हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “चौराहा…” – लेखक… श्री चन्द्रभान राही☆  समीक्षा – डॉ. कृष्णलता सिंह  ☆

डॉ. कृष्णलता सिंह 

 

“चौराहा…” – लेखक… श्री चन्द्रभान राही☆  समीक्षा – डॉ. कृष्णलता सिंह 

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – चौराहा

लेखक – श्री चन्द्रभान राही

प्रकाशक – इन्द्रा प्रकाशन, भोपाल

☆ सामाजिक कुरीति का सच्चा आईना- ‘‘चौराहा’’ उपन्यास – डॉ. कृष्णलता सिंह ☆

यह सर्वमान्य सत्य है कि ‘‘साहित्य समाज का दर्पण होता है।’’ साहित्यकार पर समाज का यथार्थ स्वरूप दिखाने का उत्तरदायित्व होता है। इस कसौटी पर श्री चन्द्रभान राही जी का उपन्यास चौराहा खरा उतरता है। यह उनका चौथा उपन्यास है, जो इन्द्रा प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित हुआ है। यह कोढ़ की तरह फैली सामाजिक समस्या भिक्षावृत्ति पर एक शोधपरक उपन्यास है, जिसे लेखक ने भिखारी समुदाय के बीच घुस कर बड़े परिश्रम से लिखा है। अगर ऐसा नहीं होता, तो भिक्षा वृति में लिप्त भिखारियों के जीवन के संघर्षों, भिक्षावृत्ति के नये-नये तरीके, वेश्यावृत्ति, किन्नर समुदाय की विवशताओं और भिखारी माफिया तंत्र की एक एक गतिविधियों का ऐसा विस्तृत, जीवन्त और मार्मिक आख्यान हमारे सामने नहीं ला पाते। समाज का यह कोना इतना वीभत्स है, इसमें इतने छेद हैं कि उनमें पैबन्द लगाने में सदियाँ बीत जायेंगी। फिर भी सम्मवतःवहाँ सब कुछ सामान्य न हो सके। क्योंकि वह सब मानव निर्मित अपराध जगत की उपज है, जो एक व्यापार की शक्ल में फल फूल रहा है। इस व्यापार पर अंकुश लगाने वाले ही उनके संरक्षक हैं, जिसका शायद हम सब को कदाचित ही अहसास होगा। राही जी ने उसी अन्धेरे कोने से रूबरू कराने के लिये हमें ऐसे चौराहे पर ला कर खड़ा किया है, जो दिन रात वाहनों के शोर शराबे से गुलजार रहता है, हरी, पीली और लाल बत्ती से चलायमान होता है। हर तरफ चहल पहल नजर आती है। ज़िन्दगी भागती दौड़ती नज़र आती है, सब कुछ अपने आप में परफेक्ट दिखाई देता है। बस कुछ पलों के लिये लाल बत्ती का सिग्लन होते ही वाहनों की रफ्तार चौराहे पर थम जाती है और दूसरी ज़िन्दगी सक्रिय हो जाती है। अचानक प्रतीक्षारत वाहनों के शीशे थपथपाये जाने लगते हैं और भिखारी माफिया का पूर्व रिहर्सल किया गया अभिनय शुरू हो जाता है।

श्री चन्द्रभान राही

राही जी ने भले ही उपन्यास की पटकथा मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बोर्ड आफिस के चौराहे और हनुमान मंदिर के आस पास रहने वाले भिखारियों, धन्धेंवालियों और किन्नरों के जीवन की कहानियों को लेकर बुनी है, परन्तु यही गोरख धन्धा अपने देश के किसी भी छोटे-बड़े शहर के चौराहे और मंदिर के आस पास हम देख सकते हैं। यह गज़ब का धन्धा है, इसमें न हींग लगती है और न फिटकरी, रंगचोखा चढ़ता है यानी जीरो इंवेस्टमेन्ट का धन्धा व्यक्ति को धन्ना सेठ बना देता है। इस उपन्यास के भिखारियों का सरगना जलील ख़ान बाम्बे के किसी डॉन का कभी गुर्गा था। अब भोपाल में भिखारियों का गिरोह चलाता है। पुलिस और सत्ता में बैठे बड़े बड़े मंत्री उसकी जे़ब में रहते हैं। उसकी हवेली में उसकी पूरी सरकार चलती है, भिखारियों के अपने पैसों के लिये उसने एक बैंक भी खोल रखा है। अपनी कमाई वह वहाँ जमा करा देते हैं, अपना हिस्सा वह जब चाहे निकाल सकते हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी रक़म उनके मनोनीत उत्तराधिकारी को सौंप दी जाती है। लेन देन के मामले में वह बहुत ईमानदार है। ईमानदारी से काम करने वाले भिखारियों के लिये वह मसीहा हैं, लेकिन गद्दारी और बेईमानी करने के लिये वह जल्लाद है। सारा काम बड़े व्यवस्थित रूप से चलाता है। भिखारियों के मेकअप और कस्ट्यूम का अलग विभाग है। वह किसी पर भीख मांगने का दबाव नहीं डालता है। बच्चों के हुनर को जानकर वह उनकी योग्यता के अनुसार उनको रोजगार भी दिलाता है, लेखक ने जलीलख़ान के व्यक्तित्व के स्याह और उजले दोनों पक्षों को भी संजीदगी से उकेरा है। आश्चर्य होता है कि इस पात्र के अपराधिक चरित्र को पढ़कर घृणा नहीं उत्पन्न होती है। कहानी का मुख्य पात्र या सूत्र धार राम नाम का एक वयस्क युवक है, जिसकी ज़िन्दगी जन्म से लेकर अब तक इसी हनुमान मंदिर के पास बैठने वाले भिखारियों के बीच कटी है। अपनी वफादारी के कारण वह ख़ान का चहेता बन जाता है। उसे भीख माँगना रुचिकर नहीं लगता है, अतः खान उसे चौराहे पर अख़बार बेचने का काम दे देता है। उसकी जन्मदात्री माँ हमारे सभ्य समाज की एक शिक्षित युवती है, जो अपना पाप छिपाने के लिये एक कोढ़िन भिखारी के पास एक अख़बार में लपेट कर उसे छोड़ जाती है। कोढ़िन इसे पाँच हजार में ख़ान के पास बेच देती है और ख़ान उस बच्चे का पालन पोषण करने के लिये उसे हर महीने अतिरिक्त पैसा देता है। अख़बार में श्रीराम की फोटो छपी होती है, इसलिए ख़ान उसका नाम राम रख देता है। यही राम अपनी आप बीती सुनाते हुए भिखारियों की दिनचर्या, उनके संघर्ष और उनके रहन सहन के एक-एक दरवाजे और खिड़कियाँ खोलता जाता है और हम अपने ही समाज के इस अजीबो गरीब अंधेरी दुनिया में प्रवेश कर अवाक् रह जाते हैं। अकसर सड़क पर हमारी मुलाकात भिखारियों से होती है। कभी हम उनकी दयनीय दशा देख कर अपनी ज़ेब कुछ ढीली कर देते हैं, कभी उपेक्षा से मुँह फेर कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन लेखक उनके जीवन की गहराई में उतरा है, यह उपन्यास पढ़कर प्रतीत होता है। न जाने कितने भिखारी और भिखारिनें हैं, सबकी अलग-अलग जीवन गाथा है, कुछ तथाकथित सभ्य समाज की अवैध सन्तानें हैं, कुछ जन्मजात अनाथ हैं, जिन्हें उनके रिश्तेदार पैसों के लालच में बेच देते हैं। कोढ़ी, अपाहिजों को उनके परिवार वाले घर से निष्कासित कर देते हैं। अपने मन का आक्रोश छिपाये दर्द से जूझते हुए वह भीख मांगने पर मजबूर हो जाते हैं। हनुमान मंदिर के पीछे इनकी बस्ती बसी है। यहीं वह अपनी देह की ज़रूरतों की पूर्ति हेतु आपस में सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं, कुछ इन्हीं भिखारियों की अपनी संतानें हैं। इसी तरह देह व्यापार से जुड़ी धन्धें वालियाँ है, जिनकी अपनी विवशताएँ और कहानियाँ। समाज से उपेक्षित किन्नरों के जीवन की अपनी संघर्ष गाथा है। सबकी शरण स्थली यही चौराहा, जो इन्हें रोजगार देता है। इतनी सारे पात्रों, कथाओं और घटनाओं को एक सूत्र में पिरो कर राही जी ने बड़ी कुशलता से उपन्यास का तानाबाना गढ़ा है कि उसमें सभी पात्र और घटनाएँ सजीव हो उठती हैं। सिने रील की तरह आँखों के सामने सब कुछ गुजरने लगता है। पाठक एक सर्वथा नयी दुनिया में प्रवेश कर हक्काबक्का हो जाता है। जैसे जैसे उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है, उत्सुकता बढ़ती जाती है। उत्सुकता और कौतूहल कहीं पर भी विश्राम नहीं ले पाते हैं। उत्तरोत्तर हमारा परिचय एक नयी घटना और कहानी से होता रहता है, जो मन को बाँध लेती है। पात्रों की सर्जना इतनी विविधता पूर्ण है कि हर  भिखारी दूसरे से अलग दिखाई देताहै। उनका रहन-सहन, दिनचर्या और मानवीय संबन्धों का लेखा जोखा मन को अन्दर तक भिगो देता है, आँखें नम हो जाती हैं। भिखारी होने के बावजूद उनमें इन्सानित है। आरती, कमला, कोढ़िन मौसी आदि की जीवन गाथामन को झकझोर देती हैं। उनकी हँसी और मसखरी के पीछे छिपा दर्द हृदय को कचोटने लगता है। राही जी ने बड़ी संवेदन शीलता और ईमानदारी से भिखारियों के जीवन का यथार्थ हमारे सामने रखा है।

उपन्यास का कथ्य न केवल रोचक है, अपितु शोधपरक नवीनता लिये हुए है। भाषा प्रवाहमयी है। अपने मन्तव्य को अभिव्यक्त करने में पूर्णता समर्थ है।राही जी ने भारी भरकम शब्दों की जगह साधारण आम जन की भाषा का प्रयोग किया है। सरल सारगर्भित शब्दों के प्रयोग से साधारणीकरण की प्रक्रिया को विस्तार मिला है, जिससे पात्र और पाठक का तादात्म्य सरलता से स्थापित हो जाता है। संवाद भी पात्रों के अनुकूल हैं। उनमें कोई बनावट नजर नहीं आती है। कुल मिला कर चन्द्रभान राही जी ने देश और समाज के लिये अभिशाप भिक्षावृति और उसके माफिया तंत्र का कुरूप आईना दिखाने की एक सफल ईमानदार प्रयास किया है, जो दिमाग को खरोचता है, विक्षोभ उत्पन्न करता है, मन तिलमिला उठता है कि यह भिक्षावृति का व्यवसाय कैसे पुलिस और नेताओं की सांठ गाँठ से माफिया तंत्र देश में चला रहा है? हम मूक् दर्शक बनकर सब कुछ देख रहे हैं। इस कलंक को हम मिटा नहीं पा रहे हैं। इन सब प्रश्नों के उत्तर भी इस उपन्यास में खोजने पर मिल जायेगा।

उपन्यास का आवरण आकर्षक और विषयानुकूल है। इन्द्रा प्रकाशन का मुद्रण भी सुन्दर है।

अन्त में इतना कहना चाहूँगी कि उपन्यास चौराहा अपने नवीन कलेवर, वस्तुविन्यास, रचनाशिल्प, प्रवाहमयी भाषा और सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण पठनीय है। देश और समाज के इतने बड़े कलंक और अभिशाप को हमारे सामने लाने के लिये श्री चन्द्रभान राही जी के इस साहासिक और ईमानदार कोशिश के लिये साधुवाद। साहित्यिक जगत में इसका हृदय से स्वागत होगा, इसी विश्वास के साथ।

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© डॉ. कृष्णलता सिंह

मोबाइल- 9971107736, ईमेल- klsingh@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ जन्मदिवस विशेष – सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

🙏 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्रद्धेय आचार्य भगवत दुबे जी को जन्म दिवस १८ अगस्त पर शत शत प्रणाम 🙏

आचार्य भगवत दुबे हिन्दी के एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। प्रचार प्रसार से दूर वे एक मौन साधक हैं और उन्होंने न केवल काव्य के कथ्य शिल्प को नये नये रुपों में संजाया संवारा है बल्कि महाकाव्य से लेकर मुक्तक -गजल तक को अपनी लेखनी का पाटल -स्पर्श प्रदान किया है।

सुविख्यात कवि श्री नीरज की इस प्रभावी प्रतिक्रिया का उल्लेख किया था सुप्रसिद्व कवि श्री चन्द्रसेन विराट ने राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले श्रद्धेय कवि आचार्य भगवत दुबे की काव्य कृति कांटे हुए किरीट में। कवि चन्द्रसेन विराट ने कवि नीरज की इस बात का उल्लेख करते हुए अपनी मंगल कामनाओं में अपनी जो बात इस काव्य पुस्तक में शामिल की वह भी आचार्य जी के काव्य को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए काफी है। वे कहते हैं कि यह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, कथाकार कितनी दिशाओं में एक साथ रचनारत रहा है, यह जानकर सुधी पाठक चकित रह जाता है। इसी कृति में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य सृजन से प्रभावित होकर एक और राष्ट्रीय कवि श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने भी लिखा है कि कवि में अपनी कल्पनाओं को रुपक में डालने की विशेष प्रवृत्ति। दिखाई पड़ती है। भाषा में प्रवाह है और अच्छे प्रयोग देखने को मिलते हैं। उन्होंने लिखा है कि अधिकांश कविताएं उपदेशात्मक और शोषण, अन्याय एवं सांप्रदायिक संकीर्णता के विरोध में है। तदर्थ इन रचनाओं का विशेष महत्व है।

आचार्य जी की इस कृति में अधिकांश कविताएं कृषकों और ग्रामीणों के दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित हैं। दरअसल आचार्य जी स्वयं भी गांव की सोंधी महक में पले बढ़े ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को न केवल अपने आस पास देखा है बल्कि उसे बड़ी गहराई से महसूस भी किया है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में यह बात बड़ी साफ तौर पर देखी जा सकती है। जैसे –

 0

न्याय मांगने, गांव हमारे, जब तहसील गये,

न्यायालय, खलिहान खेत, घर गहनें लील गये।

 0

 और कवि जब ऐसी विषम परिस्थितियों से पीड़ित जनमानस को, परेशान देखता है तो अपनी कविता में आवेश मिश्रित सीख भी देता है –

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अहंकार, अन्याय रौंदता फिरे जहां जन जीवन को

हे धिक्कार, अनीति सहन करने वाले, नर यौवन को

 O

आचार्य जी की कविताओं में शोषण के प्रति चिंता तो है लेकिन वे निराश नहीं है। उनका आशावादी दृष्टिकोण उनकी कविताओं में साफ साफ नजर आता है –

 O

संकल्पों की दीप्त प्रभा से सुखद सवेरा लाना है,

लेकर नयी उमंग, निराशाओं का तिमिर हटाना है।

 O

गांवों की गरिमामयी संस्कृति और पावन संस्कारों का महत्व भी आचार्य जी की कविताओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, एक कविता में वे लिखते हैं –

लक पांवड़े, जहां अतिथियों की

 खातिर बिछ जाते हैं,

नगरवासियों चलो तुम्हें,

 हम अपने गांव दिखाते हैं।

आचार्य जी को विरासत में मिले यही पावन संस्कार समाज के लिए प्रेरणा का विषय हो सकते हैं। जीवन में मातृ भक्ति का सिध्दांत उनके लिए सर्वोपरि था और इसकी झलक उनकी कविताओं में दिखाई देती है –

 O

टूटी कुटिया के भीतर जब शीश झुकाकर मैं जाता हूं,

मां के ममतालू चरणों में, मंदिर जैसा सुख पाता हूं।

 O

वर्ष 2001 में प्रकाशित राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक, और ग्रामीण परिवेश की 68 कविताओं के इस संग्रह में आचार्य जी की प्रेरक सोच वाली ऐसी काव्य रचनाएं शामिल हैं जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक हैं तभी तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और पाथेय के संस्थापक स्व. डा. राजकुमार सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि “कवि आचार्य भगवत दुबे संस्कारधानी जबलपुर के ऐसे स्वनामधन्य साहित्य साधक हैं जिनके विविध वर्णी कृतित्व की यश सुरभि विंध्य -सतपुडा के शैल‌ शिखरों को लांघ कर भारत व्यापिनी हो गयी है।”

आज हम सभी गौरवान्वित हैं कि श्रद्धेय सुमित्र जी की इस बात से पूरा साहित्यिक क्षेत्र सहमत है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ काव्य कृति – “सपनों के गांव में…” – कवि … श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

यशोवर्धन की पुस्तक चर्चा ☆

☆ काव्य कृति – “सपनों के गांव में…” – कवि … श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – सपनों के गांव में…

कवि  – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

प्रकाशक – पाथेय प्रकाशन 

☆ कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर ग्रामीण परिवेश की झलक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

भाई श्री संतोष नेमा संतोष का काव्य संग्रह “सपनों के गांव में ” इस समय मेरे सामने है इस संग्रह में संकलित सभी कविताओं की यह विशेषता है कि इन में कृत्रिमता नहीं है और ये सभी कविताएं बिना किसी लाग-लपेट के सीधी सरल भाषा में हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये कविताएं मेरे मन के आंगन में उतर गई हैं।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

श्री संतोष नेमा की यह खासियत है कि वे जितनी खूबी से ईश्वर के विभिन्न रूपों में आस्था अभिव्यक्त करते हैं उतने ही अधिकार से प्रकृति का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार उनकी सिद्ध हस्तता उनके लिखे उन गीतों में मिलती है जब वे मानवता और सद्भाव की बात करते हैं। उदाहरण के लिए उनकी लिखी कविताएं “सपनों के गांव में” तथा “मेरा गांव “ली जा सकती हैं। “सपनों के गांव” शीर्षक कविता में वे  कहते हैं –

नारी जहां पुजती हो, सच्चाई न बिकती हो,

 बने रहें सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

 इसी कविता में वे आगे कहते हैं –

 दिव्य स्वप्न आंखों में, झरते फूल बातों में,

 जीवन के रसमय सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।

 ऐसा लगता है कि कवि का विश्वास सद्भावना की स्थापना में है। यह उचित भी है। जब भी कोई साहित्यकार स्वस्थ समाज की चर्चा करता है, वह ऐसे समाज की कल्पना करता है जहां सद्भावना हो।

यह वास्तविकता भी है। कोई भी समाज बिना सद्भाव के नहीं रह सकता। उनकी लिखी कविता “मेरा गांव” में भी यही जरूरत सामने आती है, जब वे कहते हैं –

 सादा जीवन रीत निराली, सच्चाई की पीते प्याली

 रहता सदा यहां सद्भाव, सबसे सुन्दर मेरा गांव।

 भारत के गांवों की यह खासियत है। शहरों में व्याप्त कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर ग्रामीण परिवेश का परिचय श्री संतोष नेमा कराते हैं जब वे यह कहते हैं –

 छल प्रपंच पाखंड ने घेरा,

 लोभ मोह का सघन अंधेरा

 मन से तृष्णा दूर भगाएं

 अन्तर्मन में ज्योति जलायें।

 इस संग्रह में ऐसे विचारों की बहुलता है। कवि का जोर सदैव इस बात पर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति में सद्भाव जगाने की आवश्यकता है। वह मानवता का अग्रदूत बनता है। बिना सद्भाव और मानवता के समाज की कल्पना श्री संतोष नेमा नहीं करते हैं। यह इस संकलन की विशेषता है कि ग्राम्य परिवेश का सुन्दर वर्णन ईश्वर के विभिन्न रूपों और अवतारों के श्रद्धापूर्ण स्मरण के साथ मिलता है। हिन्दू आस्था इस संग्रह में जगह जगह मिलती है। भगवान राम, कृष्ण, दुर्गा की भक्ति की कविताएं हैं लेकिन कवि को अन्य संप्रदायों का ख्याल है। वह दूसरे मतों की चर्चा करते हुए इसके लिए राजनीति को दोषी ठहराता है।

यह सही भी है। हम राजनीति में इस तरह डूब गए हैं कि हमें अपने पास पड़ोस का ख्याल नहीं रहता।

कवि को हमारी इस कमजोरी का ध्यान है। वह कहते हैं-

 सियासत ने हमें बांटा कुछ कदर,

 हिन्दू हिन्द के, मुसलमान पाकिस्तानी हो गए।

यह इस संकलन की विशेषता है। कवि का यद्यपि अडिग हिन्दू देवी देवताओं पंर विश्वास है और इसे अभिव्यक्त करने में पीछे नहीं रहता लेकिन उसे अन्य संप्रदायों का भी ध्यान है। यह सर्व धर्म सद्भाव और हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप है। जिन मुसलमानों ने भारत में रहना स्वीकार किया और पाकिस्तान नहीं गए उन्हेंं पाकिस्तानी कहना ग़लत होगा।

इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भाषा और शैली। इसकी भाषा जहां सुबोध है, इसकी शैली बोधगम्य और अकृत्रिम है। कवि बिना किसी बहाने बाजी या लाग लपेट के अपनी भावना रखता है। शब्दाडंबर और अलंकारों का उपयोग कर कविता को बोझिल नहीं बनाया गया है। अमिधा गुणों की खूबसूरती इन कविताओं में है। ” एक कहानी हो गये ” कविता में जातिवाद पर प्रहार है। पर्यावरणीय वर्णन भी है। ग्रामीण परिवेश का परिचय भी मिलता है जैसा संकलन के नाम से प्रकट होता है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बाल कहानी-संग्रह – फूलों सी कहानियाँ – कहानीकार : सुश्री विनीता सिंह चौहान ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री विनीता सिंह चौहान जी द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह – “फूलों सी कहानियाँकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 214 ☆

☆ बाल कहानी-संग्रह – फूलों सी कहानियाँ – कहानीकार : सुश्री विनीता सिंह चौहान ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’

पुस्तक का नाम: फूलों सी कहानियाँ

कहानीकार का नाम: विनीता सिंह चौहान

प्रकाशक का पता: साहित्य झरोखा प्रकाशन

मोबाइल नंबर: 9119117355, 9461149202

ईमेल: sahityajharokha@gmail.com

समीक्षक – ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश8827985775

☆ समीक्षा- फूलों सी कहानियाँ: मानवीय मूल्यों की सुगंध बिखेरती बाल साहित्य की अनुपम कृति –  ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

फूलों सी कहानियाँविनीता सिंह चौहान द्वारा रचित बाल कहानी संग्रह है, जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में मानवीय मूल्यों और संस्कारों का बीजारोपण करना है। लेखिका ने अपने बचपन की मीठी यादों, किस्सों और कहानियों से प्रेरित होकर इस संग्रह का सृजन किया है, जिसे वह अपने कृतित्व से बचपन को पुनः जीने का प्रयास मानती हैं। पुस्तक में 32 कहानियाँ शामिल हैं, जो परोपकार सहित विभिन्न मानवीय मूल्यों पर केंद्रित हैं।

संग्रह की कहानियों में मानवीय मूल्यों पर गहन फोकस: यह पुस्तक मानवीय मूल्यों के विकास पर बल देती है, विशेषकर परोपकार को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। लेखिका मानती हैं कि बाल्यावस्था गीली मिट्टी के समान होती है, जिसमें मानवीय मूल्यों को रोपित करके एक खूबसूरत जीवन पाया जा सकता है। कहानियाँ दया, करुणा, कर्तव्यपालन, निष्ठा, सहिष्णुता, ईमानदारी जैसे सद्गुणों के विकास और लालच, क्रोध, ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों के दमन में सहायक हैं।

विविधतापूर्ण कथ्य शैली: संपादक गोपाल माहेश्वरी के अनुसार, इस संग्रह में विभिन्न प्रकार की कहानियाँ हैं – कोई विज्ञान कथा है, कोई लोककथा, किसी ने लघु कथा का बाना पहना है तो कोई बोधकथा है। कुछ कहानियाँ पंचतंत्र की कहानियों जैसी लगती हैं, तो कुछ सुनी-सुनाई सी भी प्रतीत होती हैं। यह विविधता बच्चों को बाँधे रखती है और उन्हें अलग-अलग शैलियों से परिचित कराती है।

सरल एवं बोधगम्य भाषा: बच्चों के लिए लिखी गई ये कहानियाँ सरल और सीधी भाषा में हैं, जिससे छोटे पाठक आसानी से विषय-वस्तु को समझ पाते हैं। इनमें प्रत्येक कहानी के अंत में एक स्पष्ट “कहानी की सीख” दी गई है, जो उसके नैतिक संदेश को उजागर करती है।

प्रेरक और व्यावहारिक शिक्षाएँ:

“माँ की सीख” और “सबक” जैसी कहानियाँ बच्चों को माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देती हैं।

“एक दोस्ती जो सिखा गई जिंदगी का सबक” और “सच्चे मित्र” दोस्ती के महत्व और मुसीबत में साथ निभाने की सीख देती हैं।

“सुबह का स्वप्न” और “बचपन और बारिश की वो नाव” जीवन में लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती हैं।

“परोपकार” और “उमा और जलपरी” जैसी कहानियाँ परोपकार, दया और ईर्ष्या से दूर रहने का संदेश देती हैं।

“ज्ञान की ताकत” और “गाँव की समझदार बेटी पूवी” विषम परिस्थितियों में भी योग्यता और ज्ञान से सफलता प्राप्त करने का हौसला देती हैं।

“लॉकडाउन और बेरोजगारी” और “गुब्बारेवाला” स्वदेशी बाजार को महत्व देने और मेहनत के महत्व को समझाती हैं।

“वायरस” और “बाल मेला एवं पौधारोपण” पर्यावरण संरक्षण और उसके प्रति जागरूकता का संदेश देती हैं।

“दुनिया का अंतिम दिन” और “पृथ्वी ग्रह का एलियन” अफवाहों से दूर रहकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर जोर देती हैं।

लेखिका का व्यक्तिगत जुड़ाव: लेखिका ने अपने दोनों बेटों को कहानियाँ सुनाकर उनमें गुणों और संस्कारों का विकास करने का प्रयास किया है, और वे स्वयं इन कहानियों के बीजरूप हैं। यह व्यक्तिगत जुड़ाव कहानियों में एक आत्मीयता प्रदान करता है।

‘फूलों सी कहानियाँ’ बच्चों के लिए एक अत्यंत उपयोगी संग्रह है क्योंकि यह बच्चों में नैतिक और मानवीय मूल्यों को विकसित करने का एक प्रभावी माध्यम है। कहानियों के माध्यम से दया, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा जैसे गुणों को बचपन से ही सिखाया जा सकता है।

यह बच्चों को समाज, पर्यावरण और व्यक्तिगत जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्रदान करती है, जैसे परिवार में सहयोग, स्वदेशी का महत्व, पर्यावरण जागरूकता और अफवाहों से बचना।

यह बच्चों में सकारात्मक सोच और आत्म-विश्वास को बढ़ावा देती है, उन्हें जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने और लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है。

संक्षेप में, ‘फूलों सी कहानियाँ’ बाल साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है जो न केवल बच्चों का मनोरंजन करती है बल्कि उन्हें बेहतर इंसान बनने के लिए आवश्यक मूल्यों और संस्कारों से भी परिचित कराती है। यह संग्रह निश्चित रूप से देश के नौनिहाल पाठकों और श्रोताओं द्वारा पसंद किया जाएगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/07/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 187 ☆ “एन.आर.आई. बेटा…” – लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ जी द्वारा लिखित  एन.आर.आई. बेटापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 187 ☆

☆ “एन.आर.आई. बेटा…” – लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – ‘एन.आर.आई. बेटा

लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’

☆ संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ की कहानियाँ – जीवन  संवेदनाएँ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ का कथा-संग्रह ‘एन.आर.आई. बेटा’ समकालीन हिन्दी कहानी की उस परंपरा में एक सजग संवेदनशील हस्तक्षेप है, जहाँ कथाकार न केवल जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करता है, बल्कि उन्हें मानवीय दृष्टिकोण से समझाने का भी प्रयास करता है। यह संग्रह मात्र इक्कीस कहानियों का एक संकलन नहीं, अपितु हमारे सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक मूल्यों की पुनर्परिभाषा है  कभी चुपचाप, कभी करुणाभरी आवाज़ में और कभी दृढ़ता से संजय जी कहानियों में अपने अनुभवों का लोक व्यापीकरण अत्यंत कुशलता से जन भाषा में सफलता पूर्वक करते हैं।

‘एन.आर.आई. बेटा’ की शीर्षक कहानी इस संग्रह की आत्मा है, और यही कारण है कि इसे संग्रह का नाम भी दिया गया है। यह कहानी एक भावनात्मक और बौद्धिक द्वंद्व को रेखांकित करती है । वैश्वीकरण के इस दौर में भारतीय मूल्यों और पश्चिमी जीवनशैली के बीच एक युवा की खींचतान, जो आज हर परिवार में देखने मिल रही है। लेखक ने न केवल एक पीढ़ी की पीड़ा को स्वर दिया है, बल्कि पूरे समाज के उस पक्षाघात पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है जो संवेदनाओं को परिस्थितियों से काटकर आंकता है। “मैं एक और एन.आर.आई. बेटा नहीं बनना चाहता”  यह संवाद केवल कथा का मोड़ नहीं, बल्कि एक समाजशास्त्रीय प्रतिवाद  है।

संग्रह की कहानियाँ विविध अनुभव-संसार से जन्मी हैं। ‘सीमेंट का सिपाही’ जैसे शीर्षक से ही संकेत मिल जाता है कि यह कहानी पुलिस वालों की ज़िंदगी की ओर इशारा करती है। कहानियों में  लेखकीय हस्तक्षेप कहीं भी अतिरंजित नहीं होता।

इसी प्रकार ‘मेरी सास’ एक स्त्री-केन्द्रित कथा है, जिसमें पारंपरिक रूप से प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली सास-बहू की जोड़ी में जो आत्मीयता दिखाई गई है, वह आधुनिक पारिवारिक संबंधों की एक नई समकालीन व्याख्या  है। यहाँ ‘स्त्री-विरोधी स्त्री’ की पुरानी धारणा को लेखक अस्वीकार करते है और इस प्रक्रिया में  सामाजिक गूढ़ताओं को सादगी से खंगालते है।

साहित्य, समाज की नैतिक चिंता का लेखकीय अस्त्र होता है।

कहानियाँ ‘बूढ़ी आँखें’, ‘पिता का साया’, ‘सफेद बाल’ या ‘पिता की टोपी’ जैसे शीर्षकों के साथ उम्र, विरासत और संबंधों की थकान एवं चेतना को एक साथ चित्रित करती हैं। यह कहानियाँ सिर्फ वृद्धों की नहीं, उनके अनुभवों की भी कहानियाँ हैं, जिनमें जीवन की प्रौढ़ता है, लेकिन भाषा में अनावश्यक दार्शनिकता नहीं है।

‘वट वृक्ष’ जैसे प्रतीकात्मक शीर्षक से लेखक ने जिस तरह पीढ़ियों की छांव, व्यापार और विरासत के द्वंद्व को बुना है, वह शिल्पगत दृष्टि से भी प्रशंसनीय है। यह कहानी बताती है कि भारतीय समाज में “संपन्नता” केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।

शैली और शिल्प में सहजता संजय आरजू की विशिष्टता है ।भाषा-संवेदनशील सधी हुई है है। वे संप्रेषण की क्लिष्टता से बचते हैं और कथ्य को स्वाभाविक प्रवाह में विकसित करते हैं। उनकी भाषा में एक आत्मीयता है,  पाठक को बाँधकर रखने वाली सरलता है। ‘स्पर्श’, ‘क्या कहूँ’, ‘व्रत का सामान’ जैसी कहानियाँ इस बात की साक्षी हैं कि लेखक किसी घटना से अधिक उसके भीतर की अनुभूति को पकड़ने में रुचि रखते हैं।

‘सहयात्री’ और ‘यूनिफॉर्म’ जैसी कहानियों में लेखक की सामाजिक दृष्टि और मानवीय समझ दोनों एक साथ काम करती हैं। चाहे वह  नौकरी की जद्दोजहद हो, या विद्यालयीन जीवन की मासूम यादें  लेखक हर विषय को संवेदना से छूते हैं।

संजय आरजू की यह पुस्तक समकालीन हिन्दी कथा-जगत में एक ऐसी आवाज़ है जो किसी शोर में खोती नहीं, बल्कि मौन में भी संवाद रचती है। उनकी कहानियाँ नारे नहीं लगातीं, पर पाठकों को सोचने पर विवश ज़रूर करती हैं।

हिन्दी कहानी की कसौटी पर यह संग्रह सफल है । यथार्थ का चित्रण, भाषा की आत्मीयता, चरित्रों की सजीवता और समाज की गहन दृष्टि,  इन सब बिंदुओं पर कहानियां खरी उतरती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ‘एन.आर.आई. बेटा’ एक ऐसा दर्पण है जिसमें पाठक खुद को, अपने संबंधों को और अपने समाज को नए सिरे से देखता है।

मेरी शुभ कामना संजय आरजू जी की कलम को है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “चंद्र विजय अभियान” – संकल्प संपादक : आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ समीक्षा – श्री हिमकर श्याम ☆

पुस्तक चर्चा ☆ “चंद्र विजय अभियान” – संकल्प संपादक :  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ समीक्षा – श्री हिमकर श्याम

कृति : चंद्र विजय अभियान (काव्य संकलन)

संकल्प संपादक : आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ 

प्रकाशन: समन्वय प्रकाशन अभियान

मूल्य: ११०० /-

पृष्ठ: ३०० 

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

☆ इसरो की ऐतिहासिक उपलब्धि को समर्पित काव्य संकलन ‘चंद्र विजय अभियान’ — श्री हिमकर श्याम ☆

चांद और साहित्य का गहरा संबंध रहा है। चांद को अक्सर प्रेम, रहस्य, और कल्पना के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। चांद का सौंदर्य हमेशा से ही कवियों, लेखकों और शायरों को लुभाता रहा है। कभी चांद मामा बन जाता है तो कभी चांद को महबूब की उपमा दे दी जाती है। चांद मनुष्य का आदिम सहयात्री है। हर किसी को चांद ने लुभाया है। अपनी तरफ आकर्षित किया है।

साहित्य ही नहीं भारतीय संस्कृति, धर्म, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। वैदिक, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, पुराण, रामायण, महाभारत, जैन एवं बौद्ध साहित्य की सामग्रियों से चन्द्रमा के देवत्व को स्थापित करने का सफल प्रयास किया गया है। धार्मिक जीवन में एवं विश्व की प्रायः सभी धार्मिक परम्पराओं में व्रत, पूजा, अनुष्ठान आदि में चंद्रमा की पूजा की पूजा प्रचलित रही है। विज्ञान कहता है कि चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। अरबों साल पहले एक बड़ा ग्रह पृथ्वी से टकराया था। इस टक्कर के फलस्वरूप चांद का जन्म हुआ। अपोलो -11 के अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रांग ने चांद पर पहला कदम रखा था।

चंद्रमा पर भारतीय मेधा की दस्तक विषमयकारी है। चांद पर पानी भारत की खोज है। भारत के लिए 23 अगस्त की तारीख महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। इसी दिन इसरो के चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रच दिया था। चंद्रयान मिशन की सफलता हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा करने वाली है। बहुभाषीय काव्य-संकलन ‘चन्द्र विजय अभियान’ इसरो की ऐतिहासिक उपलब्धि को समर्पित है।

विश्व कीर्तिमान रचनेवाले इस अनूठे संकलन का प्रकाशन हाल ही में ‘विश्ववाणी हिन्दी संस्थान द्वारा  किया गया है। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ इस पुस्तक के संकल्पक-सम्पादक हैं। पुस्तक पर की गई उनकी मेहनत का आभास इसे हाथ में लेते ही हो जाता है। 300 पृष्ठों के इस संकलन में 5 देशों, 51 भाषा-बोलियों में 213 रचनाकारों की काव्य रचनाएं संकलित हैं। इसमें महत्वपूर्ण संकलन में झारखण्ड के कई रचनाकारों की रचनाएं संकलित की गई हैं, जिनके नाम हैं- निर्मला कर्ण, नीता शेखर ‘विषिका, पुष्पा पांडे, मनीषा सहाय, सिम्मी नाथ और हिमकर श्याम (राँची), डॉ संगीता नाथ और प्रियदर्शनी पुष्पा (धनबाद), ई. ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र और वीणा कुमारी नंदिनी (जमशेदपुर)। गीता चौबे ‘गूँज’ (बेंगलुरु) भी झारखंड से हैं।

पुरोवाक् में आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने लिखा है कि ‘चन्द्र विजय अभियान’, भारत ही नहीं मानवता का महाअभियान है। आमुख डॉ साधना वर्मा का है और भूमिका लिखी है गीतिका श्रीव ने। संकलन में सबसे वरिष्ठ कवि 94 वर्षीय तथा सबसे कनिष्ठ कवि 12 वर्षीय हैं। संकलन में गीत, नवगीत, बाल गीत, कजरी गीत, पद, मुक्तक, गीतिका, मुक्तिका, पूर्णिका, गजल, हाइकु, माहिया, दोहे, सोरठे, कुण्डलिया, कहमुकरी आदि काव्य-विधाओं में अनुपम एवं पठनीय रचनाएं हैं।

बैक कवर पर चन्द्रयान पर यशवर्धन श्रीवास्तव, मयंक वर्मा, वर्तिका खरे, खंजन सिन्हा और अर्जिता सिन्हा द्वारा बनाई गई सुंदर तस्वीरें हैं। दो पृष्ठों पर चन्द्रयान की सफलता के नायक/नायिका इसरो के वैज्ञानिकओं एवं अभियन्ताओं के नाम और रंगीन छाया-चित्र हैं, जो उनके प्रति श्रद्धा भाव को दर्शाता है। समन्वय प्रकाशन, जबलपुर से छपी इस किताब का डिजाइन, पृष्ठ सज्जा, रंग रूप और छपाई आकर्षक है। 1100/- रुपये मूल्य की यह संग्रहणीय पुस्तक हर साहित्य प्रेमी के संग्रह की शोभा बढ़ाने योग्य है।

समीक्षा – आचार्य प्रताप

साभार – समन्वय प्रकाशन अभियान, जबलपुर, मध्यप्रदेश 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “समकाल की आवाज ” – कवि… श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधा प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री हरभगवान चावला जी द्वारा लिखित काव्य संग्रह  “समकाल की आवाजपर चर्चा।

“समकाल की आवाज ” – कवि… श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक चर्चा

समकाल की आवाज ( चयनित कवितायें)

कवि– श्री हरभगवान चावला (9354545440)

कीमत-175/- रुपये (पेपरबैक)

प्रकाशक–न्यू वर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली (8750688053)

☆ मानवीय संवेदना,प्रेम और विद्रोह की कविताएं – श्री जयपाल

इस हफ्ते हिंदी साहित्य के बहुचर्चित और प्रतिबद्ध कवि हरभगवान चावला की कविताओं से गुजरना हुआ । यह एक अलग तरह का एहसास था,एक आत्मीय अनुभूति थी। ये कविताएं ‘समकाल की आवाज़’- चयन के तहत ‘न्यू वर्ड पब्लिकेशन’- नई दिल्ली, के प्रयास से प्रकाश में आई हैं। इन कविताओं के चयन के संदर्भ में खुद प्रकाशक अफ्रीकी कवि कुमालो के हवाले से कहते हैं —

कवि हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है

कविताएं

जो आतताइयों के चेहरे पर

सीधा वार करती हों

और उनके गरूर को तोड़ती हों

 

कवि

इससे पहले कि यह दशक भी

अतीत में गर्क हो जाए

तुम जनता के बीच जाओ और

जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में

मदद करो

प्रकाशक की इस घोषणा में एक संवेदनशील साहित्यकार की तड़प दिखाई देती है । प्रकाशक समकालीन साहित्यिक सृजन से ऐसी कविताओं से पाठक को रूबरू कराना चाहते हैं जिनमे न केवल अपने समय की  धड़कन हो बल्कि एक दायित्व और  बौद्धिक ईमानदारी भी मौजूद हो , कवितायें जो अपने समय के गंभीर सवालों के द्वंद्व से गुजरी हों l यह द्वंद्वात्मकता और दृढ़ता समकाल  की कविताओं के चयन में दिखाई देती हैं।  कवि हरभगवान चावला स्वयं अपनी  कविता के बारे में कहते हैं–

‘हर तरह के शोषण का विरोध तथा मानव संवेदना की प्रतिष्ठा । प्रेम शायद मेरी कविता की रीढ़ है । कईं बार  तड़प उठती है कि सारी व्यवस्था को बदल दूँ ताकि कोई भूखा न हो । अनपढ़ न हो,शोषण का शिकार न हो। जाति या धर्म से इतर इंसान ,बस इंसान हो । इंसानी संवेदना से लबरेज । क्या कविता चीजों को बदल सकती है–? नहीं ,लेकिन कविता चीजों को देखने का नजरिया बदल देती है ।कविता को डूबकर पढ़ने के बाद आदमी ठीक वैसा नहीं रहता जैसा वह कविता पढ़ने के पहले होता है।’

इन कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार ऐसा ही एहसास  पाठक को भी होता है । ये कविताएं समाज का मार्मिक दस्तावेज  हैं ।

इस संग्रह की शुरुआत लोक जीवन की कविताओं से होती है । इन कविताओं में कवि के लोक-जीवन के प्रति गहरे अनुराग को अभिव्यक्ति  मिली है ।  लोकगीतों के तंज,ताने और उलाहने ,लोक जीवन की गंध तथा सादगी के साथ यहां आये हैं। इसके अतिरिक्त इन कविताओं में जल का संकट, पर्यावरण के प्रति व्यवस्था की लापरवाही, जल-जंगल जमीन के बारे में पूंजीवाद की निर्ममता, मजदूर और किसान की  बदहाली, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत ,आस्था-विश्वास, धर्म, संस्कृति, भाषा जाति, संप्रदाय, क्षेत्र आदि के नाम पर देश में गुंडागर्दी को सत्ता का समर्थन, संविधान और लोकतंत्र का दमन, लेखकों,पत्रकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की सरकार के प्रति चाटुकारिता ,वैश्विक दक्षिण-पंथी उभार, देश में फासीवाद का खतरनाक खेल, अंधविश्वास, पाखण्ड और अज्ञान का निर्लज्ज महिमामंडन आदि समसामयिक सामाजिक सरोकारों के मुद्दों को प्रतिबद्धता  और चुनौतीपूर्ण  स्वर के साथ उठाया गया है। इन ज्वलंत प्रश्नों को एक सशक्त आवाज देती हुई उनकी कुछ कविताओं की महत्वपूर्ण पंक्तियों की बानगी आप भी लिजिए–

चावल में

 गंगा के हरे भरे मैदानों का स्वाद था

 दाल में

 रेतीली मिट्टी की मिठास

 

 मेरी चुनरी उड़ गयी

 संभाल मेरी बिटिया

आकाश चढ़ी चुनरी

 जुल्म हुआ बिटिया !

 

तेरे गीतों में भी मैं ही रहूंगी बनी

कैसे जा पाऊंगी मैं समूची ससुराल

 

ऐसे न मुझको भेज री माई

दे दे मुझको दहेज री माई

अपने हाथ की मठरी देना

 यादों की एक गठरी देना

आंसू अपने सहेज री माई

 

आया सहेली मगसर री

बाबुल का तन थरथर री

कर्ज का दर्द सताए सखी री

बाबुल मरता जाए सखी री

उसका जीवन जंग सखी री

लड़ने का यही ढंग सखी री

 

पर दुष्यंत हैं

कि उन्हें न शकुंतलाएं याद हैं

न प्रेम- निशानियां

 

ये विधवाएं हैं

कुल कलंकिनी, पति भक्षिणी

अपने-अपने घरों से निष्कासित

गृहस्वामिनियां

 

पाप मुक्ति के लिए

कुंभ से ज्यादा अच्छा अवसर

और मंदिर की सीढ़ियों से बेहतर जगह

भला कौन सी हो सकती हैं ?

 

कुम्भ में छूटी औरतें बूढ़ी होती हैं

ये बूढ़ी औरतें अपने बेटों के सिरों पर

पाप की गठरी की तरह लदी होती हैं

 

 वर्तमान जिनके नियंत्रण में है वे जब चाहें

गढ़ लेते हैं चमचमाता मनोनुकूल अतीत

 

मैंने दिल्ली से एक सवाल पूछा

जवाब मेरे शहर से मिले बहुत सारे

 पत्थरों और गालियों की शक्ल में

 

भेड़ें अपनी मस्ती में

देशभक्ति के गीत गाएं

और भेड़ियों को

शांति से अपना काम करने दें

 

ईंधन की मानिंद भट्टियों में

झोंक दिए जाते हैं जिंदा इंसान

तुम्हारी कविता को गंध नहीं आती

कहां से लाते हो तुम

अपनी कविता की ज्ञानेन्द्रियां कवि..?

 

 कभी मिलो

जैसे धूप में जलते पौधे से

पानी मिलता है

 

एक दिन जरूर डरना छोड़ देंगे

डर के जंगल में फंसे लोग

 

बाज की आँखें सपने नहीं

शिकार देखती हैं

 

बोनों का ईश्वर भी बोना ही होता है

 

 ईश्वर मर गया मरना ही था उसे

उसके मर जाने के बाद भी उम्मीदें जिंदा रही

 

तुझे कहां कहां से बेदखल करूं

तूं कहां नहीं है मौजूद

 

न लिखना कि गांव में आने लगी हैं

साधु संतों की यात्राएं

ओ पिता !

कोई अच्छी खबर लिखना

 

कविता अगर उगती है

तो उगे जैसे घास उगती है

 

कविता अगर उतरती है

तो उतरे पेड़ पर जैसे पक्षी उतरता है

 

कविता लिपि से नहीं  होती

वह तो जीवन से संभव होती है

 

राजा होना बेशक ईश्वर होना नहीं है

पर इंसान होना राजा होने की अनिवार्य शर्त है

 

सूरज उन घरों में

कभी नहीं झांक पाता

महानायक

जिन घरों के चिराग़ बुझा देते हैं

 

भूखे हो

प्यासे हो

बीमार हो

 लाचार हो

जैसे भी हो गर्व करो

 

जूते जब एक ही नाप के बनने लगे

तो लोगों ने पैर कटवा कर नाप के अनुरूप कर लिए

 मुझे लगा पैर कटवाने से बेहतर है नंगे पांव चलना

 

जैसे जैसे बढ़ती है ग्रामीण स्त्रियों की उम्र इनकी गोद बड़ी होती जाती है

आंखें उदास

 

 ईश्वरीय किताबों में आग होती है

पानी नहीं होता

ईश्वरीय किताबें स्त्री विरोधी होती है

और शूद्र विरोधी भी

ईश्वरीय किताबों पर राजा गर्व करते हैं

 

 ईश्वरीय किताब का ईश्वर

जब किताब से निकल प्रजा में आता है

 तो आग्नेय अस्त्र में बदल जाता है

 

आजादी को हमने कभी निर्जन वन की घास या

पेड़ की तरह नहीं जिया

 

 मैं अपने घर में था

ठीक उसी वक्त जंगल में भी

जंगल के पेड़ मेरे घर की चीजों में थे जंगल के जानवर मेरे भीतर

 

जब तक हम पहुँचेंगे पंजाब

क्या तब तक भी बचा रहेगा

पंजाब के दरियाओं का पानी

छंद/अलंकार/बिम्ब/प्रतीक / वक्रोक्तियां/ शब्द/अर्थ /वाक्य /पद / मुहावरे/ लोकोक्तियां/कला/संगीत  आदि  सभी प्रकार के आवरणों को हटाकर ये कवितायें पाठक से एकांत में आकर मिलती हैं। दरअसल कविता मे जीवन होता है और जीवन में कविता । स्वयं कवि मानते हैं कि कविता लिपि में नहीं, जीवन से सम्भव होती है । इन कविताओं को कविता के व्याकरण से बाहर आकर ही समझा जा सकता है। ये कवितायें पाठक को  आत्मविश्वासी, आत्मीय,  अन्याय के प्रति विद्रोही, सामाजिक परिवर्तन के प्रति क्रांतिकारी ,इंसानियत के प्रति समर्पित, ईमानदार, संवेदनशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस एक बेहतर इंसान बनाती हैं ।  इन कविताओं को जीवन में उतारा जा सकता है,जिया जा सकता है और एक बेहतर समाज की उम्मीद को जिंदा रखा जा सकता है। यही इन कविताओं की सार्थकता है।

बेहतरीन कविता-संग्रह के लिए कवि हरभगवान चावला को बहुत बहुत-बहुत बधाई!!

समीक्षा-… श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 186 ☆ “शब्दिका…” – रचनाकार : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  शब्दिकापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 186 ☆

☆ “शब्दिका…” – रचनाकार : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक : शब्दिका

रचनाकार : डॉ. संजीव कुमार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ “शब्दिका”: शब्दों की शास्त्रीय यात्रा – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी के काव्यशास्त्र के अनुसार कविता की मूल्यवत्ता ध्वनि, रस, अलंकार, वक्रोक्ति, औचित्य आदि तत्वों में निहित होती है, जबकि पश्चिमी आलोचना उसे भाव, संरचना, प्रतीकात्मकता, भाषा की प्रामाणिकता से आँकती है। डॉ. संजीव की रचनाएँ इन दोनों परिप्रेक्ष्यों के संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताएं न तो मात्र भाववाचक हैं और न ही बौद्धिक चातुर्य का प्रदर्शन, बल्कि अनुभव, संवेदना और सामाजिक बोध का बहुआयामी संगम हैं। काव्य और कविता के मूलभूत तत्व संग्रह की सभी कविताओं में समान रूप से मुखरित दिखते हैं।

“हम शब्द हैं”, यह कविता शब्दों की अस्मिता की खोज है। शब्द न केवल संप्रेषण के माध्यम हैं, बल्कि वे स्वयं भी अर्थ की तलाश में भटकते हैं।

“हम शब्द हैं

जो खोज रहे हैं

अपना भविष्य…”

यहाँ संजीव कुमार शब्द का मानवीकरण (personification) करते है। यह प्रतीकात्मक कविता है, जो साहित्यिक सृजन-प्रक्रिया को शब्दों की दृष्टि से देखने का प्रयास करती है। कविता आत्मचिंतनात्मक है तथा आत्मकथात्मक प्रतीकों में ढली हुई है। विषयवस्तु (Content & Themes) की दृष्टि से रचनाएं उद्देश्य पूर्ण हैं।

“खुशनुमा दुनिया” यह कविता इंद्रिय बोधात्मक सौंदर्य की अभिव्यक्ति है। यहाँ गंध और अनुभूति का सामंजस्य शब्दों में मिलता है।

 “सोचने की

कोई सीमा नहीं होती…”

यह कविता ध्वनि, रस और अनुभूति का सुंदर समन्वय है। ‘खुशनुमा’ नवोन्मेष शब्द-सृजन की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रयोग है।

“घर की गली” यह कविता स्थान विशेष के माध्यम से सामाजिक विषमताओं और घटनाओं को बयां करती है।

यह प्रसंगबद्ध यथार्थवाद (Contextual Realism) है। कवि बालक, चोर, महिला, और गली जैसे प्रतीकों का सहारा लेकर नग्न यथार्थ को चित्रित किया गया है।

“अनुशासन” यह कविता शिक्षा-दर्शन और सामाजिक मूल्य-परिवर्तन की पड़ताल करती है।

 “बच्चों की ज़िन्दगी

कितनी अच्छी होती है

उन्हें नहीं पता

कि अनुशासन क्या है…”

कविता में विरोधाभास (Paradox) का सौंदर्य है, अनुशासन, जो सकारात्मक मूल्य है, उसे बच्चों की मासूम स्वतंत्रता के सापेक्ष रखकर गंभीर विचार प्रस्तुत किया गया है।

शिल्प (Form & Craft) की चर्चा की जाए तो डॉ. संजीव की कविता का शिल्प सधा हुआ और नियंत्रित है। वे छंदमुक्त काव्य के माध्यम से आधुनिकता को आत्मसात करते हैं, परंतु उनके शिल्प में काव्यात्मक संतुलन की झलक बनी रहती है।

पंक्तियाँ छोटी हैं, किंतु उनमें अर्थ की गहराई है।

ध्वनि-सौंदर्य है, प्रतीक और बिंब की शक्ति से कविता प्रभावशाली बनती है।

संवेदना और विषय की संगति स्पष्ट है। कोई पंक्ति अनावश्यक नहीं लगती।

कविताओं की भाषा शैली (Language and Style) में संजीव कुमार का अध्ययन तथा अनुभव एक साथ परिलक्षित होता है। वे कविता में अपनी भाषा सरल, व्यावहारिक, और संवादात्मक बनाए रखते है , यही उनकी विशेषता है।

कविता में कही कृत्रिमता नहीं होती, बल्कि वे पूरी प्रामाणिकता से लिखते है।

कवि अपने पाठक से प्रत्यक्ष वार्तालाप करता है, जिससे संप्रेषण में आत्मीयता बनती है।

अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य (Aesthetic Devices) की विवेचना भी आवश्यक है।

प्रमुख अलंकारों का प्रयोग दक्षता पूर्वक मिलता है। “हम शब्द हैं” पूरे शीर्षक में ही रूपक है।

“शब्द खोज रहे हैं भविष्य” में शब्दों को मानवीय व्यवहार देकर उनका सक्षम मानवीकरण किया गया है, किताब का शीर्षक ही शब्दिका रखा गया है।

“अनुशासन से आज़ादी” का मूल्यांकन करें तो विरोधाभास की ताकत का उपयोग आकर्षक है।

“घर की गली” में दृश्यात्मक चित्रण परिलक्षित होता है।

अलंकारों की योजना संयमित है। जो प्रभाव छोड़ती है। कविताओं में रस और संवेदना का स्तर ( Emotional Appeal) कवि की लेखकीय क्षमता

बताता है। करुण रस ‘घर की गली’ में नारी की पीड़ा, शांत रस ‘खुशनुमा दुनिया’ में जीवन की कोमल अनुभूति। श्रृंगार और वात्सल्य रस ‘अनुशासन’ में बालक के प्रति सहज प्रेम के भाव दृष्टि गोचर होते हैं, जो पाठक को काव्य गत आनंद प्रदान करते हैं।

रसनिष्पत्ति के लिए कवि भाव को लय से अधिक महत्वपूर्ण मानता है। यह आधुनिक काव्य की प्रवृत्ति है।

विषय वैविध्य  उच्च काव्य-संवेदना, भाषा शैली, स्पष्ट, सहज प्रतीकात्मकता, प्रभावशाली प्रेरक, स्थायी प्रभाव अंकित करने वाली काव्यशास्त्रीय कसौटी पर संतुलित एवं सुसंगत रचनाएं काव्य संग्रह शाब्दिका को संग्रहणीय बनाती हैं।

“शब्दिका” समकालीन हिंदी कविता का महत्वपूर्ण संग्रह है जिसमें काव्य की संज्ञा, सजगता और संस्कार तीनों समाहित हैं। यह संग्रह न तो यांत्रिक आधुनिकता की शिकार है, न ही परंपरागत बोझ से किसी भी तरह दबा हुआ है। इसमें सर्जनात्मक आत्मा की उपस्थिति है, जो न केवल शब्दों के माध्यम से अर्थ रचती है, बल्कि पाठक के अंतर्मन में अनुभूति की मन प्रफुल्लित करती लहरें उत्पन्न करती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “यादों का बक्सा…” – लेखक… श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

यशोवर्धन की पुस्तक चर्चा ☆

☆ “यादों का बक्सा…” – लेखक… श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – यादों का बक्सा

लेखक – श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज

प्रकाशक – पाथेय प्रकाशन 

☆ यादों का बक्सा – माडल स्कूल की गौरवगाथा का ऐतिहासिक दस्तावेज श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज का–श्री यशोवर्धन पाठक ☆

मध्यप्रदेश की संस्कारधानी में स्थित शासकीय माडल स्कूल का एक गौरवशाली इतिहास रहा है और अगर आप अपने मन में इस अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त लब्ध- प्रतिष्ठ शिक्षा संस्थान के स्वर्णिम काल की मनोहर झांकी से रूबरू होने की उत्कट अभिलाषा रखते हैं तो आपको मध्यप्रदेश सरकार में अपर कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज की हाल में ही प्रकाशित किताब यादों का बक्सा का आद्योपांत पारायण करना चाहिए। श्री आलोक श्रीवास्तव माडल स्कूल के भूतपूर्व छात्र हैं और हम दोनों ने एक साथ माडल स्कूल से हायर सेकंडरी स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की थी। श्री श्रीवास्तव की यह कृति दर असल माडल स्कूल का ऐसा यश अर्चन ग्रंथ है जो शिक्षा जगत की हर लायब्रेरी का अनिवार्य हिस्सा बनने में समर्थ है। आलोक जी ने विगत दिनों अपना यह बहुमूल्य ग्रंथ मुझे भेंट किया था जिसे पढ़कर मेरे मानस पटल पर अंकित अपने छात्र जीवन की मधुर स्मृतियां जीवंत हो उठीं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उनका यह ग्रंथ एक ऐसा संग्रहणीय दस्तावेज है जिसे माडल स्कूल के हर छात्र को अपने पास भली-भांति सहेजकर रखना चाहिए। ‘यादों का बक्सा’ को खूबसूरत बनाने के लिए श्री श्रीवास्तव ने जो कठिन साधना की है उसके लिए वे असीम प्रशंसा और साधुवाद के हकदार हैं।

भाई आलोक श्रीवास्तव ने अपने इस बेशकीमती ग्रंथ में माडल स्कूल की स्थापना से लेकर अब तक की सारी दुर्लभ जानकारी प्रस्तुत करने की ईमानदार कोशिश की है और अपनी इस कोशिश में वे पूर्णतः सफल हुए हैं। इस अर्थ में इसे अगर एक बहुमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश विदेश में माडल स्कूल का नाम रोशन करने वाले अनेक भूतपूर्व छात्रों के संस्मरणात्मक लेख इस ग्रंथ में प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं जो माडल स्कूल के सभी स्वनामधन्य भूतपूर्व प्राचार्यों सहित समस्त गुरुजनों के श्रद्धापूर्वक यश अर्चन की भावना से प्रेरित हैं। ‘यादों का बक्सा ‘ में प्रमुखता से प्रकाशित अपने लेख में शाला के भूतपूर्व छात्र और मप्र शासन के जनसंपर्क विभाग में अपर संचालक के पद से सेवानिवृत्त श्री हर्षवर्धन पाठक कहते हैं कि “जिन शासकीय शिक्षा संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करना अथवा शिक्षण कार्य करना सम्मान और प्रतिष्ठा की बात समझी जाती थी उनमें माडल हाई स्कूल का नाम अग्रणी पंक्ति में था। इस विश्वास को कीर्ति तथा उपलब्धियों के शिखर तक पहुंचाने वाले मनस्वी शिक्षाविदों में स्वर्गीय शिव प्रसाद निगम प्रमुख थे। ” श्री पाठक के अनुसार स्वर्गीय श्री निगम ने लगभग डेढ़ दशक तक इस प्रतिष्ठित विद्यालय की कमान संभाली और वह समय इस शिक्षण संस्थान का ‘स्वर्णकाल’ कहा जा सकता है। मध्यप्रदेश शासन के लोक शिक्षण विभाग के संचालक पद से सेवानिवृत्त श्री श्यामानुज प्रसाद वर्मा अपने संस्मरणात्मक लेख में माडल हाई स्कूल की गौरवगाथा का सजीव चित्रण करते हुए कहते हैं ” मेरे जीवन में जो भी सफलता प्राप्त हुई है उसमें माडल स्कूल का बड़ा योगदान है। जब कभी कालेज में शिक्षक मेरी किसी सफलता पर प्रश्न पूछते थे कि किस स्कूल से आए हो तो मैं सगर्व उत्तर देता था कि जबलपुर के माडल हाई स्कूल से। ” इसमें दो राय नहीं हो सकती कि माडल हाई स्कूल ने अपने हजारों भूतपूर्व छात्रों को देश विदेश में गर्व के साथ यह कहने का सौभाग्य प्रदान किया है कि उन्होंने जबलपुर के माडल हाई स्कूल से विद्यालयीन शिक्षा प्राप्त की है।

”यादों का बक्सा ” का आद्योपांत पारायण करने के पश्चात् ही आप यह जान पायेंगे कि 1904 में सीमित संसाधनों के साथ जिस माडल स्कूल की नींव रखी गई थी वह अपनी प्रगति यात्रा में कितने महत्वपूर्ण पड़ाव तय करते हुए कालांतर में देश के सुप्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों की अग्रणी पंक्ति में विशिष्ट स्थान अर्जित करने का हकदार बना। ” यादों का बक्सा” में प्रकाशित, माडल हाई स्कूल के संस्थापक पं. लज्जा शंकर झा का हस्तलिखित पत्र माडल स्कूल की स्थापना से लेकर स्वर्गीय श्री शिव प्रसाद निगम के प्राचार्य काल तक की प्रगति यात्रा का प्रामाणिक दस्तावेज है। निःसंदेह इस पत्र ने ” यादों का बक्सा ” की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए हैं और सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार एवं गोविंद राम सेक्सरिया अर्थ वाणिज्य महाविद्यालय जबलपुर के पूर्व प्राचार्य डॉ कुन्दन सिंह परिहार ने इस अनमोल ग्रंथ के प्रकाशन पर हर्ष व्यक्त करते हुए अपनी सम्मति में लिखा है ” मुझे खुशी है कि संस्था के पूर्व छात्र श्री आलोक श्रीवास्तव ने शाला के प्रति अपने ऋण के शोधन के लिए यह पुस्तक लिखने का निर्णय लिया। ” मैं उनके कथन से पूर्णतः सहमत हूं परन्त मैं यह भी मानता हूं कि माडल स्कूल के ऋण शोधन की भावना से किया गया बड़े से बड़ा कार्य भी भूतपूर्व छात्रों को माडल स्कूल के ऋण से उऋण नहीं कर सकता। जैसा कि डॉ परिहार कहते हैं कि इस संस्था के प्रति कृतज्ञता महसूस करना उसके पूर्व छात्रों के लिए स्वाभाविक है। सही अर्थों में ‘ यादों का बक्सा ‘ कृतज्ञता ज्ञापन का ही एक विनम्र प्रयास है जिसके लिए मैं एक बार पुनः श्री आलोक श्रीवास्तव को साधुवाद देना चाहता हूं। ” पाथेय प्रकाशन ” द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ शिक्षा जगत के लिए अनमोल उपहार सिद्ध होगा।

 ………………

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 185 ☆ “माधवी (खंड काव्य)…” – कवी – डा संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है कवी – डा संजीव कुमार  जी द्वारा लिखित  माधवी (खंड काव्य)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 185 ☆

“माधवी (खंड काव्य)…” – कवी – डा संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – माधवी (खंड काव्य)

कवी – डा संजीव कुमार

प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

 

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

महाभारत के माधवी-गालव प्रसंग पर लिखित डा संजीव कुमार के खंड काव्य माधवी की चर्चा मैं तीन कोणों से करना चाहता हूं। विज्ञान, वर्तमान स्त्री विमर्श के संदर्भ, और तीसरा मात्र महाभारत के कथा रूप में।

महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णित “माधवी-गालव प्रसंग” विलक्षण गाथा है, जिसमें स्त्री के आत्मबलिदान, ब्रह्मतेज और पुरुष अहंकार के टकराव का चित्रण है। यह प्रसंग गालव ऋषि और ययाति की पुत्री माधवी के माध्यम से समाज की सत्ता-संरचना, गुरु-शिष्य परंपरा, और स्त्री की मर्यादा पर एक दार्शनिक विमर्श प्रस्तुत करता है।

गालव ऋषि, अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु-दक्षिणा स्वरूप “श्वेत अश्व, जिनके एक कान पर श्याम चिह्न हो, आठ सौ अश्व” ऐसे ही देना चाहते थे।

 “अष्टशतानि मे देहि गच्छ गालव माम् चिरम्॥”

(महाभारत, उद्योग पर्व)

इस असंभव कार्य की पूर्ति हेतु जब गालव असमर्थ हुए, तब ययाति पुत्री माधवी ने आगे बढ़कर अपने अद्वितीय वरदान कुंवारीत्व को बार-बार पुनः प्राप्त करने की क्षमता का उपयोग करने की अनुमति दी।

यह तत्कालीन स्त्री स्वायत्तता का अनूठा उदाहरण है। माधवी तीन राजाओं हंस, दिवोदास और उशीनर से विवाह कर, प्रत्येक को एक वीर पुत्र प्रदान करती है। बाद में वह स्वयं पुनः ब्रह्मचर्य के पथ पर वन लौट जाती है।

 “प्रसुःत्यन्ते प्रसुत्रन्ते कन्यैव त्वं भविष्यसि॥”

(तू पुत्र जनने के पश्चात फिर से कन्या हो जाएगी)

इस प्रकार माधवी का चरित्र समर्पण और मौन प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता है। वह किसी की दासी नहीं, वरन् एक निर्णायक है, जिसने राष्ट्रों को वारिस दिए और फिर वन गमन को चुना। गालव का तप अंततः माधवी के त्याग के सहारे सफल होता है।

किंतु माधवी की व्यथा, उसका मौन, और उसका वनगमन एक प्रश्नचिन्ह बना कर पाठकों के अंतर्मन को झकझोर देता है।

 “वैरम् व्रीवति वनम् धर्म बृह्मचर्येण संवृतम् ॥”

(उसने संसार त्याग वन को वरण किया, धर्म और ब्रह्मचर्य से युक्त होकर)

यह प्रसंग नारी की शक्ति और संवेदना का समन्वय है। माधवी ‘द्रौपदी’ की भांति प्रतिरोध नहीं करती, परंतु गांधारी की तरह उसका मौन ही युगों तक गुंजायमान है। यह कथा केवल स्त्री-पुरुष के संबंधों का आख्यान नहीं, बल्कि एक समाजशास्त्रीय और नैतिक विमर्श भी है जहाँ त्याग सबसे बड़ा धर्म बनता है और स्त्री, इतिहास की गूढ़ संचालक।

माधवी-गालव प्रसंग महाभारत के उन अध्यायों में से है जहाँ वैदिक ऋचाएँ, समाज का सत्य, और स्त्री का आत्म-बलिदान एक साथ गुंथे हुए हैं।

माधवी का प्रसंग आज के स्त्री विमर्श में एक गूढ़ और मार्मिक प्रतीक के रूप में उभरता है। वह महाभारत की एक ऐसी स्त्री है जो अपने निर्णय स्वयं लेती है, भले ही वे पराकाष्ठा के स्तर पर त्यागमय हों। माधवी अपने वरदान का उपयोग गालव की सहायता हेतु करती है। उसका यह आत्म उत्सर्ग उसे ‘वस्तु’ नहीं, ‘कर्ता’ बनाता है।

वर्तमान स्त्री विमर्श में जब “एजेंसी”, “कंसेंट”, “बॉडी ऑटोनॉमी” तथा ” सेरोगेसी” जैसे विचार अति प्रबल हैं, जब लोकाचार बार बार तार तार हो रहे हैं, जब नव विवाहिताएं पति की हत्या करवा रही हैं, जब वासना पक्ष इतना प्रबल होता जा रहा है कि विवाहिता देशों की सीमाएं लांघकर ऑनलाइन प्रेमियों के पास भाग रही हैं, जब मर्यादा खंड कर सास दामाद के साथ भागने वाले कांड कर रही हैं तब माधवी की कथा यह प्रश्न उठाती है, कि क्या त्याग भी सशक्तिकरण हो सकता है? माधवी न तो विद्रोह करती है, न ही किसी मंच से भाषण देती है, परंतु उसका मौन, उसका निर्णय, उसकी तपस्या एक अदृश्य प्रतिरोध है।

आज की स्त्री अपने निर्णयों में स्वतंत्र होना चाहती है, चाहे वह करियर हो या मातृत्व। माधवी उस स्वतंत्रता की आदिम अभिव्यक्ति है। वह चार राजाओं से विवाह कर, पुत्र उत्पन्न कर, स्वयं पुनः ब्रह्मचर्य धारण करती है, यह उसकी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता का प्रतीक है।

माधवी की गाथा कहती है कि स्त्री केवल करुणा नहीं, चेतना है। वह केवल पात्र नहीं, परिप्रेक्ष्य है।

डा संजीव कुमार ने इस परिप्रेक्ष्य को पुनर्जागृत किया है।

वे लिखते हैं

“माधवी दुखी थी

वह नहीं सोच पा रही थी

कि अपने जीवन को सफल समझे या असफल

यह तो जैसे

किराये की कोख बेचनेवाली बन गई थी वह

दो सौ घोड़ों के प्रतिकर पर।

 

मातृत्व किसी स्त्री का नया जीवन होता है

एक तो वह नौ महीने का गर्भधारण और असहनीय प्रसव पीड़ा से अपने तन का टुकड़ा संतान के रूप में जन्म देगी,

और फिर जुड़ जाता है उसका तन-मन उसका अस्तित्व अपनी संतान के लिए वह बारंबार उसे छाती से लगाती है उसे चूमती और अपना दूध पिलाती है।

माधवी दूध पिला रही है अपने नवजात

को

पर उसे छोड़कर जाना होगा यह संतान भी।

कवि की कल्पनाशीलता उनकी स्वयं की साहित्यिक स्वतंत्रता है।

हो सकता है, यदि मैं माधवी गालव प्रसंग पर लिखता तो शायद मैं माधवी के भीतर छुपी उस माँ को लक्ष्य कर लिखता जो बारम्बार अपनी कोख में संतान को नौ माह पालने के बाद भी लालन पालन के मातृत्व सुख से वंचित कर दी जाती है। गालव बार बार उसका दूध आंचल में ही सूखने को विवश कर उसे क्रमशः नये नये राजा की अंकशायनी बनने पर मजबूर करता रहा।

मैं भोपाल में मीनाल रेजीडेंसी में रहता हूं, सुबह घूमने सड़क के उस पार जाता हूं। वहाँ हाउसिंग बोर्ड ने जो कालोनी विकसित की है, उसका नामकरण अयोध्या किया गया है, एक सरोवर है जिसे सरयू नाम दिया गया है। हनुमान मंदिर भी बना हुआ है, कालोनी के स्वागत द्वार में भव्य धनुष बना है। मैं परिहास में कहा करता हूं कि हजारों वर्षों के कालांतर में कभी इतिहासज्ञ वास्तविक अयोध्या को लेकर संशय न उत्पन्न कर देँ।

दुनियां में अनेक स्थानो पर जहां भारतीय बहुत पहले बस गये हैं जैसे कंबोडिया, फिजी आदि वहां राम को लेकर कुछ न कुछ साहित्य विस्तारित हुआ है, कुछ स्थापत्य, नृत्य, लोक रचनाएं आदि देखने सुनने मिलती हैं और समय समय पर तदनुरूप चर्चायें विद्वान अपने शोध में करते रहते हैं। इसी भांति पढ़ने, सुनने से जो भ्रम निर्मित होते हैं उसका एक रोचक उदाहरण बच्चों की एक बहस में मिलता है। एक साधु कहीं से गुजर रहे थे, उन्हें बच्चों की बहस सुनाई दी। कोई बच्चा कह रहा था मैं हाथी खाउंगा, तो कोई ऊंट खाने की जिद कर रहा था, साधु का कौतुहल जागा कि आखिर यह माजरा क्या है, यह तो शुद्ध सनातनी मोहल्ला है। उन्होंने दरवाजे पर थाप दी, भीतर जाने पर वे अपनी सोच पर हंसने लगे दरअसल बच्चे होली के बाद शक्कर के जानवरों को लेकर लड़ रहे थे।

किसी महाकाव्य के अंश को नए स्वरूप में समग्र से काटकर देखने की सीमा होती है, जिससे ऐसे भ्रम बनते हैं, यह खतरा विद्वान साहित्यिक कृतियों में उठाते रहते हैं। यह सब मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि डॉ संजीव कुमार ने खण्ड काव्य माधवी को रचकर यह जोखिम उठाया है।

इससे पहले इसी प्रसंग पर कर्म भूमि से तपोवन तक उपन्यास भी मैने पढ़ा था जिसकी लेखिका संतोष श्रीवास्तव जी हैं।

दुनियां में विभिन्न संस्कृतियों में भौतिक साक्ष्य और समानांतर सापेक्ष साहित्य के दर्शन होते हैं। भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों से कहीं अधिक प्राचीन है। रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के दो अद्भुत महा ग्रंथ हैं। इन महान ग्रंथों में धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक, आध्यात्मिक और वैचारिक ज्ञान की अनमोल थाथी है। महाभारत जाने कितनी कथायें उपकथायें ढ़ेरों पात्रों के माध्यम से न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या के गुह्यतम रहस्यों को संजोये हुये है। परंपरागत रूप से, महाभारत की रचना का श्रेय वेदव्यास को दिया जाता है। धारणा है कि महाभारत महाकाव्य से संबंधित मूल घटनाएँ संभवतः 9 वीं और 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच की हैं। महाभारत की रचना के बाद से ही अनेकानेक विद्वान सतत उसकी कथाओ का विशद अध्ययन, अनुसंधान, दार्शनिक विवेचनायें करते रहे हैं। वर्तमान में अनेकानेक कथावाचक देश विदेश में पुराणो, भागवत, रामकथा, महाभारत की कथाओ के अंश सुनाकर समाज में भक्ति का वातावरण बनाते दिखते हैं। विश्वविद्यालयों में महाभारत के कथानकों की विवेचनायें कर अनेक शोधार्थी निरंतर डाक्टरेट की उपाधियां प्राप्त करते हैं। प्रदर्शन के विभिन्न माध्यमो में ढ़ेरों फिल्में, टी वी धारावाहिक, चित्रकला, साहित्य में महाभारत के कथानकों को समय समय पर विद्वजन अपनी समझ और बदलते सामाजिक परिवेश के अनुरूप अभिव्यक्त करते रहे हैं।

न केवल हिन्दी में वरन विभिन्न भाषाओ के साहित्य पर महाभारत के चरित्रों और कथानको का व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। महाभारत कालजयी महाकाव्य है। इसके कथानकों को जितनी बार जितने तरीके से देखा जाता है, कुछ नया निकलता है। हर समय, हर समाज अपना महाभारत रचता है और उसमें अपने अर्थ भरते हुए स्वयं को खोजता है। डा संजीव कुमार ने भी महाभारत पढ़ी, समझी, उसके ऐसे अनेक कथानक चुने और उन्हें वर्तमान से जोड़ते हुए किताबों पर किताबें रच डालीं। वे बधाई के सुपात्र हैं।

महाभारत पर अवलंबित हिन्दी साहित्य की रचनायें देखें तो डॉ॰ नरेन्द्र कोहली का प्रसिद्ध महाकाव्यात्मक उपन्यास महासमर, धर्मवीर भारती का अंधा युग, आधे-अधूरे, संशय की रात, सीढ़ियों पर धूप, माधवी (नाटक), शकुंतला (राजा रवि वर्मा), कीचकवधम, युगान्त, आदि जाने कितनी ही यादगार पुस्तकें साहित्य की धरोहर बन गयी हैं।

महाभारत से छोटे छोटे कथानक लेकर अनेकानेक रचनायें हुईं हैं जिनमें रचनाकार ने अपनी सोच से कल्पना की उड़ान भी भरी है। इससे निश्चित ही साहित्य विस्तारित हुआ है। किन्तु इस स्वच्छंद कल्पना के कुछ खतरे भी होते हैं।

उदाहरण स्वरूप रघुवंश के एक श्लोक की विवेचना के अनुसार माहिष्मती में इंदुमती प्रसंग में कवि कुल शिरोमणी कालिदास ने वर्णन किया है कि नर्मदा, करधनी की तरह माहिष्मती से लिपटी हुई हैं। अब नर्मदा के प्रवाह के भूगोल की यह स्थिति मण्डला में भी है और महेश्वर में भी है। दोनो ही शहर के विद्वान स्वयं को प्राचीन माहिष्मती सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। साहित्य के विवेचन विवाद में वास्तविकता पर भ्रम पल रहा है।

इस खंड काव्य का सारांश भूमिका में कथा सार के रूप में सुलभ है। महाभारत के उद्योग पर्व के अनुसार राजा ययाति जब अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाकर वानप्रस्थ ग्रहण कर चुके होते हैं तभी गालव उनसे काले कान वाले ८०० सफेद घोड़ों का दान मांगने आता है। ययाति जिनका सारा चरित्र ही विवादस्पद रहा है, वे अपने पुत्र से उसका यौवन ले सकते हैं, अपनी पुत्री माधवी के अक्षत यौवन का उपयोग कर सकते है। वे गालव को ऐसे विशिष्ट अश्व तो नहीं दे सकते थे, क्योंकि वे राजपाट पुरु दे चुके थे। अपनी दानी छबि बचाने के लिये वे गालव को अपनी अक्षत यौवन का वरदान प्राप्त पुत्री माधवी को ही देते हैं, और गालव को अश्व प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं कि माधवी को अलग अलग राजाओ के संतानो की माँ बनने के एवज में गालव राजाओ से अश्व प्राप्त कर ले।

यह सारा प्रसंग ही आज के सामाजिक मापदण्डों पर हास्यास्पद, विवादास्पद और आपत्तिजनक तथा अविश्वसनीय लगता है। मुझे तो लगता है जैसे हमारे कालेज के दिनों में यदि ड्राइंग में मैने कोई सर्कल बनाया और किसी ने उसकी नकल की, फिर किसी और ने नकल की, नकल की तो होते होते सर्कल इलिप्स बन जाता था, शायद कुछ इसी तरह ये असंभव कथानक किसी मूल कथ्य के अपभ्रंश न हों।

कभी कभी मेरे भीतर छिपा विज्ञान कथा लेखक सोचता है कि महाभारत के ये विचित्र कथानक कहीं किसी गूढ़ वैज्ञानिक रहस्य के सूत्र वाक्य तो नहीं। ये सब अन्वेषण और शोध के विषय हो सकते हैं।

इतने अश्वों का विश्वामित्र जैसे तपस्वी करेंगे क्या? उनके आश्रम का तपोवन तो अश्वों से ही भर जाएगा। ” “

मेरा विज्ञान कथा लेखक इशारा करता है कि कही यह यूरेनियम का कोड वर्ड तो नहीं ? कहीं वे कोई अस्त्र तो नहीं बना रहे थे? खैर।

डा संजीव कुमार का यह एक और साहित्यिक सुप्रयास स्तुत्य है। यह उनकी साहित्यिक वर्दी पर एक और बड़ा तमगा है। मन झिझोड़ने वाला असहज कथानक है। स्वयं पढ़ें और स्त्री विमर्श पर तत्कालीन स्थितियों और आज के परिदृश्य का अंतर स्वयं आकलित करें।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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