(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ श्राद्ध पक्ष के निमित्त…
पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक श्राद्धपक्ष चलता है। इसका भावपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और कर्तव्य का निर्वहन है। व्यवहार पक्ष देखें तो पितरों को खीर, पूड़ी व मिष्ठान का भोग इसे तृप्तिपर्व का रूप देता है। जगत के रंगमंच के पार्श्व में जा चुकी आत्माओं की तृप्ति के लिए स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म को भोज देना लोकातीत एकात्मता है। ऐसी सदाशय व उत्तुंग अलौकिकता भारतीय दर्शन में ही संभव है। यूँ भी सनातन परंपरा में प्रेत से प्रिय का अतिरेक अभिप्रेरित है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने की ऐसी परंपरा वाला श्राद्धपक्ष संभवत: विश्व का एकमात्र अनुष्ठान है।
इस अनुष्ठान के निमित्त प्राय: हम संबंधित तिथि को संबंधित दिवंगत का श्राद्ध कर इति कर लेते हैं। अधिकांशत: सभी अपने घर में पूर्वजों के फोटो लगाते हैं। नियमित रूप से दीया-बाती भी करते हैं।
दैहिक रूप से अपने माता-पिता या पूर्वजों का अंश होने के नाते उनके प्रति श्रद्धावनत होना सहज है। यह भी स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने दिवंगत परिजन के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उनके गुणों का स्मरण करे। प्रश्न है कि क्या हम दिवंगत के गुणों में से किसी एक या दो को आत्मसात कर पाते हैं?
बहुधा सुनने को मिलता है कि मेरी माँ परिश्रमी थी पर मैं बहुत आलसी हूँ।…क्या शेष जीवन यही कहकर बीतेगा या दिवंगत के परिश्रम को अपनाकर उन्हें चैतन्य रखने में अपनी भूमिका निभाई जाएगी?… मेरे पिता समय का पालन करते थे, वह पंक्चुअल थे।…इधर सवारी किसी को दिये समय से आधे घंटे बाद घर से निकलती है। विदेह स्वरूप में पिता की स्मृति को जीवंत रखने के लिए क्या किया? कहा गया है,
यद्यष्टाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो: जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी का अनुसरण करते हैं। भावार्थ है कि अपने पूर्वजों के गुणों को अपनाना, उनके श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
विधि विधान और लोकाचार से पूर्वजों का श्राद्ध करते हुए अपने पूर्वजों के गुणों को आत्मसात करने का संकल्प भी अवश्य लें। पूर्वजों की आत्मा को इससे सच्चा आनंद प्राप्त होगा।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी
इस साधना का मंत्र होगा-
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विवेक के पन्ने…“।)
अभी अभी # ७८९ ⇒ आलेख – विवेक के पन्ने श्री प्रदीप शर्मा
ज़िन्दगी एक डायरी है, जिसे आप चाहे लिखें, न लिखें ! कुछ पन्ने विधाता लिखता है, कुछ हमारे द्वारा लिखे जाते हैं। फिर भी कुछ पन्ने कोरे ही रह जाते हैं। मेरी डायरी में भी एक पन्ना विवेक का है, जिस पर आज तक कुछ नहीं लिखा गया। कभी तो श्रीगणेश करना ही है ! सोचा, आज से ही क्यों न कर दूँ।
बुद्धि और ज्ञान के प्रदाता, ऐसा कहा जाता है, मंगलमूर्ति श्रीगणेश हैं ! विवेक के बारे में जब बात करो, तो लोग विवेकानंद तक चले जाते हैं। जब किसी बुद्धिमान को समझा-समझाकर हार जाते हैं, तो मज़बूरन कहना पड़ता है, भाई !अपने विवेक से काम लो।।
ऐसा कहा जाता है, बुद्धि का संबंध मन से है, और विवेक का अन्तर्मन से ! मन से तो हमेशा यही शिकायत रहती है, कि वह मनमानी करता है। इसीलिए कभी भी किसी बुद्धिमान व्यक्ति की मति फिर सकती है। विवेक का मामला थोड़ा अलग है। उस पर मन का नहीं अन्तर्मन का अंकुश जो है।
कभी कभी इंसान का विवेक भी काम नहीं आता। एक सज्जन किसी ज्ञानी के प्रवचन सुन घर लौटे ! ज्ञानी पुरुष की एक बात उन्होंने गाँठ बाँध ली थी ! हर काम विवेक से पूछकर किया करो अब तक वे स्वावलंबी थे। अपना काम स्वयं करते थे।
अब वे सारा काम विवेक से पूछकर करने लगे। विवेक पर भरोसा किया, और धोखा खाया, क्योंकि विवेक तो उनके लड़के का ही नाम था।।
बुद्धि और मन से परे प्रज्ञा का निवास है और विवेक उसकी रखवाली करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, और मत्सर का अन्तर्मन में प्रवेश वर्जित है। वैसे भी इनका कार्य-क्षेत्र मन तक ही सीमित है। केवल संयम ही हमें विवेक का मार्ग दिखला सकता है। और बिना मन को बस में किये संयम भी हाथ नहीं आता। योगानुशासन की यम-नियम ही बुनियाद हैं। हाथ-पाँव को तोड़ना-मरोड़ना कोई योग नहीं।
विवेक का पन्ना अति-वृहद है ! लेकिन यह स्थूल ज्ञान के शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हम होते जाएँगे, विवेक के पन्ने अपने आप खुलते जाएँगे। आइए, मन से पार चलें।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धीमी गति…“।)
अभी अभी # ७८८ ⇒ आलेख – धीमी गति श्री प्रदीप शर्मा
लिप्टन माने अच्छी चाय, और धीमी गति माने स्लो मोशन !कभी आकाशवाणी पर धीमी गति के समाचार प्रसारित होते थे। जब हम किसी को डिक्टेशन देते हैं, तो हमें अपने बोलने की गति को धीमा करना पड़ता है। वह पहले सुनता है, समझता है, और फिर लिखता है। सुनने और लिखने में तालमेल को ही डिक्टेशन कहते हैं।
हिंदी में धीमा और तेज़ के लिए दो शब्द प्रचलित हैं, चुस्त और सुस्त। लोग चुस्ती को तंदुरुस्ती और सुस्ती को बीमारी अथवा आलस्य से जोड़ लेते हैं। लाइफबॉय है जहाँ तंदुरुस्ती है वहाँ। टी वी के एक विज्ञापन में तो एक मोटे बच्चे का साबुन भी स्लो बताया गया है, धीते रहो, धोते रहो ! वहीं एक लड़की सिर्फ हैंड वाश लगाती है, और बैक्टीरिया ग़ायब। साबुन भी कहीं स्लो होता है। विज्ञापन क्या न कराए। ।
कुछ लोग चाय चुस्कियां ले लेकर पीते हैं, गर्म चाय को फूँक मार-मारकर ठंडी होने पर पीते हैं, तो कुछ इधर मुँह पर लगाई, और उधर खत्म। भोजन को चबा-चबाकर खाना चाहिए। कुछ लोग भोजन को चबाते ही रह जाते हैं, और सामने वाला पंगत छोड़कर उठ खड़ा होता है। जीवन में कहीं गति है, तो कहीं धीमी गति। कुछ तेज चलते हैं, कुछ धीमे ! जो धीमे चलते हैं, वे यह मानकर चलते हैं, जल्दी का काम शैतान का। धीरे चलिए, सुरक्षित पहुँचिये। और शैतान बाज़ी मार ले जाता है। इनका निर्णय सुरक्षित रखा रह जाता है।
कुछ लोग तेज आवाज में बात करते हैं, तो कुछ इतना धीरे बोलते हैं, कि शायद वे खुद भी नहीं सुन पाते। जो तेज़ आवाज़ में बात करते हैं, उनकी बात ग़लत होते हुए भी सही प्रतीत होती है, और जो धीमी आवाज़ में बातें करते हैं, वे मनमोहनसिंह कहलाते हैं। ।
कुछ की आवाज़ की गति तेज होती है तो कुछ लोग बड़े आराम से बोलते हैं। उनका एक वाक्य एक पेरेग्राफ जितना लंबा होता है, शब्दों की लंबाई के कारण नहीं, बोलने में ठहराव के कारण। एक उदाहरण पेश है।
हमारे शाखा प्रबंधक बहुत आराम से, रूक-रुककर बातें करते थे। वह मोबाइल का नहीं, ट्रंक कॉल का ज़माना था। बड़ी मुश्किल से कॉल लगता था, और तीन मिनिट में समाप्त हो जाता था। आप या तो कॉल एक्सटेंड करें, या फिर से लगाएं !
सुबह एकाएक उनके केबिन की घंटी बजी, उन्होंने टेलीफोन उठाया ! गुड मॉर्निंग सर, (pause)दिस इज़ बैंक ऑफ इंडिया, (pause) लक्ष्मी बाई नगर ब्रांच, (pause) इंदौर। (एक मिनिट पूरा) आय एम आर. आर. जोशी, (pause) ब्रांच मैनेजर, (pause)स्पीकिंग। ( दो मिनिट पूरे ) व्हाट कैन आय डू फ़ॉर यू सर्। और फ़ोन कट गया। तीन मिनिट पूरे। उन्होंने फिर से फ़ोन लगाया, लाइन नहीं मिली। । (अतिशयोक्ति अलंकार)
जो लोग बहुत आराम से बोलते हैं, उन्हें आप आराम से ही सुन सकते हैं ! अगर आप जल्दी में हैं, तो उनकी पूरी बात शायद ही सुन पाएँ। यही बात धीमी गति और तेज़ गति पर लागू होती है। पति-पत्नी साथ-साथ टहलने निकलते हैं, मुश्किल से दो कदम ही साथ चल पाते हैं, कि पति और पत्नी के बीच फासले बढ़ने शुरू हो जाते हैं। पति महोदय पीछे मुड़कर भी नहीं देखते कि उनकी पत्नी किस मोड़ पर है।
जहाँ गति है, वहाँ विकास है, प्रगति है, उन्नति है ! जहाँ धीमी गति है, वहाँ झुग्गी है, झोपड़ी है, चॉल है। अगर गति तेज है, तो स्मार्ट सिटी है, हेल्थ क्लब है, ट्रेड सेंटर है, ऑर्बिट मॉल है।।
हमारी गति चाहे धीमी हो या तेज़। हम जल्दी जल्दी बोलें या आराम से, कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सब अपने गंतव्य तक आराम से पहुँच जाते हैं। जीवन में कहीं कछुआ चाल है, तो कहीं खरगोश की गति और कहीं कहीं तो भेड़-चाल ! हम सबकी गति एक ही होना है। हम सब अपनी अपनी चाल से अपने गंतव्य तक पहुंचें, ईश्वर से यही प्रार्थना है। बहुत भागमभाग है जीवन में, थोड़ा सुस्ता लें।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख भीड़ में हम अकेले। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९३ ☆
☆ प्रकृति शिक्षिका के रूप में… ☆
मानव व प्रकृति का संबंध अनादि व अखंड है। प्रकृति का सामान्य अर्थ है–समस्त चराचर में स्थित सभी वनस्पति,जीव व पदार्थ, जिनके निर्माण में मानव का हाथ नहीं लगा; अपने स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य भी आ जाता है, जो प्रकृति का अंग है और शेष सृष्टि उसकी रंगभूमि है। सो! उसकी अन्त:प्रकृति उससे अलग कैसे रह सकती है? मनुष्य प्रकृति को देखता व अपनी गतिविधि से उसे प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित हो बदलता-संवरता है; तत्संबंधी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। उसी के माध्यम से वह जीवन को परिभाषित करता है। मानव प्रकृति के अस्तित्व को हृदयंगम कर उसके सौंदर्य से अभिभूत होता है और उसे चिरसंगिनी के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है और उसे मां के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है।
मानव प्रकृति के पंचतत्वों पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि, आकाश व सत्,रज,तम तीन गुणों से निर्मित है…फिर वह प्रकृति से अलग कैसे हो सकता है? जिन पांच तत्वों से प्रकृति का रूपात्मक व बोधगम्य रूप निर्मित हुआ है,वे सब इंद्रियों के विषय हैं। इन पांच तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ही असंख्य रूपों में मानव चेतना के कोश को कर्म, चिन्तन, कल्पना, भावना, भावुकता, संकल्प, जिज्ञासा, समाधान आदि से कितना समृद्ध किया है–इसका अनुमान मानव की उपलब्धियों से लगाया जा सकता है। प्रकृति का वैभव अपरिमित एवं अपार है। उसकी पूर्णता को न दृष्टि छू सकती है, न ही उसकी सीमाओं तक कान ही पहुंच सकते हैं और न ही क्षणों की गति को मापा जा सकता है। प्रकाश व शब्द की गति के साथ कौन दौड़ लगा सकता है? प्रकृति के अद्भुत् सामर्थ्य व निरंतर गतिशीलता के कारण उसमें देवत्व की स्थापना हो गयी तथा उसकी अतिन्द्रियता, अद्भुतता, उच्चता, गहनता आदि के कारण उसे विराट की संज्ञा प्रदान की गयी है। विराट में मानव,मानवेतर प्राणी व अचेतन जगत् का समावेश है। अचेतन जगत् ही प्रकृति है और जगत् का उपादान अथवा मूल तत्व है। वह स्वयंकृत, चिरंतन व सत्य है। उसका निर्माण व विनाश कोई नहीं कर सकता। प्रकृति के अद्भुत् क्रियाकलाप व अनुशासनबद्धता को देख कर मानव में भय, विस्मय, औत्सुक्य व प्रेम आदि भावनाओं का विकास हुआ, जिनसे क्रमश: दर्शन, विज्ञान व काव्य का विकास हुआ। सो! मानव मन में आस्था, विश्वास व आदर्शवाद जीवन-मूल्यों के रूप में सुरक्षित हैं और विश्व में हमारी अलग पहचान है। सम्पूर्ण विश्व के लोग भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं। रामायण व महाभारत अद्वितीय ग्रंथ हैं और गीता को मैनेजमेंट गुरू स्वीकारा जाता है। उसे विश्व के विभिन्न देशों में पढ़ाया जाता है। यह एक जीवन-पद्यति है; जिसे धारण कर मानव अपना जीवन सफलतापूर्वक बसर कर सकता है।
प्रकृति हमारी गुरू है, शिक्षिका है, जो जीने की सर्वोत्तम राह दर्शाती है। प्रकृति हमारी जन्मदात्री मां के समान है और हमारी प्रथम गुरू कहलाती है और जो संस्कार व शिक्षा हमें मां से प्राप्त होती हैं, वह पाठ संसार का कोई गुरू नहीं पढ़ा सकता। प्रकृति हमें सुक़ून देती है; अनगिनत आपदाएं सहन करती है और हम पर लेशमात्र भी आँच नहीं आने देती। वह हमारी सहचरी है; सुख-दु:ख की संगिनी है। दु:ख की वेला में यह ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाती भासती है, जो सुख में मोतियों-सम प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, दु:ख में प्रकृति मां के समान धैर्य बंधाती है।
प्रकृति हमें कर्मशीलता का संदेश देती है और उसके विभिन्न उपादान निरंतर सक्रिय रहते हैं।क्षरात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर, अमावस के बाद पूनम व विभिन्न मौसमों का यथासमय आगमन समय की महत्ता व गतिशीलता को दर्शाता है। नदियाँ निरंतर परहिताय प्रवाहशील रहती हैं। इसलिए वे जीवन-दायिनी कहलाती हैं। वृक्ष भी कभी अपने फलों का रसास्वादन नहीं करते तथा पथिक को शीतल छाया प्रदान करते हैं। वे हमें आपदा के लिए संचय करने को प्रेरित करती है। जैसे जल के अभाव में वह बंद बोतलों में बिकने लगा है। बूंद-बूंद से सागर भर जाता है और जल को बचा कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। वायु भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। परंतु मानव की बढ़ती लालसाओं ने जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के महल बनाकर पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत वृद्धि की है, जिसका विकराल रूप हमने कोरोना काल में आक्सीजन की कमी के रूप में देखा है; जिसके लिए लोग लाखों रुपये देने को तत्पर थे। परंतु उसकी अनुपलब्धता के कारण लाखों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। काश! हम प्रकृति के असाध्य भंडारण व असाध्यता का अनुमान लगा पाते कि वह हमें कितना देती है? हम करोड़ों-अरबों की वायु का उपयोग करते हैं; अपरिमित जल का प्रयोग करते हैं; वृक्षों का भी हम पर कितना उपकार है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कार्बन-डॉयोक्साईड लेकर हमें आक्सीजन देते हैं। इतना ही नहीं, वे हमें अन्न व फल-फूल देते हैं, जिससे हमें जीवन मिलता है।
मानव व प्रकृति का संबंध अटूट, चिरंतन व शाश्वत् है। प्रकृति विभिन्न रूपों में हमारे सम्मुख बिखरी पड़ी है। प्रकृति के कोमल व कमनीय सौंदर्य से प्रभावित होकर कवि उसे कल्पना व अनुभूति का विषय बनाता है, जो विभिन्न काव्य- रूपों में प्रकट होती है। यदि हम हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो प्रकृति हर युग में मानव की प्रेरणा-शक्ति ही नहीं रही, उसकी चिर-संगिनी भी रही है। वैदिक-कालीन सभ्यता का उद्भव व विकास प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में हुआ। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने प्रकृति के प्रति जहां अनुराग व्यक्त किया, वहीं उसके उग्र,रम्य व मानवीकरण आदि रूपों को अपनाया। ऋग्वेद मानव सभ्यता का प्राचीनतम ग्रंथ है। प्रकृति के दिव्य सौंदर्य से अभिभूत होकर जहां मानव उसके उन्मुक्त सौंदर्य का बखान करता है; वहीं विराट के प्रति भय, विस्मय श्रद्धा आदि की अनुभूतियों में अनंत सौंदर्य का अनुभव करता है। वाल्मीकि का प्रकृति-जगत् के कौंच-वध की हृदय-विदारक घटना से उद्वेलित आक्रोश व करुणा से समन्वित शोक का प्रथम श्लोक रूप में प्रस्फुरण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भावातिरेक या अनुभूति की तीव्रता ही कविता की मूल संजीवनी शक्ति है। महाभारत में प्रकृति केवल पर्वत, वन, नदी आदि का सामान्य ज्ञान कराती है। नल दमयंती प्रसंग में वह प्रकृति से संवेदनात्मक संबंध स्थापित न कर, स्वयं को अकेला व नि:सहाय अनुभव करती है।
कालिदास को बाह्य-जगत् का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकारा जाता है। उनका प्रकृति-चित्रण संस्कृत साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वे प्रकृति को मूक, चेतनहीन व निष्प्राण नहीं मानते, बल्कि वे उसमें मानव की भांति सुख- दु:ख व संवेदनशीलता अनुभव करते हैं। इस प्रकार अश्वघोष, भवभूति, भास, माघ, भारवि, बाणभट्ट आदि में प्रकृति का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है।
हिन्दी साहित्य के आदिकाल अथवा पूर्व मध्य-कालीन काव्य में प्रकृति का उपयोग पृष्ठभूमि, उद्दीपन व उपमानों के रूप में हुआ। विद्यापति के काव्य में प्रकृति कहीं-कहीं उपदेश देती भासती है और आत्मा परमात्मा में इस क़दर लीन हो जाती है, जैसे समुद्र में लहर और भौंरों का गुंजन नायिका को मान त्यागने का संदेश देता भासता है। वियोग में उनका बारहमासा वर्णन द्रष्टव्य है।
पूर्व मध्यकालीन काव्य में प्रकृति उन्हें माया सम भासती है तथा उन्होंने भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनाया है। कबीरदास जी ‘माली आवत देखि के, कलियन करि पुकार/ फूलि-फलि चुनि लहि, कालहि हमारी बारि’ के माध्यम से मानव को नश्वरता का संदेश देते हैं। दूसरी ओर ‘तेरा सांई तुझ में, ज्यों पुहुपन में वास/ कस्तूरी का मृग ज्यों फिरि-फिरि ढूंढे घास’ के माध्यम से वे मानव को संदेश देते हैं कि ब्रह्म पुष्पों की सुगंध की भाति घट-घट में व्याप्त है, परंतु अज्ञान के कारण बावरा मानव उसे अनुभव नहीं कर पाता और मृग की भांति वन-वन में ढूंढता रहता है। प्रेममार्गी शाखा के प्रवर्त्तक जायसी के काव्य में प्रकृति के उपमान, उद्दीपन व रहस्यात्मक रूपों का चित्रण हुआ है। वे चराचर प्रकृति में ब्रह्म के दर्शन करते हैं। समस्त जड़-चेतन प्रकृति में प्रेमास्पद के प्रतिबिंब को निहारते व अनुभव करते हैं। ‘बूंद समुद्र जैसे होइ मेरा/ मा हिराइ जस मिले न हेरा।’ जिस प्रकार बूंद समुद्र में मिलकर नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार आत्मा भी ब्रह्ममय हो जाती है।
रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास की वृत्ति प्रकृति-चित्रण में अधिक नहीं रमी, तथापि उनका प्रकृति-चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। प्रकृति उनके काव्य में उपमान व उद्दीपन रूप में नहीं आयी, बल्कि उपदेशिका के रूप में आयी है। संयोग में वर्षा व बादलों की गर्जना होने पर पशु-पक्षी व समस्त प्रकृति जगत् उल्लसित भासता है और वियोग में मन की अव्यवस्थित दशा में मेघ-गर्जन भय संचरित करते हैं। मानवीकरण में मनुष्य का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और मानव उसमें अपनी मन:स्थिति के अनुसार उल्लास, उत्साह, आनंद व शोक की भावनाएं- क्रियाएं आरोपित करता है। राम वन के पशु-पक्षियों से सीता का पता पूछते हैं। तुलसी सदैव लोक- कल्याण की भावना में रमे रहे और प्रकृति से उपदेश-ग्रहण की भावना में उन पर श्रीमद्भागवत् का प्रभाव द्रष्टव्य है–’आन छोड़ो साथ जब, ता दिन हितु न होइ/ तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि, तासु रिपु होइ।’ जब कुटुम्बी साथ छोड़ देते हैं, तो संसार में कोई भी हितकारी नहीं रह पाता। कमल का जनक जल जब सूख जाता है, तो उसका मित्र सूर्य भी उसे दु:ख पहुंचाता है।
कृष्ण भक्ति शाखा के अतर्गत सूर, नंददास, रसखान आदि को कृष्ण के कारण प्रकृति अति प्रिय थी। प्रकृति का आलंबन, उद्दीपन व आलंकारिक रूप में चित्रण हुआ है। वियोग में प्रकृति गोपियों को दु:ख पहुंचाती है और वे मधुवन को हरा-भरा देख झुंझला उठती हैं– ‘मधुबन! तुम कत रहत हरे/ विरह-वियोग स्याम सुंदर के ठाढ़ै,क्यों न जरे।’ कहीं-कहीं वे प्रकृति में उपदेशात्मकता का आभास पाते हैं और संसार के मोहजाल को भ्रमात्मक बताते हुए कहते हैं–’यह जग प्रीति सुआ, सेमर ज्यों चाखत ही उड़ि जाय।’ तोते को सेमर के फूल में रूई प्राप्त होती है और वह उड़ जाता है। सूर ने प्रकृति के व्यापारों का मानवीय व्यापारों से अतु्लनीय समन्वय किया है।
उत्तर मध्यकालीन को प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षित नहीं कर पाता। बिहारी को गंवई गांव में गुलाब के इत्र का कोई प्रशंसक नहीं मिलता। केशव को प्राकृतिक दृश्यों के अंकन का अवसर मिला,परंतु वे अलंकारों में उलझे रहे। बिहारी सतसई में जहां मानवीकरण व आलंबनगत रूप चित्रण हुआ, वहीं पर नैतिक शिक्षा के रूप में अन्योक्तियों का आश्रय लिया गया है। इनके प्रकृति-चित्रण में हृदय-स्पर्शिता का अभाव है। सो! प्रकृति उद्दीपन व उपमान रूप में हमारे समक्ष है। ‘ नहीं पराग,नहीं मधुर मधु,नहीं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यौ,आगे कौन हवाल’ के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। ‘जिन-जिन देखे वे सुमन, गयी सो बीति बहार/ अब अलि रही गुलाब की, अपत कंटीली डार।’ यह उक्ति सम्पत्ति-विहीन व्यक्ति के लिए कही गयी है तथा भ्रमर को माध्यम बनाकर प्राचीन वैभव व वर्तमान की दरिद्रावस्था का बखूबी चित्रण किया गया है।
भारतेन्दु युग आधुनिक युग का प्रवेश-द्वार है और इसमें नवीन व प्राचीन काव्य-प्रवृत्तियों का समन्वय हुआ है। प्रकृति मानवीय भावनाओं के अनुरूप हर्ष-विषाद को अतिशयता प्रदान करती, वियोगियों को रुलाती तथा संयोगियों को उल्लसित करती है। इनका बारहमासा वर्णन विरहिणी की पीड़ा को और बढ़ा देता है तथा कहीं-कहीं प्रकृति उपदेश देती भासती है। ‘ताहि सो जहाज को पंछी सब गयो,अहो मन होई’ (भारतेन्दु ग्रंथावली)। अत:जीव जहाज़ के पक्षी की भांति पुन: ब्रह्म में मिलने का प्रयास करता है। बालमुकुंद जी के हृदय में प्रकृति के प्रति सच्चा अनुराग है, जो आलंबन, उद्दीपन व उपमान रूप में उपलब्ध है।
द्विवेदी युगीन कवियों ने प्रकृति को काव्य का वर्ण्य-विषय बनाया है तथा प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है। श्रीधर पाठक, रूपनारायण पाण्डेय, रामनरेश त्रिपाठी आदि ने आलंबनगत चित्र प्रस्तुत किए हैं तथा स्वतंत्रतावादी कवियों ने रूढ़ रूपों को नहीं अपनाया, बल्कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में उसके साधारण चित्रमय, सजीव व मार्मिक रूप प्रदान किए हैं। पाठक ने कश्मीर सुषमा, देहरादून आदि कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्र उपलब्ध हैं। शुक्ल जी ने प्रकृति के आलंबन व त्रिपाठी ने पथिक व स्वप्न खंड काव्यों में प्रकृति का मार्मिक चित्रण किया है। हरिऔध ने जहां ऐंद्रिय सुख की अनुभूति की, वहीं प्रकृति से उपादान ग्रहण कर नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत, पंचवटी, यशोधरा आदि काव्यों में मनोरम प्राकृतिक चित्रण उपलब्ध है। पंचवटी में प्रकृति की अपूर्व झांकी दिखाई देती है और प्रकृति मानव के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में संबंध स्थापित करती है। साकेत में प्रकृति का मानव व मानवेतर जगत् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वे प्रकृति को सद्गुणों से परिपूर्ण मानते हैं– ‘सर्वश्रद्धा, क्षमा व सेवा की, ममता की वह धर्म में भी प्रतिमा/ खुली गोद में जो उसकी, समता की वह प्रतिमा।’ प्रकृति ममतामयी मां है, जो समभाव से सब पर अपना प्रेम व ममत्व लुटाती है।उपदेशिका की भांति मानव में उच्च विचार व सदाशयता के भाव संचरित करती है। वे भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना के भाव जाग्रत करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहते हैं—‘पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे काम में/ फिर क्यों तुम्ही खोते हो, व्यर्थ के विश्राम में।’ कवि ने सर्वभूतों को सर्वदा व्यस्त दिखाते हुए देशवासियों को आलस्य त्यागने व जाग्रत रहने का संदेश दिया है। रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में प्रकृति के सुंदर, मधुर, मंजुल रूप प्रकट होते हैं, उग्र नहीं। वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मानव-व्यापारों व मानव- संवेदना का आभास पाते हैं।
छायावाद में प्रकृति को स्वछंद रूप प्राप्त हुआ है और उसका उपयोग आध्यात्मिक भावों के प्रकाशन के लिए हुआ है। प्रकृति कवि की चेतना, प्रेरणा व स्पंदन है। इसलिए छायावाद को प्रकृति काव्य के नाम से अभिहित किया गया है।यदि प्रकृति को छायावाद से निकाल दिया जाए, तो वह पंगु हो जाएगा। प्रसाद ने प्रकृति में चेतना का अनुभव किया और वह मधुर, कोमल व सुकुमार भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बन गयी, परंतु कवि ने कामायनी में प्रकृति के भयावह, विकराल व विराट आदि रूपों का दर्शन किया है। वे प्रकृति को सचेतन व सजीव मानकर उसमें अलौकिक सत्ता का दर्शन करते हैं तथा समस्त सृष्टि के कार्य-व्यापारों को सर्वोत्तम शक्ति द्वारा अनुप्राणित स्वीकारते हैं। प्रसाद ने संसार को रंगभूमि मानते हुए कहा है कि मानव यहां अपनी शक्ति के अनुसार संसार रूपी घोंसले में अपनी शक्ति के अनुसार ठहर सकता है, ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का संदेश देता है। पंत प्रकृति के उपासक ही नहीं, अनन्य मित्र थे। उनके काव्य में मानव और प्रकृति का एकात्म्य हो जाता है। मधुकरि का मधुर राग उन्हें मुग्ध करता है और वे ‘सिखा दो न हे मधुप कुमारि/ मुझे भी अपने मीठे गान'(पल्लविनी)। वे प्रकृति के सहचरी, देवी, सखी, जननी आदि रूपों को काव्य में चित्रित करके उनमें अलौकिक सत्ता का आभास पाते हैं और प्रकृति उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है।
निराला के काव्य में प्रकृति के चित्र दिव्य, समृद्ध व रहस्यात्मक रूप में आए हैं। उनके काव्य में दो तत्वों की प्रधानता है-रहस्यवाद व मानवीकरण। उनके काव्य विराटता व उदात्तता की दृष्टि से सराहनीय हैं। प्रकृति उसे सजीव प्राणी की भांति अपना रूप दिखाती, हाव-भावों से मुग्ध करती, संवेदना प्रकट करती उत्साहित करती है। इस प्रकार प्रकृति व मनुष्य का तादात्म्य हो जाता है। बादल प्रकृति को हरा-भरा कर देते हैं, जिससे प्रेरित होकर प्रकृति कर्त्तव्य- पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है।
महादेवी वर्मा सृष्टि में सर्वत्र दु:ख देखती हैं। प्रकृति उनके लिए सप्राण है तथा वे मानव व प्रकृति के लिए एक प्रकार की अनुभूति, सजीवता, विश्रंखलता, आत्मीयता व व्यापकता का अनुभव करती हैं। वे संसार में प्रियतम को ढूंढती हैं । वे कभी प्रेम भाव में बिछ जाती हैं और जब प्रियतम अंतर्ध्यान हो जाते हैं, वे निराश होकर दु:ख-दैन्य भाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं—‘मैं फूलों में रोती, वे बालारुण में मुस्काते/ मैं पथ में बिछ जाती,वे सौरभ सम उड़ जाते।’ वे प्रकृति के चतुर्दिक प्रियतम के संदेश का आभास पाती हैं और प्रश्न कर उठती हैं — ‘मुस्काता प्रेम भरा नभ,अलि! क्या प्रिय आने वाले हैं?’ वे जीवन को संध्या से उपमित करती हैं ‘प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन’ ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ के माध्यम से वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। वेएक ओर प्रकृति में विराट की छाया देखती हैं और दूसरी ओर अपना प्रतिबिंब पाती हैं। वै छायावाद का आधार स्तंभ-मात्र नहीं हैं, रहस्य व अरूप की साधिका रही हैं।
प्रगतिवाद भौतिकवादी दर्शन है, जिस पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। समस्त सृष्टि का विकास दो वस्तुओं के संघर्ष से होता है, जो द्वंद्व का परिणाम है। यह वैज्ञानिक दर्शन है, जिसमें भावुकता के स्थान पर बुद्धि को स्वीकारा गया है।यह यथार्थवाद पर आधारित है। इन कवियों को जीवन से अनुरक्ति है और प्रकृति से प्रेम है।उन्होंने प्रकृति के उपेक्षित तत्वों व पात्रों को महत्व दिया है और प्रकृति उनके लिए शक्ति- प्रणेता है। वे दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन को देख जीवन के विकास के लिए परिवर्तन-शीलता को अनिवार्य मानते हैं। इनके गीतों पर लोकगीतों कि प्रभाव द्रष्टव्य है।
प्रयोगवादी कविता में प्रकृति के भावात्मक स्वरूप का ग्रहण हुआ अबोध बालक की तरह ईश्वर, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य के विभिन्न स्तरों पर प्रश्न करता है। इन कवियों ने जहां प्रकृति के उपेक्षित व वैज्ञानिक स्वरूपों को ग्रहण किया है,
वहीं प्रकृति में दैवीय सत्ता का आभास न पाकर , भौतिकता के संदर्भ में एक शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। इनका दृष्टिकोण भावात्मक न होकर, बौद्धिक है और प्रकृति के उपेक्षित स्वरूप(कुत्ता, गधा,चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, प्लेटफार्म, धूल, साइरन) को काव्य का विषय बनाया।इन्होंने असुंदर, भौंडे, भदेस आदि में सौंदर्य के दर्शन किए तथि युगबोध के अनुकूल प्रकृति का चित्रण किया। इन्होंने जहां प्रकृति को अपनी मानसिक कुंठाओं की अभिव्यक्ति का साधन बनाया, वहां नवीन उपमानों, बिम्बों को अपने काव्य में प्रतिष्ठित किया तथा मानवीकरण कर मनोरम चित्रण किया है।
नयी कविता प्रयोगवाद का विकसित चरण है तथा इसमें उपलब्ध प्रकृति चित्रण की विशेषता है–ग्राम्य चित्रपटी की अवधारणा। नयी कविता वाद मुक्त है तथा वे जो भी मन में आता है, कहते हैं। वे क्षणवादी हैं और हर पल को जी लेना चाहते हैं,क्योंकि वे भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनमें एक दर्शन का अभाव है। कई बार उन्हें प्रकृति के विभिन्न रूप स्पंदनहीन भासते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में शंका होने लगती है। नये कवियों की विषय-व्यापकता, नया भाव-बोध तथा नवीन दृष्टिकोण सराहनीय है। सो! प्रकृति व मानव का संबंध अनादि काल से शाश्वत् व अटूट रहा है। वह हर रूप में आराध्या रही है। परंतु जब-जब मानव ने प्रकृति का अतिक्रमण किया है, उसने अपना प्रकोप व विकराल रूप दिखाया है, जो प्राकृतिक प्रदूषण व कोरोना के रूप में हमारे समक्ष है। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव नियति के सम्मुख विवश व असहाय भासता है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ काका हाथरसी…“।)
अभी अभी # ७८७ ⇒ आलेख – काका हाथरसी श्री प्रदीप शर्मा
जिस दिन पैदा हुए, उसी दिन इस संसार से विदा भी ले ली ! (18 सितंबर 1906 – 1995) हाथरस में पैदा हुए इसलिए प्रभुलाल गर्ग, काका हाथरसी हो गए । इनके हाथ में हास्य रस की रेखाएं अवश्य होंगी,इसीलिए सदा सबको हंसाते रहे ।
इनकी आस थी कि इनके निधन पर कोई आंसू ना बहाए। शोक सभा की जगह एक हास्य कवि सम्मेलन रखा जाए। चूंकि जन्म और मरण का एक ही दिन है, इसलिए प्रस्तुत है उनकी एक हास्य कविता ।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – बचपना
बच्चों को उठाने के लिए माँ-बाप अलार्म लगाकर सोते हैं। जल्दी उठकर बच्चों को उठाते हैं। किसीको स्कूल जाना है, किसीको कॉलेज, किसीको नौकरी पर। किसी दिन दो-चार मिनट पहले उठा दिया तो बच्चे चिड़चिड़ाते हैं। माँ-बाप मुस्कराते हैं, बचपना है, धीरे-धीरे समझेंगे।…धीरे-धीरे बच्चे ऊँचे उठते जाते हैं और खुद को ‘सेल्फमेड’ घोषित कर देते हैं।
सोचता हूँ कि माँ-बाप और परमात्मा में कितना साम्य है! जीवन में हर चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए जाग्रत और प्रवृत्त करता है ईश्वर। माँ-बाप की तरह हर बार जगाता, चाय पिलाता, नाश्ता कराता, टिफिन देता, चुनौती फ़तह कर लौटने की राह देखता है। हम फ़तह करते हैं चुनौतियाँ और खुद को ‘सेल्फमेड’ घोषित कर देते हैं।
कब समझेंगे हम? अनादिकाल से चला आ रहा बचपना आख़िर कब समाप्त होगा?
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रीगणेश साधनासंपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र दी जावेगी ।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भाव भक्ति के साथ: पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २५८ ☆भाव भक्ति के साथ: पूजन… ☆
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मातु सरस्वती पूजन कीन्हा ।
विद्या ज्ञान आप वर दीन्हा ।।
श्वेत वस्त्र पुस्तक वर धारी ।
कमल आसनी आन पधारी।।
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मंगलकाज हुए सब जाते ।
मूढ़ मती के भाग्य जगाते।।
वीणा वादिन हंस वाहिनी ।
सप्त सुरों की आप दायिनी।।
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कई बार अनजाने ही बहुत से ऐसे कार्य हो जाते हैं, जिनको कोई करना नहीं चाहता , सब कुछ पूर्व निर्धारित तरीके से नहीं हो सकता । केवल प्रयास आपके द्वारा हो ऐसा करते रहें परन्तु परिणाम क्या होगा इसकी चिन्ता न करें । आप कर्म के अधिकारी हैं कर्ता नहीं ।
सारे दुःख का कारण यही होता है कि हम स्वयं को कर्ता समझने की भूल कर बैठते हैं और अनजाने ही उन गलतियों के जिम्मेदार बन जाते हैं जो की ही नहीं गयी ।
इसे इस दृष्टि से देखें, जो होगा अच्छा होगा इसमें ही सबका कल्याण है । हर पल को भगवान का उपहार समझते हुए आनन्द के साथ जियें और जीने दें।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय ललित निबंध – “हीरे की तलाश” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७२ ☆
ललित निबंध – हीरे की तलाश श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
नर्मदा का हर कंकड़ शंकर कहा गया है तो पन्ना जिले की मिट्टी में हीरे की भौतिक तलाश की जाती है, जहां प्रकृति ने अपने अद्वितीय उपहार को छिपा रखा है। पर जीवन भौतिकता से बढ़कर जीवंत चेतना है, जो हमें एक गहन और व्यापक दृष्टिकोण देती है। यह दृष्टिकोण हमें हीरक व्यक्तित्व की तलाश करने को प्रेरित करता है , स्वयं को हीरे जैसा मूल्यवान और आभामय बनाने को प्रेरित करता है। व्यक्ति की आंतरिक चमक, उसकी चेतना, और उसके मानवीय गुण एक अद्वितीय हीरे की तरह भीड़ में भी अलग चमकते हैं।
रत्नों में हीरे अपनी दुर्लभता और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं, मानव जीवन में भी व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसकी आत्मा, और उसकी चेतना ऐसी ही हीरक होती है। व्यक्ति की ईमानदारी , हजार मनकों की माला में उसे अलग चमकता हीरे जैसा मनका बना कर प्रस्तुत करती है। जैसे मिट्टी को खोदकर हीरा निकाला जाता है, वैसे ही जीवन के अनुभवों और संघर्षों के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर के हीरक गुणों को निखारता है। यह सतत प्रक्रिया है । जहां व्यक्ति अपने आंतरिक संसाधनों को पहचानता है और उन्हें निरन्तर बेहतर बनाते हुए विकसित करता है। व्यक्ति के गुरु , परिवार, समाज किसी जौहरी की भांति व्यक्ति को निरंतर जीवन पर्यंत गढ़ते रहते हैं।
हीरक व्यक्तित्व की यह तलाश हमें भीड़ के कंकडो में हीरे की खोज का व्यापक दृष्टिकोण देती है । व्यक्ति को उसके समग्र स्वरूप में आकलित किया जाता हैं, न कि केवल उसके बाहरी आवरण या उपलब्धियों से। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना और सतरंगी चमक से मूल्यवान होता है, वह किस आभूषण के कैसे डब्बे में रखा गया है वह उतना महत्व नहीं रखता जितना हीरे की मौलिकता । पारखी पल भर में कृत्रिम हीरे और वास्तविक प्राकृतिक हीरे में अंतर समझ लेता है। प्रकृति कोयले को करोड़ों वर्षों के उच्च तापमान में गलाकर , भारी दबाव में दबाकर उसे हीरा बनाती है। उस कच्चे हीरे को चमकदार रूप में तराशे जाने के लिए जौहरी उसे काटते छांटते हैं। वैसे ही एक व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों सहानुभूति, करुणा, साहस, और ज्ञान को तराशने से महान बनता है। यह दृष्टिकोण हमें जीवन को गहन और अर्थपूर्ण यात्रा के रूप में देखने को प्रेरित करता है। व्यक्ति को हीरा बनाने में उसका परिवेश , उसके शिक्षक, उसकी परिस्थितियां अहम भूमिका निभाते हैं।
हर व्यक्ति में एक अद्वितीय हीरा छिपा होता है, जिसे पहचानने और तराशने की जरूरत होती है। जैसे हीरा तराशने से उसकी चमक और सौंदर्य बढ़ता है, वैसे ही व्यक्ति के गुणों को विकसित करने से उसका व्यक्तित्व निखरता है। व्यक्ति अपने अनुभवों, सीखने की प्रक्रिया, और आत्म-विश्लेषण के माध्यम से अपने भीतर के आभामय हीरे को प्रकट कर सकता है।
इस तलाश में हम पाते हैं कि जीवन एक सतत विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया है। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना से चमकता है, वैसे ही व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों और चेतना से महान बनता है। यह प्रक्रिया एक गहन आत्म अनुसंधान है। हीरक व्यक्तित्व की तलाश एक गहन और व्यापक यात्रा है, जो हमें जीवन के हर पहलू में एक अद्वितीय सौंदर्य और अर्थ खोजने को प्रेरित करती है। यह यात्रा हमें अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानने, उन्हें विकसित करने, और जीवन को एक गहन और अर्थपूर्ण अनुभव बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। जीवन को भीड़ में कंकड़ सा खो देना है या हीरा बनाकर अमर कर दें, यह स्वयं हमारे ही हाथों तथा सोच से संभव है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बाप कमाई…“।)
अभी अभी # ७८६ ⇒ आलेख – बाप कमाई श्री प्रदीप शर्मा
सुनने में भले ही आपको यह अच्छा ना लगे, बाप तक क्यों चले गए, आप भाषा को थोड़ा झाड़ पोंछ लें, इसे अपने पिताजी की खून पसीने की, मेहनत की कमाई कह लें, लेकिन इससे सच नहीं बदलने वाला, कहलाएगी वह बाप कमाई ही।
सोचिए, आप जब पैदा हुए थे, तो क्या साथ लाए थे, मां ने आपको जन्म दिया, उसका दूध पीकर तो आप पले बढ़े, कैसे उतारेंगे दूध का कर्ज़, कभी सोचा है। माता पिता के कर्ज़ से उऋण होना इतना आसान भी नहीं।।
भले ही उस जमाने में आपके पिताजी दो पैसे कमाते थे फिर भी पूरे परिवार का पेट पालते थे।
आज जितनी जनसंख्या और महंगाई तब भले ही ना हो, फिर भी परिवार आज की तुलना में अधिक बड़ा और भरा पूरा होता था। नहीं पढ़ाया आपको किसी महंगे पब्लिक स्कूल में, फिर भी संस्कार तो दिए। बड़ों का आदर सम्मान करना, उन्हें प्रणाम करना।
जो भी चीज घर में आती थी, सबको बराबरी से बांटना, आपके त्योहारों पर कपड़े लत्तों का खयाल रखना, बीमार होने पर दवा दारू की व्यवस्था करना, कमाने वाला एक, और खाने वाले दस,
फिर भी अपने से अधिक आपका ध्यान रखा, तब जाकर आप आज इस स्थिति में आ गए कि आपको यह शब्द भी चुभने लगा।।
मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं कि मैं तो आज भी बाप कमाई ही खा रहा हूं। मेरे माता पिता को गुजरे कई वर्ष गुजर गए, लेकिन जो अपार धन संपत्ति मेरे नाम कर गए हैं, वह पीढ़ियों तक खत्म नहीं होने वाली। आपको शायद भरोसा ना हो, अतः संक्षेप में उसका विस्तृत वर्णन दे रहा हूं।
मेरी माता से मुझे विरासत में संतोष धन मिला, और वह भी इतना कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। जीवन भर केवल दो साड़ियों में अपना गुजारा करने वाली मेरी मां का पेट तब तक नहीं भरता था, जब तक घर के सभी सदस्यों का भोजन ना हो जाए। सादगी ही उनका आभूषण था, लेकिन वह अपनी सभी बहू बेटियों को सजा धजा देखना चाहती थी। दूसरों की खुशी में खुश होना, और उनके दुख दर्द में उनका हाथ बंटाना उनका स्वभाव था।।
इसके बिल्कुल विपरीत मेरे पिताजी स्वभाव से ही रईस थे। संघर्षों के बीच, मेहनत पसीने के बल पर, ईमानदारी, व्यवहार कुशलता, समय की पाबंदी और दरियादिली से, हमें अभावों से उन्होंने कोसों दूर रखा। मोहल्ले का पहला रेडियो हमारे घर ही आया था, जिसकी लाइसेंस फीस पोस्ट ऑफिस में भरने वे खुद जाते थे।
घर में रिश्तेदारों और चिर परिचित लोगों का आना जाना लगातार बना रहता था। तब रिश्तेदार भी महीनों और हफ्तों रुका करते थे, घर में उत्सव सा माहौल सदा बना रहता था। लेकिन मजाल है कभी गरीबी में आटा गीला हुआ हो। आज जैसा नहीं, कि अतिथि तुम कब जाओगे।।
खुद्दारी, आत्म सम्मान और स्वाभिमान हम सबको उनसे ही विरासत में मिले हैं। माता पिता के आशीर्वाद से बड़ी कोई बाप कमाई नहीं होती। वे हमारे लिए जमीन जायदाद भले ही नहीं छोड़ गए हों लेकिन उनकी साख और पुण्याई ही हमारी कुल जमा पूंजी है, जो उनके आशीर्वाद से अक्षुण्ण और सुरक्षित है। उनकी नेकी, ईमानदारी, और समय की पाबंदी ही हमारी बाप कमाई है। आज भी इस दुनिया में हमारे जैसा कोई रईस और सुखी इंसान नहीं, क्योंकि आज भी हमारे ऊपर हमारे माता पिता का वरद हस्त है, उनका स्थान हमारे हृदय में है और उनका आचरण हमारे व्यवहार में।
माता पिता हमारे प्रथम गुरु होते हैं और पालक भी ! हमारी सभी सांसारिक, भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों में उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहता है। आप क्या सोचते हैं, उनको रूष्ट कर कभी आप ईश्वर को मना लेंगे।।
हम भी खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ ही जाएंगे, लेकिन अपनी आशीर्वाद रूपी बाप कमाई साथ लेकर जाएंगे, क्योंकि ऐसे माता पिता कहां सबको नसीब से मिलते हैं। रफी साहब एक सीधे सादे नेकदिल इंसान थे, कितनी मासूमियत से वह इतनी बड़ी बात कह गए ;
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका लेख – “एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221 ☆
☆ लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
आजकल हर कोई ऑनलाइन काम करता है. बैंकिंग, शॉपिंग, ईमेल, सोशल मीडिया आदि सभी काम ऑनलाइन किए जाते हैं. ऐसे में हमारी ऑनलाइन सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका पासवर्ड भी एआई से हैक हो सकता है?
जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि एआई का इस्तेमाल करके हैकर्स आपके कीबोर्ड की आवाज सुनकर आपका पासवर्ड पता लगा सकते हैं. इस तरीके को अकाउस्टिक साइड चैनल अटैक कहा जाता है.
इस अटैक में हैकर्स आपके पासवर्ड डालते समय आपके कीबोर्ड की आवाज को रिकॉर्ड करते हैं. इसके बाद वे इस आवाज को एआई से प्रोसेस करते हैं और आपके पासवर्ड का अनुमान लगाते हैं.
शोध में पाया गया है कि एआई 95% सटीकता के साथ आपके पासवर्ड का अनुमान लगा सकता है. यह बात बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि आजकल लोग बहुत ही कमजोर पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं.
अगर आप अपने पासवर्ड को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. सबसे पहले, आपको एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.
दूसरा, आपको अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.
तीसरा, आपको अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर नहीं रखना चाहिए. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.
अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.
एआई से हैकिंग से बचने के लिए कुछ उपाय
एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करें. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.
अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल न करें. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.
अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर न रखें. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.
अपने सिस्टम को हमेशा अपडेट रखें. सॉफ्टवेयर अपडेट में अक्सर सुरक्षा से जुड़े सुधार होते हैं जो आपके सिस्टम को हैकिंग से बचाने में मदद करते हैं.
अनजान लिंक पर क्लिक न करें. अनजान लिंक पर क्लिक करने से आपके सिस्टम में मैलवेयर आ सकता है जो आपके पासवर्ड को चुरा सकता है.
सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल सावधानी से करें. सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल करने से आपके पासवर्ड को चुराने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आपके पासवर्ड को एन्क्रिप्ट करना चाहिए या आपके पासवर्ड को किसी पासवर्ड मैनेजर में रखना चाहिए.
अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.