीं कर सकते, लेकिन प्रेम के दो शब्द, मरहम का काम करते हैं, और तिरस्कार की एक नजर, जले पर नमक छिड़कने का काम करती है।

क्या हमने कभी कोई ऐसी फेहरिस्त बनाई है, जब हमने डूबते को तिनके का सहारा दिया हो। किसी दुखी इंसान के आंसू पोंछे हों। यही ज़बान तो छुरी भी है और कटार भी। मरहम भी यही और प्यार, दुलार भी।।

नेकी और बदी, ये ज़िन्दगी की किताब के शब्द हैं, महज किसी शब्दकोश के दो आखर नहीं। चलती ट्रेन में जब कोई अनजान व्यक्ति प्लेटफॉर्म पर दौड़ता हुआ, आपकी प्यास बुझाने के लिए, आपका खाली बर्तन भरता है, तो क्या आप सोच सकते हैं, यह कितनी बड़ी सेवा है। ताली, थाली पर बहुत राजनीति और व्यंग्य हुआ, लेकिन सच्चाई के धरातल पर भी बहुत कुछ हुआ। देर से ही सही, किसी ने तो पलायन करते मजदूरों की आवाज़ उठाई।

ये चलते फिरते हमदर्द फरिश्ते आपको सब जगह मिलेंगे। कहीं नजर नहीं आएंगे, कहीं रूबरू मिलेंगे। शैलेन्द्र से अच्छा इस फलसफे को हमें और कोई नहीं समझा सकता ;

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार

किसी के वास्ते हो, तेरे दिल में प्यार

जीना इसी का नाम है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४६ – सच्चा गुरु ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४६ सच्चा गुरु… ?

मनुष्य अशेष विद्यार्थी है। प्रति पल कुछ घट रहा है, प्रति पल मनुष्य बढ़ रहा है। घटने का मुग्ध करता विरोधाभास यह कि  प्रति पल, पल भी घट रहा है। 

हर पल के घटनाक्रम से मनुष्य कुछ ग्रहण कर रहा है। हर पल अनुभव में वृद्धि हो रही है, हर पल वृद्धत्व समृद्ध हो रहा है।

समृद्धि की इस यात्रा में प्रायः हर पथिक सन्मार्ग का संकेत कर सकने वाले मील के पत्थर को तलाशता है। इसे गुरु, शिक्षक, माँ, पिता, मार्गदर्शक,  सखा, सखी कोई भी नाम दिया जा सकता है।

विशेष बात यह कि जैसे हर पिता किसी का पुत्र भी होता है, उसी तरह अनुयायी या शिष्य,  मार्गदर्शक भी होता है। गुरु वह नहीं जो कहे कि बस मेरे दिखाये मार्ग पर चलो अपितु वह है जो तुम्हारे भीतर अपना मार्ग ढूँढ़ने की प्यास जगा सके। गुरु वह है जो तुम्हें ‘एक्सप्लोर’ कर सके, समृद्ध कर सके। गुरु वह है जो तुम्हारी क्षमताओं को सक्रिय और विकसित कर सके।

एक संत थे जिनके लिए कहा जाता था कि वे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानते हैं। स्वाभाविक था कि उनके शिष्यों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि होती गई। हरेक के मन में ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानने की सुप्त इच्छा थी। एक दिन दैनिक साधना के उपरांत उनके परम शिष्य ने इस बाबत पूछ ही लिया। गुरुजी बोले, मैं तुम्हें ईश्वर तक पहुँचने के मार्गदर्शक तत्व बता सकता हूँ पर अपना मार्ग तुम्हें स्वयं ढूँढ़ना होगा।

ज्ञानी जानता है कि पुल पार करने से नदी पार नहीं होती। नदी पार करने के लिए उसमें कूदना पड़ता है। लहरों के थपेड़ों के साथ अन्य सभी आशंकाओं को भी तैरकर परास्त करना होता है। तैराकी के गुर सिखाये जा सकते हैं पर तैरते समय हरेक को अपने हिस्से की चुनौतियों से स्वयं दो-दो हाथ करने पड़ते हैं।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहें तो जीपीएस लगाकर गंतव्य तक पहुँचा तो जा सकता है पर रास्ते का ज्ञान नहीं होता। रास्ता समझने के लिए स्वयं भटकना होता है। अपना रास्ता स्वयं ढूँढ़ना होता है। स्वयं की क्षमताओं को सक्रिय करना होता है।  स्वयं को स्वयं ही अपना शोध करना होता है, स्वयं को स्वयं ही अपना बोध  करना होता है।

ध्यान रहे कि पथ तो पहले से ही है। तुम उसका अनुसंधान भर करते हो, आविष्कार नहीं। यह भी भान रहे कि पथ का अनुसंधान करनेवाले तुम अकेले नहीं हो, असंख्य दूसरे भी अपने-अपने तरीके से अनुसंधान कर रहे हैं। सारे मार्गों का अंतिम लक्ष्य एक ही है। अत: यह एकाकार का मार्ग है।

सच्चा गुरु वह है जो  तुम्हें एकल नहीं एकाकार की यात्रा कराये। एकाकार ऐसा कि पता ही न चले कि तुम गुरु के साथ यात्रा पर हो या तुम्हारे साथ गुरु यात्रा पर है। दोनों साथ तो चलें पर कोई किसी की उंगली न पकड़े।

यदि ऐसा गुरु तुम्हारे जीवन में है तो तुम धन्य हो। तुम्हारा मार्ग प्रशस्त है।

जिनकी गुरुता ने जीवन का मार्ग सुकर किया, उनका वंदन। जिन्होंने मेरी लघुता में गुरुता देखी, उन्हें नमन।

गुरु पूर्णिमा की अग्रिम शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पापा का गुस्सा: अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – पापा का गुस्सा: अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व।)

☆ आलेख – पापा का गुस्सा: अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भारतीय परिवार में पिता की भूमिका आर्थिक भरण-पोषण तक सीमित नहीं है। वह परिवार का संरक्षक, मार्गदर्शक,अनुशासक और भावनात्मक स्तम्भ होता है। यदि माँ वात्सल्य की मूर्ति है तो पिता को दृढ़ता और संकल्प का आधार माना जाता है। पारिवारिक व्यवस्था में वह अनुशासन, उत्तरदायित्व और संरक्षण का प्रतीक है। धर्म, मर्यादा, संस्कार और पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी है किन्तु इसी भूमिका का एक ऐसा भी पक्ष है जो प्राय: बच्चों को कठोर, भयावह और अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है, वह है— पिता का गुस्सा। यह गुस्सा केवल क्रोध की सहज अभिव्यक्ति नहीं है अपितु यह अनुशासन स्थापित करने का प्रयास, भविष्य की चिंता का परिणाम तो कभी आर्थिक, सामाजिक व मानसिक दबावों की प्रतिक्रिया होती है। उसके गुस्से को नकारात्मक व्यवहार मान लेना उचित नहीं है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्येक कठोर स्वर हिंसा नहीं होता किन्तु प्रत्येक अनियंत्रित क्रोध निश्चित रूप से सम्बन्धों को आहत करता है।

    पिता का क्रोध अनेक परिस्थितियों का परिणाम होता है। वह अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहता है। पढ़ाई में लापरवाही, अनुशासनहीनता या गलत संगति उसे चिंतित करती है,जो कभी-कभी गुस्से में प्रकट होती है। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, रोजगार की अस्थिरता, महँगाई और सामाजिक अपेक्षाएँ, उसके अंदर मानसिक तनाव उत्पन्न करतीं हैं। कई पिता अपनी भावनाएँ सहजता से व्यक्त नहीं कर पाते, जिसके कारण प्रेम के स्थान पर कठोरता दिखाई देती है। आज के बच्चे स्वतंत्रता चाहते हैं जबकि कई पिता परम्परागत अनुशासन में विश्वास रखते हैं। ये अंतर भी संघर्ष को जन्म देते हैं लेकिन अक्सर कहा जाता है कि पिता इसलिए डाँटते हैं क्योंकि उन्हें बच्चों की चिंता होती है, पिता का गुस्सा प्रेम का दूसरा रूप है।विचारणीय तथ्य यह भी है कि प्रेम की अभिव्यक्ति यदि क्रोध के माध्यम से होगी तो बच्चे उसके पीछे छिपे स्नेह को नहीं समझ पाएँगें। एतदर्थ प्रेम और अनुशासन के बीच संतुलन आवश्यक है। अनुशासन, प्रेरणा, संवाद निरंतर मार्गदर्शन से भी स्थापित किया जा सकता है। अनुशासन और भय में इतना ही अंतर है कि  अनुशासन आत्मविश्वास बढ़ाता है, भय आत्मविश्वास को घटाता है। अनुशासन व्यक्तित्व विकसित करता है तो भय व्यक्तित्व को दबा देता है। बच्चे केवल शब्द नहीं बल्कि भावनाएँ भी सीखते हैं। यदि घर में संवाद, सम्मान और संयम होगा तो बच्चे इन्हीं मूल्यों को अपनाएँगे इसके विपरीत यदि घर में चिल्लाना, अपमानित करना या भय का वातावरण होगा तो बच्चे झूठ बोल सकते हैं, आक्रामक व संकोची बन सकते हैं, आत्मविश्वास खो सकते हैं और पिता से भावनात्मक दूरी बना सकते हैं।

     आज का पिता पहले की अपेक्षा जटिल परिस्थितियों में जीवन को जी रहा है। बढ़ती आर्थिक प्रतिस्पर्धा, नौकरी का असुरक्षित वातावरण, डिजिटल व्यसन,सोशल मीडिया का प्रभाव, शिक्षा का बढ़ता दबाव, परिवार के लिए समय का अभाव आदि परिस्थितियों में पिता का तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। यदि तनाव का उचित प्रबंधन न हो तो वह घर में क्रोध के रूप में प्रकट हो सकता है। आधुनिक पारिवारिक मनोविज्ञान यह स्वीकार करता है कि एक सफल पिता वह नहीं जिससे बच्चे भयभीत रहें अपितु वह है जिस पर बच्चे विश्वास करें। सकारात्मक पितृत्व के लिए क्रोध से पहले संवाद, आदेश से पहले कारण, आलोचना से पहले प्रोत्साहन, दण्ड से पहले मार्गदर्शन, नियंत्रण से पहले विश्वास आदि प्रमुख आधार बन सकते हैं। गुस्से पर नियंत्रण रखने के लिए भी पिता को प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुकना चाहिए, समस्या पर बात करें, बच्चे की आयु और मानसिक अवस्था को समझें, संवाद के लिए समय सुनिश्चित करें! साथ ही बच्चों को भी चाहिए कि वे पिता के संघर्षों को समझें, झूठ से बचें, सम्मानपूर्वक अपनी बात रखें, पिता की बातों की कद्र करें, अनुभव हमेशा उम्र से बड़ा होता है।

       सारत: कहा जा सकता है कि पिता का गुस्सा : अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व है। यह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं अपितु जिम्मेदारियों, सामाजिक अपेक्षाओं, आर्थिक दबावों और संतान के भविष्य की चिंता का मिश्रित परिणाम होता है फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि प्रेम की अभिव्यक्ति यदि केवल कठोरता के माध्यम से होगी तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। आधुनिक समय की आवश्यकता है कि पिता अनुशासन और स्नेह के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करे जिससे बच्चे भय नही, विश्वास के साथ निकट आ सकें। पितृत्व ऐसा हो जिसमें अनुशासन तो हो पर अपमान न हो, दृढ़ता हो पर क्रूरता न हो, अपेक्षाएँ हों तो संवाद भी हो और सबसे बढ़कर प्रेम हो, जो शब्दों, व्यवहार व अपनत्व में दिखाई दे।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares