श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय ग़ज़ल “कड़वी हर एक हक़ीक़त ” ।)
जय प्रकाश की एक ग़ज़ल # १३० ☆ कड़वी हर एक हक़ीक़त ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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आँखों में शर्मो हया रख
थोड़ा तो वादे वफ़ा रख ।
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जुर्म की गिरह में मत बँध
जुर्मों को देके सज़ा रख ।
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लोग तो हँसेंगे सुनकर
दर्दों को दिल में छुपा रख।
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कड़वी हर एक हक़ीक़त
जख्मों की पास दवा रख ।
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नेकी बस काम आएगी
ग़ैरों से ख़ुद को जुदा रख।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





