हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६२ – शब्द नहीं रहे शब्द – कतारें ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – शब्द नहीं रहे शब्द…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६२ – शब्द नहीं रहे शब्द – कतारें ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

रोज देखता हूँ

कतारें

नल पर लगी कतारें

राशन की कतारें

अब देख रहा हूँ

बैंक में लगी कतारें

पुराने नोट जमा करने के लिए

कतारें

जमा पैसा निकालने के लिए

कतारें

जिंदगी कतार हो गई है।

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६२ – “कविता का यह मर्म, कि-…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “कविता का यह मर्म, कि-...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “कविता का यह मर्म, कि-...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

चूल्हा चौंकेगा, पराँत-

मन में हरषायेगी ।

कविता का यह मर्म, कि-

घर में रोटी आयेगी॥

 

संध्या का अवसाद

धुयें में चुप हो जायेगा ।

भोजन का आस्वाद

मुखपटल पर छप जायेगा ।

 

पीपा होगा मुदित,

तवे पर रौनक आयेगी ॥

 

पाला गया जीव खुश होकर

पूँछ हिलायेगा ।

मिट्ठू अपनी सुग्गी के,

तलवे सहलायेगा ।

 

परच उठेगी आग –

रसोई अब पक जायेगी ॥

 

गाय हींस कर बछड़े को

विश्वास दिलायेगी ।

” अपना भी हिस्सा होगा “

धीमे समझायेगी ॥

 

खुशहाली तब दबे पाँव,

ऐसे आजायेगी ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

20-11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आउट ऑफ बॉक्स ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आउट ऑफ बॉक्स ? ?

माप-जोखकर खींचता रहा

मानक रेखाएँ जीवन भर

पर बात नहीं बनी,

निजी और सार्वजनिक

दोनों में पहचान नहीं मिली,

आक्रोश में उकेर दी

आड़ी-तिरछी, बेसिर-पैर की

निरुद्देश्य रेखाएँ;

यहाँ-वहाँ अकारण

बिना प्रयोजन,

चमत्कार हो गया!

मेरा जय-जयकार हो गया,

आलोचक चकित थे-

आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग का

ऐसा शिल्प आज तक

देखने को नहीं मिला,

मैं भ्रमित था-

रेखाएँ, फ्रेम, बॉक्स,

आउट ऑफ बॉक्स,

मैंने यह सब कब सोचा था भला?

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ श्रीमद्भगवद्गीता के मुक्तक ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ श्रीमद्भगवद्गीता के मुक्तक ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

(1)

है दुनिया में जो व्यापक ज्ञान और अध्यात्म की वाहक।

सदा जो पथ दिखाती है,बनाती नर को जो लायक।

उसे कहते हैं सारे दिव्यता का इक महासागर,

कहाती है जो गीता,कृष्ण थे,जिसके अमर गायक।।

(2)

मुझे गीता ने सिखलाया,जिऊँ मैं कैसे यह जीवन

सुवासित कैसे कर पाऊँ,मैं अपनी देह और यह मन

मैं चलकर कर्म के पथ पर,करूँ हर पल का नित वंदन,

महकता मेरा गीता-ज्ञान से,जीवन औ‘ घर-आँगन ।

(3)

कर्म को मानकर पूजा,ही मन को तुम प्रबल रखना

बनो तुम निष्कपट मानव,यही आदर्श फल चखना

नहीं करना कभी तुम,एक पल परिणाम की चिंता,

कि बस कर्त्तव्य-पथ पर,आगे ही बढ़ते सदा दिखना।

(4)

अमर है आत्मा सबकी,यही गीता ने सिखलाया

नहीं जिसका मरण होता,यही इक सत्य दिखलाया

अमर हैं कृष्ण और अमरत्वमय है ज्ञान की वाणी,

सकल ब्रम्हांड में  श्रीकृष्ण ने आलोक फैलाया।

(5)

मोह अर्जुन का मारा था,सुनाकर ज्ञानमय गीता

जो समझा ज्ञान यह गहरा,वही अज्ञान को जीता

समझ लें धर्म को,और नीति-दर्शन,सत्य की वाणी,

बना लो मन को यूँ पावन,जो नित गीता-अमिय पीता।

 ☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नये साल में ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ नये साल में ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

सभी अधूरे सपने मेरे, पूरे होंगे नये साल में।

अरमानों में रंग भरेंगे, नहीं फंसेंगे मकड़ जाल में।।

 *

अब तक जो भी रहे अधूरे, सपने वे मुस्काएंगे।

हमको देकर के खुशियाँ वे, मंज़िल आज सजाएंगे।।

 *

नहीं निराशा संग रहेगी, मातम को दफनाएंगे।

कर्म करेंगे नये साल में, मंगल गीत सुनायेंगे।।

 *

जाने वाले का वंदन कर, आगत को घर लाएँगे।

रहे अधूरे सपने अब तक, उनको अब महकाएँगे।।

 *

जीवन में अब नव गति होगी, और सुहानी बातें।

सब कुछ अब मंगलमय होगा, सुखमय अब दिन-रातें।।

 *

नहीं संग अवसाद रहेगा, नया वेग अब तन-मन में।

आने वाला काल सँजोये, नया नेग  अब आँगन में।।

 *

जीवन संकल्पित होकर के, नव अध्याय लिखेगा।

 मुस्कानों का मौसम होगा, मातम नहीं दिखेगा।।

 *

सभी अधूरे सपने आकर, वंदन नमन करेंगे।

पूरे करके “शरद” उन्हें हम, आगत चमन करेंगे।।

 ☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४४ ☆ # “अच्छे दिन भी आऐंगे…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अच्छे दिन भी आऐंगे…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४४ ☆

☆ # “अच्छे दिन भी आऐंगे…” # ☆

☆

मत उदास हो अपना आपा मत खो

ये दिन भी कट जाएंगे

छाई है बदली तो क्या

ये बादल भी छट जाएंगे

 

कितनी भी हो लंबी रातें

कितनी भी हो दुख भरी बातें

भोर की कोमल कोमल किरणें

ओस की बूंदो पर लगी है गिरने

जीवन का नया संदेशा लाती है

उम्मीद की ज्योत जलाती है

भ्रमर वाटिका में फूल खिलाएंगे

अब अच्छे दिन भी आएंगे

 

बीते दिनों की बीती बातें

अंधेरी और गुमनाम रातें

भूखे पेट घर भर के फांकें

फटे वस्त्रोंसे गरीबी ही झांके

बुझे हुए हैं घर के चूल्हे

कोई देवदूत बनकर आकर छू ले

इस उम्मीद से आंखों में सपने सजाएंगे

अब अच्छे दिन भी आएंगे

 

जीवन तो एक संघर्ष है

कभी गम तो कभी हर्ष है

आंखों में है कितने सपने

राह में छूट गए हैं अपने

लड़ते लड़ते हम जीतेंगे

दुख के दिन जरूर बितेंगे

हम भी गीत खुशी के गाएंगें

अब अच्छे दिन भी आएंगे /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ८७ – तुम प्रेम हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘तुम प्रेम हो…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ८७ ☆ तुम प्रेम हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

प्रेम हो,

तुम प्रेम हो,

प्रेम का रूप हो,

प्रेम मय हो,

प्रेम जय हो,

प्रेम स्वरूप हो,

तुम प्रेम हो, तुम प्रेम हो,

 

प्रेम प्रीत हो,

प्रेम गीत हो,

प्रेम नाद हो,

प्रेम संगीत हो,

तुम प्रेम हो, तुम प्रेम हो,

 

प्रेम की आस हो,

प्रेम का विश्वास हो,

प्रेम की चाहत हो,

प्रेम की सुवास हो,

तुम प्रेम हो, तुम प्रेम हो,

 

प्रेम का ही साज हो,

प्रेम पर ही नाज हो,

प्रेम से चाहत रहे,

प्रेम का ही राज हो,

तुम प्रेम हो, तुम प्रेम हो.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दफ़न… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

(डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु से साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, दो कविता संग्रह, पाँच कहानी संग्रह,  दो  उपन्यास “फिर एक नयी सुबह” और  “औरत तेरी यही कहानी” प्रकाशित। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। हाल ही में आशीर्वाद सम्मान से अलंकृत । आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता दफ़न… ।)  

☆ कविता ☆ दफ़न… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

कई विचारों को दफ़न

आत्मीयता को दफ़न

मनुष्यता को दफ़न

प्रेमिका के विचारों  को

दफ़न करते देखा है।

 

अंधेरे को सुबह पर

सूरज को चांद पर

सुर को राग व ताल पर

नृत्य में घुंघरू की आवाज़ को

 दफ़न होते देखा हैं।

 

अरमान व इच्छा को

व्यक्ति की करनी को

मौत के बाद जीवन को

उजाले के बाद अंधेरे को

दफ़न होते देखा हैं।

 

अतीत के विचारों को

सैनिक को देश पर

अंग्रेज का इतिहास को

खुशामद करते चहरे 

दफ़न होते देखा हैं।

 

दर्द को हंसी में

जीवन में राबता को

अच्छाई को बुराई में

परिंदे को दुख में फडफडाते

मौत को करीब से

दफ़न होते देखा है।

☆

© डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

सम्प्रति : लेखिका व कवयित्री, सह- प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, रामैय्या इन्स्टिट्यूट ओफ बिजनेस स्टडीस, गोकुला, बेंगलूरू

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५९ – सॉनेट ~ ठंड का नवाचार ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सॉनेट ~ ठंड का नवाचार।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५९ ☆

☆ सॉनेट ~ ठंड का नवाचार ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

ठंड बढ़ गई ओढ़ रजाई

कॉफी प्याला थाम हाथ में

गर्म पकौड़े खा ले भाई

गप्प मार मिल-बैठ साथ में

*

जला कांगड़ी सिगड़ी गुरसी

कर पंचायत हाथ ताप ले

मोबाइल संग मातम-पुरसी

कफ जम जाए सिरप-भाप ले

*

गरमागरम बहस टी वी की

सारमेय वक्ता भौंकेंगे

एंकर की हरकत जोकर सी

बिना बात टोकें-रेंकेंगे

*

आलू भटा प्याज के भजिए

खाएँ गपागप प्रभु तब भजिए

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अलख जगाना है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अलख जगाना है…!

☆ ॥ कविता॥ अलख जगाना है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

अगर  देश को बचाना है,

जन में अलख जगाना है।

॰

घन  भयंकर नभ में छाए,

प्रलय चाहते हैं बरपाना।

सनातन  के साधकों का,

वजूद  चाहते हैं मिटाना।

इंसानियत के दुश्मनों के,

चेहरों से परदा उठाना है।

॰

मारग में अवरोध आएँगे,

नज़ारे मन को भरमाएँगे।

कोई  कितना भी लुभाए,

किन्तु झाँसे में न आएँगे।

पार कर अगाध अम्बुधि,

हमें सतत् बढ़ते जाना है।

॰

सारी दुनिया से है न्यारा,

हमको जान से है प्यारा।

अपनों ने जिसे ठुकराया,

हमने  उन्हें दिया सहारा।

एकमात्र लक्ष्य है हमारा,

उन्नत देश को बनाना है।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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