हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २० – कविता – भारत की आत्म-व्यथा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भारत की आत्म-व्यथा“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २० ?

? कविता – भारत की आत्म-व्यथा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

बंजर ज़मीं की रेत-सा, वीरान हो गया हूँ मैं

हालात देख अपने, परेशान हो गया हूँ मैं

=2=

इक ज़िस्म एक जाँ, ज़ुदा हम यूँ हुए कि ज्यों

आधा भारत, आधा पाकिस्तान हो गया हूँ मैं

=3=

गांधी सुभाष नेहरू भगत तिलक नहीं रहे

लगता है जैसे खण्डहर, मक़ान हो गया हूँ मैं

=4=

दंगे-फ़साद हो रहे, मज़हब के नाम पर

गीता बँटी और बँटकर, क़ुरआन हो गया हूँ मैं

=5=

सूखा अकाल बाढ़ कर्ज़ क़ुदरती क़हर

इन सबसे जूझता हुआ, किसान हो गया हूँ मैं

=6=

ईमान की ज़मीं था मैं ‘राजेश’ कभी, अब

घोटाले-भ्रष्टाचार की, खदान हो गया हूँ मैं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बसंत! दस्तक दे रहा…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – बसंत! दस्तक दे रहा…!

☆ ॥ कविता॥ बसंत! दस्तक दे रहा…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

देह- द्वारे दस्तक दे रहा बसंत,

शिशिर का हुआ जा रहा अंत।

*

मंद-मंद मलय बयार बह रही,

उल्लसित हैं गृहस्थी औ’ संत।

*

मन और मति को लुभा रही है,

प्रकृति की छटा अद्भुत,अनंत।

*

प्रेयसी प्रीत  के ज्वर की मारी,

रात- दिन रटती रहती है कंत।

*

अरमान हिमानी पिघलने लगे,

हवा में तैरते फ़साने मनगढ़ंत।

*

मदन, महादेव का शत्रु बना है,

दुनिया  हुई जाती मतंग-मस्त।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ऋतुराज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ऋतुराज ? ?

हर क्षण तन छीज रहा,

हर क्षण मन रीझ रहा,

जितना छीजता, उतना रीझता,

छीजना, रीझना, स्वयं पर खीजना,

विरोध का आभास अथाह,

विरुद्ध का समानांतर प्रवाह,

तब पाट का आकुंचन होना,

समानांतर का मिलन होना,

अब न छीजना, अब न रीझना,

भीतर-बाहर मानो संत होना,

देहकाल में ऐसा भी वसंत होना…!

 

वसंतपंचमी एवं माँ सरस्वती के अवतरण दिवस पर स्वस्तिकामनाएँ. 💐🙏

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०७ ☆ भावना के दोहे – – बसंत ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – – बसंत )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – बसंत ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

माघ माह की पंचमी, ऋतु  है बसंत राज।

घर घर में सब पूजते, मां सरस्वती आज।।

जन्म -जन्म बुझती नहीं, तेरी मेरी प्यास। 

दिखता मुझे बसंत है, बरसे है मधुमास।।

 *

बीत गया पतझड़ अभी, छाने लगा बसंत।

अच्छे दिन अब आ गए, हुआ शीत का अंत।।

 *

डाल डाल पर झूमता, प्यारा लगे बसंत।

महक महक रसधार का, कभी न होवे अंत।

 *

 मादकता बौरा गई, देख  बसंती रूप।

मधुबन भी खुश हो रहा, मौसम के अनुरूप।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७८ – नवगीत – मौन अंबर… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतमौन अंबर

? रचना संसार # ७८ – गीत – मौन अंबर…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

तरस रहे बर्षा को हम सब,

मौन मगर बैठा अंबर है।

सूख गए आँखोँ के आँसू,

मन की धरती भी बंजर है।।

*

दूर हुई परछाई अपनी,

अंतर्मन की पीर बढ़ी है।

मंजिल मिलना बहुत कठिन है,

झुलसाती तन धूप चढ़ी है।।

काँटों भरी डगर मिलती है,

दर्द भरा दिखता  मंजर है।

**

तरस रहे वर्षा को हम सब,

मौन मगर बैठा अंबर है।।

**

 तेज रवानी लहरों की है,

 ओझल हुआ किनारा भी है।

 मार्ग रोकती रात -दिवस  है,

 विकट समय की धारा  भी है।।

 फँसे हुए हम  बीच भँवर में,

 चुभा घात का भी ख़ंजर है।

*

तरस रहे वर्षा को हम सब,

मौन मगर बैठा अंबर है।।

**

व्यथित हुआ है जीवन सारा ,

बनी शूल की सेज हमारी।

झेल रहे हम विरह दंश नित,

चलती दिल पर रोज कटारी।।

हमको ताने का विष दे जग,

मार रहा मंथर-मंथर है।

*

तरस रहे वर्षा को हम सब,

मौन मगर बैठा अंबर है।।

**

रिक्त नेह के घट सारे हैं,

कुटिल मलिनता भरी हुई है।

पत्थर हृदय जमाना सारा ,

मानवता भी मरी हुई है।।

चातक मन नित  प्यासा तरसे,

सूख हुआ तन भी पंजर है।

 *

 तरस रहे वर्षा को हम सब,

मौन मगर बैठा अंबर है।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८९ ☆ संस्कार और संस्कृति… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – संस्कार और संस्कृति आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८९ ☆

☆ संस्कार और संस्कृति☆ श्री संतोष नेमा ☆

सिरफिरों ने कर दिया, चाहत को बदनाम

प्रेम दिखावा, क्रूर मन, करते कत्लेआम

 *

संस्कार और संस्कृति, कभी न छोड़ें आप

अपनी यह पहचान है, जिसकी मिटे न छाप

 *

बहूरूपियों से बचें, इनका दीन न धर्म

ये निकृष्टजन स्वार्थवश, करते खोटे कर्म

 *

राह चलें हम धर्म की, करें नेक सब काज

रखें आचरण संयमित, मेरे ये अल्फ़ाज़

 *

धर्म सनातन कह रहा, ईश्वर हैं माँ-बाप

मान रखें उनका सदा, बन कृतज्ञ सुत आप

 *

बेटा हों या बेटियाँ, रखो धर्म की लाज

छोड़ें मत माँ-बाप को, कर मरज़ी के काज

 *

कभी भरोसा मत करें, करके आँखे बंद

नकली हैं बहु चेहरे, जिनके नव छल-छंद

 *

माना जीवन आपका, करें फैसले आप

ध्यान रखें पर कभी भी, दुखी न हों माँ-बाप

 *

मात-पिता के प्यार से, बढ़कर कोई प्यार

हुआ न होगा कभी भी, गाँठ बाँध लो यार

 *

युग की नई विडंबना, आडंबर का जोर

बिन सोचे समझे चलें, जिसका ओर न छोर

 *

किया प्रेम के नाम पर, मानवता का खून

जिसने तन टुकड़े किये, उनको डालो भून

 *

जब भी बहकीं बेटियाँ, हुआ गलत अंजाम

छिनता है संतोषतब, उल्टे होते काम

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ९ – कविता – परम सत्य… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पूजनीय वृक्ष।)

☆ शशि साहित्य # ९ ☆

? कविता – परम सत्य…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

उसको आना है, वो आएगी जरूर..

ना करेगी इंतजार, किसी स्नेह आमंत्रण का..

जब तय है आना, तो राह पर टकटकी कैसी..

सारी जद्दोजहद तो, जिंदगी के लिए

हंस के और हंसा के गुजरे,

तो सोने पर सुहागा है..

ना नाप पैमाने को, कि खाली है वो आधा,

दम रखता है वह बेतहाशा हिलोरें भरने का,

गर पूरा भर गया, तो छलक कर बह जाएगा..

मानव जीवन पाया, मौका मिला, नर से नारायण हो जाने का..

सृजन की क्षमता दे, ईश्वर ने अपने समकक्ष कर दिया, ‍

फिर सोचना कैसा, योग्यता से अपनी, नारायणी बन जा ना..

 

ना करो जाया, समझो हर पल की कीमत को,

 सिर्फ ये ही है वो शै,

ना लौट कर आएगी दोबारा..

ईश्वर भी खुश हो, अपनी रचना देखकर,

याद रह जाओ, ऐसा कुछ “अच्छा” कर जाना,

जितनी भी मिली, जिंदा दिली से जी जाना..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क्षितिज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क्षितिज ? ?

छोटे-छोटे कैनवास हैं

मेरी कविताओं के,

आलोचक कहते हैं,

और वह बावरी

सोचती है-

मैं ढालता हूँ

उसे ही अपनी

कविताओं में,

काश!

उसे लिख पाता

तो मेरी कविताओं का

कैनवास

क्षितिज हो जाता!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

*

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८२ ☆ बाल गीत – शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८२ ☆ 

बाल गीत – शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के

करते सदा उजाला हैं।

सत का पथ ही हमें बताएँ

मणियों की वे माला हैं।

*

किरण बिखेरें सूरज-सी वह

अंधकार को दूर करें।

पुष्पों-सी खुश्बू फैलाकर

अहम , बहम को चूर करें।

*

श्रम का पाठ पढ़ाएँ शिक्षक

खुले अक्ल का ताला है।

शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के

करते सदा उजाला हैं।

*

पहली गुरु अपनी माता है

दूजे गुरु शिक्षक होते।

भाषा , विषय पढाएँ हमको

बीज सदा अच्छे बोते ।

*

आभा, प्रभा , ओज के सर्जक

वे ही दया , प्रवाला हैं।

शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के

करते सदा उजाला हैं।

*

मित्र हमारे वे बन जाते

राह – प्रदर्शक बन जाएँ।

ज्ञान और विज्ञान सिखाकर

नव नूतन पाठ पढाएँ।

*

दया , प्रेम के सच्चे सागर

बनते कभी रिसाला हैं।

शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के

करते सदा उजाला हैं।

*

उत्तम शिक्षा दें सबको ही

सामाजिक बनते ज्ञानी।

डॉक्टर और इंजीनियर भी

बनें अंतरिक्ष विज्ञानी।

*

विश्वामित्र बनें संदीपन

बन जाते वे ग्वाला हैं।

शिक्षक ही हैं दीप ज्ञान के

करते सदा उजाला हैं।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१० – कविता – ☆ समय चक्र… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता समय चक्र” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१० 

☆ समय चक्र… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

कल जो था

बदल गया है

आज कितना,

उखड़ा-उखड़ा सा मन

जहाँ उमंगे थी वहीं

बेबसियों का संकलन

खत्म सा होने लगा है

संचित उत्साहित धन,

 

शेष है केवल

अनंतिम मौन

यूँ कहने को

सब कुछ है अपना 

जैसे गहन नींद में

मनोनुकूल सपना

पर मुश्किल है

इन्हें सहेजे रखना,

 

विकलांग नहीं

फिर भी

क्रियाएँ दिव्यांग सी

परिवर्तित होती

दैहिक क्षमता

कब, कैसे, नहीं पता,

समय के समंदर में

गोते लगाती

रह जाती है शेष

अनकही अंतर्व्यथा,

 

जुड़ा है

सभी के साथ

एक समय के बाद

यह अवस्थागत संघर्ष

बीतते वर्ष दर वर्ष

शोक हो या हर्ष

टूटना निश्चित है

एक वक्त दैहिक दर्प

यही है जीवन जगत का

परम् सत्य।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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