(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
संजय दृष्टि – रामबाण
बावड़ी को जाने वाले रास्ते पर खड़े विशाल पीपल में भूत बसता है। गाँव के लोग दोपहर के समय और शाम के बाद उस तरफ जाते ही नहीं। उसकी डालियाँ तोड़ना तो दूर, पत्तियाँ तक छूना वर्जित था। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक में भय समान रूप से व्याप्त था। पीपल सदा हरा रहा, पत्तियों से सदा भरा रहा।…यह पिछली सदी की बात है।
सदी ने करवट बदली। मनुष्य ने अनुसंधान किया कि पीपल सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देता है। फिर भौतिकता की आंधी चली। पेड़, पौधे, पर्यावरण, परंपरा सब उखड़ने लगे। बावड़ियाँ पाट दी गईं, पीपल काट दिये गए। ऑक्सीजन की हत्या कर साँस लेने का सपना पालनेवाला नया शेखचिल्ली पैदा हो चुका था।..शेखचिल्ली जिस डाली पर बैठता, उसे ही काट देता। शनैः-शनैः न जंगल बचे, न पीपल। शेखचिल्ली की देह भी लगभग मुरझा चली।
एकाएक पता चला कि सुदूर आदिवासी क्षेत्र में पीपल-वन है। पीपल ही पीपल। सघन पीपल, हरे पीपल, भरे पीपल। अनुसंधानकर्ता ने एक आदिवासी से पूछा- वहाँ ले चलोगे?..आदिवासी ने साफ मना कर दिया। अधिक कुरेदने पर बोला- जाना तो दूर, हम उस तरफ देखते भी नहीं।….क्यों?….वो भूतों की नगरी है। हर पीपल पर कई- कई भूत बसते हैं।..
अनुसंधानकर्ता ने अनुसंधानपत्र में लिखा, ‘रामबाण टोटके कालजयी होते हैं।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उनका ऐसा ही एक पात्र है ‘असहमत’ जिसके इर्द गिर्द उनकी कथाओं का ताना बना है। आप प्रत्येक बुधवार साप्ताहिक स्तम्भ– असहमत आत्मसात कर सकेंगे।
आज प्रस्तुत है असहमत से अलग एक अनोखी कहानी हमारी भाषा…. उसकी बोली। )
☆ कथा-कहानी #13 – अलंकृत भाषा ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
विराटनगर शाखा में उच्च कोटि की अलंकृत भाषा में डाक्टरेट प्राप्त शाखाप्रबंधक का आगमन हुआ. शाखा का स्टाफ हो या सीधे सादे कस्टमर, उनकी भाषा समझ तो नहीं पाते थे पर उनसे डरते जरूर थे. कस्टमर के चैंबर में आते ही प्रबंधक जी अपनी फर्राटेदार अलंकृत भाषा में शुरु हो जाते थे और सज्जन पर समस्या हल करने आये कस्टमर यह मानकर ही कि शायद इनके चैंबर में आने पर ही स्टाफ उनका काम कर ही देगा, दो मिनट रुककर थैंक्यू सर कहकर बाहर आ जाते थे. बैठने का साहस तो सिर्फ धाकड़ ग्राहक ही कर पाते थे क्योंकि उनका भाषा के पीछे छिपे बिजनेस प्लानर को पहचानने का उनका अनुभव था.
एक शरारती कस्टमर ने उनसे साहस जुटाकर कह ही दिया कि “सर,आप हम लोगों से फ्रेंच भाषा में बात क्यों नहीं करते.
साहब को पहले तो सुखद आश्चर्य हुआ कि इस निपट देहाती क्षेत्र में भी भाषा ज्ञानी हैं ,पर फिर तुरंत दुखी मन से बोले कि कोशिश की थी पर कठिन थी. सीख भी जाता तो यहाँ कौन समझता,आप ?
शरारती कस्टमर बोला : सर तो अभी हम कौन समझ पाते हैं. जब बात नहीं समझने की हो तो कम से कम स्टेंडर्ड तो अच्छा होना चाहिए.
जो सज्जन कस्टमर चैंबर से बाहर आते तो वही स्टाफ उनका काम फटाफट कर देता था. एक सज्जन ने आखिर पूछ ही लिया कि ऐसा क्या है कि चैंबर से बाहर आते ही आप हमारा काम कर देते हैं.
स्टाफ भी खुशनुमा मूड में था तो कह दिया, भैया कारण एक ही है, उनको न तुम समझ पाते हो न हम. इसलिए तुम्हारा काम हो जाता है. क्योंकि उनको समझने की कोशिश करना ही नासमझी है. इस तरह संवादहीनता और संवेदनहीनता की स्थिति में शाखा चल रही थी.
हर व्यक्ति यही सोचता था कौन सा हमेशा रहने आये हैं, हमें तो इसी शाखा में आना है क्योंकि यहाँ पार्किंग की सुविधा बहुत अच्छी है. पास में अच्छा मार्केट भी है, यहाँ गाड़ी खड़ी कर के सारे काम निपटाकर बैंक का काम भी साथ साथ में हो जाता है. इसके अलावा जो बैंक के बाहर चाय वाला है, वो चाय बहुत बढिय़ा, हमारे हिसाब की बनाकर बहुत आदर से पिलाता है. हमें पहचानता है तो बिना बोले ही समझ जाता है. आखिर वहां भी तो बिना भाषा के काम हो ही जाता है।पर हम ही उसके परिवार की खैरियत और खोजखबर कर लेते हैं पर चाय वाले से इतनी हमदर्दी ?
क्या करें भाई, है तो हमारे ही गांव का, जब वो अपनी और हमारी भाषा में बात करता है तो लगता है उसकी बोली हमको कुछ पल के लिये हमारे गांव ले जा रही है.
एक अपनापन सा महसूस हो जाता है कि धरती की सूरज की परिक्रमा की रफ्तार कुछ भी हो, शायद हम लोगों के सोशल स्टेटस अलग अलग लगें पर हमारा और उसका टाईम ज़ोन एक ही है. याने उसके और हमारे दिन रात एक जैसे और साथ साथ होते हैं.
शायद यही अपनापन महसूस होना या करना, आंचलिकता से प्यार कहलाता हो.
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.
श्री अरुण डनायक जी ने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर कई कहानियों की रचना की हैं। इन कहानियों में आप बुंदेलखंड की कहावतें और लोकोक्तियों की झलक ही नहीं अपितु, वहां के रहन-सहन से भी रूबरू हो सकेंगे। आप प्रत्येक सप्ताह बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ बुंदेलखंड की कहानियाँ आत्मसात कर सकेंगे।)
बुंदेलखंड कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है। यहां के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय कृषि कार्य ही रहा है। यह कृषि वर्षा आधारित रही है। पथरीली जमीन, सिंचाई के न्यूनतम साधन, फसल की बुवाई से लेकर उसके पकनें तक प्रकृति की मेहरबानी का आश्रय ऊबड़ खाबड़ वन प्रांतर, जंगली जानवरों व पशु-पक्षियों से फसल को बचाना बहुत मेहनत के काम रहे हैं। और इन्ही कठिनाइयों से उपजी बुन्देली कहावतें और लोकोक्तियाँ। भले चाहे कृषि के मशीनीकरण और रासायनिक खाद के प्रचुर प्रयोग ने कृषि के सदियों पुराने स्वरूप में कुछ बदलाव किए हैं पर आज भी अनुभव-जन्य बुन्देली कृषि कहावतें उपयोगी हैं और कृषकों को खेती किसानी करते रहने की प्रेरणा देती रहती हैं। तो ऐसी ही कुछ कृषि आधारित कहावतों और लोकोक्तियों का एक सुंदर गुलदस्ता है यह कहानी, आप भी आनंद लीजिए।
☆ कथा-कहानी #91 – बुंदेलखंड की कहानियाँ – 1 जंगल में खेती ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆
हटा में जन्मे जगन मोहन पांडे जब बैक की नौकरी के चौथे पल में पहुंचे तो उच्च प्रबंधन को उनकी कर्मठता के बारे में अनायास ही पता चल गया और बड़े साहब ने उन्हें वरिष्ठ प्रबंधन श्रेणी में पदोन्नत किए जाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। बड़े साहब की कृपा दृष्टि से उन्हे पदोन्नति मिल गई और पंडिताइन ने हटा की चंडी माता के मंदिर में सवा किलो गुजिया का प्रसाद, जो उन्होंने गफ़लू हलवाई के यहां गुजिया का आकार छोटा रखने का विशेष आर्डर दे कर बनवाई थी, चढ़ाया और प्रेम से चीन्ह चीन्ह कर उसी अंदाज में दिया जिस पर सदियों पहले कहावत बनी थी, ‘अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह के देय।’
खैर प्रमोशन की खुशियां बधाइयों के साथ खत्म हो गई और पांडेजी की नई पदस्थापना के आदेश आ गए। बैंक की नौकरी जिंदगी भर दमोह, सागर में गुजारने वाले पांडे जी को बहुत आघात लगा जब उनकी पदस्थापना का समाचार मिला। उमरिया में उन्हें बैंक द्वारा संचालित ग्रामीण प्रशिक्षण संस्थान में मुख्य प्रबंधक बनाकर भेजा जा रहा था। जब सारे जुगाड़ चिरौरी बिनती काम ना आई तो पांडे जी ने ‘ ‘प्रभु इच्छा ही बलियसी’ ऐसा मानकर उमरिया अकेले जाकर नौकरी के शेष बचे तीन वर्ष काटने का निर्णय आखिरकार ले ही लिया।
उमरिया जंगल का आदिवासी बहुल क्षेत्र था और आदिवासी युवाओं को प्रशिक्षण की प्रतिदिन शुरुआत पांडे जी इसी कहावत से करते ‘ उत्तम खेती मध्यम वान, अधम चाकरी भीख निदान।‘ पांडेजी रोज यही बताते कि खेती श्रेष्ठ व्यवसाय है नौकरी और व्यापार के चक्कर में मत पड़ो। उनकी बातें सुनते सुनते आदिवासी युवा जब अघा गए तो एक थोड़े चतुर गोंड ने कहा ‘सर कहना सरल है पर करना कठिन, आप हमारे गाँव चलकर देखिए तो समझ में आएगा कि जंगल में खेती करना कितना कठिन है।’
बस फिर क्या था पांडेजी ने हामी भर दी और शनिवार रविवार परिवार के पास हटा जाने की अपेक्षा उमरिया जिले के दूरदराज के गाँव भेजरी जाने का फरमान जारी कर दिया। यात्रा भत्ता चित्त करने के उद्देश्य से दौरा सरकारी बनाया और प्रधान कार्यालय से इसकी अनुमति भी ले ली।
जब पांडेजी गाँव जाने लगे तो उनके मन में खेती किसानी को लेकर बहुत सी बुन्देली कहावतें, मुख से बाहर निकलने कुलबुलाने लगी। ग्रामीणों को बातचीत के लिए उकसाने हेतु उन्होंने खटिया पर बैठते ही कहा “ गेवड़े खेती हमने करी, कर धोबिन सौं हेत। अपनों करो कौंन सें कइए, चरों गदन ने खेत।“
आदिवासियों को उनकी बुन्देली भाषा समझ में नहीं आई तो पांडेजी ने इसका अर्थ कथावाचक जैसे रोचक अंदाज में सुनाते हुए बताया कि ‘गाँव के समीप कभी खेती किसानी नहीं करनी चाहिए क्योंकि गाँव के पालतू पशु खड़ी फसल को नष्ट कर देते हैं उसे कहा जाते हैं। इसी प्रकार अगर किसी गाँव में धोबी या कुम्हार रहते हैं तो उनसे भी ज्यादा प्रेम संबंध बनाना ठीक नहीं है क्योंकि किसान तो धोबिन के प्रेमालाप में डूबा रहेगा और उसका गधा सारी फसल को नष्ट कर देगा।“
पांडे जी की रोचकता लिए इस कहानी को सुनते ही आदिवासियों के मन से अनजान व्यक्ति के प्रति भय खतम हो गया और उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई “ साहब जू हमारे खेत तो जंगल की तलहटी में हैं और हमें उनकी दिन रात रखवाली करनी पड़ती है। दिन में तो पक्षी और बंदर फसल को खाने आते रहते हैं और रात में हिरण और नील गाय पूरा खेत साफ कर जाती हैं। “
पांडे जी ने हटा में फसलों की बर्बादी की ऐसी दुखद दास्तान नहीं सुनी थी तुरंत बोल उठे “ खेती धन की नाश, धनी न हुईयै पास। और फिर इसका अर्थ बताते हुए बोले कि जो व्यक्ति खेती अपने हाथ से करता है अथवा अपनी निगरानी में कृषि कार्य की देखभाल कराता है उसे ही लाभ प्राप्त होता है। दूसरों के हाथ खेती छोड़ने से हानि होती है। आप लोग खुद मेहनत करोगे तभी फसल की रक्षा होगी।‘
पांडे जी की मधुर वाणी ने आदिवासियों को गुस्सा कर दिया। वे बोले “साहब जू हम लोग शहरी बाबू नहीं है जो बटिया खेती, साँट सगाई करें। हम लोग तो दिन रात खेत की रखवाली पौष की कड़कड़ाती ठंड में भी करते हैं फिर भी जानवर खेत में घुसकर फसल बर्बाद कर देते हैं।“
किसानों की यह परेशानी सुनकर पांडेजी के मन में बैंक के क्षेत्राधिकारी की आत्मा प्रवेश कर गई और वे खेतों का निरीक्षण करने के बाद कुछ सलाह देने की बात बोल उठे। आदिवासी भी सहर्ष उन्हे अपने खेतों में ले गए। जब पांडेजी खेतों को देखने पहुंचे तो वहाँ की प्राकृतिक छटा, कटीली झाड़िया और श्वेत फूलों से लदे काँस की लहलहाती घाँस को देखकर अपने दद्दा की वह कहावत जो वे बचपन से सुनते आए थे याद आ गई “ जरयाने उर काँस में, खेत करो जिन कोय, बैला दोऊ बेंचकैं, करो नौकरी सोय।“
एक आदिवासी ने पूछ ही लिया कि ‘महराज का गुनगुना रहे हो।‘
पांडे जी बोल उठे ‘ कंटीली झाड़ियों और काँस से भरी हुई भूमि में खेती करने से कोई लाभ नहीं होता है। इस भूमि में उत्पादन कम होगा इससे अच्छा तो यह है कि बैल बेचकर परदेश चले जाओ और वहाँ नौकरी करो।‘
पांडे जी की बात सुनकर किसान निरुत्साहित नहीं हुआ, बोला ‘ हम खेती किसानी लाभ के लिए नहीं करते हैं, बस दो जून की रोटी मिल जाए और उन्हा लत्ता का जुगाड़ हो जाए इसी उम्मीद से यहां फसल उगाते हैं। हम काहे को परदेश जाकर नौकरी करेंगे।’
पांडे जी ने खेतों को ध्यान से देखा लेकिन बाड़ी व बिजूका उन्हे किसी भी खेत में दिखाई नहीं दिए। कृषि कार्य में निरीक्षण को लेकर उनके दिमाग में आदिवासियों की यही सबसे बड़ी कमजोरी है ऐसा भाव उपजा और वे पंद्रह दिन बाद इस समस्या का कोई निदान बताएंगे ऐसा कहकर अपना सरकारी दौरा पूरा कर उमरिया वापस आ गए।
(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।
अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)
☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #73 – ईश्वर की पूजा☆ श्री आशीष कुमार☆
मन को वश करके प्रभु चरणों मे लगाना बडा ही कठिन है। शुरुआत मे तो यह इसके लिये तैयार ही नहीं होता है। लेकिन इसे मनाए कैसे? एक शिष्य थे किन्तु उनका मन किसी भी भगवान की साधना में नही लगता था और साधना करने की इच्छा भी मन मे थी।
वे गुरु के पास गये और कहा कि गुरुदेव साधना में मन लगता नहीं और साधना करने का मन होता है। कोई ऐसी साधना बताए जो मन भी लगे और साधना भी हो जाये। गुरु ने कहा तुम कल आना। दुसरे दिन वह गुरु के पास पहुँचा तो गुरु ने कहा सामने रास्ते मे कुत्ते के छोटे बच्चे हैं उसमे से दो बच्चे उठा ले आओ और उनकी हफ्ताभर देखभाल करो।
गुरु के इस अजीब आदेश सुनकर वह भक्त चकरा गया लेकिन क्या करे, गुरु का आदेश जो था। उसने 2 पिल्लों को पकड कर लाया लेकिन जैसे ही छोडा वे भाग गये। उसने फिरसे पकड लाया लेकिन वे फिर भागे।
अब उसने उन्हे पकड लिया और दुध रोटी खिलायी। अब वे पिल्ले उसके पास रमने लगे। हप्ताभर उन पिल्लो की ऐसी सेवा यत्न पूर्वक की कि अब वे उसका साथ छोड नही रहे थे। वह जहा भी जाता पिल्ले उसके पीछे-पीछे भागते, यह देख गुरु ने दुसरा आदेश दिया कि इन पिल्लों को भगा दो।
भक्त के लाख प्रयास के बाद भी वह पिल्ले नहीं भागे तब गुरु ने कहा देखो बेटा शुरुआत मे यह बच्चे तुम्हारे पास रुकते नही थे लेकिन जैसे ही तुमने उनके पास ज्यादा समय बिताया ये तुम्हारे बिना रहनें को तैयार नही है।
ठीक इसी प्रकार खुद जितना ज्यादा वक्त भगवान के पास बैठोगे, मन धीरे-धीरे भगवान की सुगन्ध, आनन्द से उनमे रमता जायेगा। हम अक्सर चलती-फिरती पूजा करते है तो भगवान में मन कैसे लगेगा?
जितनी ज्यादा देर ईश्वर के पास बैठोगे उतना ही मन ईश्वर रस का मधुपान करेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि उनके बिना आप रह नही पाओगे। शिष्य को अपने मन को वश में करने का मर्म समझ में आ गया और वह गुरु आज्ञा से भजन सुमिरन करने चल दिया।
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित हृदय को झकझोरने वाली लघुकथा ‘सिहरन’. डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस विचारणीय लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 81 ☆
☆ लघुकथा – सिहरन… ☆
आशा! चल तेरा कस्टमर आया है।
बिटिया तू बैठ, मैं अभी आई काम करके।
जल्दी आना।
थोडी देर बाद फिर आवाज – आशा! आ जल्दी, कस्टमर है।
बिटिया तू खेल ले, मैं अभी आई काम करके।
हूँ —।
बिटिया तू खाना खा ले, मैं अभी आई काम करके।
हूँ – उसने सिर हिला दिया ।
ना जाने कितनी बार आवाज आती और आशा सात – आठ साल की बिटिया को बहलाकर नीचे चली जाती।
ऐसे ही एक दिन – बिटिया तू पढाईकर, मैं बस अभी आई काम करके।
अम्माँ ! अकेले कितना काम करोगी तुम? मैं भी चलती हूँ तेरे साथ काम करने। तुम कहती हो ना कि मैं बडी हो गई हूँ?
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उनका ऐसा ही एक पात्र है ‘असहमत’ जिसके इर्द गिर्द उनकी कथाओं का ताना बना है। आप प्रत्येक बुधवार साप्ताहिक स्तम्भ– असहमत आत्मसात कर सकेंगे। )
☆ असहमत…! भाग – 12 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
असहमत मोबाइल में बात करने का दिखावा करते हुये सन्मति को नज़रअंदाज करते हुये क्रास कर गया पर दस कदम के बाद ही उसे Don’t use mobile here की आवाज़ सुनाई दी तो वो पीछे मुड़ा.
डॉक्टर सन्मति ने उसे देखकर कुछ याद करने की कोशिश की, फिर उसे यू ट्यूब में पोस्ट किसी कंपनी की वीडियो पोस्ट याद आई जिसने असहमत के जॉब इंटरव्यू को पब्लिक ओपीनियन के लिये पोस्ट कर दिया था और वीडियो को 1.2 मिलियन बार देखा जा चुका था. लाईक और डिस्लाईक में 20-20 का मैच चल रहा था. जो लिबरल, मस्तमौला और innovative थे, वो चाहते थे कि अपाइंटमेंट के बदले असहमत को कंपनी का ब्रांड एंबेसडर बना दिया जाय जबकि कंसरवेटिव सोच के धनी ऐसे लोगों को सबक सिखाने के लिये पहले असहमत को अस्थायी नियुक्ति देकर, महीने भर उसका अवैतनिक उपयोग कर बाद में not suitable to handle marketing का टैग लगाकर कंपनी से बाहर करने के कमेंट लिख रहे थे.
शायद सन्मति को यही वीडियो क्लिप याद रही और इस महान आत्मा को रूबरू पाकर ओंठो पर हल्की मुस्कान आ गई. न केवल असहमत बल्कि पाठकों के भ्रम को दूर करने के लिए कहना आवश्यक है कि यह मुस्कान असहमत की स्पष्टवादिता और अक्खड़पन से उपजी मुस्कान थी. ये तो बाद में पता चला कि once upon a time, असहमत और सन्मति same class की zoology lab. में dissection के लिये एक ही प्रजाति के मेंढक शेयर किया करते थे, हालांकि टेबल अलग अलग थीं पर अर्ध बेहोश मेंढक, डिसेक्शन के अस्त्रों से घायल होकर अक्सर उछलकर दूसरी पंक्ति की टेबल पर जाकर silent zone को चेलेंज कर देते थे और लैब पहले चीखना और फिर प्रतिक्रियात्मक हंसी के कहकहों से गुलज़ार हो जाया करती थी.
असहमत का मोबाइल इस बार फिर बजा, इस बार दूसरी ओर पिताजी थे जो उसके इस तरह अचानक गोल हो जाने पर उसे पुलसिया धमकी की डोज़ दे रहे थे. असहमत ने सन्मति के बिना मांगे ही फिर मिलने का वचन देकर विदा ली.
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
संजय दृष्टि – आत्मकथा
बेहद गरीबी में जन्मा था वह। तरह-तरह के पैबंदों पर टिकी थी उसकी झोपड़ी। उसने कठोर परिश्रम आरम्भ किया। उसका समय बदलता चला गया। अपनी झोपड़ी से 100 गज की दूरी पर आलीशान बिल्डिंग खड़ी की उसने। अलबत्ता झोपड़ी भी ज्यों की त्यों बनाये रखी।
उसकी यात्रा अब चर्चा का विषय है। अनेक शहरों में उसे आइकॉन के तौर पर बुलाया जाता है। हर जगह वह बताता है,” कैसे मैंने परिश्रम किया, कैसे मैंने लक्ष्य को पाने के लिए अपना जीवन दिया, कैसे मेरी कठोर तपस्या रंग लाई, कैसे मैं यहाँ तक पहुँचा..!” एक बड़े प्रकाशक ने उसकी आत्मकथा प्रकाशित की। झोपड़ी और बिल्डिंग दोनों का फोटो पुस्तक के मुखपृष्ठ पर है। आत्मकथा का शीर्षक है ‘मेरे उत्थान की कहानी।’
कुछ समय बीता। वह इलाका भूकम्प का शिकार हुआ। आलीशान बिल्डिंग ढह गई। आश्चर्य झोपड़ी का बाल भी बांका नहीं हुआ। उसने फिर यात्रा शुरू की, फिर बिल्डिंग खड़ी हुई। प्रकाशक ने आत्मकथा के नए संस्करण में झोपड़ी, पुरानी बिल्डिंग का मलबा और नई बिल्डिंग की फोटो रखी। स्वीकृति के लिए पुस्तक उसके पास आई। झुकी नजर से उसने नई बिल्डिंग के फोटो पर बड़ी-सी काट मारी। अब मुखपृष्ठ पर झोपड़ी और पुरानी बिल्डिंग का मलबा था। कलम उठा कर शीर्षक में थोड़ा- सा परिवर्तन किया। ‘मेरे उत्थान की कहानी’ के स्थान पर नया शीर्षक था ‘मेरे ‘मैं’ के अवसान की कहानी।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादकश्री विजय कुमार जी की एक विचारणीय लघुकथा “धन्य हैं“।)
☆ लघुकथा – धन्य हैं ☆
जब बहुत देर तक कोई ऑटोवाला जाने को तैयार न हुआ, तो योगेश का धैर्य जवाब दे गया। वह अपने एक मित्र और उसकी नवविवाहित पत्नी के साथ ऋषिकेश अपने एक अन्य मित्र के विवाह समारोह में शामिल होने के लिए आया हुआ था। हरिद्वार स्टेशन के बाहर से उन्हें ऋषिकेश तक जाने वाला ऑटो पकड़ना था। धूप जोरों पर थी। आज गंगा दशहरा होने के कारण अत्यधिक भीड़ भी थी। रोजमर्रा के रास्ते को भी शायद बदल दिया गया था, जिसकी वजह से ऑटो रिक्शा वाला बीस की जगह पचास रुपए प्रति सवारी मांग रहा था, जो योगेश का मित्र देने को तैयार नहीं था।
एक ऑटो रिक्शा को रोककर योगेश ने कुछ बातचीत की, और अपने दोस्त को आवाज लगाई, ‘आ जाओ राजेश, यह चलने को तैयार है।” गंतव्य स्थान पर पहुंचकर योगेश ने राजेश को अपनी पत्नी के साथ अंदर जाने को कहा और उससे छुपा कर चुपचाप ऑटोवाले को डेढ़ सौ रुपए पकड़ा दिए।
विवाह समारोह से निपटने के बाद राजेश ने हरिद्वार के किसी गुरुजी के पास उनके आश्रम में जाने की इच्छा व्यक्त की, और सभी वहां चले गए। गुरु जी से मिलने के उपरांत राजेश ने जब उनके चरणों में हजार रुपए रखे, तो योगेश चौंक गया, और सोचने पर मजबूर हो गया, ‘अपनी मेहनत की कमाई में से अपने या अपनी पत्नी के ऊपर तो सौ-पचास रुपए भी ज्यादा खर्च ना हो जाएं, इसके लिए इतनी झक्क मारता रहा, अपनी नवविवाहित पत्नी का भी ख्याल नहीं रखा, और यहां ए.सी. आश्रम में पसर कर बैठे इस तथाकथित साधु को कितने रुपए लुटा दिए? कमाल है? कुछ तो सिद्धि है इन साधु, संतों और बाबाओं में, जो ऐसे महाकंजूस मानवों को भी चूस लेते हैं। धन्य हैं…।”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय लघुकथा “प्रायश्चित”। इस विचारणीय रचनाके लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 108 ☆
लघुकथा – प्रायश्चित
चमचमाती कार से उतरकर जिस घर के सामने सेठ रूपचंद खड़ा था। मन में घबराहट, बेचैनी और बेटी के बाप होने की वजह से अब वह स्वयं दबा जा रहा था। डोर बेल बजने पर चमकीली साड़ी, गहने से लदी सौम्य सुंदर महिला को देखकर थोड़ी देर बाद ठिठक गया।
पसीने से तरबतर बड़े ही गौर से उसे देखने लगा। बिजली सी कौंध गई। आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। वर्षों पहले फुलवा से दोस्ती की थी। बात शादी तक पहुंच गई थी। शादी के बहकावे में आकर विश्वास में फुलवा अपना सर्वस्व निछावर कर बैठी थी।
लेकिन रूपचंद ने अपनी अमीरी और उसकी गरीबी का मजाक उड़ाते उसे एक ऐसी जगह ला छोड़ा था, जहां से उसे निकलना भी मुश्किल था। समय पंख लगा कर उड़ा। फुलवा का बेटा बाहर नौकरी करता था और रूपचंद की बेटी से बहुत प्यार करता था।
बस आज अपनी बिटिया के लिए वह फुलवा के घर आया था। परंतु उसे नहीं मालूम था कि जिसको वह ठुकरा कर किसी और के हाथों बेच गया था, उसी के घर उसकी अपनी बिटिया शादी करेगी।
“नमस्कार” फुलवा ने कहा “आइए मुझे इसी दिन का इसी पल का इंतजार बरसों से था। बस ईश्वर से एक ही प्रार्थना करती थी कि तुम से एक मुलाकात जरूर हो। पर ऐसी मुलाकात होगी मैंने नहीं सोचा था। अब तुम ही बताओ इस रिश्ते को मैं क्या करूं?” रूपचंद फुलवा के पैरों गिर पड़ा गिड़गिड़ाने लगा।
“मेरी बेटी को बचा लीजिए। मैं कहीं का नहीं रह जाऊंगा। सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।” फुलवा ने देखा रूपचंद रो-रो कर परेशान हो रहा था। आज उसके हाथ जोड़ने और आंखों से गिरते आंसू बता रहे थे कि बेटी का दर्द क्या होता है। फुलवा का बेटा कमरे से बाहर आया। निकलते हुए बोला “माँ यही है मीनू के पिता जी। इनकी बेटी से मैं बहुत प्यार करता हूं और ये शादी की बात करने हमारे यहां आए हैं।”
फुलवा ने कहा – “बेटा मुझे तुम्हारी पसंद से कोई शिकायत नहीं है। परंतु कुछ घाव भरने के लिए सेठ रूपचंद जी को अपनी सारी संपत्ति मेरे नाम करनी होगी। और तभी मैं इनको अपना संबंधी बना पाऊंगी।” हमेशा दहेज के खिलाफ बोलने वाली माँ के मुंह से दहेज की बात सुनकर उसका बेटा थोड़ा परेशान हुआ। और सेठ जी ने देखा कि बात तो बिल्कुल सही कह रही है यदि इस प्रकार का सौदा है तो भी वह फायदे में ही रहेगा। क्योंकि शायद वह उसका प्रायश्चित करना चाह रहा था।
तुरंत हाँ कहकर उसने अपनी बेटी मीनू की शादी फुलवा के बेटे से तय करने का निश्चय किया और बदले में फुलवा से कहा – “जो बात बरसों पहले हो चुकी। उसे भूल कर मुझे माफ कर देना। शायद यही मेरी सजा है।” बेटे को कुछ समझ नहीं आया। माँ से इतना जरूर पूछा – “आप तो हमेशा दहेज के खिलाफ थी पर आज अचानक आपको क्या हो गया?” फुलवा ने हँसते हुए कहा – “पुराना हिसाब बराबर जो करना है।”
( ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी का हार्दिक स्वागत।sअब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।)
आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा ‘हमसफ़र’।)
☆ लघुकथा – हमसफ़र ☆ श्री हरभगवान चावला ☆
आंदोलन ख़त्म होते ही राजधानी की सीमा पर बने अस्थायी घर टूटने लगे। सारा सामान ट्रॉलियों पर लादा जाने लगा। मानसा ज़िले के एक गाँव के कुछ किसान जिस घर में रह रहे थे, उस घर के टूट जाने के बाद सारा सामान ट्रॉली पर लाद रहे थे। थोड़ी दूरी पर एक पिल्ला चुपचाप खड़ा उन्हें ऐसा करते देख रहा था। वह अपनी जगह पर इतना स्थिर था कि जैसे वहीं उगा कोई पेड़ हो। उसे देख कर एक किसान ने कहा, “ओये देखो यारो, यह कितना उदास दिख रहा है।”
“उदास तो होणा ही है। अपणी दी रोटी खाता था, अपणे ही पास सो भी जाता था। अज्ज आपां जा रहे हैं। सच्ची दसणा, आपां उदास नईं? लगदा, जैसे अपणा घर छूट रहा है। अपणा यह हाल है तो इसका तो होणा ही है।” दूसरे ने कहा।
“इसको समझ नहीं आ रहा कि हो क्या रहा है, ये सब लोग कर क्या रहे हैं, कोई अनहोनी तो नहीं वापर गई!” तीसरे ने कहा।
“यारो यह पिल्ला हमारे आंदोलन के दौरान की पैदाइश ही है। हमारे सहारे का इसको भरोसा था, अब यह किसके सहारे? कल्ला रहेगा तो मर नहीं जायेगा?” चौथे ने कहा।
“ओये नहीं रहेगा यह कल्ला! यह अपणे साथ रहता था, अपणे साथ ही रहेगा। आपां ने इसको बेसहारा नईं होणे देणा।” यह कहते हुए एक किसान ने उसे उठाकर ट्रॉली में बिठा दिया।