हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६८ – “जो विमर्श में जुटीं…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “जो विमर्श में जुटीं...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “जो विमर्श में जुटीं...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

कोहरे में ठिठुरन से

ऐसे, सूरज भी हारा।

दिनके चढ़ते चढ़ते

कैसे लुढ़क गया पारा ॥

 

जमे दिखे गांडीव,

सिकुड़ते सव्यसाचियों के ।

धुंध , लपेटे शाल, उलहने

सहें चाचियों के ।

 

चौराहे जलते अलाव भी

लगते बुझे बुझे –

और घरों की खपरैलें तक

लगीं सर्वहारा ॥

 

जो विमर्श में जुटीं

लिये गम्भीर समस्यायें ।

हाथ सेंकने जुटीं गाँव की

बंकिम प्रतिभायें ।

 

बृद्धायें , दरवाजे पर ले

बरोसियाँ बैठीं –

शांति पाठ के बाद पढ़

रहीं ज्यों अमृत धारा ॥

 

लोग रजाई – कम्बल

चेहरे तक लपेट निकले ।

लगे, फूस से ढके, फूल के

हो सुंदर गमले ।

 

आसमान से नीचे तक है

सुरमई अँधियारा –

धुँधला सूरज दिखता नभ

में लगे एक तारा ॥

 

कोहरे में ठिठुरन से ऐसे

सूरज भी हारा ।

दिनके चढ़ते चढ़ते कैसे

लुढक गया पारा ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-02-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९ ☆ # “उदास बसंत…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “उदास बसंत…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९  ☆

☆ # “उदास बसंत…” # ☆

यह कैसी बसंती पवन चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

डाली से फूल झरने लगे हैं

भ्रमर भी आह भरने लगे हैं

वीरान हो गई है वाटिका

पतझड़ से सब डरने लगे हैं

मौसम ने यह कैसी चाल चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

आकाश में उड़ती हुई पतंग है

मांझे और धागे में मची हुई जंग है

मांझे पर चढ़ा कट्टरता का रंग है

मांझे से कट रहे वंचितों के अंग है

लहुलूहान अंगो से भरा हर चौराहा हर गली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

पीली पीली सरसों पीले पीले वस्त्र है

बसंती नैनों में कटार से अस्त्र है

पीले को रक्तिम करने पढ रहे वह मंत्र है

उनकी इच्छापूर्ति में लगे सारे तंत्र है

बसंत की मादकता धूमिल हो चली हैं

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

यह कैसी बसंती पवन चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९२ – मन के धागे… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता मन के धागे।)

☆ अभिव्यक्ति # ९२ ☆ मन के धागे☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मन के धागे,

खींच रहे हैं,पल पल मुझको,

ले जाना,जाने कहां चाहते,

 

मन के धागे,

मन निर्मल है,

मन शीतल है,

मन चंचल है,

पता नहीं,कहां ले जाएं,

 

मन के धागे,

मन की उलझन,

मन उलझाये,

मन उलझा है,

मन सुलझाये,

मन ही जाने,क्या सुलझाये,

 

मन के धागे,

मन की बातें,

मन ही जाने,

मन ही छेड़े,

मन अफसाने,

मन से जोड़ रहे हैं, नेह,

मन के धागे।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Against the Current…/विपरीत बहाव… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Against the Current…/विपरीत बहाव… ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Against the Current… ??

We moved side by side

as our directions were the same

Yet our inner currents

were never alike…

 

For him, knowing

was a pause,

a place to stop

where he received the answer

 

For me, knowing

was a journey,

—an ever restless flow to

unravel the mystic realms

 

He found meaning

I became the meaning..!

 

? विपरीत बहाव??

समांतर चले

क्योंकि दिशाएँ समान थीं

पर अनुभूति एक-सी नहीं थी

उसके लिए जानना

एक विराम था

वह उत्तर पर रुका

मेरे लिए जानना

एक अनंत यात्रा

मैं जिज्ञासा में बहता रहा

उसने अर्थ पाया

मैं अर्थ होता रहा…!

(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem समांतर

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि –  समांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६४ – नर्मदा जयन्ती विशेष – पूर्णिका – नेह नर्मदा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – पूर्णिका – नेह नर्मदा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६४ ☆

☆ नर्मदा जयन्ती विशेष – पूर्णिका – नेह नर्मदा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

रमा चंचला, मन चंचल

रमे रमा में हो अविचल

.

नेह नर्मदा रुद्ध न हो

रहे प्रवाहित कलकल कल

.

बुद्धि रही भरमाती क्यों

भेद-बुद्धि है मिथ्या छल

.

उगना है सूरज सम तो

हँसते-हँसते संझा ढल

.

नहीं समस्या है ऐसी

जिसका कोई मिले न हल

.

परख साधु की होती तब

जब टकराता कोई खल

.

मोबाइल रख पॉकेट में

आपस में करिए मिल गौल

.

मंजिल कितनी दूर न सोच

पग चूमेगी चलता चल

.

देख अन्य की प्रगति न जल

तम हरने दीपक बन जल

.

दमयंती हो हर नारी

नर हो पाए राजा नल

.

कट जाते हैं युग पल में

युग बन कटता ‘सलिल’ न पल

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१३.१.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नर्मदा जयन्ती विशेष – माँ नर्मदे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “माँ नर्मदे“.)  

? कविता – नर्मदा जयन्ती विशेष – माँ नर्मदे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

            👏1

लालसा तेरे दर्शन की माँ नर्मदे,

है तमन्ना मैं पाऊँ माँ तेरे ही चरण

मोक्षदायिनी शिवकन्या हे इंदुभवा,

बालूवाहिनी मैं आऊँ माँ तेरी ही शरण ll

           👏2

अमरकण्टक से खम्भात सौगात माँ,

परिक्रमण करते हैं भक्त दिन-रात माँ

दुग्धधारा कपिलधारा सहस्त्रधारा माँ,

धुँआधार से हृदयप्रदेश ने पुकारा माँ

धुँआधार से हृदयप्रदेश ने पुकारा माँ…….

स्वेद महाकाल का जब धरा पर गिरा,

मैया रेवा का पावन हुआ अवतरण ll

लालसा…………

             👏3

गंगास्नान से पुण्य जैसा मिले,

तेरे दरस मात्र से पुण्य वैसा मिले

हर्षदायिनी विपाशा शंकरी अमृता,

रंजना सरसा मुरला हे मेकलसुता

तरण तारण माँ तमसा तेरा अनुकरण,

माँ तेरा अनुसरण माँ तेरा स्मरण ll

लालसा………

              👏4

गंदगी का वरण करते जो अशिष्ट हैं,

गोद में तेरी मिलाते अपशिष्ट हैं

श्रद्धा कैसी यह शुद्धता का हरण,

कैसा वातावरण पवित्रता का क्षरण ll

विमले माँ को प्रदूषण से मुक्ति मिले,

अगर जन करें न अंधानुकरण ll

लालसा………

              👏5

शपथ लें कि कलकल पवित्र जल में हम

पावन जल में न मिलायें,मूत्र-मल को हम

दोहराएँ न कल कपट-छल को हम

सहज भक्ति-भाव,इस सरल हल को हम

हे नरबदा हे मैया मकरवाहिनी,

साफ़-सुथरा हो अपना ये पर्यावरण ll

लालसा……..

             👏6

कूड़ा-कर्कट-मल,जल में न डालें हम

नदिया शुद्धि का राजेश‘, हल निकालें हम

निर्मला सलिला हे कलकल प्रवाहिनी,

जीवन-रेखा देवी मकरवाहिनी

भक्ति आराधना आरती कीर्तन,

तेरी ही गोद में मेरा जीवन-मरण ll

लालसा……….

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “बसंत पंचमी: चेतना का उत्सव” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “बसंत पंचमी:चेतना का उत्सव” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

पीली किरणों ने आकर, धरती का मौन तोड़ा है,

शीत के बोझ तले दबा, हर बीज आज फिर जागा है।

*

सूनी डालियाँ कह उठीं, “अब ठहरना व्यर्थ है,”

हवा ने सिखाया धीरे-से, कि परिवर्तन ही सत्य है।

*

सरसों हँसी खेतों में, स्वर्णिम स्वप्न बिखराए,

प्रकृति ने जीवन के अर्थ, आज फिर से समझाए।

*

बसंत पंचमी केवल, ऋतु का नाम नहीं,

यह अज्ञान से ज्ञान तक, चलने का एक प्रमाण है।

*

वीणा के हर स्वर में, विद्या की पुकार बसी,

माँ सरस्वती के आशीष से, हर बुद्धि आज जागी-हँसी।

*

आओ, मन की भूमि पर, ज्ञान के बीज बोएँ,

श्रम, सत्य और संस्कार से, अपने भविष्य को संजोएँ।

*

बसंत कहता है, “जो सीखता है, वही बढ़ता है,”

ज्ञान की रोशनी में ही, मानव सच में गढ़ता है।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समांतर ? ?

समांतर चले

पर समांतर में भी

कितना अंतर रहा,

उसने मेरा लिखा पढ़ा,

मैं उसे पढ़कर लिखता रहा..!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९३ ☆ गीत – ।। मां शारदे की वंदना ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९३ ☆

☆ गीत ।। मां शारदे की वंदना ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।।बसंत पंचमी, मां सरस्वती पूजन दिवस।।

हे मां शारदे है प्रार्थना विनम्र हम सब को ज्ञान दे।

हे वीणा वादिनी जीवन में क्या अच्छा बुरा संज्ञान दे।।

*****

विद्या की देवी  हर समस्या   के लिए ज्ञान विज्ञान दे।

हे मां सरस्वती कैसे हो यह भवसागर पार वो भान दे।।

कैसे बने सरल जीवन की कठिन राह वो अनुमान दे।

हे मां शारदे है प्रार्थना विनम्र हम सब को ज्ञान दे।

***

हे मां बागेश्वरी रहें विद्या विद्यार्थी मत हमें अभिमान दे।

कैसे करें हम सदा   रक्षा राष्ट्र की  वह स्वाभिमान   दे।।

कैसे रहें तन मन से शुद्ध मां वीणापाणी हमें वह ध्यान दे।

हे मां शारदे है प्रार्थना विनम्र हम सब को ज्ञान दे।।

*****

हे हंसवाहिनी विद्यादायनी भीतर मानवता का संचार कर।

श्वेत कमल विराजनी धैर्य बुद्धि विवेक का उपचार कर।।

मां भारती महाश्वेता देवी  उत्तम वर्तमान का वरदान दे।

हे मां शारदे है प्रार्थना विनम्र हम सब को ज्ञान दे।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५६ ☆ कविता – क्योंकि परम्परागत सब प्यार खो गया है… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – क्योंकि परम्परागत सब प्यार खो गया है। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५६

☆ क्योंकि परम्परागत सब प्यार खो गया है…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दुनियाँ दुखी है क्योंकि सदाचार खो गया है

लालच का हर एक मन पै अधिकार हो गया है।

 *

रहते थे साथ हिलमिल छोटे-बड़े जहाँ पर

वहाँ द्वेष-बैर-कटुता व्यवहार हो गया है।

 *

संतोष की गली में उग आई झाड़ियाँ हैं

जिनसे फिर पार जाना दुश्वार हो गया है।

 *

मन सब जो सच्चाई से बातें किया करते थे

बढ़ चढ़ बताना उनका अधिकार हो गया है।

 *

जीवन सरल था सादा उलझनें थी बहुत कम

अब नई मुश्किलों का अम्बार हो गया है।

 *

इस नये जमाने में नित नई आँधियाँ हैं

सब धूल धूसरित सा संसार हो गया है।

 *

एक ओर तो प्रगति हुई पर बढ़ी सौ बुराई

क्योंकि परम्परागत सब प्यार खो गया है।

 *

प्रत्येक घर गली में जहाँ प्रेम उमगता था  

वहाँ पर ‘विदग्ध’ लौ बिन अँधियार हो गया है।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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