हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८८ – गीत – ऋतुपति… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – ऋतुपति

? रचना संसार # ८८ – गीत – ऋतुपति…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

अनुरक्त हुए ऋतुपति को मैं,

पीने को हाला देती हूँ।

कंचनवर्णी इस यौवन को,

मधुरस का प्याला देती हूँ।।

**

मधुरिम अधरों पर रसासिक्त,

आँखें सुंदर भी  हैं नीली।

यौवन मद में मखमली बदन,

स्वर्णिम आभा नथ चमकीली,

प्रेयसी प्राणदा प्रियतम को,

प्यारी मधुशाला देती हूँ।

*

कंचनवर्णी इस यौवन को,

मधुरस का प्याला देती हूँ।।

**

नित मदिर -गीत गाता  यौवन,

बौराती पुलकित तरुणाई।

मैं बँधीं प्रीति की डोरी से,

हूँ बिना पिया के अकुलाई।।।

सिंदूरी माथे को खुश हो,

निज मन मतवाला देती हूँ।

*

कंचनवर्णी इस यौवन को,

मधुरस का प्याला देती हूँ।।

**

यौवन का झीना घूँघट पट,

रेशम की अँगिया शरमाती।

अभिसार वल्लरी नित पुष्पित,

है चन्द्र प्रभा सी  मुस्काती।।

प्रिय प्रांजल मूरत प्रांजल को

मैं प्रेमिल प्याला देती हूँ।

*

कंचनवर्णी इस यौवन को,

मधुरस का प्याला देती हूँ।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समग्रता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समग्रता ? ?

उन आँखों में

बसी है स्त्री देह,

देह नहीं, सिर्फ

कुछ अंग विशेष,

अंग विशेष भी नहीं

केवल मादा चिरायंध,

सोचता हूँ काश

इन आँखों में कभी

बस सके स्त्री देह..,

केवल देह नहीं

स्त्रीत्व का सौरभ,

केवल सौरभ नहीं

अपितु स्त्रीत्व

अपनी समग्रता के साथ,

फिर सोचता हूँ

समग्रता बसाने के लिए

उन आँखों का व्यास भी तो

बड़ा होना चाहिए..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१६ ☆ भावना के दोहे – मन मोहन  ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मन मोहन )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मन मोहन  ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

 

करते तेरी वंदना, हम तो आठों याम।

मन मोहन से पूछती, कब आओगे श्याम।।

 *

अंतस् की पीड़ा बढ़ी, कहाँ छुपी मुस्कान।

अभिनय तुम करना नहीं, उससे तुम अंजान।।

 *

मीत हमारी प्रीत का, तुझे नहीं है भान।

अब तो मुझको समझ लो, तुझमें बसती जान।।

 *

शर्त नहीं हमने रखी, प्रेम किया आगाध।

दोष नहीं तुमको दिया, बस मेरा अपराध।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९८ ☆ कविता – यह कैसी तकरार लड़ाई… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपकी  एक कविता – यह कैसी तकरार लड़ाई आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९८ ☆

कविता – यह कैसी तकरार लड़ाई☆ श्री संतोष नेमा ☆

यह कैसी तकरार लड़ाई

बात किसी को समझ न आई ।।

दादागीरी की ज़िद देखो ।

अमरीका ने आग लगाई ।।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

यह कैसा कानून कायदा ।

देखें अपना सिर्फ फायदा ।।

यूएन ओ धृतराष्ट्र बना है।

दिखे ना उसको कहीं आपदा ।।

आज समय लेता अंगड़ाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

यूक्रेन को धमकाता रसिया ।

यूएसए की चालें घटिया ।।

रखते बड़ी नाक मतवाले ।

कातिल चाल चलें नटखटिया ।।

केवल अपनी दिखे भलाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

पाक बड़ा नालायक लगता ।

जिसका खाता उसको ठगता ।।

हमला करता अफगानों पर ।

बारूदों से स्वयं सुलगता ।।

बढ़ा रहा आतंक कसाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

किम जोंगुन की बात निराली ।

करे नित्य आघात मवाली ।।

सनक मिजाजी उसकी शातिर।

निंदनीय है न्याय प्रणाली ।।

मिसाइलें उसने चलवाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

भले देश छोट इजरायल ।

है अमेरिका उसका कायल ।

कैसी जंग छिड़ी है भाई ।

कदम कदम मानवता घायल ।।

समझ गई दुनिया कुटिलाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

खेल तेल का हर दिन चलता ।

मन में खोट इरादा पलता ।।

दबा रहे दीगर देशों को ।

यह संतोष खेल अब खलता ।।

जगजाहिर इनकी चतुराई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शिक्षा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  शिक्षा।)

? कविता – शिक्षा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(चौपाई छंद)

?

शिक्षा नूतन पथ दिखलाती

शिक्षा ही तो मान दिलाती l

सत्य राह चलना सिखलाती

संस्कृति से परिचय करवाती ll

*

शिक्षा का हम अलख जगाएं

जीवन का तम दूर भगाएं l

शिक्षा बिन नर पशु है जानो

शिक्षा का मतलब पहचानो ll

*

सारे जग का है यह नारा

फैले शिक्षा का उजियारा l

करना कारज कोई न्यारा

बहे देश में शिक्षा धारा ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १८ – कविता – खुशियों का पैगाम… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘खुशियों का पैगाम।)

☆ शशि साहित्य # १८ ☆

? कविता – खुशियों का पैगाम…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

छा गई रुत खुशियों की,

किस बात का संदेशा ले आई …

मतवाला बन घुमड़ रहा है जी,

 इस तपिश में बरसने,

जो बात मन को भायी…

खुशियां खिल रही वृक्षों पर,

कालियां भी मुस्कायी…

फूल रहे हैं बौर भी,

खिलखिला रही अमराई…

नदिया भी बल खा कर,

आंचल सा लहराई…

खुशबू संग लिए अपने,

गुनगुना रही है पुरवाई…

चांद जमीं पर उतर आया,

देख बहारों की तरुणाई…

तारों की बारात सजी है,

रस घोल रही है शहनाई…

हरषुं खुशियां दमक रही है,

गुम हो गई है तन्हाई…

छा गई रुत खुशियों की,

मनचाहा संदेशा ले आई…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मैली चाँदनी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मैली चाँदनी ? ?

गैर घरों में

झाड़ू-पोछा करती

अपने बच्चों की फीस भरती,

परायी किचन में

चपाती सेकती

अपनी रसोई चलाती,

जुआरी पति की

भद्दी गालियाँ सुनती

शराबी मर्द के

लात-घूँसे खाती,

हर रात बलत्कृत होती

फिर भी

करवा चौथ का व्रत करती!

काश! चाँद औरत होता!

इन बदनसीब कालिमाओं

के जीवन में

थोड़ी चाँदनी होती!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९२ ☆ भक्ति गीत – हे! मेरे करुणानिधे! ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९२ ☆ 

☆ भक्ति गीत – हे! मेरे करुणानिधे! ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

योगमय जीवन बना दो।

प्रेम  की   गंगा  बहा दो।

वेदमय जीवन बना दो।

हे!मेरे करुणानिधे!

हे! मेरे करुणानिधे!

राह पकड़ूँ सत्य की मैं,

हौसला हर बार दो।

ताप भौतिक दूर होवें,

ज्ञान की पतवार दो।

 *

देह-मन निर्मल बना दो।

हे! मेरे करुणानिधे!

 **

पाप से सबको बचाओ,

हर तरफ ही आग है।

बाग को माली उजाड़े,

डस रहा अब नाग है।

 *

सत्य-पथ हम को दिखा दो।

हे! मेरे करुणानिधे!

 **

हर तरफ व्यभिचार का ही,

आवरण फैला हुआ।

आचरण अब हर मनुज का,

हर तरह मैला हुआ।

 *

देश-दुनिया को बचा दो।

हे! मेरे करुणानिधे!

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४० ☆ कहती है गौरैया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कहती है गौरैया” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४० ☆

☆ कहती है गौरैया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

कहती है गौरैया

आँगन हुए प्रदूषित

मैं क्यों आऊँ द्वार तुम्हारे।

जहाँ-तहाँ बैठाए पहरा

रोते हो रोना

नहीं कहीं खाली छोड़ा है

कोई भी कोना

अपनी मर्ज़ी के

मालिक हैं यह कहना

बैठे बंद किए गलियारे ।

कभी फुदकती घर के भीतर

कभी खिड़कियों पर

कभी किताबों पर मटकाती

आँख झिड़कियों पर

बनकर भोली उड़े

फुर्र से जब चिचियाकर

फिर बतलाती दोष हमारे।

देख हमे फुरसत में अपना

नीड़ सँवारे गुपचुप

चोंच दबाए तिनका रखती

रोशनदान में छुप-छुप

भरे सकोरे पर हक

जतलाती है हरदम

रोज जगाती है भिनसारे।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१८ – महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१८ ☆

? महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… ? श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

जैन धर्म में है बसा, जीवों का कल्यान।

संस्कृति ने सबको दिया, जीने का वरदान।।

राम कृष्ण गौतम हुए, महावीर की भूमि।

योग धर्म अध्यात्म से, कौन रहा अनजान।।

 *

धर्मों की  गंगोत्री, का है  भारत केन्द्र।

जैन बौद्ध ईसाई सँग, मुस्लिम सिक्ख सुजान।

 *

ज्ञान और विज्ञान का, भरा यहाँ भंडार।

सबको संरक्षण मिला, हिन्दुस्तान महान।। 

 *

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को, जन्मे कुंडल ग्राम।

वैशाली के निकट ही, मिला हमें वरदान।।

 *

राज पाट को छोड़कर, वानप्रस्थ की ओर।

सत्य धर्म की खोज कर, किया जगत कल्यान।।

 *

सन्यासी का वेषधर, निकल चले अविराम।

छोड़ पिता सिद्धार्थ को, कष्टों का विषपान।। 

 *

प्राणी-हिंसा देख कर, हुआ बड़ा संताप।

मांसाहारी छोड़ने, शुरू किया अभियान।।

 *

अहिंसा परमोधर्म का, गुँजा दिया जयघोष।

जीव चराचर अचर का, लिया नेक संज्ञान।।

 *

मूलमंत्र सबको दिया , पंचशील सिद्धांत।

दया धर्म का मूल है, यही धर्म की जान।

 *

हिंसा का परित्याग कर, अहिंसा अंगीकार।

प्रेम दया सद्भाव को, मिले सदा सम्मान।।

 *

चौबीसवें  तीर्थंकर, माँ त्रिशला के पुत्र।

महावीर स्वामी बने, पूजनीय भगवान।।

 *

वर्धमान महावीर जी, बारम्बार प्रणाम ।

त्याग तपस्या से दिया, सबको जीवन दान।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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