हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – अब ये क़िस्से नहीं ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर विचारणीय लघुकथा – अब ये क़िस्से नहीं।)

☆ लघुकथा – अब ये क़िस्से नहीं ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

एक पेड़ की अलग-अलग डालियों पर तोता और मैना पिछले चार पहर से ख़ामोश बैठे थे। आख़िर तोते ने ख़ामोशी तोड़ी, “इधर आ जाओ मैना।”

मैना तोते के पास आ बैठी। तोते ने कहा, “अब ख़ामोशी बर्दाश्त नहीं होती मैना। कोई क़िस्सा सुनाओ, तुम्हारे पास तो मर्दों की बेवफ़ाई के हज़ारों क़िस्से हैं।”

“तुम्हारे पास भी औरतों की बेवफ़ाई के अनगिनत क़िस्से हैं, तुम्हीं सुना दो।”

“छोड़ो, आज मैं कोई क़िस्सा नहीं सुना पाऊँगा।”

“मुझसे भी आज यह नहीं होगा।”

दोनों फिर ख़ामोश हो गए। ख़ामोशी फिर तोते ने तोड़ी, “तुमने कल से कुछ खाया नहीं, कुछ खाने को लाऊँ तुम्हारे लिए?”

“मुझे भूख नहीं है। रात भर मुझे उन दोनों की चीख़ें सुनाई देती रहीं। वैसे खाया तो तुमने भी कुछ नहीं?”

“मुझे भी रात भर उनकी चीख़ें सुनाई देती रहीं। उफ़्फ़, कितने बेरहम हैं ये इन्सान! दोनों प्रेमियों को सैंकड़ों टुकड़ों में काट दिया। उफ़्फ़!”

दोनों एक दूसरे की आँखों में झाँकने की कोशिश कर रहे थे, पर दोनों की आँखें धुंधला गई थीं। तोते ने कहा, “कितनी बेढंगी हैं इन्सानों की दुनिया, नफ़रतपसंदों को तख़्त हासिल होते हैं, मुहब्बत करने वालों को मौत।”

“वैसे औरत-मर्द के बीच नफ़रत फैलाने के गुनहगार तो हम भी हैं।”

“सही कह रही हो तुम, हमारे मुहब्बत के क़िस्से आख़िर में अपने पीछे नफ़रत ही तो छोड़ते हैं । अब यह गुनाह हम नहीं करेंगे। अब से हम मुहब्बत के क़िस्से गाएँगे।”

“मुहब्बत का हश्र हमने अभी अपनी आँखों से देखा है। नफ़रतों के इस ख़ौफ़नाक दौर में मुहब्बत के क़िस्से …?”

“नफ़रत के दौर में ही मुहब्बत के क़िस्सों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।”

“क़दम-क़दम पर मुहब्बत के दुश्मन शिकारियों की तरह मौजूद हैं, ऐसे में हमारे क़िस्से सुनेगा कौन?”

“पेड़ सुनेंगे, हवा सुनेगी, धरती सुनेगी, आसमान सुनेगा और फिर इन्सान भी सुनेंगे। मुहब्बत की ताक़त पर भरोसा रखो।”

“आमीन!” मैना ने कहा, ठीक उसी समय दोनों के होंठों पर उम्मीद से भरी करुण मुस्कान झिलमिला उठी।

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क –  406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा एव लघुफिल्म – कर्तव्य ☆ सुश्री मीरा जैन ☆

सुश्री मीरा जैन 

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री मीरा जैन जी  की अब तक 9 पुस्तकें प्रकाशित – चार लघुकथा संग्रह , तीन लेख संग्रह एक कविता संग्रह ,एक व्यंग्य संग्रह, १००० से अधिक रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से व्यंग्य, लघुकथा व अन्य रचनाओं का प्रसारण। वर्ष २०११ में  ‘मीरा जैन की सौ लघुकथाएं’ पुस्तक पर विक्रम विश्वविद्यालय (उज्जैन) द्वारा शोध कार्य करवाया जा चुका है।  अनेक भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद प्रकाशित। कई अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय पुरस्कारों से पुरस्कृत/अलंकृत। २०१९ में भारत सरकार के विद्वान लेखकों की सूची में आपका नाम दर्ज । प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर पांच वर्ष तक बाल कल्याण समिति के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं उज्जैन जिले में प्रदत्त। बालिका-महिला सुरक्षा, उनका विकास, कन्या भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ आदि कई सामाजिक अभियानों में भी सतत संलग्न। पूर्व में आपकी लघुकथाओं का मराठी अनुवाद ई -अभिव्यक्ति (मराठी ) में प्रकाशित। 

हम समय-समय पर आपकी लघुकथाओं को अपने प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने का प्रयास करेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैआपकी पुस्तक एक लघुकथा – ‘कर्तव्य’। संयोगवश इस लघुकथा पर आधारित एक लघुफिल्म श्री सुरेश मुद्गल जी के निर्देशन में बनी है जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं।

☆ कथा-कहानी : लघुकथा एवं लघुफिल्म – कर्तव्य ☆ सुश्री मीरा जैन ☆

शंभू पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ विनती करने लगा –

‘साहब जी! मेरी ट्रक खराब हो गई थी इसलिए समय पर मैं अपने शहर नहीं पहुंच पाया प्लीज जाने दीजिए साहब जी ‘

 पुलिस वाले की  कड़कदार आवाज गूंजी-

‘साहब जी के बच्चे ! एक बार कहने पर तुझे समझ में नहीं आ रहा कि आगे नहीं जा सकता कोरोना की वजह से सीमाएं सील कर दी गई है कर्फ्यू की सी स्थिति  है  1 इंच भी गाड़ी आगे  बढ़ाई तो एक घूमाकर दूंगा  समझे सब समझ आ जायेगा ‘

पुलिसवाला तो फटकार लगाकर चला गया किंतु  शंभू की भूख से कुलबुलाती आॅते  सारे ढाबे व  रेस्टोरेंट बंद पुलिस का खौफ रात को 10:00 बजे अब वह जाये तो कहां जाये साथ में क्लीनर वह भी  भूखा अब क्या होगा यही सोच आंखें नम होने लगी, तभी पुलिस वाले को बाइक पर अपनी ओर आता देख शंभू की घिग्गी बंध गई फिर कोई नई मुसीबत, शंभू की शंका सच निकली बाइक उसके समीप आकर ही  रुकी पुलिसवाला उतरा डिक्की खोली और उसमें से अपना टिफिन निकाल शंभू की ओर यह कहते हुए बढ़ा दिया –

‘लो इसे खा लेना मैं घर जाकर खा लूंगा’

शंभू की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली वह  पुलिस वाले  को नमन कर इतना ही कह पाया-

‘साहब जी ! देशभक्त फरिश्ते हैं आप’

इस पर पुलिस वाले ने कहा-

‘वह मेरा ऑफिशियल कर्तव्य था और यह मेरा व्यक्तिगत कर्तव्य ही नहीं सामाजिक दायित्व भी है’

© मीरा जैन

संपर्क –  516, साँईनाथ कालोनी, सेठी नगर, उज्जैन, मध्यप्रदेश

फोन .09425918116

jainmeeera02@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार # 105 – कौन थी शबरी ?☆ श्री आशीष कुमार ☆

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #105  🌻 कौन थी शबरी ? 🌻 ☆ श्री आशीष कुमार

शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है। वह भीलराज की अकेली पुत्री थी। जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी। विवाह मैं उनके होने वाले पति ने अनेक जानवरों को मारने के लिए मंगवाया। इससे दुखी होकर उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया। फिर वह अपने पिता का घर त्यागकर जंगल में चली गई और वहाँ ऋषि मतंग के आश्रम में शरण ली। ऋषि मतंग ने उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार कर लिया। इसका भारी विरोध हुआ। दूसरे ऋषि इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि किसी निम्न जाति की स्त्री को कोई ऋषि अपनी शिष्या बनाये। ऋषि मतंग ने इस विरोध की परवाह नहीं की।

ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा में अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें। उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे।

ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन में लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं। लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती। उनकी आंखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं। और एक दिन प्रभु राम उनके दरवाजे पर आ गए।

शबरी धन्य हो गयीं। उनका ध्यान और विश्वास उनके इष्टदेव को उनके द्वार तक खींच लाया। भगवान् भक्त के वश में हैं यह उन्होंने साबित कर दिखाया। उन्होंने प्रभु राम को अपने झूठे फल खिलाये और दयामय प्रभु ने उन्हें स्वाद लेकर खाया। फ़िर वह प्रभु के आदेशानुसार प्रभुधाम को चली गयीं।

शबरी की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? आइये इस पर विचार करें।

कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता। व्यक्ति के कर्म उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं। हम किस परिवार में जन्म लेंगे इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है पर हम क्या कर्म करें इस पर हमारा पूरा अधिकार है। जिस काम पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं है वह हमारी जाति का कारण कैसे हो सकता है। व्यक्ति की जाति उसके कर्म से ही तय होती है, ऐसा भगवान् ख़ुद कहते हैं।

कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,

मानहु एक भगति कर नाता।

प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया। भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है। प्रभु राम ने कहा की हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ। तुम कौन हो, तुम किस परिवार में पैदा हुई, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तम्हारे द्वार पर लेकर आया है।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – विरासत ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर विचारणीय लघुकथा – विरासत।)

☆ लघुकथा – विरासत ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

नाना लॉबी में बैठे थे और रसोईघर में नातिन नव्या पूरियाँ तलती नानी से कह रही थी, “नानी पूरियाँ ज़्यादा बनाना, नानू को ठंडी पूरियाँ बहुत पसंद हैं।”

“अच्छा! तुझे किसने बताया?”

“किसी ने नहीं, मुझे पता है।”

“नानू को तो पसंद नहीं हैं, तुझे होंगी।”

“मुझे नहीं, नानू को…”

रसोईघर में नानी और नातिन की चुहल चल रही थी और नाना सोच रहे थे – मुझे ठंडी पूरियाँ पसंद हैं, यह बात मेरी माँ जानती है, बिना बताए पत्नी यह बात जान गई, फिर बेटी भी जान गई और अब छः साल की नातिन… ये स्त्रियाँ भी विलक्षण होती हैं, पुरुषों की पसंद को विरासत की तरह याद रखती हैं! काश इनकी पसंद की भी कोई विरासत होती!

रसोईघर में दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े जिरह कर रहे थे। जिरह को निष्कर्ष पर पहुँचाते हुए नातिन बोली, “आपको कुछ नहीं पता, मैं नानू से ही पुछवा देती हूँ।” वह दौड़ती हुई लॉबी में आई और तड़ाक से पूछा, “आपको ठंडी पूरियाँ पसंद हैं न नानू!”

“हाँ मेरी माँ।” नाना के मुँह से अनायास निकला।

“बस सुन लिया नानी, इतना भी पता नहीं!” नव्या ने ज़ोर से बोलते हुए नानी को चिढ़ाया।

नाना की आँखें भीग गई, होंठ मुस्कुरा दिए। उन्हें लगा, उनकी एक नहीं, चार माँएँ हैं।

 

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क –  406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा एवं शॉर्ट फिल्म – जन्मदिन ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

(आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी की लघुकथा ‘जन्मदिन’  ई-अभिव्यक्ति में 21 जून 2021 को प्रकाशित हुई थी। आज प्रयोग स्वरूप लघुकथा और लघु-चलचित्र (Short Film) एक साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है इस प्रयोग को आप सभी का स्नेह एवं प्रतिसाद मिलेगा।)


JANAMDIN (A Short Film) | Chirag Bhasin | Sangeeta Jangra | Upanya Verma @Bharosa 24 news Created By: Chirag Bhasin Productions 

साभार – श्री कमलेश भारतीय

☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा : जन्मदिन ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

छोटे भाई की छोटी बेटी मन्नू हमारे पास आई हुई थी । एक सुबह नाश्ते पर कहने ली – बड़ी मां , मेरी एक बात सुनेगी ?

– कहो बेटे । कहो । पत्नी ने पुचकारते हुए कहा ।

– आज मेरा जन्मदिन है । मनाओगी ?

बड़ी बड़ी आंखों से मन्नू ने बड़ा सवाल किया ।

– मनायेंगे । मनायेंगे क्यों नहीं ?

पत्नी ने चहकते हुए कहा ।

– केक बनवायेंगे ?

– हां । हां । बेटी क्यों नहीं ?

– मोमबत्तियां जलायेंगे ? कुछ मेहमान भी बुलायेंगै ?

– हां । बेटी । हां ।

– गिफ्ट भी मिलेंगे ?

– हां । बेटी । पर तुझे शक क्यों हो रहा है ?

– बड़ी मां । मेरा जन्मदिन कभी नहीं मनाया जाता ।इसलिए । डैडी मेरे भाई का जन्मदिन तो धूमधाम से मनाते हैं पर मेरा जन्मदिन भूल जाते हैं । आप कितनी अच्छी हैं । मेरी प्यारी अम्मा ।

मेरी पत्नी की आंखों में आंसू थे और वह कह रही थी कि बेटी तू हर साल आया कर । हम तेरा जन्मदिन मनाया करेंगे ।

मन्नू की आंखों में आंसू इन्द्रधनुष के रंगों में बदल गये थे ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – अभयारण्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

आज की साधना

श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार आज बुधवार 31अगस्त को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 9 सितम्बर तक चलेगी।

इस साधना का मंत्र होगा- ॐ गं गणपतये नमः

साधक इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करने का प्रयास करें। जिन साधकों को अथर्वशीर्ष का पाठ कठिन लगे, वे कम से कम श्रवण अवश्य करें। उसी अनुसार अथर्वशीर्ष पाठ/ श्रवण का अपडेट करें।

अथर्वशीर्ष का पाठ टेक्स्ट एवं ऑडियो दोनों स्वरूपों में इंटरनेट पर उपलब्ध है।

🕉️ प्रथम पूज्य, गजानन, श्रीगणेश को नमन।

….एक अनुरोध, वाचन संस्कृति का निरंतर क्षय हो रहा है। श्रीगणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक किसी एक पुस्तक / ग्रंथ का अध्ययन करने का संकल्प करें। प्रतिदिन कुछ पृष्ठ पढ़ें और मनन करें। महर्षि वेदव्यास के शब्दों को ‘महाभारत’ के रूप में लिपिबद्ध करने वाले, कुशाग्रता के देवता के प्रति यह समुचित आदरभाव होगा।

श्रीगणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई। …..एक अनुरोध और, त्योहार पारम्परिक रूप से एवं सादगी से मनाएँ। साज-सज्जा भारतीय संस्कृति के अनुरूप तथा पर्यावरण स्नेही रखें।

संजय भारद्वाज

आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

 ? संजय दृष्टि – लघुकथा – अभयारण्य ??

सरीसृप सर्पों का अभयारण्य था वहाँ। यहाँ के निवासी प्रकृति धर्म का पालन करते थे। फलतः इस भूभाग में साँप मारे नहीं जाते थे। पकड़े जाने पर दूर-दराज वन-प्रांतर में छोड़े जाने की परंपरा थी। विवशता में अपवादस्वरूप कोई साँप मारा भी गया तो प्रायश्चित के सारे साधन अपनाये जाते। साँप निश्चिंत थे वहाँ। चूहों की संख्या नियंत्रित थी, अतः किसान निश्चिंत थे। सब आनंद से चल रहा था।

समय ने अंगड़ाई ली। खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के कारण दिवालिया शासन व्यवस्था को विदेशियों को ख़ास सहूलियतें देने पर मजबूर होना पड़ा। सत्ता का रिमोट अब विदेशियों के हाथ में था।

ये विदेशी साँप का माँस चाव से खाते थे। पहले तो विरोध हुआ। फिर अपवाद ने परंपरा के भूभाग में पैर जमाना शुरू किया। शनैः-शनैः अपवाद, परंपरा हो गया।

अब साँप कई डॉलर में बिकने लगे। जैसे-जैसे साँप कम हुए, उनका दाम भी बढ़ता गया।

दोपाये सर्पों का अभयारण्य है वहाँ।

© संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # 46 – मनमौजी लाल की कहानी – भाग – 1 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना  जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज प्रस्तुत है आपकी एक मज़ेदार कथा श्रंखला  “मनमौजी लाल की कहानी…“ की अगली कड़ी ।)   

☆ कथा कहानी  # 46 – मनमौजी लाल की कहानी – भाग – 1 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव 

(प्रशिक्षण की श्रंखला बंद नहीं हुई है पर आज से ये नई श्रंखला प्रस्तुत है,आशा है स्वागत करेंगे.पात्र मनमौजी लाल की कहानी “आत्मलोचन” से अलग है और ज्यादा लंबी भी नहीं है.)

मनमौजी लाल बड़े प्रतिभावान छात्र थे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे. कुछ तो सच है और कुछ उनकी जन्मकुंडली भी कहती है. लगता है कि विद्या के कुंडली वाले घर में सरस्वती खुद विराजमान हो गई हैं. स्कूल में खेल का पीरियड उन्हें बिल्कुल भी अपनी ओर याने क्लास के बाहर नहीं खींच पाता था. आगे चलकर भी उन्हें वही खेल भाया जिसे शतरंज कहते हैं. कुर्सी पर बैठे बैठे, टेबल पर रखे चेस़ बोर्ड में शतरंजी चालों की बाजी का युद्ध. उनका बचपन वैसे तो “आत्मलोचन” जी के समान ही गरीबी की बाउंड्री लाईन पार नहीं कर पाया पर उनमें आत्म लोचन जी के समान,टीएमटी सरिया जैसे मजबूत इरादों की कमी थी. मन की मौज़ के अनुसार ही आचरण किया करते थे और फिलहाल उनका मन पढ़ाई में ही लगता था. मनमौजी का घर, गरीबी का शोरूम ही था. चंद लकड़ी की कुर्सियां, एक टेबल सामने के कमरे में, बीच के कमरे में दिन में खड़ी और रात को सोने के हिसाब से बिछी दो खाट. अंतिम कमरे में रसोई जहाँ बनाने और भूतल पर बैठकर भोजन करने की व्यवस्था. घर के पीछे आंगन, जिसमें बीच में तुलसी का पोधा जिसे मिट्टी के तंदूर आकार के स्टेंड के ऊपर रखा गया ताकि सुबह पूजा के वक्त जल चढ़ाया जा सके और शाम को तुलसी के नीचे तेल का दीपक रखा जा सके. इस घर में धर्म, ईश्वर पर विश्वास, हर पर्व को अपने सीमित साधनों से किफायती रूप से मनाने की रीति, मन जी की माताजी का स्वभाव था.  घर में सुंदर कांड का पाठ शनिवार और मंगलवार को होता था, गायत्री मंत्र रोज पूजा के समय पढ़ा जाता था, आरती सुबह और शाम दोनों समय की होती जिसमें शाम को “मन” भी रहते. दही हांडी, गनपति उत्सव और नवरात्रि सामाजिक पर्व थे जिनको मनाने की लागत बहुत कम थी पर आनंदित होने का प्रभाव बहुत ज्यादा. तो स्वाभाविक रूप से मां,पिताजी और इकलौते पुत्र मन, नियमित रूप से हिस्सा लेते.

अब बात चंद लकड़ी की कुर्सियों की तो कभी वो काम आतीं आगंतुकों की मेहमाननवाजी के लिये तो कभी मन जी के पढ़ने के लिये. ये दोनों सुविधाएं आपस में कभी कभी एक दूसरे की सीमा रेखा को क्रास कर जातीं जब पढ़ने के समय मिलने वाले आ जाते. यह स्थिति मन को अपनी स्टडी करने के लिए, न केवल सोने के लिये उपयोग में आने वाले कमरे की ओर जाना पड़ता बल्कि पढ़ाई में व्यवधान भी उत्पन्न होता।आने वालों के लिये जल और कम दूध की चाय अवश्य पेश की जाती और उनके जाने के बाद फिर से मनमौजी कुर्सी टेबल पर अधिकार प्राप्त करते. एकाग्रता तो भंग होती ही थी पर निदान नहीं था या था भी तो जगह और पैसे दोनों की डिमांड करता था. पर मनमौजी की असुविधा, उनके पिताजी बहुत शिद्दत से महसूस करते थे तो उन्होंने उस हिसाब अपनी कमाई की छोटी चादर में भी बचत की शुरुआत कर दी. चूंकि बचत का उद्देश्य बहुत नेक था और संकल्प भी मज़बूत तो, मनोकामना पूर्ण हुई और पहली बार घर में पुत्र जन्म के बाद दूसरी खुशी के रूप में आया लकड़ी का टू सीटर सोफासेट।उस कमरे में इतनी जगह तो थी कि घर के इकलौते चिराग और आगंतुकों का ख्याल कर सके तो उस कमरे में दोनों ही समा गये. वर्तमान शब्दावली इसे ड्राईंग कम स्टडी रूम के रूप में परिभाषित कर सकती है. आज तो लॉन, कैज़ुअल सिटिंग, ड्राइंगरूम, लिविंग रूम, स्टडी, किचन, स्टोर, डाइनिंग रूम, और दो, तीन, चार बेडरूम विथ अटैच WC की हाउसिंग लोन से खरीदी संपन्नता है पर कभी ऐसा समय भी था जब अभाव पर संतुष्टि प्रभावी थी. तब गरीबी हटाओ, शाइनिंग इंडिया,अच्छे दिन, सबका विकास जैसे सपने बेचे नहीं जाते थे और नागरिक भी अपने अभावों के लिये अपने भाग्य को जिम्मेदार मानकर चुपचाप वोट देकर अपने काम में लग जाते थे. एक तो उनमें अपनी असुविधाओं को, दूसरे की लक्जरी से तौलने की आदत नहीं थी, दूसरा ऐसे लोग अपने जैसों के बीच में ही रहते हैं तो सामाजिकता, वक्त पर एक दूसरे की सहायता करना, उमर के हिसाब से सम्मान या स्नेह और अपनापन देना जैसी कमजोरियों के कारण ईर्ष्यालु होना, आइसोलेशन में रहना, सोशल स्टेटस और झूठी शान को मेनटेन करने जैसे गुणों से संपन्न नहीं हो पाते.

 क्रमशः…

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – सही मूल्यांकन ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका) ☆

श्री विजय कुमार

(आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक श्री विजय कुमार जी  की एक विचारणीय लघुकथा  “सही मूल्यांकन)

☆ लघुकथा – सही मूल्यांकन ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका) ☆

फेसबुक खोलकर राजेश एक साहित्य ग्रुप में डाली गई पोस्टों को देखने-पढ़ने लगा। आज भी एक लेखिका द्वारा अपनी एक रचना के किसी अन्य द्वारा अपने नाम से पोस्ट किए जाने पर आपत्ति दर्ज करते हुए उस पर चर्चा-परिचर्चा की जा रही थी। ग्रुप से जुड़े लगभग सभी रचनाकार या पाठक वर्ग इस कृत्य की निंदा कर रहे थे, जो सही भी था। किसी भी रचनाकार के साथ यह अन्याय ही था।

…परंतु राजेश सोच रहा था, ‘क्या जरूरत है अपनी नवीनतम रचना को इस तरह फेसबुक या व्हाट्सएप्प पर डालने की? पता नहीं क्यों, सभी को वाहवाही लूटने की इतनी जल्दी रहती है कि इधर कोई कविता, लघुकथा या अन्य रचना लिखी नहीं, उधर तुरंत पोस्ट कर दी। कई तो लगता है कि सीधे लिखते ही फेसबुक या व्हाट्सएप्प पर ही हैं। कई बार तो कितनी अशुद्धियाँ होती हैं, और रचना भी अधपकी-सी होती है। फिर सिलसिला शुरू हो जाता है वाहवाही का। अगर कोई गलती से रचना के खिलाफ कोई टिप्पणी कर दे, तो सभी उस बेचारे टिप्पणी करने वाले की हालत खराब करके रख देते हैं। यदि कोई रचना अच्छी हो, तो तुरंत चोरी हो जाती है। बस फिर कोसते रहो। क्या फेसबुक या व्हाट्सएप्प पर किसी रचना का सही मूल्यांकन हो पाता है?’

सोचते-सोचते उसने अपना ईमेल अकाउंट खोला और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं पोस्ट करने में व्यस्त हो गया…।

***

©  श्री विजय कुमार

सह-संपादक ‘शुभ तारिका’ (मासिक पत्रिका)

संपर्क – # 103-सी, अशोक नगर, नज़दीक शिव मंदिर, अम्बाला छावनी- 133001 (हरियाणा)
ई मेल- urmi.klm@gmail.com मोबाइल : 9813130512

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 136 – लघुकथा ☆ श्री गणेश उन्नयन… ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी  बाल मनोविज्ञान और जिज्ञासा पर आधारित लघुकथा “श्री गणेश उन्नयन…”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 136 ☆

☆ लघुकथा  🌿 श्री गणेश उन्नयन… 🙏

नदी किनारे रबर की ट्यूब लिए बैठी माधवी अपने 4 साल के बेटे को समझा रही थी… बेटा अभी जितने भी गणपति आएंगे उन सभी को विसर्जित करना है। तुम यहीं तट पर बैठना कुछ प्रसाद और रुपये मिल जायेगा।

बेटा शिबू मन ही मन सोच रहा था क्या इनमें से एक गणपति को हम अपने घर नहीं ले जा सकते क्या?  

झोपड़ी में रहने वाले क्या गणेश जी नहीं बिठा सकते? आखिर ये विसर्जन के लिए ही तो आए हैं, क्या हमारे यहां बप्पा बाकी दिनों में नहीं रह सकते?

मन में उठे सवालों को लेकर दौड़ कर अपने आई (माँ)  के पास गया और बहुत ही भोलेपन से कहा… “आई, इसमें से जो सबसे सुंदर गणपति बप्पा होंगे उसे आप नदी में नहीं भेजना। हम अपने साथ घर ले जाएंगे और पूजा करेंगे। जैसे बप्पा सब को बहुत सारा पैसा देते हैं, हमें कुछ दिनों बाद देंगे परंतु, तुम मुझे एक बप्पा इनमें से लेने देना।“

अचानक तेज बारिश होने लगी गणपति विसर्जन के लिए जितने भी भक्त आए थे। सब किनारे में रखकर घर भागने लगे। किसी ने कहा… “ए बाई! यह पैसे रखो और गहरे में जाकर विसर्जित कर देना।“

हाँ साहब हम ट्यूब में बिठा कर ले जाएंगी और आपके बप्पा को नदी में विसर्जित कर देंगे। उसके मन में उठे सवाल और बेटे की बात! क्या गणपति को हम नहीं ले सकते?

भीड़ कम होने पर रखे गणपति मूर्तियों को देख मां ने कहा… “बेटा, तुम्हें जो गणपति बप्पा चाहिए बताओ।”

बेटे की खुशी का ठिकाना ना रहा बारिश बंद होने पर आगे-आगे शिबू फूटे पीपे को जोर – जोर से बजाते हुए चिल्लाते जा रहा था… “गणपति बप्पा मोरिया, गणपति बप्पा मोरिया”

और माधवी सर पर गणपति जी को उठाए अपने घर की ओर सरपट चल रही थीं। वह नहीं जानती थी कि यह  सही है या नहीं किन्तु, शायद बप्पा को भी उनके साथ जाना अच्छा लग रहा था।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार # 104 – शरण ☆ श्री आशीष कुमार ☆

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #104 🌻 शरण 🌻 ☆ श्री आशीष कुमार

एक गरीब आदमी की झोपड़ी पर…रात को जोरों की वर्षा हो रही थी. सज्जन था, छोटी सी झोपड़ी थी. स्वयं और उसकी पत्नी, दोनों सोए थे. आधीरात किसी ने द्वार पर दस्तक दी।

उन सज्जन ने अपनी पत्नी से कहा – उठ! द्वार खोल दे. पत्नी द्वार के करीब सो रही थी. पत्नी ने कहा – इस आधी रात में जगह कहाँ है? कोई अगर शरण माँगेगा तो तुम मना न कर सकोगे?

वर्षा जोर की हो रही है. कोई शरण माँगने के लिए ही द्वार आया होगा न! जगह कहाँ है? उस सज्जन ने कहा – जगह? दो के सोने के लायक तो काफी है, तीन के बैठने के लायक काफी हो जाएगी. तू दरवाजा खोल!

लेकिन द्वार आए आदमी को वापिस तो नहीं लौटाना है. दरवाजा खोला. कोई शरण ही माँग रहा था. भटक गया था और वर्षा मूसलाधार थी. वह अंदर आ गया. तीनों बैठकर गपशप करने लगे. सोने लायक तो जगह न थी.

थोड़ी देर बाद किसी और आदमी ने दस्तक दी. फिर गरीब आदमी ने अपनी पत्नी से कहा – खोल ! पत्नी ने कहा – अब करोगे क्या? जगह कहाँ है? अगर किसी ने शरण माँगी तो?

उस सज्जन ने कहा – अभी बैठने लायक जगह है फिर खड़े रहेंगे. मगर दरवाजा खोल! जरूर कोई मजबूर है. फिर दरवाजा खोला. वह अजनबी भी आ गया. अब वे खड़े होकर बातचीत करने लगे. इतना छोटा झोपड़ा! और खड़े हुए चार लोग!

और तब अंततः एक कुत्ते ने आकर जोर से आवाज की. दरवाजे को हिलाया. गरीब आदमी ने कहा – दरवाजा खोलो. पत्नी ने दरवाजा खोलकर झाँका और कहा – अब तुम पागल हुए हो!

यह कुत्ता है. आदमी भी नहीं! सज्जन बोले – हमने पहले भी आदमियों के कारण दरवाजा नहीं खोला था, अपने हृदय के कारण खोला था!! हमारे लिए कुत्ते और आदमी में क्या फर्क?

हमने मदद के लिए दरवाजा खोला था. उसने भी आवाज दी है. उसने भी द्वार हिलाया है. उसने अपना काम पूरा कर दिया, अब हमें अपना काम करना है. दरवाजा खोलो!

उनकी पत्नी ने कहा – अब तो खड़े होने की भी जगह नहीं है! उसने कहा – अभी हम जरा आराम से खड़े हैं, फिर थोड़े सटकर खड़े होंगे. और एक बात याद रख! यह कोई अमीर का महल नहीं है कि जिसमें जगह की कमी हो!

यह गरीब का झोपड़ा है, इसमें खूब जगह है!! जगह महलों में और झोपड़ों में नहीं होती, जगह दिलों में होती है!

अक्सर आप पाएँगे कि गरीब कभी कंजूस नहीं होता! उसका दिल बहुत बड़ा होता है!!

कंजूस होने योग्य उसके पास कुछ है ही नहीं. पकड़े तो पकड़े क्या? जैसे जैसे आदमी अमीर होता है, वैसे कंजूस होने लगता है, उसमें मोह बढ़ता है, लोभ बढ़ता है .

जरूरतमंद को अपनी क्षमता अनुसार शरण दीजिए. दिल बड़ा रखकर अपने दिल में औरों के लिए जगह जरूर रखिये.

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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