हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 291 – धन्यो गृहस्थाश्रम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 290 धन्यो गृहस्थाश्रम: ?

सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ताप्रियभाषिणी

सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः।

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे

साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः।।

शार्दूलविक्रीडित छन्द में रची उपरोक्त पंक्तियों का अर्थ है कि घर में आनंद हो, संतान बुद्धिमान हो, पत्नी मधुरभाषिणी हो, मित्र सच्चे हों, घर में धन हो, पत्नी के प्रति पति निष्ठावान हो, सेवक आज्ञापालक हो, घर में अतिथियों का सत्कार होता हो,  शिव का पूजन होता हो, प्रति दिन उत्तम भोजन बनता हो और सज्जनों का संग होता हो तो ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है ।

इस रचना में गृहस्थ आश्रम की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई है। विशेष बात यह कि प्राचीन समय में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुसार रचे गए इस पथदर्शक काव्य में अधिकांश मूलभूत मूल्य उद्घोषित हुए हैं जिनमें कालानुसार किंचित परिवर्तन ही आया है।

भारतीय दर्शन ने जीवन को चार आश्रमों में विभक्त किया है। ये हैं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रत्येक कालखंड की अवधि 25 वर्ष रखी गई है। ब्रह्मचर्य जीवन के पहले 25 वर्ष का कालखंड है। यह औपचारिक शिक्षा एवं व्यवहार जगत की दीक्षा हेतु है। 25 से 50 वर्ष की आयु गृहस्थाश्रम है। यह सांसारिक दायित्वों की पूर्ति का समय है। इसमें विवाह, संतान को जन्म देना, उनका लालन-पालन करना, उनकी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करना, परिवार को केंद्र में रखना आदि सम्मिलित हैं। वानप्रस्थाश्रम, पारिवारिक दायित्वों से शनै:-शनै: मुक्त होने का कालखंड है। दायित्वों से मुक्ति अंतस की यात्रा के लिए प्रेरित करती है। फलत: वानप्रस्थाश्रम में निरंतर आध्यात्मिक विकास होता है। इस  शृंखला में अंतिम आश्रम संन्यास कहलाता है। यह संसार से विरक्त होकर ईश्वर में अनुरक्त होने की कालावधि है। चौथे पुरुषार्थ मोक्ष की ओर ले जाने का साधन है संन्यास।

चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को महत्वपूर्ण माना गया है। यह सृष्टि के सातत्य की अटूट शृंखला बनाए रखने का साधन भर नहीं है। मनुष्य की मनुष्यता के विकास में गृहस्थ आश्रम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परिवार का उद्भव, एक दूसरे की कमियों-अच्छाइयों अर्थात शक्ति बिंदुओं और निर्बलताओं के साथ चलना, परस्पर मान-सम्मान देना, विभिन्न विषयों पर सामूहिक चर्चा करना, सामूहिक निर्णय लेना, उदारता, सहनशीलता, सुख-दुख में साथ रहना आदि बहुत कुछ सिखाता है गृहस्थ आश्रम।

अब ‘मैं और मेरा’ तक सीमित मूल्यधर्मिता का समय है। शिक्षा से लेकर खानपान व पहनावे से लेकर सामाजिक औपचारिकता तक में आयातित संस्कृतियों का अनुकरण कर हमने अपने अस्तित्व पर स्वयं ही प्रश्नचिन्ह लगा लिया है। इसके दुष्परिणाम गृहस्थ आश्रम पर  दृष्टिगोचर हो रहे हैं। 18 से 20 वर्ष की आयु में होने वाला परिणय, शिक्षा के चलते 25 वर्ष तक पहुँचा। यह तर्कसम्मत था। तत्पश्चात करियर के चलते 25 से बढ़कर 30 तक पहुँच गया। अब 35 वर्ष की औसत आयु तक आ चुका है। इस आयु तक आते-आते युवक-युवती बौद्धिक रूप से परिपक्व हो चुके होते हैं। तथापि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि युवावस्था का शिखर काल भी ढलान पर होता है। 

इस अवस्था में व्यवहार बुद्धि अधिक सक्रिय हो उठती है। प्रेम के स्थान पर व्यवहार प्रधान हो जाता है। मस्तिष्क पड़ताल करने में जुटा रहता है पर मन गौण होने लगता है। अपने ही बनाए घेरों में घिरे इन युवाओं को पता ही नहीं होता कि जीवन दो और दो मिलकर कर चार होने का गणित नहीं होता। यदि ऐसा ही होता तो मन की अनुभूतियाँ होती ही नहीं।

आजकल युवक-युवती दोनों आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, यह सुखद है। दुखद यह है कि अधिकांश के शब्दकोश में लचीलेपन का अर्थ समझौता लिखा होता है। लचक और समझौते में अंतर न कर पाने के कारण समय बीतता रहता है।

वर्तमान असंगत स्थिति के कारणों की मीमांसा करते हुए इस सत्य को भी स्वीकारना होगा कि लड़कियों ने सतत कठोर परिश्रम से समाज में अपना स्थान बनाया है। व्यक्ति से व्यक्तित्व की यात्रा कर उन्होंने अपनी योग्यता प्रमाणित की है। विडंबना है कि पुरुष का अहंकार, ‘मेल ईगो’ नारी की इस सफलता को स्वीकार करने के लिए अभी भी तैयार नहीं है। आज भी ऐसे परिवार मिल जाएँगे जो बहू को घर की चौखट तक सीमित रखना चाहते हैं। जिनके लिए चूल्हे-चौके से परे  स्त्री जीवन का दूसरा कोई अर्थ नहीं है। इसके चलते उच्च शिक्षित युवतियों की विवाह से विमुखता भी बढ़ रही है।

सनद रहे कि सात जन्मों का साथ चाहने वाली विवाह संस्था का स्थान डगमगा रहा है। विवाह होना कठिन हो चला है और होने के बाद उसे निभाना और अधिक कठिन। विवाह योग्य युवक-युवतियों को याद रखना चाहिए कि ‘नो वन इज़ परफेक्ट।’ अगर, मगर, किंतु-परंतु विवाह की डगर को संकरा करते जा रहे हैं।

विवाह के बाद सामंजस्य के अभाव में संबंध विच्छेद सैकड़ों प्रतिशत की दर से बढ़े हैं। संबंध विच्छेद से बच्चों पर जो बीतती है, उस पर किसी का विचार होता दिखता नहीं। बच्चे को माँ और पिता, दोनों की आवश्यकता होती है। एक से दूर रहने के कारण उनकी मनोदशा पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

यक्ष प्रश्न है कि कहाँ जा रहे हैं हम?

‘ईट, ड्रिंक एंड बी मेरी’ के मद में डूबा समाज क्या शेष संभावनाओं के मुरझाने की प्रतीक्षा में है? स्मरण रहे, विवाह, गृहस्थ आश्रम का प्रवेश द्वार है। गृहस्थाश्रम इहलौकिक और पारलौकिक संभावनाओं का अशेष जगत है। इसे बाहर खड़े रहकर नहीं समझा जा सकता। आदि शंकराचार्य  जैसे मूर्धन्य को भी देवी भारती के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए एक राजा की देह में प्रवेश कर गृहस्थाश्रम को जीना पड़ा था।

अशेष के ‘अ’ की रक्षा के लिए कमर कसने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत और समष्टिगत प्रयासों की आवश्यकता है। मैं तो अभियान पर निकल चला हूँ। क्या आपने चलना आरम्भ किया?….इति।

© संजय भारद्वाज 

प्रातः 6:50 बजे, 31 मई 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️💥 श्री महावीर साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 695 ⇒ पानी पतरा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पानी पतरा।)

?अभी अभी # 695 ⇒ पानी पतरा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जहां आज भी कच्चे मकान हैं, वहां छत पर लोहे की नालीदार शीट लगी होती है, और उन मकानों को पतरों वाला मकान कहते हैं। अक्सर इन छतों पर कवेलू भी बिछाए जाते हैं। बारिश के शुरू होते ही, पतरे टप टप आवाज करने लगते हैं। आज के मकानों की तो पूछिए ही मत ! पूरे वाटर प्रूफ होते हैं। केवल टीवी और मोबाइल से ही बारिश का पता चलता है। घर में सूखा, और बाहर निकलते ही सड़कों पर ही नदी नाले का नजारा।

पानी पतरा एक कम सुना हुआ शब्द है। वह जमाना वर्ली मटके का था। रतन खत्री कभी मटका किंग था। सट्टा बाजार एक फिल्म भी आई थी। कभी शायद किसकी लॉटरी भी लगी हो ! क्योंकि आजकल तो लॉटरी पर भी प्रतिबंध है। सट्टा लगाया जाता है, और जुआ खेला जाता है। दोनों ही कानूनन अपराध हैं।।

अक्सर पुरानी फिल्मों में एक रईस लालाजी होते थे, जिनकी एक खूबसूरत लड़की होती थी। अच्छा भला लाखों -करोड़ों का कारोबार होता था। अचानक कहीं से फोन की घंटी बजती। उधर से आवाज आती, लालाजी, आपने जिस घोड़े पर पैसा लगाया था, वह हार गया। आप बर्बाद हो गए। और लालाजी को दिल का दौरा पड़ जाता था।

मुंबई का वह एरिया आज भी महालक्ष्मी कहलाता है, जहां घुड़दौड़ होती है और लाखों के वारे न्यारे होते हैं। आज का शेयर मार्केट लोगों को बनाता भी है और बर्बाद भी कर देता है। यह पूरी तरह वैध है, No risk no gain.

आइए, पानी पतरे के लिए सराफे चलें। माफ कीजिए आज वहां आपको सोना चांदी तो मिल जाएगा, रात में सभी पकवान, मिठाई, चाट और पानी पूरी भी मिल जाएगी, लेकिन कहीं भी पानी पतरे के दर्शन नहीं होंगे। आखिर क्या है यह पानी पतरा।।

आज से वर्षों पूर्व जब इसी सराफे में पतरे वाले पुराने मकान थे, तब पानी पतरा खेला जाता था। जी हां, यह एक तरह का सट्टा ही था। लोग दुकानों में बैठे हैं। सबकी निगाह आसमान में बादलों पर है। और बैठे बैठे ही सौदे हो रहे हैं। इधर पतरे भीगे और उधर लाखों के वारे न्यारे।

बड़ा ही विचित्र नजारा होता था पानी पतरे का।

इशारों ही इशारों में हार जीत हो जाती थी। बादलों पर कालिदास ने मेघदूतम् जैसा दूत काव्य रच दिया।

और वही बादल यहां लक्ष्मी पुत्रों पर धन की वर्षा कर रहे हैं।।

समय का खेल निराला है। खेल वही खेलें जो युक्तिपूर्ण हो और पूरी तरह कानूनी हो। सट्टा छोड़ें, सत्ता से नाता जोड़ें। एक और परिश्रम है और एक ओर अनुमान। यह युग सट्टे का नहीं निवेश अर्थात् इन्वेस्टमेंट का है।

मोहरे भले ही बदल जाएं, चालें तो वही होती हैं।

वार त्योहार का मौसम है आइए पानी पतरे को मारें गोली, पूजा पत्री की बात करें। इंद्रदेव तो मेहरबान हैं ही, गणेशोत्सव की तैयारी करें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #278 ☆ घर की तलाश… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख घर की तलाश। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 278 ☆

☆ घर की तलाश… ☆

एक लम्बे अंतराल से उसे तलाश थी एक घर की, जहां स्नेह, सौहार्द, समर्पण व एक-दूसरे के लिए मर-मिटने का भाव हो। परंतु पत्रकार को सदैव निराशा ही हाथ लगी।

आप हर रोज़ आते हैं और अब तक न जाने कितने घर देख चुके हैं। क्या आपको कोई घर पसंद नहीं आया?

तुम्हारा प्रश्न वाज़िब है। मैंने बड़ी-बड़ी कोठियां देखी हैं–आलीशान बंगले देखे हैं–कंगूरे वाली ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं व हवेलियां देखी हैं, जहां के बाशिंदे अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हैं और वहां व्याप्त रहता है अंतहीन मौन। यदि मैं उसे मरघट-सी ख़ामोशी कहूं व चहूंओर पसरा सन्नाटा कहूं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

परंतु तुमने द्वार पर खड़ी चमचमाती कारें, द्वारपाल व जी-हज़ूरी करते गुलामों की भीड़ नहीं देखी, जो कठपुतली की भांति हर आदेश की अनुपालना करते हैं। परंतु मुझे तो वहां इंसान नहीं; चलते-फिरते पुतले नज़र आते हैं, जिनका संबंध-सरोकारों से दूर तक का कोई नाता नहीं होता। वहां सब जीते हैं अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी, जिसे वे सिगरेट के क़श व शराब के नशे में धुत्त होकर ढो रहे हैं।

आखिर तुम्हें कैसे घर की तलाश है?

क्या तुम ईंट-पत्थर के मकान को घर की संज्ञा दे सकते हो, जहां शून्यता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी-सम…कब, कौन, कहां, क्यों से दूर– समाधिस्थ।

अरे विश्व तो ग्लोबल विलेज बन गया है;इंसानों के स्थान पर रोबोट अहर्निश कार्यरत हैं;मोबाइल ने सबको अपने शिकंजे में इस क़दर जकड़ रखा है, जिससे मुक्ति पाना संभव नहीं है। आजकल सब रिश्ते-नातों पर ग्रहण लग गया है। हर घर के अहाते में दुर्योधन व दु:शासन घात लगाए बैठे हैं। सो!दो माह की बच्ची से लेकर नब्बे वर्ष की वृद्धा की अस्मिता भी सुरक्षित नहीं।

चलो छोड़ो!तुम्हारी तलाश कभी पूरी नहीं होगी, क्योंकि आजकल घरों का निर्माण बंद हो गया है। हम अपनी संस्कृति को नकार पाश्चात्य की जूठन ग्रहण कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं और बच्चों को सुसंस्कारित नहीं करते, क्योंकि हमारी भटकन अभी समाप्त नहीं हुई।

आओ!हम सब मिलकर आगामी पीढ़ी को घर- परिवार की परिभाषा से अवगत कराएं और दोस्ती व अपनत्व की महत्ता समझाएं, ताकि समाज में समन्वय, सामंजस्य व समरसता स्थापित हो सके। हम अपने स्वर्णिम अतीत में लौटकर सुक़ून भरी ज़िंदगी जिएं, जहां स्व-पर व राग-द्वेष का लेशमात्र भी स्थान न हो। हमें संपूर्ण विश्व में अपनत्व का भाव दृष्टिगोचर हो और हम सब दिव्य, पावन निर्झरिणी में अवगाहन करें, जहां केवल तेरा ही तेरा का बसेरा हो। हम अहं त्याग कर मैं से हम बन जाएं, जहां कुछ भी तेरा न मेरा हो।

●●●●

© डा. मुक्ता

30.3.22

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और प्रशस्ति… ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और प्रशस्ति…)

☆ पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और प्रशस्ति… ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

2019 की बात है। किताबों की अलमारी की सफ़ाई करते हुए कहीं से एक प्रशस्ति-पत्र निकल आया। उसमें लिखा था- लघुकथा की विकास-यात्रा में आपके योगदान को कोटिशः नमन। मुझे याद आया कि मैंने एक लघुकथा-सम्मेलन में लघुकथा भेजी थी, ख़ुद नहीं जा पाया था। मेरे शहर के एक लेखक के ज़रिये मुझ तक यह प्रशस्ति-पत्र तथा सम्मेलन में पढ़ी गई सभी लघुकथाओं का पुस्तकाकार संग्रह भेजा गया था और उस संग्रह के लिए मुझे शायद दो सौ रुपये चुकाने पड़े थे। मैंने पुस्तक और प्रशस्ति-पत्र यूँ ही कहीं रख दिए थे। सफ़ाई के दौरान मैंने प्रशस्ति-पत्र को पढ़ा और मुझे हँसी आ गई। क़ायदे से तो मुझे गर्व और आभार से भर जाना चाहिए था, लेकिन मैं गहरी सोच में पड़ गया कि मैंने कब लघुकथा के विकास में योगदान दिया था। बता दूँ कि तब तक मेरा एक भी लघुकथा संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। दस- बीस लघुकथाएँ लिख लेने भर से मेरा ऐसा प्रचंड योगदान कि मैं ‘कोटिशः नमन’ का पात्र हो गया। जिस किसी ने भी वहाँ लघुकथा पढ़ी होगी, उसे ठीक ऐसा ही प्रशस्ति-पत्र दिया गया होगा। एक साथ साठ-सत्तर लोग कोटिशः नमन के पात्र हो गए होंगे। इस तरह के सम्मान से वितृष्णा नहीं होती? आज इस तरह के प्रशस्ति-पत्रों से लोगों के घरों की दीवारें भरी पड़ी हैं। उन्हें देखकर मुझे कभी नहीं लगा कि फलाँ बड़ा लेखक है। प्रशस्तियों के आदान-प्रदान का धंधा आज चरम पर है। लोग जुगाड़ लगाकर पुरस्कार झटक रहे हैं। यहाँ तक कि एंट्री फ़ीस भरकर पुरस्कार ले रहे हैं। त्रासदी यह भी है कि प्रसाद, प्रेमचंद, निराला, पंत, महादेवी, नीरज जैसे साहित्यकारों के नाम पर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए जा रहे हैं, जिनकी पुरस्कार राशि महज़ पाँच सौ रुपये भी हो सकती है। संभव है कि इससे ज़्यादा एंट्री फ़ीस ही हो। लेखक प्रशस्ति-पत्र को दीवार पर टाँगकर मेहमानों पर अपने अंतरराष्ट्रीय लेखक होने का रौब ग़ालिब कर देते हैं, जबकि वे जानते हैं कि वे कितने पानी में हैं। आजकल यह भी सिलसिला चल निकला है कि आप एक संस्था बनाकर किसी शहर के दस-बीस लेखकों को बुलाकर थोक के भाव राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से ‘सम्मानित’ कर दें और कुछ दिनों बाद उस शहर के लेखक आपके शहर के दस-बीस लेखकों को उसी तरह से सम्मानित कर दें। प्यार भी बना रहेगा, दीवारें भी सजती रहेंगी। पुरस्कार के लिए नाम कैसे भी रखे जा सकते हैं। बड़े-बड़े लेखक तो हैं ही (आपकी ओछी हरकत से महान लेखक अपमानित होता है तो आपकी बला से), इनके अलावा साहित्य के साथ भूषण, विभूषण, रत्न, मनीषी जैसे शब्द जोड़ कर पुरस्कार का नाम रखा जा सकता है। हज़ारों विशेषण उपलब्ध हैं। मेरा एक प्रश्न है- आपकी तुलना कोई ताॅलस्ताॅय, गोर्की, मोपासां, चेखव, शेक्सपियर, बालज़ाक वगैरह से करे तो आप यक़ीन कर लेंगे? नहीं न! आप समझ जाएँगे कि सामने वाला बन्दा आपका उल्लू खींच रहा है। ऐसे ही आपके अति साधारण लेखन के लिए (कभी-कभी दो कौड़ी के लेखन के लिए) विलक्षण, अलौकिक प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग सचमुच गाली देने जैसा ही है। लेखक सोचता है कि चलो, महान होने के अहंकार और धोखे में ही जी लिया जाए। लेखक का सम्मान उसका लेखन ही है, प्रशस्ति पत्र नहीं ।

ख़ैर, उस प्रशस्ति पत्र को मैंने कूड़ेदान के हवाले कर दिया और यक़ीन मानिये, ऐसा करते हुए मुझे कोई अफ़सोस नहीं हुआ, बल्कि मैंने राहत ही महसूस की कि मैं एक पाखण्ड भरे झूठ से मुक्त हो गया।

मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि सैंकड़ों पुस्तकें लिख देने से कोई लेखक महान नहीं होता और न सैंकड़ों पुरस्कार प्राप्त कर लेने से कोई लेखक महान होता है। लेखक के अच्छे या बुरे होने की एक ही कसौटी है – उसका लेखन। महत्वपूर्ण यह है कि उसने क्या लिखा, क्यों लिखा और कैसा लिखा? महत्वपूर्ण यह नहीं है कि उसने कितना लिखा और उसने कितने पुरस्कार प्राप्त करने में सफलता हासिल की।

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ || मातृत्व छांव || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्हें 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान से नवाजा गया। उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ || मातृत्व छांव || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

ममा या मम्मी नहीं  गाँव में अम्मा होती है… 

वह साड़ी में पिन नहीं लगातीं बल्कि  आंचल स्वतंत्र खुला रखतीं हैं…

उसके साड़ी के पल्लू में बंधे हुए होते हैं सिक्के या कुछ रुपये जो बच्चों के हाथों में आसानी से आ जाते हैं…

अम्मा को सब कुछ पता होता है जैसे कब भुखे होगें बच्चे और कब नहीं… 

अम्मा के रसोई में हमेशा खाना उपलब्ध होता है…

 मैगी नूडल्स खाकर बड़ी नहीं हुई पहले की पीढ़ी बल्कि, रोटी, चीनी या रोटी, अचार बहुत प्रेम से खाते थे…

 

अम्मा मेला या हाट कम जाती थी… 

तीज त्योहार में अक्सर बाबूजी ही कपड़ा लाते  केवल अम्मा के लिए ही नहीं बल्कि, बुआ के लिए भी…

 

बुआ का तीजा दादाजी के देहांत के उपरांत भी जाता रहा, जब तक बुआ और बाबूजी जीवित रहे, यह क्रम चलता रहा ना जाने कौन सा प्रेम का अटूट नाभि बंधन था पहले के लोगों में 👥 उस जमाने में ✍️

फर्क़ ही नहीं पड़ता था  बच्चा किसके पास है?

अम्मा डांटती तो बड़की माई (बड़ी मां) आंचल में समेट लेती और अम्मा से कहतीं

“खबरदार जो मेरे सामने बच्चों को डांटा”

जेठानी की बाते सुन लेतीं

 कुछ नहीं कहतीं बल्कि दोनों जेठानी- देवरानी शब्दहीन अतंस से बातचीत कर लेतीं

घर के सारे पुरुष -समाज खाना खा लेते, तो ना जाने कौन -कौन सी चटनी के साथ अम्मा बिना सब्जी के ही चावल खा लेतीं…

उनके थाली में कभी सब्जी होता और कभी नहीं भी,  फिर भी वह खा लेतीं…

अम्मा को खुद पता नहीं…

कौन सी सब्जी पंसदीदा थी उनकी ?

बाबूजी भी नहीं जानते थे…

बाबूजी जब तक जीवित रहे उन्होंने रसोई के अंदर प्रवेश  नहीं किया और अम्मा -बाबूजी की  आवश्यकता सदा अद्भुत कौशल गृहणी बन करतीं रही…

 

अम्मा को ना कभी ज्वार हुआ ना ही कभी उन्होंने कहा कि मुझे भी तारीफ़ के दो शब्द सुनने है…

अम्मा तो एक गंभीर सांचे में ढली देहांती बहू  जो सीधा पल्लू पहनी देहरी तक सीमित रहतीं…

 

उम्र के साथ साथ जैसे जैसे बडी़ हुई  मालूम चला अम्मा तो  शहर से हैं!

यह बात ना जाने कब से कील बन चुभती मन के कोने में पड़ी रही…

अम्मा को बस निहारती रही…

 

कभी अल्हड़ उन्मुक्त उंमगो की जीवंतता अम्मा मे भी होगा…

परिवर्तन कैसे हो गया??

 

आखिर कब कैसे उड़ान भरने वालीं अम्मा ने कोशिश करना छोड़ दिया…

प्रश्न अधूरा सा रहा और वक़्त चलता रहा…

अम्मा की उड़ान भरने वालीं लाडो, खुद अम्मा बन चुकी है…

 हर प्रश्न का जवाब मिल चुका है आज…!

 

जिम्मेवारी के पतीले में ना जाने  कहाँ छूट जातें हैं मध्यवर्गीय सपने और बच्चों के पालन पोषण में जायका का स्वाद कहाँ गुम हो जाता है?

 

मिर्ची -निबू का नज़र कवच घर में टांगते- टांगते  बस देहरी में सिमट जाता है अल्हड़पना…

ना जाने कब कैसे एक बच्चे के जन्म के साथ ही एक अल्हड़ उन्मुक्त उंमगो वाली बेटी दम तोड़ देती है और एक परिपक्व माँ का जन्म हो जाता है?

 

ना जाने कौन से रेस्टोरेंट से अम्मा ने अचार बनाया?

अक्सर वही अचार प्लेट में नज़र आ जाते हैं…

 

अम्मा ने सच ही कहा है 👧

 

सह कर  तेज ज्वार तब प्रफुल्लित होता है माँ के जैसा व्यवहार…

अनसुनी अनकही माँ के जज्बात, जो आंगन की चुप्पी में जाने कहाँ खो गई पीढ़ी दर पीढ़ी…

लिखने की कोशिश कर रही हूँ… अनवरत…

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 694 ⇒ साहब का कुत्ता… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – साहब का कुत्ता।)

?अभी अभी # 694 ⇒ साहब का कुत्ता 🐶 श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिन भर की दफ्तर, फाइल और मीटिंग की थकान के बाद दूसरे दिन सुबह ही तो थोड़ा सुकून मिलता है जब साहब अपने कुत्ते के साथ ताजी हवा का सेवन करने स्टेडियम निकल जाते हैं।

अंग्रेज अफसरों के लिए रेसिडेंसी एरिया में क्लब और बंगले बना गए और नौकर चाकर भी दे गए।

अगर किसी बंगले में कुत्ता ना हो, तो वह बंगला सिंदूर बिना सुहागन सा नजर आता है।

राजनीति में जिस तरह आजकल नेता भक्त बिना नहीं रह सकता, साहब को एक कुत्ते के अलावा कोई स्वामिभक्त नजर नहीं आता। एक कुत्ता ही तो होता है, जिसके पीछे अफसर भी दौड़ता नजर आता है। समय का फेर देखिए। एक कुत्ते ने साहब और मेम साहब को कितना दौड़ा दिया। गेंद सीधी स्टेडियम से बाहर।।

कितनी पैनी नजर है हमारे मीडिया की और उससे भी अधिक चुस्त और सजग हमारी सरकार, जो नौकरशाही पर मानो किसी ड्रोन से नज़र रख रही हो।

चौतरफा तारीफ, वाहवाही। चट मीडिया में तस्वीर पट न्याय। इसे कहते हैं गुड गवर्नेंस। हम तो इस खुशी में कल नेहरू को भी भूल गए।

इस संदर्भ में अफसरों पर गाज गिरना कोई नई बात नहीं। हमारे मंत्री समझदार हैं, वे अफसरों की तरह कुत्ते नहीं पालते। वे भक्त पालते हैं, जो उनके पहले ही सात समंदर पार, मीडिया सहित पहुंच जाते हैं, दुनिया के किसी भी स्टेडियम में।

जहां भक्त है, वहां सम्मान है, जहां स्वामिभक्त है वहां सैकड़ों मील दूर ट्रांसफर है।।

एक धर्मराज थे जो कुत्ते सहित स्वर्ग पधार गए और एक हमारे साहब हैं, जो कुत्ते को स्टेडियम ले गए तो इनके काम लग गए।

साहबों के भी साहस और दुस्साहस में बड़ा अंतर होता है। एक दुस्साहसी महिला पुलिस अफसर ने दिल्ली में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री की गाड़ी का चालान बनाया तो वह किरण बेदी कहलाई लेकिन जब खिलाड़ियों के स्टेडियम में कोई अफसर कुत्ता घुमाएगा तो अच्छे अच्छों का सर चकराएगा।

जिन्हें भारतीय मीडिया से शिकायत है, उनके लिए यह एक सुखद संकेत है।  वह पत्रकार भी बधाई का पात्र है जिसने हिम्मत दिखाकर इस घटना को सार्वजनिक किया। और सोने में सुहागा सरकार की ताबड़तोड़ त्वरित कार्यवाही। काश कोई कुत्ते की मनोदशा भांप पाता जिसके कारण यह सब घटना घटी। वैसे स्टेडियम में कुत्ते का खेल के बीच आना कोई बड़ी घटना नहीं। वे कई बार पहले भी पिच का निरीक्षण कर गए हैं। खैर है इन बेजुबान प्राणियों पर कोई भारतीय दंड संहिता अथवा आचार संहिता लागू नहीं होती।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 352 ☆ आलेख – “कैसे और क्यों व्यंग्यकार बने परसाई?” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 352 ☆

?  आलेख – कैसे और क्यों व्यंग्यकार बने परसाई? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हरिशंकर परसाई का जन्म आजादी से पहले 1924 में एक ब्राह्मण परिवार में मध्यप्रदेश के ग्रामीण परिवेश में हुआ। उन्होंने बड़े होते हुए गाँव की सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ, रूढ़िवादिता, और आदमी की पीड़ा और विडंबनाओं को करीब से देखा तथा समझा। उनका व्यक्तित्व संवेदनशील था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया। पढ़ाई के दौरान उनकी रुचि साहित्य, दर्शन और समाजशास्त्र में विकसित हुई। प्रेमचंद, रवींद्रनाथ टैगोर और चेखव जैसे लेखकों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। सामयिक घटनाओं पर उनकी नजरें सचेत रहीं। जब वे युवा हुए तब देश आजाद अवश्य हो गया था पर सामाजिक स्थिति आशानुकूल बदली नहीं थी। राजनीतिक उथल-पुथल, नौकरशाही का भ्रष्टाचार और नैतिकता के ढोंग से उनका सामना हुआ। । इस “मोहभंग” ने परसाई को झकझोरा और उन्होंने महसूस किया कि गंभीर लेखन से लोगों पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना व्यंग्य से पड़ सकता है। उन्होंने अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए बोलचाल की भाषा और हास्य व्यंग्य को अपनाया। वे सतत लिखते गए और व्यंग्य की उनकी मौलिक भाषा शैली विकसित होती गई। उनका लेखन सिर्फ मनोरंजन नहीं,  बल्कि “समाज का आईना” था। जैसे,  ‘वैष्णव की फिसलन’ में उन्होंने धार्मिक पाखंड पर करारा प्रहार किया। उन्होंने “ठिठुरता हुआ गणतंत्र” में लोकतंत्र की विसंगतियों को रोचक चुटीले अंदाज़ में उकेरा। लेखन के लिए वे पात्रों के चयन अपने परिवेश से ही किया करते थे। पात्रों के माध्यम से वे व्यंग्य का नाटकीय प्रस्तुतीकरण करने में सफल हुए। परसाई ने कभी भी सत्ता या समाज के ठेकेदारों से समझौता नहीं किया। उनके व्यंग्य में “सच को सच कहने का साहस” था।

उनकी पत्रिका ‘वसुधा’ के माध्यम से वे सीधे पाठकों से जुड़े और बिना लाग-लपेट के स्पष्ट विचार रखते थे। जनसामान्य की भाषा में रचना तथा मानवीय वृत्तियों पर लेखन के कारण ही उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। उनका मानना था कि व्यंग्य का उद्देश्य सिर्फ हँसाना नहीं,  बल्कि “सोचने पर मजबूर करना” है। ‘भोलाराम का जीव’, इंस्पेक्टर मातादीन जैसी रचनाओं ने उन्हें अमर बना दिया। उनके लेखन से हिंदी साहित्य में व्यंग्य को मुख्यधारा में स्थान मिला।

परसाई के अध्ययन से हम व्यंग्य लेखन के सूत्र समझ सकते हैं।

समाज को गहराई से देखें तो छोटी-छोटी विसंगतियाँ व्यंग्य का विषय बन सकती हैं।

सरल भाषा,  गहरा प्रभाव छोड़ती है। जटिल विचारों को आम बोलचाल के शब्दों में व्यक्त करें।

लेखन में निर्भीकता और ईमानदारी आवश्यक होती है। सच्चाई को छुपाए बिना उसे व्यंग्य, हास्य का रूप दें।

मानवीय स्वभाव को समझ कर व्यक्ति के दोगलेपन और स्वार्थ पर रचनात्मक प्रहार करें।

परसाई ने व्यंग्य को ही अपना हथियार बनाया क्योंकि यह सटीक वार करता है। हास्य के माध्यम से कटु सत्य भी सहज रूप से स्वीकार्य बन जाता है। और जनमानस तक पहुँचना आसान होता है।

परसाई का लेखन सिर्फ साहित्य नहीं,  बल्कि समाज का सांस्कृतिक दस्तावेज़ बन गया है। परसाई का मानना था कि व्यंग्यकार का कर्तव्य है कि अपने लेखन से अंधेरे को उजाले में बदल दें।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विलोम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विलोम ? ?

विद्यालय में विलोम का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाया था। फिर जीवनभर पढ़ना पड़ा विलोम का पाठ।

जिससे सुख की आस रही, उसने पीड़ा दी। जिस पर विश्वास किया, उसने विश्वासघात किया। जिनसे अपनापन अपेक्षित था, वे व्यवहार करते रहे परायों-सा। जीने ने भी साथ नहीं दिया, सो मर-मरकर जिया।

सचमुच मरा तब तक विलोम को जीता रहा वह।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️💥 श्री महावीर साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जवेगी।आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 245 ☆ अनुभवों से जुड़ें… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अनुभवों से जुड़ें। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 245 ☆ अनुभवों से जुड़ें

गुजरते वक्त की आहट

सुनायी दे रही है।

कही अनकही अनायास

दिखायी दे रही है।।

*

अंदाज बदल जाता है

जब कभी विवादो से।

बात सुधरती जाती है

तब केवल संवादों से।।

*

नासमझ बन जीते रहो

पर याद करना सदा।

भूलते हो भूल जाओ

पर पीर हरना सदा।।

*

फूल संग शूल मिलेंगे

बात यही सच्ची है।

कर्म करते चले जाओ

सीख यही अच्छी है।।

जीत के मूल मंत्र के साथ चलते रहने वाला कभी हारता नहीं है, बस सबको साथ लेकर चलना आना चाहिए। वक्त एक न एक दिन अपने अनुरूप सभी को ढाल लेता है जो जल्दी समझते हैं, वही सुखी रहते हैं। मानव मन सदा से यात्रा प्रेमी रहा है, उसे नए लोगों का साथ, नया परिवेश, नयी बोली, भाषा, पानी सभी कुछ चाहिए जिससे अपनी अनवरत यात्रा के दौरान वैचारिक पोटली को विस्तारित कर सके। चार धाम, पहाड़ों की सैर, नर्मदा परिक्रमा, नदियों में स्नान, तीर्थ स्थलों के दर्शन, पुरातत्व से जुड़े स्थान, ऐतिहासिक इमारतें आदि को समझना, जानना व इनसे सीखना।

जिज्ञासा से सीखने की प्रेरणा मिलती है। आइए मिलकर देश दुनिया को जाने समझे और उन्नत बनाने में सहयोग करें।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 693 ⇒ अपना देस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना देस ।)

?अभी अभी # 693 ⇒ अपना देस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे राष्ट्र में महाराष्ट्र भी है और गुजरात प्रदेश में सौराष्ट्र भी! एक देश के वासी होते हुए भी सबका अपना अपना देस है। बरसों से लोग रोजी रोटी के लिए, देस को छोड़ परदेस जाते रहे हैं। जिसे हम आज प्रदेश कहते हैं, उसका ही अपभ्रंश है यह देस।

जब लड़की की शादी के बाद बिदाई होती है तो अमीर खुसरो का यह विदाई गीत महिलाएं गाती हैं ;

काहे को ब्याहे बिदेस,

अरे लखिय बाबुल मोरे,

काहे को ब्याहे बिदेस

‌आखिर तब देस होता ही कितना छोटा था!

‌ये गलियां ये चौबारा

यहां आना ना दोबारा।

पनघट और अमराई और सावन के झूले, बचपन के संगी साथी जब छूटते थे, तो मन बरबस कह उठता था;

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना

ये घाट, ये बाट कहीं भूल न जाना।

निरगुन कौन देस को बासी!

देस वह स्थान है, जहां हम पैदा हुए, बड़े हुए, खेले कूदे। हम जिस नदी में नहाए, हमने जिस कुएं का पानी पीया, ज़िन्दगी भर आप चाहो तो उसे भूल जाओ, आखरी समय वह जरूर याद आता है।

ऐसा माना गया है कि जब हम देह त्यागते हैं तो हमें अपने बचपन की तस्वीरें खुली आंखों से दिखाई देती हैं। हमारे परिवार के वे वरिष्ठ जन, जिनकी गोद में आपने बचपन गुज़ारा है, आपको पुकार रहे हैं। लोग समझते हैं, आप भावुक होकर प्रलाप कर रहे हैं। लेकिन अंतिम समय में अतीत ही साथ जाता है, वर्तमान से नाता टूट जाता है।

उड़ जाएगा हंस अकेला।

जग दर्शन का मेला।।  

हम कितना भी देश विदेश में प्रवास कर लें। रोजी रोटी किस इंसान को कहां फेंकती है, कुछ कहा नहीं जाता। होते हैं कई बदनसीब, जो वापस अपने देस नहीं लौट पाते। जिन्हें अपनी माटी से लगाव होता है, वे हमेशा उस पल की तलाश में रहते हैं, जब वे एक बार फिर अपने जन्म स्थान के दर्शन कर लें।

माटी से यह लगाव, माटी की उस खुशबू का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। आखिर यह तन ही तो हमारा वतन है। जिस माटी से पैदा हुआ है, उसे उसमें ही मिल जाना है। हम इस माटी का कर्ज चुका पाएं, उसे अंतिम प्रणाम कर पाएं, शायद इसीलिए माटी का मोह हर अमीर गरीब को, मजदूर किसान को अंतिम समय में, सैकड़ों मील दूर, अपने देस की ओर खींचता है, आकर्षित करता है।।  

आप एक नन्हे बालक से उसका खिलौना छीनकर देखिए। उसे पैसे का, सोने चांदी का लालच देकर देखिए। एक मिट्टी के खिलौने में उसकी जान बसी है। वह उसके साथ उठता, बैठता, सोता खाता है। उसका खिलौना टूटता है, वह मचल जाता है। उसकी दुनिया बिखर जाती है।

इंसान की दुनिया भी जब एक बार बिखर जाती है, तो उसे समेटना इतना आसान नहीं होता। आज हर जगह सब बिखरा बिखरा सा है। इसे समेटना, संभालना, संवारना बहुत ज़रूरी है। केवल भरोसा और विश्वास ही हमें वापस अपनी माटी से जोड़ सकता है, हमें बिखरने से बचा सकता है। शायद तब ही जो दर्द की सरगम हमें सुनाई दे रही है वह थमेगी। कहीं कोई अभागा फिर यह दर्द भरा गीत गाने को विवश ना हो ;

हम तो चले परदेश

हम परदेसी हो गए

छूटा अपना देस

हम परदेसी हो गए

ओ रामा हो ….!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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